गांवों में मुकद्दम भी करते रहे स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व

पूर्व आलेख में प्रसंग इटावा का चल रहा था कि यहां के मुकद्दम या ग्राम्य मुखिया लोगों ने भी किस प्रकार स्वतंत्रता की ज्योति जलाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पूर्व आलेख में प्रसंग इटावा का चल रहा था कि यहां के मुकद्दम या ग्राम्य मुखिया लोगों ने भी किस प्रकार स्वतंत्रता की ज्योति जलाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इटावा का प्राचीन इतिहासप्राचीन काल में इटावा का नाम इष्टिकापुर मिलता है। बौद्घकाल में यहां अनेकों बिहार चैत्य थे, कालांतर में यहां हिंदुओं के भव्य मंदिर बने। मुस्लिम काल में इन मंदिरों का विनाश कर हिंदू धर्म की रीढ़ को तोडऩे का कार्य किया गया।मुकद्दम सुमेर  व अधरनइटावा के दो मुकद्दमों के नाम ‘तारीखे मुबारकशाही’ के अनुसार राय सबीर का सुमेर तथा अधरन थे। इन दोनों के लिए मुहम्मद बिहामद खानी का कथन है कि इनके पास सुल्तान के पुत्र शाहजदा फतह खां से रूष्ट होकर मलिक सुरूक का पुत्र छुटटा (जिसे कहीं कहीं जहता भी लिखा गया है) पहुंचा। जिसे इन दोनों मुकद्दमों ने संरक्षण और शरण प्रदान की। सुमेर और अधरन का यह कृत्य सुल्तान को उचित नही लगा और वह क्रोध से लाल हो गया। इसलिए उसने इटावा के चौहानों का विनाश करने के लिए भारी सैन्यबल के साथ प्रस्थान कर दिया। मुहम्मद बिहामद खानी लिखता है-‘‘काफिर व दुष्ट जिनकी प्रसिद्घी और वीरता दूर दूर तक फैल चुकी थी बिना युद्घ किये रात्रि के अंधेरे में किले से भाग खड़े हुए। ‘‘खानी के इस कथन में प्रयुक्त शब्द प्रसिद्घी और वीरता दूर-दूर तक फैल चुकी थी ध्वनि देने योग्य है। इसका अभिप्राय है कि जो लोग विद्रोह कर रहे थे उनसे दूर-दूर के लोग भी प्रभावित थे। इन प्रसिद्घ और वीर लोगों ने सुल्तान को झांसे में डालते हुए रात्रि में किला छोड़ दिया। तब सुल्तान ने क्रोधावेश में आकर जनसंहार और चौहानों की लूट आरंभ कर दी। उधर मलिक छुट्टा स्वयं ही सुल्तान के पास पहुंच गया और उसने सुल्तान से क्षमायाचना कर ली।सुल्तान ने मचाई लूट, मुकद्दमों ने किया पुन: विद्रोहसुल्तान ने इटावा में व्यापक लूटपाट की, कितने ही मंदिरों को तुड़वा दिया। जकी के द्वारा हमें ज्ञात होता है कि सुल्तान ने यहां मलिक मोहम्मद शाह अफगान को नियुक्त कर दिया था। इसके पीछे सुल्तान का उद्देश्य यही रहा होगा कि भविष्य में इटावा में पुन: कोई विद्रोह न होने पाये। परंतु जकी से ही हमें ज्ञात होता है कि इटावा के मुकद्दमों ने 1371 ई. में पुन: विद्रोह कर दिया। फलस्वरूप सुल्तान को इटावा के स्वतंत्रता आंदोलन का दमन करने के लिए पुन: इटावा की ओर प्रस्थान करना पड़ा। मुस्लिम लेखकों के वर्णन से ही हमें पता चलता है कि इस बार सुल्तान ने इन मुकद्दमों के साथ अपनी ओर से ही संधि समझौते का प्रस्ताव रखा और सुल्तान की उदारता के कारण दोनों पक्षों में समझौता हो गया। राय सुमेर और अधरन को वह दिल्ली ले आया जहां उनके साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार किया गया और वे दोनों ही राजधानी