भारत के ‘गौरव’ को लौटाना चाहते थे राणा सांगा

महर्षि दयानंद का मत

जिन लोगों ने विदेशियों का अंधानुकरण करते-करते स्वदेश और स्वदेशी की भावना को अपने लिए अपमानजनक समझकर उसे कोसना आरंभ किया, उन लोगों को देखकर महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज को असीम पीड़ा हुआ करती थी। उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ समुल्लास-11 में लिखा है-

‘‘अपने देश की प्रशंसा वा पूर्वजों की बड़ाई करनी तो दूर रही उसके स्थान पर पेट भर निंदा करते हैं। व्याख्यानों में ईसाई आदि अंग्रेजों की प्रशंसा भरपेट करते हैं। ब्रह्मादि महर्षियों का नाम भी नही लेते, प्रत्युत ऐसा कहते हैं कि बिना अंग्रेजों के सृष्टि में आज पर्यन्त कोई भी विद्वान नही हुआ, आर्यावत्र्तीय लोग सदा से मूर्ख चले आये हैं, इनकी उन्नति कभी नही हुई।…भला जब आर्यावत्र्त में उत्पन्न हुए हैं और इसी देश का अन्न जल खाया-पीया अब भी खाते पीते हैं, अपने माता-पिता, पितामहादि के मार्ग को छोडक़र दूसरे विदेशी  मतों पर अधिक झुक जाना, ब्रहम समाजी और प्रार्थना समाजियों का एतद्देशस्य संस्कृति विद्या से रहित अपने को विद्वान प्रकाशित करना, इंगलिश भाषा पढक़े, पण्डिताभिमानी होकर, झटिति एक मत चलाने में प्रवृत्त होना, मनुष्यों का स्थिर और वृद्घि कारक काम क्यों कर हो सकता है?’’

महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज इस बात के भी प्रबल पक्षधर थे कि जब अनार्षमतों के मुस्लिम ईसाई आदि लोग अपने पूर्वजों का यशोगान करने में लगे रहते हैं, तो हमें अपने शुभाचरणशील पूर्वजों का यशोगान क्यों नही करना चाहिए? इसका अभिप्राय है कि यदि कहीं हमारे पूर्वजों के शुभाचरण को छिपाने का प्रयास हो रहा है और अनावश्यक ही उन्हें हीन और तुच्छ सिद्घ करने का प्रयास किया जा रहा है तो हमें उस प्रयास का तीव्र विरोध करना चाहिए। महर्षि ने लिखा है-‘‘जैसे द्वीप द्वीपांतर के वासी मुसलमान, जैन ईसाई, आदि मनुष्य अपने स्वदेशी और स्वमतस्थों को आनन्दित कर रहे हैं, क्या ऐसे हम लोगों को न होना चाहिए? प्रत्युत सब देशस्थ समग्र मनुष्यादि प्राणीमात्र के परस्पर उपकार, विद्या शुभाचरण और पुरूषार्थ कर अपने पूर्वजों की जिन महाशय आर्यों के हम संतान हैं, उनका दृष्टांत अर्थात उपदेशन हो, और जैसी उनकी कीर्ति और प्रताप रूप मार्तण्ड भूगोल में प्रकाशित हो रहा था उसका अनुकरण क्यों न करें।’’

स्वसे द्रोह आत्मघाती नीति

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारे देश में ‘स्व’ से द्रोह की प्रवृत्ति में वृद्घि हुई। उसका परिणाम ये आया कि हम अपने गौरवपूर्ण ‘स्व’ से दूर होते चले गये। आज तो हमारे पास मात्र भटकन है, उसके अतिरिक्त कुछ भी नही। इस भटकन के कारण ही हम आज तक वही इतिहास पढ़ते  और ढोते चले आ रहे हैं जो कभी हमें विश्व में तुच्छ सिद्घ करने के लिए लिखा गया था।

