महाभारत के युद्ध का काल निर्धारण

images (32) (1)

कब हुआ महाभारत का युद्ध

गुंजन अग्रवाल

महाभारत का युद्ध कब हुआ? इस यक्ष-प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ लेने पर भारतीय इतिहास की बहुत सारी काल-सम्बन्धी गुत्थियाँ सुलझ सकती हैं। विगत दो शताब्दियों में अनेक देशी-विदेशी इतिहासकारों ने महाभारत-युद्ध की तिथि निर्धारित करने और उसके आधार पर समूचे इतिहास को व्यवस्थित करने का प्रयास किया है। पाश्चात्य इतिहासकारों ने तो भारतीय सभ्यता को अल्पकालीन ही सिद्ध किया है, अत: इस सन्दर्भ में उनके द्वारा प्रस्तुत तिथि की कोई विश्वसनीयता नहीं। यहाँ इस लेख में उनके तिथि-क्रम पर विचार करने का कोई लाभ भी नहीं है। रही बात भारतीय विद्वानों की, तो खेद के साथ लिखना पड़ रहा है कि अधिकांश भारतीय विद्वान् अपने इतिहास-ज्ञान के लिए पाश्चात्यों पर निर्भर रहे हैं। अर्थात् पाश्चात्यों द्वारा निर्धारित तिथियों को ही उन्होंने स्वीकार किया है। इस प्रकार अधिकांश भारतीय विद्वान् महाभारत-युद्ध की वास्तविक तिथि से पर्याप्त दूरी पर अंधेरे में भटकते रहे हैं।
कुछ प्रसिद्ध मान्यताओं की समीक्षा करना समीचीन रहेगा।
1. एहोल से दक्षिण के राजा चालुक्य पुलकेशियन द्वितीय (609-642) के समय के एक शिलालेख में एक जैन-मन्दिर बनवाने का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि महाभारत-युद्ध से 30+3000+700+5 (3735) और शक-राजाओं के 50+6+500 (556) वर्ष बीतने पर कलियुग में यह मन्दिर बनवाया गया है। यदि इन 3,735 वर्षों में से 556 वर्ष निकाल दिए जाएँ, तो 3179 वर्ष रहते हैं। अर्थात्, कलियुग के 3180वें वर्ष में शक संवत् का प्रारम्भ हुआ था। अथवा शक संवत् से 3180 वर्ष पूर्व कलियुग का प्रारम्भ हुआ था। वर्तमान 2020 ई. में शक संवत् 1942 चल रहा है। इससे 3180 अर्थात् 1942 + 3180 = 5122 वर्ष पूर्व (3102 ई.पू.) महाभारत का युद्ध और कलियुग का प्रारम्भ हुआ था। इस प्रकार, एहोल का शिलालेख 3102 ई.पू. में महाभारत-युद्ध और कलियुग का प्रारम्भ होना मानता है।
2. वराहमिहिर ने बृहत्संहिता, 13.3 में लिखा है कि जब युधिष्ठिर राज्य कर रहे थे, तब सप्तर्षि मघा नक्षत्र में थे। उनका संवत् 2526 वर्ष बीतने पर शक संवत् प्रचलित हुआ। कहने का तात्पर्य यह है कि शक संवत् के प्रारम्भ से 2526 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का शासन प्रारम्भ हुआ। शक संवत् का प्रारम्भ 78 ई. में हुआ। इसलिए 78-2526 = —2448, यानि 2448 ई.पू. में युधिष्ठिर का शासन प्रारम्भ हुआ। इस प्रकार बृहत्संहिता के अनुसार 2449 ई.पू. में महाभारत युद्ध हुआ।
3. कल्हण ने लिखा है कि कलियुग के 653 वर्ष बीतने पर इस भूतल पर कौरव और पाण्डव हुए थे।