के प्रमुख व्यक्तियों में गिने जाने लगे। (संदर्भ : ‘सल्तनत काल में हिंदू प्रतिरोध’)भय बिन होई ना प्रीतिसुल्तान की उदारता को हम प्रशंसनीय मानते हैं। उसने अपनी ओर से मानवता का प्रदर्शन किया तो हिंदुओं की उदारता भी देखिये कि समानता के स्तर पर आते ही उसके कदम का स्वागत किया। परंतु इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि सुल्तान की इस उदारता और मानवता के मूल में ‘हिन्दू भय’ समाहित था। यह ठीक है कि  पहली बार के आक्रमण में वह लूटमार करके चला गया, परंतु एक विशाल सेना का गठन करके चलना और शत्रु को शांत करने में असफल रह जाना, निश्चित रूप से घाटे का सौदा ही होता था। इसके अतिरिक्त फीरोज क्रूर होकर भी दुर्बल था, तीसरे सुल्तान को यह भी ज्ञात था कि उसके पूर्ववत्र्तियों के शासनकाल में हिंदू प्रतिरोध यदि निरंतर जारी रहा तो इसे अब भी शांत करने का ढंग परिवर्तित करना उचित होगा। इसीलिए उसने इटावा के दोनों  मुकद्दमों  के साथ राजधानी दिल्ली में भी सम्मान जनक व्यवहार किया।इस सबके उपरांत भी सुल्तान के विरूद्घ ‘हिंदू प्रतिरोध’ निरंतर जारी रहा, एक क्षेत्र विशेष के साथ सुल्तान की नीति को दूसरे क्षेत्रों में मान्यता नही मिली, आग भडक़ती रही और सुल्तान उसे बुझाने के लिए इधर से उधर भागता रहा। हिंदुओं के स्वतंत्रता प्रेम ने सचमुच तुगलक सुल्तानों को नचाकर रख दिया था। विशेषत: मुहम्मद बिन तुगलक और फीरोजशाह तुगलक पर तो यह कथन अक्षरश: लागू होता है।कटेहर का स्वतंत्रता प्रेमी खडक़ सिंहमुस्लिम लेखकों से हमें ज्ञात होता है कि कटेहर जिसे आजकल रूहेलखण्ड कहा जाता है, के एक  मुकद्दम खडक़ सिंह ने 1380-81 ई. में बदायूं के मुक्ता सैय्यद मुहम्मद और उसके भाई सैय्यद अलाउद्दीन को अपने घर भोज पर आमंत्रित किया और उनकी हत्या कर दी। मुकद्दम खडक़ सिंह के भीतर स्वतंत्रता की भावना मचल रही थी, और वह किसी न किसी प्रकार से विदेशी मुस्लिम शासकों के विरूद्घ अपनी आवाज को क्रांति के रूप में परिवर्तित करने हेतु आतुर था।जब मुकद्दम खडक़ सिंह की इस दुस्साहसपूर्ण कार्यवाही की जानकारी सुल्तान फीरोजशाह को हुई तो वह बड़ा क्रोधित हुआ। सुल्तान ने इस मुकद्दम को दंडित करने की दृष्टि से कटेहर की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में हिन्दुओं के साथ अत्याचार, अनाचार और महिलाओं के साथ बलात्कार की ऐसी वीभत्स घटनाएं की गयीं, जिन्हें लेखनी वर्णन भी नही कर सकती।खडक़ सिंह को ज्ञात था कि सुल्तान क्रोधवश दण्डात्मक कार्यवाही के लिए अवश्य आएगा। अत: उसने समय पूर्व ही कटेहर छोड़ दिया। वह कुमायूं के  पर्वतीय प्रदेशों की ओर चला गया।  राज्य में प्रवेश करने पर सुल्तान ने हिन्दू हत्या यंत्र का चक्र इतनी निर्ममता से चलाया कि इतिहासकार को स्पष्ट लिखना पड़ गया कि-‘‘कत्लेआम इतना सामूहिक और इतना भेदभावहीन रहा कि मृत सैय्यदों की रूहों को खुद इसे रोकने आना पड़ा। (पृष्ठ 96-‘दिल्ली सुल्तानेर’ नामक ‘भारतीय जनता का इतिहास एवं सभ्यता क्रम’ की भारतीय विद्या भवन प्रकाशन की पुस्तक का छठा भाग) बताया जाता है कि एक बार फीरोज की नाक ही कट गयी। फीरोजशाह ने हजारों लोगों की हत्या कर दी, 23000 कृषकों, श्रमिकों, बूढ़ों और बच्चों को बंदी बना लिया। मगर वीर हिंदू डटे रहे।’’