दिल्ली सल्तनत का अंतिम सुल्तान इब्राहीम लोदी

अब हम जिस सुल्तान का उल्लेख करने जा रहे हैं वह दिल्ली सल्तनत का अंतिम सुल्तान था। उसके पतन के साथ दिल्ली सल्तनत और लोदी वंश दोनों का सूर्य एक साथ अस्त हो गया था। इसी समय भारत के सौभाग्य का सूर्य बनकर महाराणा संग्राम सिंह मेवाड़ में चमक रहा था, परंतु दुर्भाग्य हमारा कि इस देशभक्त को हमने सहयोग नही किया और उसके लक्ष्य को समझने में हमने या तो चूक की या उस चूक को देशद्रोह तक मानने का आरोप हमने उस व्यक्ति पर लगाया। इतिहास ने मोड़ तो खाया पर हमारे प्रमादवश वह मोड़ हमें और भी घने अंधकार में ले गया। हमारे लिए उस समय अवसर था और हम विदेशी जुआ को फेंक सकते थे, पर हम चूक गये। संभवत: दुर्दिनों का दुर्भाग्य अभी हमें और दंडित करना चाहता था।

राणा संग्राम था एक चुनौती

इब्राहीम लोदी के लिए राणा सांगा उस समय एक महत्वपूर्ण चुनौती था। राणा सांगा यद्यपि मालवा के मुस्लिम सुल्तानों से भी उलझ रहा था, परंतु इसके उपरांत भी राणा की शक्ति में दिनानुदिन वृद्घि हो रही थी। महाराणा से संघर्ष कर उसकी शक्ति का दमन करना इब्राहीम के लिए कोई छोटी बात नही थी।

राणा संग्राम के विषय में कर्नल टॉड के विचार

राणावंश के इस नायक राणा सांगा उपनाम संग्राम सिंह के विषय में कर्नल टॉड ने बहुत ही रोचक वर्णन किया है। राणा के विषय में उसके विचार सुन समझकर हमें इस नायक के विषय में गर्व और गौरव की अनुभूति होती है।

राणा संग्राम सिंह 1509 ई. में मेवाड़ (चित्तौड़) के राज्य सिंहासन पर बैठा था। इस महान शासक से पूर्व राणा कुम्भा के शानकाल में मेवाड़ राज्य में कुछ दुर्बलताएं आ गयी थीं, और पारस्परिक कलह के कारण राज्य अपयश का भागी बन रहा था। परंतु सांगा नाम के सूर्य के उदय काल में ही यह कलक कटुता का परिवेश वैसे ही समाप्त हो गया जैसे सूर्योदय के काल में अंधेरा भाग जाता है। संग्राम सिंह एक दूरदर्शी, प्रतापी, शूरवीर भारत की क्षात्र परंपरा को सूक्ष्मता से जानने वाला धीरवीर गंभीर शासक था। कर्नल टॉड उसे सुयोग्य शासक लिखते हुए हमें बताता है कि राणा के सिंहासन पर बैठते ही मेवाड़ ने जो कुछ खोया था उसे पुन: प्राप्त कर लिया।

कर्नल टॉड के शब्दों में-‘‘संग्राम सिंह के सिंहासन पर बैठते ही मेवाड़ राज्य ने अपनी उन्नति आरंभ की और कुछ समय के पश्चात वह भारतवर्ष का चक्रवर्ती राजा माना गया। मारवाड़ और आमेर के राजाओं ने मेवाड़ की ख्याति बढ़ाई। ग्वालियर, अजमेर, सीकरी, राईसीन, कालपी, चंदेरी के राजा और नरेश मेवाड़ राज्य के सामंत रहे थे और आवश्यकता पडऩे पर शत्रुओं के साथ युद्घ करते थे।’’

चक्रवर्ती राजा था  राणा संग्राम सिंह

राणा संग्राम सिंह के विषय में उपरोक्त वर्णन से हमें पता चलता है कि ये शासक भारत की आर्यावत्र्तकालीन छवि को उभारना चाहता था। उसका लक्ष्य चक्रवर्ती राज्य स्थापित कर आर्यों (हिंदुओं) को उनका खोया हुआ वैभव और गौरव प्रदान कराना  था। किसी के आने से या उपस्थित होने मात्र से ही यदि लोग सीधी सच्ची मर्यादित बातें करने लगें और अपनी कलह कटुता की बातें को भूल जाएं तो  यह स्थिति उस व्यक्ति की महानता को दर्शाती है, जिससे उसका आभामंडल तेजोमयी बना करता है और उस तेजोमयी आभामंडल के सामने अच्छे-अच्छे लोग अपनी चतुराई भूल जाते हैं। महाराणा संग्राम सिंह के पास यह आध्यात्मिक दिव्य पूंजी थी, जिसका स्वामी उस समय के राजाओं में कोई नही था, इसीलिए उस व्यक्ति को चक्रवर्ती राजा की उपाधि कर्नल टॉड ने प्रदान की है। उसने अपने साम्राज्य का विस्तार करना आरंभ किया। कर्नल टॉड अपनी पुस्तक ‘राजस्थान का इतिहास’ भाग-1 के पृष्ठ 157 पर महाराणा संग्राम सिंह के राज्य की सीमाओं का वर्णन करता है। वह बताता है-

