“हिंदुस्तान ही खालिस्तान है” और “सारा खालिस्तान ही हिंदुस्तान है”

images (9)

अशोक मधुप

तो ऐसा करने वालों को ये जरूर सोचना चाहिए कि वो “दशम पातशाह” की शिक्षाओं का अनुकरण कर रहे हैं या उसके विपरीत जा रहे हैं? उन्हें ये जरूर सोचना चाहिए कि उनके आचरण से पवित्र “खालसा” शब्द शोभित हो रहा है अथवा इस पवित्र शब्द दुरूपयोग हो रहा है?

हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक कार्यक्रम में कहा कि कुछ लोग खालिस्तान की मांग क्यों करते हैं जबकि पूरा हिन्दुस्तान उनका है। उन्होंने यह टिप्पणी उस समय की जब वह केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ ‘शाइनिंग सिख यूथ ऑफ इंडिया’ नामक पुस्तक के विमोचन में शामिल हो रहे थे। रक्षा मंत्री ने कहा, ‘भारतीय संस्कृति को अतीत में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा था। अगर भारतीय संस्कृति आज कायम है तो यह सिख समुदाय के कारण है। सिख समुदाय का गौरवशाली इतिहास है। विडंबना यह है कि उनमें से बहुत से लोग उनका इतिहास नहीं जानते हैं। रक्षा मंत्री ने कहा, ‘मैं कहूंगा कि अपने युवाओं को सिख समुदाय का इतिहास सिखाएं। यह देश सिख समुदाय के योगदान को कभी नहीं भूलेगा। कुछ लोग खालिस्तान की मांग करते हैं। आप खालिस्तान के बारे में क्यों बात करते हैं, जब पूरा हिंदुस्तान आपका है?’ उन्होंने कहा, ‘इस साल हम गुरु तेग बहादुर की 400वीं जयंती (प्रकाश पर्व) मना रहे हैं। गुरु तेग बहादुर के नाम पर शौर्य है, साहस है और उनका नाम और काम दोनों ही हमें प्रेरणा देते हैं। सिख समुदाय अपनी जाति, धर्म के बावजूद सभी के लिए लंगर की सेवा करता है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी सिख धर्म के इतिहास और बलिदान की सराहना करते हैं।’ स्वतंत्रता संग्राम में सिख समुदाय का बहुत बड़ा योगदान था। जब हमें आजादी मिली और विभाजन की त्रासदी का सामना करना पड़ा, तो सिखों ने बहुत कुछ झेला।’