नही मांगी प्राणों की भिक्षाकहने का अभिप्राय है कि अपने मुकद्दम के दुस्साहस पर भी किसी हिन्दू ने व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से खड़े होकर अपने प्राणों की भिक्षा सुल्तान से नही मांगी और ना ही कटेहर के मुकद्दम को पकडक़र लाकर सुल्तान को सौंपने की ही बात कही। हिंदुओं ने निर्मम अत्याचार सहे हजारों की संख्या में बलिदान दिये,  पर स्वाभिमान को समाप्त नही होने दिया।यहां कटेहर के मुकद्दम खडक़ सिंह को कायर कहा जा सकता है, कि वह दो मुस्लिमों को मारकर भाग गया था। डा.वा.मो. आठलेजी ने अपनी पुस्तक ‘भारत की पहचान’ के पृष्ठ 22 पर लिखा है :-‘‘युद्घ तो राज्य और संपत्ति के लिए भी किया जाता है और राष्ट्र के सम्मान की रक्षा की दृष्टि से भी। स्वार्थ के लिए किये गये युद्घ में तो पराजय की स्थिति में संधि या लेन देन भी किया जा सकता है किंतु सम्मान की रक्षा हेतु किये गये युद्घ में केवल दो ही विकल्प होते हैं-विजय या मृत्यु।’’अत: खडक़ सिंह के सामने भी ये दो ही विकल्प थे-विजय या मृत्यु। विजय संदिग्ध थी और शत्रु से संधि समझौता कर क्षमायाचना करते हुए स्वाभिमान बेचना उचित नही था-इसलिए मृत्यु ही सही या असीम कष्टों से भरे जीवन को दूर जंगल के एकांत में जीना ही उसके लिए सही था। यह कायरता नही वीरता थी जो जीवन को असीम संकटों में जानबूझकर डालकर प्रदर्शित की जा रही थी। हमारे देश में दूसरों के आनंद के लिए निज प्राणों का दान करना सर्वोत्तम दान माना जाता रहा है। दूसरों के लिए कष्ट सहने में जीवन का परमानंद खोजा गया है। उक्त पुस्तक के लेखक लिखते हैं :-‘‘दधीचि ऋषि ने आततायी वृत्रासुर के वध हेतु वज्र के निर्माण के लिए अपनी अस्थियों को समर्पित किया। राजा शिवि ने एक निर्दोष पक्षी की रक्षा हेतु शरीर का मांस समर्पित किया। दोनों ही इतिहास की घटनाएं हैं और दोनों में ही प्राणदान की तत्परता है। एक में राष्ट्र के आक्रांता के विनाश हेतु तथा दूसरे में निर्दोष की रक्षा हेतु ये दोनों ही हमारी संस्कृति के अंग हैं। परित्राणाय साधूनां विनाशाय  च दुष्कृताम्।’’कटेहर का मुकद्दम और  भारत की वीर परंपराजिस देश में प्राणदान की परंपरा रही हो, उसमें निजी सुख वैभव को लात मारकर उसे ‘मां भारती’ के परम वैभव के सामने तुच्छ मानकर मां की सेवा को अपना संकल्प बनाकर जीवन जीने वालों की एक लंबी परंपरा रही है। कटेहर का मुकद्दम उसी परंपरा की एक कड़ी बन गया था।कटेहर के विषय में फरिश्ता का कथन है कि वहां लगभग 33000 लोग बंदी बनाये गये तथा दास बनने के लिए विवश किये गये।