‘‘राणा संग्राम सिंह के शासनकाल में मेवाड़ राज्य की सीमा बहुत दूर तक फैल गयी थी। उत्तर में बयाना प्रांत में बहने वाली पीली नदी, पूर्व में सिंध नदी, दक्षिण में मालवा और पश्चिम में मेवाड़ की दुर्गम शैलमाला उसकी सीमा बन गयी थी। मेवाड़ राज्य की यह उन्नति राणा संग्राम सिंह की योग्यता, गंभीरता और दूरदर्शिता का परिचय देती है। उसके राज्य सिंहासन पर आने के पूर्व जिन शत्रुओं ने चित्तौड़ पर अधिकार करने के सपने देखे थे राणा संग्राम सिंह के आते ही उनका और सहायकों का फिर कभी नाम सुनने को नही मिला।’’

ऐसे राणा संग्राम सिंह से इब्राहीम लोदी ने भी दो बार युद्घ किया था पर वह दोनों बार ही पराजित हुआ था।

भारत का वैभव पूर्ण गौरव लौटाना चाहता था राणा

हिंदू एक जीवन्त जाति है-इतिहास ने यह भली प्रकार सिद्घ कर दिया है और यह भी कि हिंदुत्व एक जीवंत साधना है जिसे मानव और मानवता के लिए उपयोगी बनाये रखने के लिए युग युगों से लोगों ने संघर्ष किया है। उस संघर्ष की गाथा उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना इस भूमंडल का इतिहास है।

महाभारत काल से हजारों वर्ष  पूर्व इस देश ने संसार को मार्ग दिखाया और उस युद्घ के  पश्चात भी लंबे समय तक मार्गदर्शन करता रहा। दिल्ली के राज्यसिंहासन को इंद्रप्रस्थ का राज्यसिंहासन कहा जाता था। इंद्र अपने आप में वैभव का स्वामी है। इसलिए इस देश के राज्य सिंहासन का नाम भी वैभव के साथ जुड़ा था। राजधानी स्वयं में वैभव की एक मिसाल थी। इन सबका अंतिम लक्ष्य आर्यावत्र्त को वैभवपूर्ण बनाना था-यहां के नागरिकों को वैभवपूर्ण बनाना था।

राणा यह भली भांति जानता था कि चक्रवती राजा बनने का अर्थ क्या है? इसलिए उसने बड़े स्तर पर राजाओं को अपना मित्र बनाया। परंतु इंद्रप्रस्थ पर वह जब उन लोगों का शासन देखता था जो कि भारत के वैभव और गौरव को मिटाने का कार्य कर रहे थे तो वह छंटपटाकर रह जाता था। वह एक क्षण भी उन लोगों को इंद्रप्रस्थ के वैभव की राख पर हाथ सेंकने की अनुमति देना नही चाहता था जिनके क्रूर कृत्यों से वैभव पुरी दिल्ली इस समय ‘उल्लूनगरी’ बन गयी थी। उसके लिए इन सब परिस्थितियों में आशा की किरण केवल यह थी कि दिल्ली की सल्तनत के भी इस समय अनेकों टुकड़े हो गये थे।

दिल्ली का राज्य हो गया था खण्ड-खण्ड

कर्नल टॉड के शब्दों में-‘‘समय के प्रभाव से आज उसी दिल्ली का राज्य सैकड़ों टुकड़ों में विभाजित हो गया है, और उन छोटे-छोटे टुकड़ों में सैकड़ों राजा और नवाब शासन करते हैं। इन दिनों में दिल्ली और बनारस के मध्य दिल्ली बीना, कालपी और जौनपुर नाम के चार स्वतंत्र राज्य अपना शासन चला रहे थे।’’

राणा जोडऩा चाहता था सारे खंडों को

राणा इन सबके मध्य एक नये भारत का सपना बुन रहा था। उसकी अपनी योजना थी-पर यह भी सत्य है कि उस सपने को या योजना को साकार रूप देने के लिए मार्ग में अनेकों बाधाओं को भी पार करना था। क्योंकि शत्रु भी पूर्ण कौशल के साथ अपनी व्यूह रचना में लगा हुआ था।