उन्होंने यह भी कहा कि सिख समुदाय ने राम मंदिर आंदोलन में बड़ा योगदान दिया। निहंग सिखों ने पहले इसके लिए आंदोलन किया। मैं राजनाथ सिंह का यह बयान पढ़ रहा हूं तो मेरी आखों के सामने एक दृश्य आ जाता है…
24 अगस्त। दिल्ली का एयरपोर्ट।
अफगानिस्तान से वहां बसे भारतीयों को लेकर एक विमान एयरपोर्ट पर उतरता है। विमान में अफगानिस्तान से आने वालों में अफगानी सिख भी हैं। सिख समाज अपने साथ गुरु ग्रंथ साहब के तीन पावन स्वरूप भी लाया है। गुरुग्रन्थ साहिब के स्वरूप को रिसीव करने के लिए केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी खुद एयरपोर्ट पहुंचे। उनके साथ केंद्रीय मंत्री पी. मुरलीधरन भी मौजूद थे। अफगानी भारतीयों का स्वागत करने काफी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता भी एयरपोर्ट पर आये थे। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतियों को सिर पर रखकर रिसीव किया। नंगे पांव गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतियों को सिर पर रखे वह एयर पोर्ट से बाहर आये। यह अलग तरह का दृश्य है। गुरु ग्रन्थ साहब जी के सम्मान का दृश्य देखते ही बनता है। कोई किसी तरह का भेदभाव नहीं। जो व्यक्ति यह दृश्य देख रहा है, वह हाथ जोड़कर गुरु ग्रन्थ साहिब के स्वरूप को प्रणाम कर रहा है। नतमस्तक हो रहा है। ऐसे ही तो हिंदू समाज रामायण और गीता का सम्मान करता है। इनके आगमन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहा, “हम अफगानिस्तान से मात्र अपने भाई-बहनों को ही नहीं लाये हैं बल्कि सिर पर रखकर गुरु ग्रंथ साहिब भी लाये हैं।
मैं सोच रहा हूं कि अफगानिस्तान से देश वापस लाने वाले हिंदू−मुस्लिम-सिख में कोई भेदभाव नहीं। सब भारत माता के लाल हैं। सब भारत मां के सपूत। देश का व्यवहार सबके प्रति एक-सा है। फिर खालिस्तान क्योंॽ खालिस्तान के बारे में सोचता हूं कि आज सिख समाज पूरे भारत में कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र है। खालिस्तान की मांग करने वालों के लिए, उनकी आंख खोलने के लिए संघ प्रचारक इन्द्रेश कुमार के विचार काफी हैं। संघ प्रचारक इन्द्रेश कुमार से पंजाब के Nangal (नंगल) और लुधियाना में हुए कार्यक्रमों में पूछा गया कि खालिस्तान के बारे में आपकी क्या राय है। उन्होंने बोलते हुए कहा था− “हिंदुस्तान ही खालिस्तान है” और “सारा खालिस्तान ही हिंदुस्तान है”।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जब देश को और धर्म को आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत शीश देने वाले वीरों की आवश्यकता थी तब “पिता दशमेश” गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने “ख़ालसा पंथ” का सृजन करते हुए “संत-सिपाही” परंपरा की नींव डाली। इसमें हर जाति, वर्ण और क्षेत्र के लोग शामिल हुए ताकि धर्म बच सके। यानि खालसा पंथ लोगों को समाज को और राष्ट्र को जोड़ने के लिए आया था। दुर्भाग्य से कुछ लोगों ने इस पवित्र शब्द का दुरुपयोग कर इस शब्द का प्रयोग भारत को तोड़ने के लिए और लोगों को बांटने के लिए इस्तेमाल किया और नाम दिया “खालिस्तान”।
तो ऐसा करने वालों को ये जरूर सोचना चाहिए कि वो “दशम पातशाह” की शिक्षाओं का अनुकरण कर रहे हैं या उसके विपरीत जा रहे हैं? उन्हें ये जरूर सोचना चाहिए कि उनके आचरण से पवित्र “खालसा” शब्द शोभित हो रहा है अथवा इस पवित्र शब्द दुरूपयोग हो रहा है? इसके बाद उन्होंने प्रश्न करने वाले से कहा- सतगुरु “नानक देव जी” की प्राकट्य स्थली ‘तलवंडी साहिब’ वर्तमान पाकिस्तान में है। चतुर्थ पातशाही “गुरु रामदास जी” की प्राकट्य स्थली चूना मण्डी, लाहौर में है। वह भी दुर्भाग्य से आज पाकिस्तान में आता है। दशम पातशाह “गुरु गोविंद सिंह जी” का प्रकाश बिहार के पटना साहिब में हुआ था तो जहाँ तक खालिस्तान का ही प्रश्न है तो मुझे आपसे इतना पूछना है कि जो खालिस्तान आप मांग रहे हो उसमें हमारे गुरुओं की ये प्राकट्य स्थली शामिल होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए? उन्होंने आगे कहा- “करतारपुर साहिब” जहाँ गुरु नानक देव जी ज्योति-जोत में समाये थे वो आज पाकिस्तान में हैं। पंचम “गुरु अर्जुन देव” जी ने ‘लाहौर’ में शरीर छोड़ा था। दशम पातशाह “गुरु गोविंद सिंह जी” महाराज ‘नांदेड़ साहिब’, महाराष्ट्र में ज्योति-ज्योत में समाये थे। मुझे आपसे इतना ही पूछना है कि जो खालिस्तान आप मांग रहे हो उसमें हमारे गुरुओं के ज्योति-ज्योत में समाने की ये स्थली होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए?
उन्होंने आगे कहा- “दशमेश पिता” ने जब “खालसा “सजाया था तो शीश देने जो पंच प्यारे आगे आये थे। उनमें से एक ‘भाई दयाराम’ लाहौर से थे। दूसरे मेरठ के ‘भाई धरम सिंह जी’ थे। तीसरे जगन्नाथपुरी, उड़ीसा के ‘हिम्मत सिंह जी’ थे। चौथे द्वारका, गुजरात के युवक ‘मोहकम चन्द जी’ थे और पांचवें कर्नाटक के बीदर से भाई ‘साहिब चन्द सिंह’ जी थे। मेरा प्रश्न ये है कि उस खालिस्तान के अंदर इन पंच प्यारों की जन्म-स्थली होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए?
