क्या साकार हो पाया है आजादी का हमारा वह सपना?

ललित गर्ग

पन्द्रह अगस्त हमारे राष्ट्र का गौरवशाली दिन है, इसी दिन स्वतंत्रता के बुनियादी पत्थर पर नव-निर्माण का सुनहला भविष्य लिखा गया था। इस लिखावट का हार्द था कि हमारा भारत एक ऐसा राष्ट्र होगा जहां न शोषक होगा, न कोई शोषित, न मालिक होगा, न कोई मजदूर, न अमीर होगा, न कोई गरीब। सबके लिए शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और उन्नति के समान और सही अवसर उपलब्ध होंगे। मगर कहां फलित हो पाया हमारी जागती आंखों से देखा गया स्वप्न? कहां सुरक्षित रह पाए जीवन-मूल्य? कहां अहसास हो सकी स्वतंत्र चेतना की अस्मिता?

आजादी के अनेक वर्ष बीत गए पर आज भी आम आदमी न सुखी बना, न समृद्ध। न सुरक्षित बना, न संरक्षित। न शिक्षित बना और न स्वावलम्बी। अर्जन के सारे सूत्र सीमित हाथों में सिमट कर रह गए। स्वार्थ की भूख परमार्थ की भावना को ही लील गई। हिंसा, आतंकवाद, जातिवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयवाद तथा धर्म, भाषा और दलीय स्वार्थों के राजनीतिक विवादों ने आम नागरिक का जीना दुर्भर कर दिया।

स्वतंत्रता दिवस का हर भारतीय के मन में गहरा उत्साह है, आदर है। छोटा ही सही लेकिन यह हमारे जीवन का एक अहम पड़ाव तो है ही, जो हमें थोड़ा ठहरकर अपने बीते दिनों के आकलन और आने वाले दिनों की तैयारी का अवसर देता है। एक राष्ट्र की तरह एक समाज, एक व्यक्ति के जीवन में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान है। स्वतंत्रता दिवस की दस्तक एक आह्वान है कि हम आजादी के लम्हों की वास्तविक समीक्षा करें। इस ऐतिहासिक अवसर पर हम जहां अतीत को खंगालें वहीं भविष्य के लिए नये संकल्प बुनें। हमें यह देखना है कि आजादी का एक और बीता हुआ वर्ष हमें क्या संदेश देकर जा रहा है और उस संदेश का क्या सबब है। जो अच्छी घटनाएं बीते वर्ष में हुई हैं उनमें एक महत्वपूर्ण बात यह कही जा सकती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागृति का माहौल बना। लेकिन जाते हुए वर्ष ने अनेक घाव दिये हैं, जहां महंगाई  एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंची, जहां आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है। साफ-सुथरी राजनीतिक की जिनसे अपेक्षाएं थी उनकी पार्टी की बड़ी हस्तियों के घोटालों की त्रासदी का उजागर होना भी लोकतंत्र की सांसों को कमजोर ही कर रहा है। इधर आम आदमी की वकालत करने वाली पार्टी ने जितने भी चुनावी वायदें किये, वे सभी धीरे-धीरे धराशाही हो रहे है। बड़ी खूबसूरती से जनता की जेबें काटी जा रही है।

नवीन आर्थिक घटनाओं के संकेत हैं कि हम न सिर्फ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं बल्कि किसी भी तरह का झटका झेलने में सक्षम है। इस साल सेंसेक्स ने लगातार ज्वारभाटा की स्थिति बनाए रखी। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में गिरावट एवं बैंक की ब्याज दरों में भी गिरावट के संकेतों से कुछ आशाएं बांधी है। जब दुनिया की बड़ी आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ताएं धराशायी होती हुई दिख रही है  तब भी भारत ने स्वयं को संभाले रखा, यही वह मुकाम है जहां पहुंच कर आजादी का वास्तविक स्वाद आता हुआ दिख रहा है। लेकिन क्या यह सच है या सपना। अभी भी सपना जैसा ही है जिसे सच में बदलना हमारी आजादी का संकल्प होना चाहिए।