इब्राहीम लोदी था प्रमुख शत्रु

राणा संग्राम सिंह के लिए अपनी योजनाओं को मूत्र्तरूप देने में सबसे बड़ी बाधा उस समय दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी था। अत: इब्राहीम लोदी से राणा संग्राम सिंह का युद्घ होना अनिवार्य था। इसका एक कारण यह भी था कि राणा संग्राम सिंह ने सिकंदर लोदी के काल से ही अपने साम्राज्य का विस्तार करना आरंभ कर दिया था। उसने दिल्ली के अधीन रहे कुछ क्षेत्रों को भी अपने राज्य की सीमा में विलीन कर लिया था। इससे बहुत देर यह नही सोचा जा सकता था कि इब्राहीम लोदी और राणा संग्राम सिंह के मध्य युद्घ टाला जा सकता है। परिस्थितियां और एक दूसरे की महत्वाकांक्षाएं युद्घ को अवश्यम्भावी बना रही थीं। कारण कि एक के समक्ष अलाउद्दीन के विशाल साम्राज्य के बराबर का राज्य स्थापित कर उसका भोग करना अपना लक्ष्य था तो दूसरे के समक्ष उससे भी विशाल (बप्पा रावल के विशाल साम्राज्य जैसा) साम्राज्य खड़ा करना लक्ष्य था। दोनों के मार्ग में ही एक दूसरे आते थे, युद्घ इसलिए भी  अनिवार्य होता जा रहा था। राणा की दृष्टि में इब्राहीम विदेशी था और उन विदेशी आततायियों को देश की सीमाओं से बाहर खदेड़ देना उसका लक्ष्य था, जबकि इब्राहीम लोदी दिल्ली सल्तनत की जिस सुल्तान परंपरा का इस समय उत्तराधिकारी था उस पर बैठने वाले शासक की सोच भी यही  बन जाती थी कि हिंदुस्तान पर शासन करना उनका नैसर्गिक अधिकार है, और खुदा ने अनेक ‘नेमतों से भरपूर इस मुल्क’ को केवल उन्हीं के लिए बनाया है। यह भावना भी युद्घ को अपरिहार्य बना रही थी। ऐसी परिस्थितियों में महाराणा के लिए इब्राहीम लोदी अपना प्रमुख शत्रु था।

राणा ने किये 18 युद्घ

गौरी शंकर श्री रामचंद ओझा हमें बताते हैं कि 1517 ई. में जब इब्राहीम लोदी दिल्ली के राज्य सिंहासन पर बैठा तो राज्य सिंहासन पर बैठते ही उसने बड़ी सेना के साथ मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी।  सिकंदर लोदी द्वारा चंदेरी तथा इब्राहीम लोदी द्वारा ग्वालियर आधिपत्य से लोदी सल्तनत और मेवाड़ राज्य की सीमा आपस में जा टकराई थीं। राणा ने मालवा राज्य में अपना जिस प्रकार हस्तक्षेप बढ़ाना आरंभ किया था वह भी इब्राहीम लोदी को असहनीय हो रहा था। राजपूत अभिलेखों में दोनों पक्षों के संघर्ष में राणा का खातोली के युद्घ में पूर्ण विजयी होना लिखा है। जबकि कर्नल टॉड के अनुसार राणा ने दिल्ली और मालवा के विरूद्घ 18 युद्घ किये थे।

लोदी को किया था परास्त

ये सारे युद्घ स्पष्टत: राज्य विस्तार कर चक्रवर्ती राजा बनने के लिए ही किये गये थे। इन युद्घों में से राणा ने इब्राहीम लोदी से बकरोल तथा घटोली में संघर्ष किया था, जिसमें से अंतिम संघर्ष में उसने शाही सेना को पूर्णत: परास्त किया था। मुस्लिम लेखकों में से रिज्कउल्ला तथा अब्दुल्ला ने दोनों पक्षों में एक बार तथा अहमद यादगार ने दो बार संघर्ष होने का उल्लेख किया है।

(स्रोत :सल्तनत काल में हिंदू प्रतिरोध पृष्ठ 484)