4. विभिन्न पुराणों में एक श्लोक कुछ हेर-फेर के साथ आया है जिसके आधार पर कई विद्वानों ने महाभारत-युद्ध की तिथि 14वीं-15वीं शताब्दी ई.पू. निर्धारित की है। मत्स्य पुराण 273.35 और विष्णु पुराण 4.24.104 में कहा गया है कि परीक्षित के जन्म से नन्द के अभिषेक तक 1050 वर्ष होते हैं। वायु पुराण 99.409 और ब्रह्माण्ड पुराण 3.74.227 में भी कहा गया है कि परीक्षित के जन्म से महापद्मनन्द के अभिषेक तक 1050 वर्ष होते हैं। भागवत पुराण 12.2.26 में कहा गया है कि परीक्षित के जन्म से लेकर नन्द के अभिषेक तक 1,115 वर्षों का समय लगेगा।
उपर्युक्त पौराणिक वचन उनके वर्तमान उपलब्ध (प्रकाशित) संस्करणों से लिए गए हैं। विभिन्न पुस्तकालयों में उपलब्ध इन्हीं पुराणों की प्राचीन प्रतियों में आए श्लोक इनसे कुछ भिन्न हैं। उदाहरणार्थ मत्स्य पुराण की प्राचीन प्रति में ‘पञ्चाशदुत्तरम्Ó के स्थन पर ‘पञ्चशतोत्तरम्’ शब्द आया है। देखने में कोई विशेष अन्तर नहीं, किन्तु गणना करने पर कितना बड़ा अन्तर आ गया है, यह पाठक स्वयं देखेंगे। जहाँ आधुनिक प्रति के अनुसार गणना करने पर परीक्षित के जन्म से नन्द के अभिषेक तक 1,050 वर्ष होते हैं, वहीं प्राचीन प्रति के अनुसार गणना करने पर 1,500 वर्ष होते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि प्राचीन प्रतियों और उनके आधुनिक संस्करणों में इतना बड़ा अन्तर क्यों है? तो इसका उत्तर यह है कि पुराणों की प्राचीन प्रतियाँ अंग्रेज़ों के भारत आने से पूर्व की हैं। उनके पाठ शुद्ध हैं। वर्तमान प्रकाशित पुराण ब्रिटिश शासनकाल में सम्पादित किये गए हैं यानी उनमें गड़बड़ी की गई है। अंग्रेजों ने राजनीतिक उद्देश्य के तहत भारतीय इतिहास में भारी मात्रा में विकृतियाँ उत्पन्न कीं। इसके अंतर्गत उन्होंने यूरोपीय और कुछ भारतीय संस्कृतज्ञों को धन देकर उनसे भारत का इतिहास विकृत करवाया। इन तथाकथित विद्वानों ने भारतीय ग्रन्थों के मूल पाठों में कहीं अक्षरों में, कहीं शब्दों में और कहीं-कहीं वाक्यावली में परिवर्तन किए। यही नहीं, इसके साथ-साथ कहीं-कहीं प्रक्षिप्त अंश भी जोड़ दिए गए। राजाओं और उनके कालों को जान-बूझकर पीछे ले जाया गया। उदाहरण के लिए मत्स्य पुराण के जिस श्लोक में मौर्यवंश का राज्यकाल 316 वर्ष दिया गया था, छपी हुई प्रति में अक्षर बदलकर उसे ऐसा कर दिया गया जिससे उसका अर्थ 137 वर्ष हो गया है। विष्णु पुराण में मौर्यवंश का राज्यकाल 337 वर्ष दिया गया था, उसे भी 137 वर्ष में बदला गया । आज के अधिकतर विद्वान् 137 वर्ष को ही सही मानते हैं, किंतु कलिंग-नरेश खारवेल के हाथीगुम्फा-अभिलेख में मौर्यवंश के संदर्भ में 165वें वर्ष का स्पष्ट उल्लेख होने से अंग्रेज़ों द्वारा की गयी गड़बड़ी का पर्दाफाश हो गया है। ऐसी और भी अनेक गड़बडिय़ों का विवरण सुप्रसिद्ध इतिहासकार पं. कोटा वेंकटचलम् ने अपनी पुस्तकों द प्लॉट इन इंडियन क्रोनोलॉजी और क्रोनोलॉजी ऑफ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्स्ट्रकटेड में दिया है।