तो उन्होंने आगे कहा- सिख धर्म के अंदर पांच तख्त बड़ी महत्ता रखते हैं, इनमें से एक तख्त श्री पटना साहिब में है जो बिहार की राजधानी पटना शहर में स्थित है। 1666 में “गुरु गोबिंद सिंह जी” महाराज का यहाँ प्रकाश हुआ था और आनंदपुर साहिब में जाने से पहले उन्होंने यहाँ अपना बचपन यहाँ बिताया था। लीलाएं की थीं। इसके अलावा पटना में गुरु नानक देव जी और गुरु तेग बहादुर जी के भी पवित्र चरण पड़े थे। एक और तख़्त श्री हजूर साहिब महाराष्ट्र राज्य के नांदेड़ में है। तो मेरा प्रश्न ये है कि ये सब पवित्र स्थल आपके खालिस्तान में होने चाहिए कि नहीं होने चाहिए?
उन्होंने आगे कहा- महाराजा रणजीत सिंह ने जिस विशाल राज्य की स्थापना की था, उसकी राजधानी लाहौर थी। उनके महान सेनापति हरिसिंह नलवा की जन्म स्थली और शरीर त्याग स्थली दोनों ही आज के पाकिस्तान में हैं, इसके अलावा अनगिनत ऐसे संत जिनका बाणी पवित्र श्री गुरुग्रंथ साहिब में है वो सब भारत के अलग-अलग स्थानों में जन्मे थे। मेरा प्रश्न है कि आपके इस खालिस्तान में ये सब जगहें आनी चाहिए कि नहीं आनी चाहिए?
प्रश्नकर्ता से उन्होंने कहा- इन सारे प्रश्नों के उत्तर तभी मिल सकते हैं और ये सारे ही स्थल तभी खालिस्तान के अंदर तभी आ सकते हैं जब आप और मैं ये मानें कि सारा “हिंदुस्तान ही खालिस्तान है” और “सारा खालिस्तान ही हिंदुस्तान है”। मान लो अगर आपने खालिस्तान ले भी लिया तो क्या इन जगहों पर वीजा और पासपोर्ट लेकर आओगे जो आज तुम्हारे अपने है? आप तो बड़े छोटे मन के हो जो इतने से खालिस्तान मांग कर खुश हो रहे हो और मैं तो आपको खालिस्तान में पूरा अखंड हिंदुस्तान दे रहा हूँ। है हिम्मत मेरे साथ ये आवाज़ उठाने की?
संघ प्रचारक भारत के कुछ और प्रसिद्ध गुरूद्वारों का जिक्र नहीं कर पाएं। उनका यहां करना जरूरी है।
देश के अन्य प्रसिद्ध गुरुद्वारे
देश के कुछ महत्वपूर्ण गुरुद्वारे हैं− गुरुद्वारा पौंटा साहिब, (हिमाचल प्रदेश) माना जाता है कि पौंटा साहिब पर सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह ने सिख धर्म के शास्त्र दसम् ग्रंथ या ‘दसवें सम्राट की पुस्तक’ का एक बड़ा हिस्सा लिखा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि गुरु गोबिंद सिंह चार साल यहां रुके थे।
जम्मू कश्मीर का गुरुद्वारा मटन साहिब अनंतनाग भी विश्व प्रसिद्ध है। यह श्रीनगर से 62 किलोमीटर की दूरी पर है। बताया जाता है कि श्री गुरुनानक देव जी अपनी यात्रा के दौरान यहां 30 दि‍न ठहरे थे।
कनार्टक का गुरुद्वारा श्री नानक झिर साहिब, एक ऐतिहासिक जगह है। रोजाना लगभग चार से पांच लाख लोग इस गुरुद्वारे में माथा टेकने आते हैं।
उत्तराखण्ड का गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब सिखों का एक विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक पवित्र गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा जिला उधमसिंह नगर के खटीमा क्षेत्र में देवहा जलधरा के किनारे बसा हुआ है। यह स्थान सिखों के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थानों में से एक है। गुरुद्वारे का निर्माण सरयू नदी पर किया गया है। और नानक सागर डेम पास में ही स्थित है। जिसे नानक सागर के नाम से जाना जाता है। यह वह स्थान है जहाँ सिक्खों के प्रथम गुरु नानकदेव जी और छठे गुरु हरगोविन्द साहिब के चरण पड़े। इस राज्य में तीन सिख पवित्र स्थानों में से एक है। अन्य पवित्र स्थानों में गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब और गुरुद्वारा रीठा साहिब हैं।
दिल्ली के तो आठ गुरुद्वारे विश्व प्रसिद्ध हैं।
ये हैं− गुरूद्वारा बंगला साहिब, गुरुद्वारा शीशगंज, गुरुद्वारा रकाब गंज, गुरुद्वारा बाबा बंदा सिंह बहादुर, गुरुद्वारा माता सुंदरी, गुरुद्वारा बालासाहिब, गुरुद्वारा मोती बाग साहिब और गुरुद्वारा दमदमा साहिब। इनके अलावा देश भर में और भी महत्वपूर्ण गुरुद्वारे हैं। विशेष बात यह है कि इन गुरुद्वारों में बड़ी तादाद में हिंदू भी जाकर माथा नवाते हैं। ऐसे में खालिस्तान बनने पर क्या होगाॽ खालिस्तान के बाहर के गुरुद्वारों में तो बिना पासपोर्ट और वीजा के जाना संभव नहीं होगा। फिर हिंदू भी गुरुद्वारों में जाते कतरांएगे। ऐसे में गलत मांग क्यों की जाएॽ आज पूरा देश सब भारतवासियों का है, सबको सब जगह जाने की छूट है, फिर ऐसे रास्ते क्यों देखें, जे व्यवधान पैदा करें।

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
betsilin giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
hititbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
grandpashabet
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet
grandpashabet
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
meritking güncel giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betasus giriş
betpark giriş
betasus
betasus
betasus giriş
betasus
meybet giriş
meybet giriş