राणा का हो गया था अंगभग

राणा संग्राम सिंह यथा नाम तथागुण वाली कहावत को चरितार्थ करने वाला ज्योतिष्मान पुंज था। उसने सिंहासन पर बैठते ही अपना नाम संग्राम सिंह कर लिया था। इसलिए उसने अपना जीवनध्येय भी संग्राम को ही बना लिया था। चक्रवर्ती साम्राज्य की स्थापना के लिए राणा का ‘संग्राम’ और ‘सिंह’ बन जाना अपेक्षित भी था। यह भी मान्यता है कि राणा संग्राम सिंह और इब्राहीम लोदी की सेनाओं में हाड़ौती की सीमा पर खातोली गांव के निकट संघर्ष हुआ था। जिसमें सुल्तान की शाही सेना भाग गयी थी और सुल्तान के एक पुत्र को बंदी बना लिया गया था। जिसे कुछ समय पश्चात छोड़ दिया गया था। इस घोर संग्राम में संग्राम को जीवन संग्राम के लिए अपने एक घुटने की बलि चढ़ानी पड़ गयी थी। इतना ही नही उसका एक हाथ भी कट गया था। परंतु वीर संग्राम सिंह ने साहस नही छोड़ा अंग भंग होकर भी साहस को सदा अपने साथ रखा। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए जो लोग किसी भी प्रकार के कष्ट को हंसकर सहन कर लेते हैं, वास्तव में वही लोग इतिहास बनाया करते हैं।

लोदी को दूसरी बार भी पराजय मिली

इब्राहीम लोदी ने पहले युद्घ का प्रतिशोध लेने के लिए तथा अपने अपमान और पराजय की क्षतिपूर्ण करने के लिए शीघ्र ही राणा के साथ दूसरा युद्घ किया। ‘वाक्याते मुश्ताकी’, ‘तारीखे दाऊदी’ और ‘तारीखे शाही’ जैसे ग्रंथों के अनुसार इस बार लोदी ने मियां फर्मूली और मियां मकन के अधीन 40 हजार अश्वारोहियों की एक विशाल सेना मेवाड़ का मानमर्दन करने के लिए भेजी। उसे ज्ञात था कि भारत के किस शेर से युद्घ होना है इसलिए तैयारी भी उसी के अनुसार की जानी अपेक्षित थी। यह राणा का पराक्रम ही था कि उस जैसे अंग-भंग व्यक्ति के लिए भी लोदी को इतनी बड़ी सेना भेजनी पड़ रही थी। कहते हैं युद्घ से पूर्व इब्राहीम लोदी ने अपने विश्वसनीय मियां मकन को निर्देश दिया था कि वह युद्घारंभ करने से पूर्व मियां हुसैन फर्मूली और मियां  मारूफ को बंदी बना ले। इस कार्यवाही की जानकारी मियां हुसैन फर्मूली को समय से हो गयी  इसलिए यह युद्घ से पूर्व राणा संग्राम सिंह की ओर चला गया। इससे राणा की सेना का मनोबल और बढ़ गया।

हिंदुओं ने भयंकर रक्तपात किया

भयंकर युद्घ और भयंकर रक्तपात हुआ। हिन्दुओं ने प्राण हथेली पर रखकर युद्घ आरंभ कर दिया। जिधर भी राजपूत हिन्दू रणबांकुरे निकलते उधर ही शत्रु सेना का अंत हो जाता। इन वीर योद्घाओं ने शाही सेना की इस प्रकार व्यूह रचना की कि शत्रु सेना उससे निकल नही पायी। युद्घ की ऐसी भयंकरता शत्रु ने अब से पहले सुनी तो होगी पर देखी नही होगी। इस भयंकर युद्घ में शाही सेना का मनोबल निरंतर टूटता जा रहा था, जबकि हिन्दू वीरों का मनोबल उसी अनुपात में निरंतर बढ़ रहा था। अंतत: शाही सेना के कितने ही योद्घा और अधिकारियों के मारे जाने से उसने पराजय स्वीकार कर ली और वह भाग खड़ी हुई। विजयी सेना ने पराजित सेना का बयाना तक पीछा किया और कितने ही शत्रुओं का प्राणांत कर दिया। (तारीखे-दाऊदी)