मनुष्य का जीवन आज भी विडम्बनापूर्ण और यातनापूर्ण स्थिति से गुजर रहा है।। दु:ख-दर्द भोगती और अभावों-चिन्ताओं में रीतती उसकी हताश-निराश जिन्दगी आजादी के अहसास को कमतर करती है। आज भी वह हर मुकाम पर स्वयं को ठगा-सा महसूस करता है। उसकी उत्कट आस्था और अदम्य विश्वास को राजनीतिक विसंगतियों, सरकारी दुष्ट नीतियों, सामाजिक तनावों, आर्थिक दबावों, प्रशासनिक दोगलेपन और व्यावसायिक स्वार्थपरता ने लील लिया है। लोकतन्त्र भीड़तन्त्रा में बदल गया है। दिशाहीनता और मूल्यहीनता बढ़ रही है, प्रशासन चरमरा रहा है। भ्रष्टाचार के जबड़े खुले हैं, साम्प्रदायिकता की जीभ लपलपा रही है और दलाली करती हुई कुर्सियां भ्रष्ट व्यवस्था की आरतियां गा रही हैं। उजाले की एक किरण के लिए आदमी की आंख तरस रही है और हर तरफ से केवल आश्वासन बरस रहे हैं। सच्चाई, ईमानदारी, भरोसा और भाईचारा जैसे शब्द शब्दकोषों में जाकर दुबक गये हैं। व्यावहारिक जीवन में उनका कोई अस्तित्व नहीं रह गया है।

आशा की ओर बढऩा है तो पहले निराशा को रोकना होगा। इस छोटे-से दर्शन वाक्य में आजादी का आधार छुपा है। मनुष्य में जो कुछ उदात्त है, सुंदर है, सार्थक और रचनामय है, वह सब जीवन दर्शन है और यही जीवन दर्शन आजादी के संकल्प बुनने का आधार है।

खेल के मैदान से लेकर पार्लियामेंट तक सब जगह अनियमितता एवं भ्रष्टाचार  है। गरीब आदमी की जेब से लेकर बैंक के खजानों तक लूट मची हुई है।  छोटी से छोटी संस्था से लेकर सर्वोच्च नीति-नियामक संस्थानों तक सभी जगह लॉबीवाद फैला हुआ है। साधारण कार्यकत्र्ता से लेकर बड़े से बड़े धार्मिक महंतों तक में राजनीति आ गई है। पंच-पुलिस से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक निर्दाेष की कहीं कोई सुनवाई नहीं है। भगवान की साक्षी से सेवा स्वीकारने वाला डाक्टर भी रोगी से व्यापार करता है। जिस मातृभूमि के आंगन में छोटे से बड़े हुए हैं, उसका भी हित कुछ रुपयों के लालच में बेच देते हैं। पवित्र संविधान की शपथ खाकर कुर्सी पर बैठने वाला करोड़ों देशवासियों के हित से पहले अपने परिवार का हित समझता है। नैतिक मूल्यों की गिरावट की सीमा लांघते ऐसे दृश्य रोज दिखाई देते हंै। इन सब स्थितियों के बावजूद हमें स्वतंत्रता के संकल्पों के साथ अपना नजरिया बदलना होगा। जो खोया है उस पर आंसू बहाकर प्राप्त उपलब्धियों से विकास के नये रास्ते खोलने हैं। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना है कि अच्छाइयां किसी व्यक्ति विशेष की बपौती नहीं होतीं। उसे जीने का सबको समान अधिकार है। जरूरत उस संकल्प की है जो अच्छाई को जीने के लिये लिया जाये। भला सूरज के प्रकाश को कौन अपने घर में कैद कर पाया है?

आजादी के एक और महत्वपूर्ण वर्ष को अलविदा कहते हुए हमें सकारात्मक होना होगा। तमाम तरह की तकलीफों एवं परेशानियों के बावजूद लोगों की आमदनी कई गुना बढ़ी है। वे बेहतर खा-पहन रहे हैं, बेहतर तालीम पा रहे हैं, गरीबी की मार कम हुई है, गांवों में भी कुछ तो रोशनी दिखाई देती है। अब भी आप कहते हो कि ये सब तो ठीक, लेकिन भाई, अमीर-गरीब का फासला तो बढ़ा है, पल्यूशन कितना बढ़ चुका है, जिंदगी का मतलब टेंशन हो गया है और अब तो पूरी दुनिया खतरे में आ गई हैज् तो कोफ्त होना लाजिमी है। लेकिन कब तक हम-आप तरक्की की सराहना-प्रशंसा करने से बचने के लिए खामियां तलाशते रहेंगे? मैं समझता हूं, तारीफ से बचने और खामियां खोजने का यह बेमिसाल जज्बा इस मुल्क का कोई निराला गुण है। आखिर हम ऐसे क्यों है?

सदियों की गुलामी और स्वयं की विस्मृति का काला पानी हमारी नसों में अब भी बह रहा है।

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