सुल्तान सदा  भयभीत रहासुल्तान को इतना सब कुछ करने पर भी कटेहर के शेर का भय निरंतर लगा रहा था। इसलिए सुल्तान शिकार खेलने के बहाने कटेहर में प्रतिवर्ष जाता रहा था। इसके पीछे कारण यही था कि खडक़सिंह के कहीं न कहीं जीवित होने का भय सुल्तान को था। शिकार करते-करते इतने हिन्दुओं का नाश इस प्रांत में कर दिया गया था कि मुस्लिम लेखकों को भी स्वीकार करना पड़ा कि ये प्रांत पूर्णत: वीरान हो गया था। इतिहासकारों का यह भी मानना है कि सुल्तान की शक्ति में कमी आते ही कटेहर शासकों, मुकद्दमों और जनसाधारण ने अपनी स्वतंत्रता की पुन: घोषणा कर दी थी। युद्घ के हम प्रेमी हो गये थेहमारे हिन्दू वीरों का भयंकर विनाश के मध्य इस प्रकार पुन: पुन: स्वतंत्रता के लिए उठ खड़ा होना स्पष्ट करता है कि युद्घ से हमें कितना प्रेम हो गया था और उससे मुंह फेरने के स्थान पर अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए हम उसे अपने लिए कितना अनिवार्य मानने लगे थे। हमने हजारों वर्ष पूर्व युद्घ से मुंह फेरने वाले अर्जुन को उपदेश देकर युद्घ के  लिए सन्नद्घ करने वाले कृष्ण को भगवान बनाकर और उनके गीता ज्ञान को भगवान की वाणी बनाकर यूं ही अमर नही किया था, अपितु उसे अपने राष्ट्रीय चरित्र का एक अंग बना लिया था। यही कारण था कि स्वतंत्रता की ज्योति को बुझाने के लिए उठ रहे प्रचण्ड अवरोध, गतिरोध और तूफान भी उसे बुझा नही पा रहे थे। लगता था अहिंसा प्रेमी बुद्घ के ‘आत्मदीपो भव:’ के संदेश ने हमारी राष्ट्रीय चेतना को स्वत: स्फूर्त प्रेरणा का अजस स्रोत ही बना दिया था। इसलिए ‘खडक़ सिंह’ उत्पन्न होते रहे और विदेशी सुल्तानों को एक ‘खडक़ सिंह’ के लिए शमशीर खानों की बलि चढ़ानी पड़ती रही। कौरव पाण्डवों का युद्घ तथा पाण्डवों की विजय ऐतिहासिक घटना है तथा उस दुर्धर्ष संग्राम के मध्य अर्जुन की प्रेरणास्वरूप सर्वदर्शन रूप पयस्विनी गीता हमारी सांस्कृतिक धरोहर बनी। इसी गीता ने हताश अर्जुन के मोह को भंग कर धर्म युद्घ के लिए प्रेरित किया। त्याग-तपस्या के साथ ही लोकहित तथा धर्म-स्थापना के लिए संघर्ष हमारी संस्कृति का उद्घोष है।(संदर्भ : ‘भारत की पहचान’ पृष्ठ 23)गागरौन का गौरवराजस्थान का इतिहास वीरता और सल्तनत काल के हिंदू प्रतिरोधों की कहानियों से भरा पड़ा है। यद्यपि कुछ ऐसे उदाहरण भी है कि जब कुछ राजपूतों ने अपनी कन्याएं मुस्लिम सुल्तानों/बादशाहों को सौंपकर हिंदू के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाई, परंतु अधिकांश राजस्थानी इतिहास हिन्दू की वीरता, विजय और वैभव का इतिहास है। झालावाड़ जनपद के अंतर्गत आने वाला गागरौन भी अपने अंतर में ऐसी ही गौरवप्रद झांकियों को समेटे हुए है।इस किले को जलदुर्गों की श्रेणी का सर्वोत्तम दुर्ग माना जाता है। क्योंकि इसके तीन ओर काली सिंध तथा आहू नदियां घूम जाती हैं, जो इसे शत्रु के लिए दुर्भेद्य बनाती हैं। अपने अजेय स्वरूप के कारण इस किले का भारत के और विशेषत: राजस्थान के दुर्गों में महत्वपूर्ण स्थान है। मध्य काल में यहां कितने ही वीर हिन्दुओं ने अपनी स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिये और वीरांगनाओं ने अपना जौहर व्रत निभाकर अपनी अस्मिता और स्वतंत्रता की रक्षा की। कर्नल टॉड हमें बताते हैं-‘‘जब तक आप गागरोन दुर्ग न पहुंच जाएं (चारों ओर से घने वृक्षों से आच्छादित होने के कारण) तब तक चारों ओर दुर्गम और सघन जंगल ही दिखाई देता है, गढ़ पहुंचने पर ही इस दुर्ग का अजेय रूप ज्ञात होता है।’’