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सैर सपाटा

ऋषि दयानंद जी की साधना-स्थली कर्णवास में गुजरे कुछ पल

कल दिनांक 18 अक्टूबर को ऋषि दयानंद जी की पवित्र साधना स्थली कर्णवास में कुछ पल बिताने का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ। जिला बुलंदशहर में गंगा के तट पर बसा यह अल्पज्ञात स्थान महर्षि की यादों को समेटे पर सरकारी दृष्टिकोण से पूर्णतया ओझल हुआ पड़ा है।
महर्षि दयानंद ने अपने जीवन काल में यदि सबसे अधिक कहीं प्रवास किया तो वह स्थान कर्णवास ही था। इसके बाद दूसरा स्थान फर्रुखाबाद था। जहां पर ऋषि दयानंद 9 बार गए थे।
यहां पर ऋषि दयानंद सबसे पहली बार अप्रैल-मई 9867 में आए थे। उसके पश्चात जून-जुलाई 18 67, तीसरी बार 8 जुलाई 18 67 चौथी बार अगस्त – सितंबर 18 67, पांचवी बार नवंबर 18 67, छठी बार दिसंबर 1867, सातवीं मई 1867, आठवीं बार सितंबर 1870 नौवीं बार नवंबर 1871 और 10 वीं बार 2 दिसंबर 1876 को पधारे थे।
उपरोक्त दिए गए तथ्यों से पता चलता है कि स्वामी जी महाराज 18 67 में ही सबसे अधिक बार इस स्थान पर पधारे थे। उस समय नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर एक कुइया होती थी। जो आज भी है।  इसके अतिरिक्त एक अच्छा बगीचा होता था। उसमें ही बैठकर महर्षि दयानंद अपनी साधना किया करते थे। वह स्थान आज भी सुरक्षित है जहां पर स्वामी जी बैठकर नदी की ओर मुंह करके अपनी साधना किया करते थे। चित्र में वह स्थान दिखाई दे रहा है।