सारांश यह है कि मत्स्य, विष्णु, ब्रह्मांड, भागवत और वायु पुराणों में शुद्ध पाठ ‘पञ्चशतोत्तरम्’ है न कि ‘पञ्चाशदुत्तरम्’ या ‘पञ्चदशोत्तरम्’। लगभग प्रत्येक पुराण में महाभारत-युद्ध के समय से कलियुग के राजाओं की भविष्य-वंशावलियों का वर्णन है और उनके राजत्वकाल भी गिनाए गए हैं। उनकी ओर ध्यान देने से मत्स्यपुराण की प्राचीन प्रति का कथन प्रमाणित हो जाता है। प्राय: सभी पुराणों में लिखा है कि महाभारतकालीन जरासन्ध के पुत्र सहदेव थे, उनके पुत्र मार्जारि से लेकर बाहद्र्रथ वंश के 22 राजाओं का राज्यकाल 1,000 (1006) वर्ष तक था। बार्हद्रथों के पश्चात् प्रद्योतवंशीय पाँच राजाओं का राज्य 138 वर्ष तक रहा। उनके पश्चात् शिशुनागवंशीय दस राजाओं का राज्यकाल 360 वर्ष तक और उनके पश्चात् नन्दवंशीय 9 राजाओं का शासनकाल 100 वर्ष तक था। सबका योग होता है
(1006+138+360+100=) 1,604 वर्ष। यदि इस संख्या में नन्दवंशीय राजाओं का शासनकाल निकाल दें, क्योंकि महाभारत के युद्धकाल अथवा परीक्षित के जन्म से महापद्म के अभिषेक तक में महापद्म का राज्यकाल नहीं है, तो रह जाते हैं 1504 वर्ष, जिससे मत्स्यपुराण का प्राचीन पाठ अक्षरश: सत्य सिद्ध हो जाता है। इसके साथ ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि जो इतिहासकार विष्णु, मत्स्य आदि पुराणों के परिवर्तित श्लोक के आधार पर बार्हद्रथवंशीय राजाओं के समय से लेकर महापद्मनन्द तक के अभिषेक के समय को 950, 1015, 1050 और 1115 वर्ष गिनते हैं, और इस आधार पर महाभारत-युद्ध को 14वीं-15वीं शताब्दी ई.पू. में सिद्ध करते हैं, वे सर्वथा अमान्य हैं।
अभी तक के विवेचन से एक बात तो सिद्ध हो गई है, और वह यह है कि महाभारत-युद्ध नन्द के अभिषेक से लगभग 1,500 वर्ष पूर्व हुआ था। किन्तु, युद्धकाल से अबतक कितने वर्ष व्यतीत हुए, यह निश्चित नहीं हुआ। इसका उत्तर भी हमें महाभारत और पुराणों में मिल जाता है। महाभारत आदिपर्व, 2.13 में कहा गया है कि जब द्वापर और कलि की सन्धि का समय आनेवाला था, तब समन्तपञ्चक क्षेत्र (कुरुक्षेत्र) में कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं का परस्पर भीषण युद्ध हुआ। भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व, 3.1.4 में कहा गया है कि भविष्य नामक महाकल्प के वैवस्वत मन्वन्तर के 28वें द्वापर युग के अन्त में कुरुक्षेत्र में (महाभारत) युद्ध हुआ था। महाभारत स्त्रीपर्व, 25.44-45 में पुन: कहा गया है कि महाभारत-युद्ध के बाद गान्धारी ने श्रीकृष्ण को शाप दिया कि आज से 36 वर्ष के बाद यदुवंश का विनाश होगा और तुम भी मृत्यु को प्राप्त होगे। भविष्य पुराण प्रतिसर्गपर्व 3.4.3में कहा गया है कि पाण्डव 36 वर्षों तक राज्य करके स्वर्ग सिधारे थे। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने विख्यात ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में युधिष्ठिर का राज्यकाल 36 वर्ष, 8 मास और 25 दिन लिखा है। इस दृष्टि से भी 37वें वर्ष में पाण्डवों के राज्यत्याग और परीक्षित के राज्याभिषेक की बात सिद्ध होती है।
विष्णु 4.24.108, वायु 19.428-429, ब्रह्माण्ड 2.74.241 और भागवत पुराण 1.15.36 के अनुसार जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण अपने परमधाम को पधारे थे, उसी दिन, उसी समय पृथिवी पर कलियुग प्रारम्भ हो गया था। सारांश यह है कि महाभारत-युद्ध के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर ने 36 वर्ष, 8 मास और 25 दिनों तक शासन किया। उसी 37वें वर्ष में श्रीकृष्ण अपने परमधाम को पधारे। जिन दिन वे अपने परमधाम को पधारे, उसी दिन, उसी समय पृथिवी पर कलियुग प्रारम्भ हुआ। तो कलियुग का प्रारम्भ कब हुआ? इसका उत्तर भी हमारे ज्योतिष ग्रन्थों में मिल जाता है। भाष्कराचार्य ने अपने ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि के मध्यमाधिकार, कालमानाध्याय, 28 में लिखा है कि छह मन्वन्तर और सातवें मन्वन्तर के 27 चतुर्युग बीत चुके हैं। जो 28वाँ चतुर्युग चल रहा है, उसके भी 3 युग बीत चुके हैं और जो चौथा कलियुग चल रहा है, उसके भी शालिवाहन संवत् तक 3179 वर्ष गुजर चुके हैं।
शालिवाहन संवत् का प्रारम्भ 78 ई. में उज्जयिनी-नरेश शालिवाहन ने किया था और वर्तमान में शालिवाहन संवत् 1942 चल रहा है। अत:, 1942+3179 = 5121 वर्ष कलियुग के बीत चुके हैं और 5122वाँ वर्ष चल रहा है। इस दृष्टि से भी कलियुग का प्रारम्भ 5122 – 2020 = 3102 ई.पू. में हुआ था। इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध है कि कलियुग का प्रारम्भ 3102 ई.पू. में हुआ था।
भविष्य पुराण उत्तरपर्व, 101.6 के अनुसार कलियुग का प्रारम्भ माघ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था। इस प्रकार, 28वें कलियुग का प्रारम्भ माघ शुक्ल पूर्णिमा तदनुसार 18 फरवरी, शुक्रवार, 3102 ई.पू. को दोपहर 2 बजकर 27 मिनट और 30 सैकंड पर हुआ था। यह वह घड़ी थी जब सात नक्षत्र एक राशि पर एकत्र हो गए थे। चूँकि महाभारत का युद्ध कलियुग के प्रारम्भ से 37 वर्ष पूर्व हुआ था, अत: महाभारत-युद्ध की तिथि है— (3102+37=) 3139 ई.पू.। यह महाभारत-युद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, दिसंबर 3139 ई.पू. को प्रारम्भ होकर 18 दिनों तक चला।