(संदर्भ : ‘राजस्थान का इतिहास’ पृष्ठ 590)गागरौन दुर्ग का अतीतइस दुर्ग के विषय में मान्यता है कि इसे किसी चौहान शासक ने 7वीं  8वीं शताब्दी के मध्य निर्मित कराया था। डोड परमारों के पश्चात यहां लंबे समय तक खींची राजपूतों का वर्चस्व रहा। राजस्थानी इतिहासकार जगदीश सिंह गहलौत की मानें तो इस दुर्ग की स्थापना डोड राजा बीजलदेव द्वारा सन 1195 के लगभग करायी गयी थी। यहां कभी खुम्माण प्रथम ने भी अरब सेना के छक्के छुड़ाये थे। जनश्रुति है कि  प्राचीन काल में यहां गर्ग ऋषि ने तपस्या की थी। उसी के नाम से गागरौन शब्द प्रचलित हुआ। यहां पर 92 मंदिरों के प्राचीन ध्वंसावशेष आज भी पड़े हैं।अलाउद्दीन खिलजी को यहां खींची राजपूत राजा जैतसी ने करारा उत्तर दिया था और उसका विजय अभियान (1300 ई. में)  यहां रोककर अपनी वीरता का प्रमाण दिया था। इस प्रकार गागरौन का एक समृद्घ और गौरवशाली अतीत रहा है। जब दिल्ली पर फीरोज तुगलक शासन कर रहा था तो उस समय गागरौन पर संभवत: पीपा जी शासन कर रहे थे।गागरौन का वीर पीपाजीपीपाजी को झुकाने के लिए फीरोज तुगलक ने मलिकजादा फीरोज एवं मलिक सरदवालतदार को 12 हजार की सवार सेना देकर आक्रमण करने के लिए भेजा। ‘तारीखे मुहम्मदी’ का लेखक हमें बताता है कि इस सवार सेना के साथ असंख्य पैदल सैनिक थी साथ थे। शाही सेना ने गागरौन दुर्ग को घेर लिया। गागरौन की वीर हिंदू  प्रजा ने अपने राजा का साथ देते हुए फीरोज तुगलक की शाही सेना का तीव्रतम प्रतिरोध किया। शिहाब हकीम की मआसिरे महमूद शाही से हमें पता चलता है कि शाही सेना ने आसपास के क्षेत्रों का विनाश कर दिया, परंतु वह शाही सेना किले की दुर्भेद्यता तथा हिंदू नागरिकों के तीव्र प्रतिरोध के कारण दुर्ग पर अधिकार नही कर सक ी। शाही सेना एक छोटे से राज्य के किले पर अधिकार न कर सके यह भी अपमानजनक स्थिति थी। इसलिए इस अपमानजनक स्थिति से बचने के लिए एक ही विकल्प था-संधि समझौता करके सम्मान की रक्षा करते हुए दिल्ली लौट आना।अत: परिणामस्वरूप हिन्दू नरेश के साथ संधि समझौता का प्रस्ताव भेजा गया। हिंदू नरेश से संधि कर शाही सेना दिल्ली लौट गयी। इतिहास में मुख्य भूमिका फीरोज तुगलक को दी गयी। परिणाम ये निकला कि फीरोज के संधि शासक ने ही अपनी ओर से संधि प्रस्ताव दिया और शाही सेना विजयी होकर दिल्ली लौटी।गागरौन: हमारे गौरव का स्मारकवस्तुत: गागरौन दुर्ग भी हमारे स्वतंत्रता संग्राम का एक पवित्र और गौरवपूर्ण स्मारक है। खींची शासकों के तीव्र प्रतिरोध के कारण ही शाही सेना को दिल्ली लौटना पड़ा था। जिनका  अतीत गौरवपूर्ण होता है, सच है कि गौरवपूर्ण इतिहास का सृजन भी वही करते हैं। गागरौन के हिंदू प्रतिरोध ने इस बात की पुष्टि की। आज वहां इस गौरवप्रद दुर्ग में किसी भी स्वतंत्रता सैनानी या बलिदानी का या वीरोचित कृत्यों का कोई उल्लेख किसी शिला लेख पर नही है। स्मारकों का इतना भारी अपमान? शोक! महाशोक!!