  जब महर्षि दयानंद यहां पर 2 दिसंबर 1876 को अंतिम बार आए तो वह केवल 2 दिन रुक कर ही यहां से चले गए थे। क्योंकि उस समय महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित करने की अंग्रेज तैयारी कर रहे थे । जिसके विरुद्ध महर्षि दयानंद देशी राजाओं , क्रांतिकारियों और सामाजिक नेताओं से मिलकर स्वदेश -उत्थान के लिए योजना बनाने पर विचार करने हेतु दिल्ली चले गए थे।
जब महर्षि यहाँ पर आए थे तो यहां के लोगों ने उन्हें शरीर पर गंगा रज लगाए मात्र कौपीन धारण किए एक अवधूत परमहंस के रूप में ही देखा था। इसी स्थान पर महर्षि दयानंद जी का पंडित अंबादास पर्वती जी से शास्त्रार्थ हुआ था । दूसरा शास्त्रार्थ यहां पर उन्होंने पंडित हीरावल्लभ के साथ किया था। जिसका आंखों देखा हाल ठाकुर शेर सिंह ने लिखा था।
महर्षि दयानंद के कर्णवास प्रवास के बारे में बताया जाता है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की शिष्टता व निर्भयता
कर्णवास में कर्ण सिंह बड़े गुर्जर क्षत्रीय थे व जमीदार रईस थे, महर्षि दयानन्द जी को प्रमाण करके बोले कि हम कहां बैठे? स्वामी जी ने कहा कि जहां आपकी इच्छा है। कर्ण सिंह घमण्ड से बोले जहां आप बैठे हैं हम तो वहां बैठेंगे। एक ओर हटकर स्वामी जी बोले – ‘आइए बैठिये।’ उसने स्वामी जी से पूछा – आप गंगा को मानते हैं। उन्होंने उत्तर दिया गंगा जितनी है उतनी मानते हैं,
‘वह कितनी है।’ फिर कहा हम संन्यासियों के लिए कमण्डल भर है। कर्ण सिंह गंगा स्तुति में कुछ श्लोक पढ़ता है। स्वामी जी ने कहा यह तुम्हारी गप्प, भ्रम है। यह तो जल है। इससे मोक्ष नहीं होता, मोक्ष तो सत्य कर्मों से होता है।
फिर कर्ण सिंह बोले – हमारे यहां रामलीला होती है, वहां चलिए। स्वामी जी ने कहा तुम कैसे क्षत्रिय हो महापुरुषों का स्वांग बनाकर नाचते हो। यदि कोई तुम्हारे महापुरुषों का स्वांग बनाकर नाचे तो कैसा लगेगा ?
उसके ललाट पर चक्रांकित का तिलक देखकर कहा – ”तुम कैसे क्षत्रिय हो, तूने अपने माथे पर भिखारियों का तिलक क्यों लगाया है और भुजाएं क्यों दुग्ध की हैं?”
कर्ण सिंह बोले – ‘यह हमारा परम मत है। यदि तुमने खण्डन किया तो हम बुरी तरह पेश आयेंगे।”
किन्तु स्वामी जी शान्त मन से खण्डन करते रहे। फिर कर्ण सिंह को क्रोध आ गया। उसने म्यान से तलवार निकाल ली। स्वामी जी ने निर्भीकता से कहा यदि सत्य कहने से सिर कटता है तो काट लो, यदि लड़ना है तो राजाओं से लड़ो, शास्त्रार्थ करना है तो अपने गुरु रंगाचार्य को बुलाओ और प्रतिज्ञा लिख लो यदि हम हार गये तो अपना वेद मत छोड़ देंगे। कर्ण सिंह ने कहा – उनके सामने तुम कुछ भी नहीं हो। स्वामी जी बोले – ” रंगा स्वामी की मेरे सामने क्या गति है?”
क्रोधित कर्ण सिंह स्वामी जी को गाली देता रहा. किन्तु स्वामी जी हंसते रहे। कर्ण सिंह ने तलवार चलाई, स्वामी जी ने तलवार छीन ली और कहा चाहूं तो तेरे शरीर में घुसा दूं और तलवार टेककर दो टुकड़े कर दिए और शान्त रहे। शिष्यों ने रिपोर्ट लिखने को कहा किन्तु स्वामी जी ने उसको माफ कर दिया और पूर्ववत् शान्त होकर उपदेश करने लगे।
     अभ्यस्त अपराधी भी महर्षि दयानन्द योगी से डर भागे
कर्णवास में एक रात को कर्ण सिंह ने अपने तीन आदमियों को स्वामी जी का सिर काटने भेजा। किन्तु उन अपराधियों को कुटी में जाने का साहस न हुआ। स्वामी जी खटका सुनकर बैठ गये। राव साहब ने अपने आदमियों को पुनः धमकाकर भेजा और कहा स्वामी जी का सिर काट लाओ। स्वामी जी चौकी पर बैठ कर ध्यान मगन हो गए। वह जब स्वामी जी की हत्या करने दरवाजे पर आए तो स्वामी जी ने द्वार पर आकर भयंकर स्वर में ध्वनि की और वे लोग ध्वनि की आवाज सुनकर घबरा गए और चित्त होकर गिर पड़े, तलवारें छूट गईं और किसी प्रकार उठकर भाग गये। सत्य के पथिक में बड़ी आत्म शक्ति होती है।
     सन् १८६७ में अनूप शहर में मूर्ति पूजा पर शास्त्रार्थ
स्वामी को अनूप शहर में आये। अध्यापक लाला बाबू ने स्वामी की से कुछ पूछने का आग्रह किया। स्वामी जी ने कहा कोई दूसरा व्यक्ति तुमको समझा देवे तो मैं तैयार हूं, मैं संस्कृत में ही बोलूंगा और वहां पर पण्डित अम्बादत्त से मूर्ति पूजा पर शास्त्रार्थ हुआ और अम्बादत्त हट गए। बहुतों ने उसी समय से मूर्ति पूजा छोड़ दी और मूर्तियों को पानी में विसर्जन कर दिया और अम्बादत्त दुबारा शास्त्रार्थ करने का साहस न कर सका।
     दयालु महर्षि दयानन्द जी ने विष देने वाले को क्षमा किया
अनूप शहर की घटना है, कि एक दिन एक ब्राह्मण ने स्वामी जी को विष दे दिया क्योंकि वह स्वामी जी की मूर्ति पूजा खण्डन से तंग आ चुका था। स्वामी जी समझ गये और न्योली क्रिया से विष निकाल कर बच गये पर उस विष देने वाले को कुछ न कहा। सैय्यद मोहम्मद तहसीलदार ने उस ब्राह्मण को बन्दी बना लिया। वह स्वामी जी से बहुत प्रेम करते थे और दर्शनार्थ रोज आया करते थे। स्वामी जी ने तहसीलदार से बोलना बन्द कर दिया। उसने कारण पूछा तो स्वामी जी ने कहा- “मैं संसार को बन्दी बनाने नहीं आया हूँ परन्तु उनको छुड़ाने आया हूँ। यदि वह अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता तो मैं अपनी श्रेष्ठता क्यों छोड़ूं।” अन्त में तहसीलदार से कहकर उसको छुड़वा दिया।

  महर्षि दयानंद के जीवन से जुड़े इस ऐतिहासिक स्थल पर पहुंचकर ऋषि की यादों को नमन किया और अपने आपको बहुत सौभाग्यशाली समझा कि आज स्वामी जी के देहांत के 138 वर्ष पश्चात इस स्थान पर पहुंचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
मेरे साथ में आर्य समाज के प्रति उत्साही रूप में समर्पित दिवाकर आर्य जी,  राकेश यादव जी और ब्रह्मपाल सिंह आर्य जी भी थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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