देशी विदेशी विद्वानों की दृष्टि में महाभारत युद्ध की तिथियां

 वी.आर. लेले – 6228 ई.पू.

 व्हीलर – 6000 ई.पू.

 पद्माकर विष्णु वर्तक – 16 अक्टूबर-2 नवंबर 5561 ई.पू.

 पं. गणपति जानकी राम दूबे – 5226 ई.पू.

 स्वामी महादेवानन्द गिरि – 3475 ई.पू.

 प्लिनी – (बकासुर से सिकंदर तक 154 पीढ़ी, प्रति पीढ़ी 20 वर्ष मानने पर) लगभग 3300 ई.पू.

 जानकीनाथ शर्मा – 3265 ई.पू.

 पण्ड्या वैद्यनाथ – 3152-53 ई.पू.

 पं. चन्द्रकान्त बाली शास्त्री – 3148 ई.पू.

 प्रो. पी.वी. होले – 13-30 नवंबर 3143 ई.पू.

 एम. कृष्णमाचार्य – 3139 ई.पू.

 आचार्य उदयवीर शास्त्री – 3139 ई.पू.

 आचार्य रामदेव – 3139 ई.पू.

 राघवाचार्य – 3139 ई.पू.

 डॉ. के.एन.एस. पटनायक – 3139 ई.पू.

 पं. कोटा वेंकटचलम् – 3139 ई.पू.

 एन. जगन्नाथराव – 3139 ई.पू.

 स्वामी ओमानन्द सरस्वती – 3139 ई.पू.

 रवीन्द्र कुमार भट्टाचार्य – 3139 ई.पू.

 वृन पार्कर – 3138 ई.पू.

 पुरुषोत्तम नागेश ओक – 3138 ई.पू.

 रघुनन्दन प्रसाद शर्मा – 3138 ई.पू.

 प्रो. रीता वर्मा – 3138 ई.पू.

 प्रो. डी.डी. मिश्र – 3138 ई.पू.

 सुरेश कुमार – 3138 ई.पू.

 देवकरणी विरजानन्द – 3138 ई.पू.

 डॉ. देवसहाय त्रिवेद – 3137 ई.पू.

 सुभाष काक – 3137 ई.पू.

 स्वामी बोन महाराज – 3136 ई.पू.

 एहोल-शिलालेख – 3102 ई.पू.

 पं. माधवाचार्य – 3102 ई.पू.

 पं. इन्द्रनारायण द्विवेदी – 3102 ई.पू.

 प्रो. आपटे – 3102 ई.पू.

 युधिष्ठिर मीमांसक – 3102 ई.पू.

 पं. लेखराम – 3102 ई.पू.

 महामहोपाध्याय डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा – 3102 ई.पू.

 स्वामी करपात्रीजी महाराज – 3102 ई.पू.

 सच्चिदानन्द भट्टाचार्य – 3102 ई.पू.

 डॉ. नवरत्न एस. राजाराम – 3102 ई.पू.

 भवानीलाल भारतीय – 3102 ई.पू.

 सी.टी. केंगे – 3102 ई.पू.

 बी.एम. चतुर्वेदी – 3102 ई.पू.

 अबुल फज़ल – 3102 ई.पू.

 चिन्तामणि विनायक वैद्य – 3102-01 ई.पू.

 प्रो. काशिनाथ वासुदेव अभ्यंकर – 3101 ई.पू.

 श्रीपाद दामोदर सातवलेकर – 3100 ई.पू.

 पं. भोजराज द्विवेदी – 3087 ई.पू.

 मेगास्थनीज – (कृष्ण से चन्द्रगुप्त मौर्य तक 138 पीढ़ी, प्रति पीढ़ी 20 वर्ष मानने पर) लगभग 3078 ई.पू.

 के. श्रीनिवास राघवन – 3067 ई.पू.

 प्रो. बी.एन. नरहरि अचर – 3067 ई.पू.

 सम्पत आयंगर – 3067 ई.पू.

 शेषगिरि – 3067 ई.पू.

 पी. आर. चिदम्बरम् – 3038 ई.पू.

 जी.एस. सम्पत – 3023 ई.पू.

 जी.एस. सरदेसाई – 3023 ई.पू.

 प्रो. वी.बी. आठवळे – 3016 ई.पू.

 तलकधर शर्मा – लगभग 3000 ई.पू.

 सत्यप्रकाश सारस्वत – 3000 ई.पू.

 डॉ. एस. बालकृष्ण – 2559 ई.पू.