मेवात ने पुन: करवट लीमेवात के इतिहास और वीरता पर प्रसंगवश हम पूर्व में प्रकाश डाल चुके हैं। इसके नायकों के गौरवपूर्ण कृत्यों से बने इतिहास को पढक़र भी पाठकों के हृदय में रोमांच उत्पन्न होता है। पाठकों को स्मरण होगा कि इटावा के मुकद्दम राय सुमेर तथा अधरन ने अपनी वीरता का प्रदर्शन किस प्रकार किया था? ‘सल्तनत काल में हिंदू प्रतिरोध’ के विद्वान लेखक हमें सप्रमाण बताते हैं कि सुल्तान फीरोज की वृद्घावस्था के कारण वजीर खानेजहां बहुत महत्वाकांक्षी हो चला था, और वह शाही परिवार के लोगों के विरूद्घ ही षडयंत्र रचने लगा था। इसलिए सुल्तान ने अपने शहजादे मुहम्मद खां को उसका दमन करने के लिए भेजा। जुलाई अगस्त 1387 ई. में शहजादा अपनी सेना के साथ खानेजहां के यहां पहुंचा। इस सेना में मुकद्दम सुमेर और अधरन भी सम्मिलित थे। सेना ने वजीर के घर को घेर लिया। वजीर खाने जहां ने सर्वप्रथम तो सामना करना चाहा परंतु सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाकर वह अपने दो पुत्रों तथा अनुयायियों के साथ घर से निकलकर मेवात की ओर भाग खड़ा हुआ। महारी का कोका चौहान वजीर ने महारी नामक एक गांव में कोका चौहान के यहां जाकर शरण ली। कोका चौहान ने वजीर को शरण दे दी। कोका चौहान को ज्ञात था कि उसने ततैयों के बर्र में हाथ डाल दिया है। परंतु आये हुए शरणार्थी को शरण देना ही उसने उन परिस्थितियों में उचित समझा? अत: शहजादा मुहम्मद खां के लिए कोका चौहान  का दमन  करना आवश्क हो गया था। मेवात जिस प्रकार दुस्साहस के साथ करवट बदल रहा था वह शहजादा के लिए असहनीय तो था ही साथ ही अपने सम्मान और प्रतिष्ठा को चुनौती देने वाला एक कृत्य भी था। अत: शहजादा ने शीघ्र ही एक बड़ी सेना के साथ सिकंदर खान को मेवात के वजीर खानेजहां को और कोका चौहान को दण्ड देने के लिए भेजा।कोका चौहान को सुल्तान की शाही सेना के प्रस्थान की सूचना मिली तो उसने राजभक्ति प्रदर्शित करते हुए वजीर खां ने जहां को बंदी बनाकर सिकंदर को सौंप दिया जिसने उसकी हत्या करा दी।कोका चौहान के द्वारा दिल्ली की सल्तनत को चुनौती देना एक वीरता का कृत्य था। उसके दमन के लिए दिल्ली की सल्तनत के द्वारा विशेेष तैयारी करना और सिकंदर खां को उसका दमन करने के लिए विशेष रूप से भेजना भी यह सिद्घ करता है कि गांवों के मुकद्दमों तक से युद्घ के लिए तत्कालीन मुस्लिम सुल्तानों को कितनी तैयारी के साथ चलना पड़ता था। मुकद्दमों का भय सुल्तानों के भीतर रहता था। सुल्तान की विशाल सेना से घबराकर कोका चौहान ने यदि खानेजहां को सिकंदर खां को सौंप दिया तो इसमें भी कोई अपराध नही था, क्योंकि उस समय के राजनीतिक परिवेश में ऐसी घटनाएं मुस्लिम सरदारों के द्वारा कितनी ही बार हो चुकी थीं। कोका चौहान ने अपने देश के एक शत्रु को उसी के भाई को सौंपकर कोई अनुचित कार्य नही किया, अपितु भारत की स्वतंत्रता का एक शत्रु ही बिना किसी प्रतिरोध के समाप्त करा दिया। राजनीति के अंतर्गत कूटनीति में अपने देश के हित सदा ऊपर होते हैं। इसलिए  जिन परिस्थितियों में कोका चौहान ने वजीर को सिकंदर के हाथों सौंपा, वह उचित ही था, यद्यपि शरणागत की रक्षा करना भारत की परंपरा रही है, परंतु शरणागत का चरित्र, उद्देश्य और आचरण भी देखा जाना अपेक्षित है। क्रमश:

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