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भाषा से खुलेंगे रोजगार के द्वार

indian languagesडा. भरत झुनझुनवाला

कौशल विकास के माध्यम से रोजगार उत्पन्न करने के लिए सरकार को चाहिए कि जर्मन, फ्रेंच, चाइनीज तथा जापानी जैसी भाषाओं का भारत में विस्तार करें। स्नातक छात्रों के लिए एक विदेशी भाषा को सीखना अनिवार्य बना देना चाहिए। कई अमरीकी विश्वविद्यालयों में ऐसी व्यवस्था लागू है। देश के हर जिले में कृषि विज्ञान केंद्रों की तरह विदेशी भाषा केंद्र खोलने चाहिए। इन केंद्रों में विदेशी भाषा की शिक्षा देनी चाहिए। विश्वविद्यालयों को निर्देश देना चाहिए कि हर स्नातक को एक स्किल का कोर्स भी कराए। जैसे अंग्रेजी के एमए के छात्रों को ट्रांसलेशन का कोर्स कराएंज्वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2009 से 2012 में प्रति वर्ष संगठित क्षेत्र में मात्र पांच लाख रोजगार का सृजन हुआ है। हमारे श्रम बाजार में प्रति वर्ष एक करोड़ युवा प्रवेश कर रहे हैं। पुराना बैकलॉग कम से कम छह करोड़ का है। क्या कारण है कि हम केवल पांच लाख रोजगार प्रति वर्ष सृजित कर रहे हैं? कारण है कि कंपनियों द्वारा अधिकाधिक मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। विकास की प्रक्रिया में ऐसा होता ही है। विकास का अर्थ होता है समृद्धि यानी पूंजी की  प्रचुर उपलब्धता। पूंजी अधिक उपलब्ध होने से ब्याज दर कम हो जाती है और कंपनियों के लिए महंगी ऑटोमेटिक मशीनों में निवेश करना लाभप्रद हो जाता है। दूसरी तरफ  विकास की प्रक्रिया में लोगों का जीवन स्तर ऊंचा होता है और वेतन बढ़ते हैं। इससे कंपनियों के लिए श्रमिक को रोजगार देना घाटे का सौदा होने लगता है। इस प्रकार विकास का तार्किक परिणाम बेरोजगारी है। विकास दर ऊंची होने का अर्थ है कि कंपनियां अधिक उत्पादन करके सस्ता माल बेच रही हैं। ऐसा तब ही संभव है, जब वे श्रमिकों का उपयोग कम करें। जैसे कि चीनी मिल ने बायलर में बगास झोंकने की ऑटोमेटिक मशीन लगा दी। लागत कम आई और कंपनी ने उत्पादन बढ़ाया, परंतु रोजगार का हनन हुआ। इस प्रकार विकास और बेरोजगारी साथ-साथ चल रहे हैं। इस समस्या का समाधान मनेरगा जैसी योजनाओं से नहीं निकल सकता है। कारण यह कि मनेरगा के लिए राजस्व जुटाने के लिए बड़ी कंपनियों से टैक्स अधिक मात्रा में वसूल करना होगा। ऐसा तब ही संभव है, जब ये कंपनियां अधिक उत्पादन करें। इनके द्वारा अधिक उत्पादन जब ऑटोमेटिक मशीनों से किया जाएगा, तब ही बाजार में टिकेगा। ऑटोमेटिक मशीनों के उपयोग से रोजगार का हनन होगा। जितना रोजगार हम मनेरगा से बनाएंगे उससे ज्यादा बेरोजगारी ऑटोमेटिक मशीनों से बढ़ेगी। हमें अर्थव्यवस्था को दो क्षेत्रों में विभाजित कर देना चाहिए। एक ‘विकास क्षेत्र’ तथा दूसरा ‘रोजगार क्षेत्र’। विकास क्षेत्र में पेट्रोलियम, स्टील, रेल जैसे पूंजी सघन उद्योगों को रखना चाहिए। इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावनाएं कम होती हैं। रिफाइनरी में बालटियों से पेट्रोल को शोधित नहीं किया जा सकता है। इस क्षेत्र में पूंजी के प्रचुर उपयोग की छूट देनी चाहिए। यहां लक्ष्य अधिकाधिक मात्रा में सस्ता उत्पादन होना चाहिए, जिससे हम विश्व बाजार में अपना रुतबा स्थापित कर सकें। ‘रोजगार क्ष़ेत्र’ में बिलकुल अलग नीति लागू करने की जरूरत है। जैसे बुनाई को लें। पावर लूम पर भारी मात्रा में टैक्स लगा दिया जाए तो मशीन से बना कपड़ा महंगा हो जाएगा। फलस्वरूप हैंडलूम सहज ही सस्ता पडऩे लगेगा। करोड़ों लोगों को हैंडलूम से कपड़ा बुनने में रोजगार मिल जाएगा। मनेरगा की जरूरत ही नहीं रह जाएगा अथवा हार्वेस्टर पर टैक्स लगा दें तो कटाई में करोड़ों रोजगार उत्पन्न हो जाएंगे। लेकिन ट्यूबवेल पर टैक्स लगाना उचित नहीं होगा चूंकि 500 फीट की गहराई से रहट से पानी निकालना संभव ही नहीं है। सरकार को चाहिए कि नीति आयोग को कहे देश में उपलब्ध तमाम तकनीकों का रोजगार ऑडिट करे। देखे कि किन तकनीकों पर न्यून टैक्स लगाने