राणा संग्राम सिंह का शारीरिक सौष्ठव

कर्नल टॉड ने राणा संग्राम सिंह के विषय में लिखा है :-राणा संग्राम सिंह का शरीर लंबा था, वह स्वस्थ और शक्तिशाली था। उसका रंग गोरा था और नेत्र बड़े -बड़े थे। उसको देखते ही उसके शक्तिशाली होने का अनुमान होता था। युद्घ करते-करते उसके शरीर के कई अंग चोट ग्रस्त हो गये थे। वह अत्यंत साहसी तथा धैर्यवान था। पराजित शत्रु पर वह सदा रहम करता था, और उसके साथ अपनी उदारता का परिचय देता था। रणथम्भौर के दुर्ग पर होने वाले युद्घ में उसने अपनी अद्भुत वीरता का परिचय दिया था। उसके इन अच्छे गुणों की प्रशंसा बाबर ने स्वयं अपने संस्मरणों में की है, वह संग्राम सिंह की वीरता और उदारता की प्रशंसा किया करता था।’’

वास्तव में महान व्यक्ति वही होता है जिसके गुणों की प्रशंसा उसके शत्रु भी करें। बाबर ने अपने भारत आगमन से पूर्व ऐसे महान गुणों का समावेश किसी व्यक्ति में नही देखा था इसलिए उसके लिए राणा संग्राम सिंह प्रशंसा का पात्र बना।

नया राष्ट्र बनाते-बनाते हम पुराना राष्ट्र लेने लगे

स्वतंत्रता के पश्चात हमारे देश में नया राष्ट्र बनाने की बातें बढ़ चढक़र की गयीं। चारों ओर ऐसा लगा कि जैसे हमारे पास पुराना कुछ भी नही है और हम आज से (15 अगस्त 1947 ई. के पश्चात से) ही नया राष्ट्र बनाना आरंभ कर रहे हैं। इसलिए कई ‘स्वयंभू राष्ट्र निर्माता’ हमने बनते बिगड़ते देखे। उन सबने यही संकेत दिया कि हमारे यहां राष्ट्र का क, ख, ग आज से ही आरंभ हो रहा है। इसलिए ‘राष्ट्राय नम:’ का गीत संगीत हमारे अनुसार यहीं से प्रारंभ करो। ऐसे लोगों के विषय में और उनके प्रचार के विषय में हमें सावधान रहना चाहिए था पर हम उनके विचारों के प्रवाह में बह गये।

वह हमसे कहते-‘‘हमने आज से पूर्व कभी भी ‘संपूर्ण भारत  एक राष्ट्र’ वाली बात का अनुभव नही किया है। राष्ट्र की कल्पना तक हमने पाश्चात्यों से ग्रहण की है और अब हमारा एक नया राष्ट्र बन रहा है। ऐसे अनेक भ्रामक तथ्यों का आज सभी ओर बोलबाला है। इस कथन की पुष्टि में अनेकप्रचलित वाक्यप्रचार व शब्द प्रयोग उदधृत किये जा सकते हैं।’’ (मा.स. गोलवलकर)

ऐसे लोगों के अहंकारी स्वभाव और ज्ञान शून्य विवेक शक्ति के कारण देश में अकारण ही अपने प्रति ही हीन भावना का सृजन हुआ और एक ‘राष्ट्र निर्माण’ का हमने संकल्प पूर्ण कर लिया। इसी संकल्प के नीचे राणा संग्राम सिंह का वह प्रयास दबकर रह गया जिसके लिए वह अब से सदियों पूर्व प्रयास कर रहे थे, और जिसके अनुसार वह भारतवर्ष में पुन: चक्रवर्ती राज्य स्थापित कर ‘भगवा ध्वज’ की पावनता को संसार में श्रेष्ठता के रूप में स्थापित कर देना चाहते थे। वह था राष्ट्र निर्माण का वास्तविक संकल्प, जो थोथे संकल्पों के बोझ से दबा दिया गया।

जिस व्यक्ति ने इस देश में सदियों पूर्व राष्ट्र निर्माण के लिए अपना एक हाथ और एक टांग गंवा दी और उसके उपरंात भी अपना साहस नही खोया उसके प्रति जिन लोगों ने आज तक इतिहास से उसका संकल्प न तो पूछा और न पूछना उचित समझा वे राष्ट्रघाती हैं, पापी हैं और उनके पाप बोझ से यह देश जिस प्रकार अभी तक हीन भावना से ग्रस्त है, उसके लिए उनकी आत्मा युग-युगों तक कष्ट का अनुभव करेगी।

क्रमश:

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