 वृद्धगर्ग – 2449 ई.पू.

 वराहमिहिर – 2449 ई.पू.

 कल्हण – 2449 ई.पू.

 महामहोपाध्याय विश्वेश्वरनाथ रेऊ – 2449 ई.पू.

 प्रो. पी.सी. सेनगुप्ता – 2449 ई.पू.

 अल्ब्रेट वेबर – पाणिनि के बाद

 एम. राजाराव – 2442 / 2420 ई.पू.

 जनार्दन सखाराम करंदीकर – 1931 ई.पू.

 दिलीप देवधर – 1800 ई.पू.

 आचार्य बलदेव उपाध्याय – 1506 ई.पू.

 प्रो. आई.एन. आयंगर – 1478 ई.पू.

 तारकेश्वर भट्टाचार्य – 1432 ई.पू.

 बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय – 1430

 आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी – 1430

 अलेक्ज़ेंडर कनिंघम – 1426 ई.पू.

 डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल – 1424 ई.पू.

 डॉ. रमेशचन्द्र दत्त – 1424 ई.पू.

 सत्यकेतु विद्यालंकार – 1424 ई.पू.

 लोकमान्य टिळक – 1400 ई.पू.

 देव – 1400 ई.पू.

 डॉ. एनफिन्स्टन – 1400 ई.पू.

 पं. कृष्णदत्त वाजपेयी – 1400 ई.पू.

 अनन्त सदाशिव अळतेकर – 1400 ई.पू.

 डॉ. अच्युत दत्तात्रेय पुसाळकर – 1400 ई.पू.

 आर.एल. सिंह – 1400 ई.पू.

 जवाहरलाल नेहरू – 1400 ई.पू.

 हेनरी थॉमस कोलब्रुक – 14वीं सदी ई.पू.

 शंकर बालकृष्ण दीक्षित – 14वीं सदी ई.पू.

 सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव – 1397 / 1263 ई.पू.

 होरेस हेमॅन विल्सन – 1370 / 1367 ई.पू.

 फ्रांसिस विलफोर्ड – 1370 ई.पू.

 फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन – 13वीं सदी ई.पू.

 डॉ. हण्टर – 1200 ई.पू.

 जॉन डाउसन – 1200 ई.पू.

 हेनरी मायर्स इलियट – 1200 ई.पू.

 डॉ. बिन्देश्वरी प्रसाद सिन्हा – 1200-1000 ई.पू.

 जॉन हेनरी प्राट – 12वीं सदी ई.पू. का उत्तरार्ध

 डॉ. रतिलाल मेहता – 12वीं सदी ई.पू.

 के.जी. शंकर – 1198 ई.पू.

 डॉ. केशो लक्ष्मण दफ्तरी – 1197 ई.पू.

 वेलण्डि गोपाल ऐयर – 14-31 अक्टूबर, 1194 ई.पू.

 जॉन बेंटलि – 1179 ई.पू.

 कर्नल ज़ेम्स टॉड – 1179 ई.पू.

 डॉ. सीतानाथ प्रधान – 1150 ई.पू.

 सुमन शर्मा – 1150 ई.पू.

 विन्सेण्ट आर्थर स्मिथ – 1000 ई.पू.

 आर्थर मैकडोनल – 1000 ई.पू.

 एच.ए. फड़के – 1000 ई.पू.

 फ्रेडरिक ईडन पाजऱ्ीटर – 950 ई.पू.

 निहार रंजन रे – 800 ई.पू.

 एच.सी. सेठ – छठी शताब्दी ई.पू.।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betgaranti yeni giriş
betsat giriş
betsat giriş
superbetin giriş
betgaranti giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
betsat giriş
betsat giriş
betpark giriş
betpark giriş
nesinecasino giriş
nesinecasino giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betgaranti giriş
jojobet giriş
betgaranti mobil giriş
klasbahis
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vdcasino giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betsat giriş
betsat giriş