से ज्यादा संख्या में रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं। यह भी देखे कि एक साल में दो करोड़ रोजगार सृजित करने के लिए कितनी तकनीकों पर कितना टैक्स लगाना होगा। तदानुसार टैक्स लगा दें, तो एक पंथ दो काज हासिल हो जाएंगे। टैक्स की वसूली होगी, रोजगार सृजित होंगे और मनेरगा पर किए जाने वाले खर्च की बचत होगी, सो अलग। समस्या विश्व व्यापार संगठन के स्तर पर उत्पन्न होगी। भारत में पावरलूम पर टैक्स लगाने से हमारे घरेलू बाजार में कपड़ा महंगा हो जाएगा। फलस्वरूप पावरलूम से चीन में बना सस्ता कपड़ा प्रवेश करेगा। ऐसा हुआ तो हमें दोहरा नुकसान होगा। हमारा हैंडलूम उद्योग बंद हो जाएगा, चूंकि चीन का सस्ता कपड़ा बाजार में उपलब्ध होगा। दूसरा यह कि उस पर भारी टैक्स लगा लेने से  पावरलूम का कपड़ा महंगा पडऩे से भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अत: जरूरी होगा कि साथ-साथ पावरलूम से बने कपड़े पर भारी मात्रा में आयात कर लगाया जाए। ऐसा करने के लिए डब्ल्यूटीओ संधि में संशोधन भी आवश्यक हो सकता है, परंतु हमारी कर्मठ सरकार के लिए इसे हासिल करना कठिन नहीं है। रोजगार की समस्या का विश्व के किसी भी देश के पास समाधान नहीं है। सब देश सस्ता माल बनाने की होड़ में बेरोजगारी बढ़ाते जा रहे हैं, जैसे सभी को सम्मोहित कर दिया गया हो। ऐसे में मुख्यधारा का अनुसरण करते हुए सबके साथ नरक में जाने से उत्तम होगा कि हम स्वर्ग पहुंचने का अपना अलग रास्ता बनाएं। इस परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कौशल विकास को दिए जा रहे प्रोत्साहन को समझना होगा। प्रधानमंत्री ने 2022 तक 40 करोड़ श्रमिकों की कार्य क्षमता में सुधार का लक्ष्य रखा है। निश्चित ही स्किल के विकास से वैश्विक स्तर पर अनेक रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं। घरेलू अर्थव्यवस्था में रोजगार ठंडे पड़े रहें तो विश्व अर्थव्यवस्था से सहारा मिल सकता है। इंटरनेट के माध्यम से ट्रांसलेशन, बिल्डिंग का डिजायन, कानूनी शोध इत्यादि तमाम कार्यों को भारत में किया जा सकता है। आज देश में मिडल क्लास का विस्तार सॉफ्टवेयर के माध्यम से हुआ है। सॉफ्टवेयर की तर्ज पर दूसरे क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर विकास हो सकता है। इस दिशा में इंटरनेट के माध्यम से जिन सेवाओं का निर्यात हो सकता है, उन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। हमारे फिटर तथा मेकेनिकों के लिए विश्व के रोजगार के अवसर खुलना कठिन हैं, चूंकि ये सेवाएं दूसरे देश में जाकर ही मुहैया कराई जा सकती हैं। कौशल विकास के माध्यम से रोजगार उत्पन्न करने के लिए सरकार को चाहिए कि जर्मन, फ्रेंच, चाइनीज तथा जापानी जैसी भाषाओं का भारत में विस्तार करें। स्नातक छात्रों के लिए एक विदेशी भाषा को सीखना अनिवार्य बना देना चाहिए। कई अमरीकी विश्वविद्यालयों में ऐसी व्यवस्था लागू है। देश के हर जिले में कृषि विज्ञान केंद्रों की तरह विदेशी भाषा केंद्र खोलने चाहिए। इन केंद्रों में विदेशी भाषा की शिक्षा देनी चाहिए। विश्वविद्यालयों को निर्देश देना चाहिए कि हर स्नातक को एक स्किल का कोर्स भी कराए। जैसे अंग्रेजी के एमए के छात्रों को ट्रांसलेशन का कोर्स कराएं। स्किल डिवेलपमेंट का केंद्र वैश्विक बाजार होना चाहिए। इस दिशा में घरेलू उद्यमों में विशेष रोजगार उत्पन्न नहीं होंगे। देश में तमाम स्किल्ड लोग वर्तमान में ही बेरोजगार हैं। ऐसे में स्किल डिवेलपमेंट से केवल टोपी ही बदली जाएगी। वर्तमान में कार्य कर रहे 70 अंक वाले वर्कर को बर्खास्त करके उद्यमी 90 अंक वाले वर्कर को रोजगार देगा। कुल रोजगार में वृद्धि कम ही होगी। अत: स्किल डिवेलपमेंट का लक्ष्य विदेशों में इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध कराने वाली सेवाओं का होना चाहिए। इस दिशा में मोदी कारगर कदम उठाएंगे तो देश के युवा उन्हें प्रणाम करेंगे।

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