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टिकैत की हठधर्मिता ने अंधेरे मोड पर पहुंचा दिया है किसान आंदोलन को

अजय कुमार 

नये कृषि कानून के विरोध के नाम पर देश में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, उसे सिर्फ मोदी विरोधी बताकर अनदेखा नहीं किया जा सकता है क्योंकि आंदोलन की आड़ में देश विरोधी ताकतें ठीक वैसे ही मंसूबे पाले हुए हैं, जैसे सीएए के खिलाफ आंदोलन के समय देखने को मिले थे।

नये कृषि कानून के विरोध के नाम पर कब तक देश की सड़कों, हाई-वे पर अराजकता का माहौल बना रहेगा। मासूमों के खून-खराबे से सड़कें और खेत-खलिहान लाल होते रहेंगे। देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता रहेगा। रेल और सड़क मार्ग बाधित किया जाता रहेगा। आंदोलन के नाम पर बेशकीमती सरकारी जमीन पर बलात कब्जा, आंदोलनकारियों द्वारा जबर्दस्ती बिजली-पानी का बिना किसी तरह का भुगतान किए इस्तेमाल करना किसी भी सूरत में जायज नहीं कहा जा सकता है। आंदोलन के नाम पर हिंसा-आगजनी की वारदातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। खासकर, चुनावी साल में किसी भी छोटी से छोटी घटना का राजनैतिक फायदा लेने के लिए हमारे नेता गिद्धों की तरह कहीं जुट जाते हैं और शर्मनाक बयानबाजी करने लगते हैं, उससे देश की छवि तो खराब होती ही है साथ ही अपराधी भी बच निकलते हैं।

नये कृषि कानून के विरोध के नाम पर देश में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, उसे सिर्फ मोदी विरोधी बताकर अनदेखा नहीं किया जा सकता है क्योंकि किसान आंदोलन की आड़ में देश विरोधी ताकतें ठीक वैसे ही मंसूबे पाले हुए हैं, जैसे सीएए के खिलाफ आंदोलन के समय देखने को मिले थे। तब भी बड़े पैमाने पर विदेश में बैठी देश विरोधी ताकतों की सक्रियता की जानकारी खुफिया विभाग को मिली थी। इस बार भी ऐसा ही मंजर है। सबसे अच्छी बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर की घटना को स्वतः संज्ञान में लेकर पूरे प्रकरण की जांच शुरू कर दी। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि लखीमपुर कांड के गुनाहागार बच नहीं पाएंगे। वैसे यह पहली बार नहीं है जब किसान आंदोलन में हुई हिंसा को सुप्रीम कोर्ट ने अपने संज्ञान में लिया है।
पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और नाराजगी के बाद भी किसान नेताओं के तेवर ढीले नहीं पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह रहा है कि जो कानून लागू ही नहीं हुआ, उसको खत्म करने के नाम पर आंदोलन कैसे चलाया जा सकता है, लेकिन आंदोलनकारी किसानों को राजनैतिक संरक्षण मिलने की वजह से किसान नेता मोदी सरकार से टकराव की मुद्रा में नजर आ रहे हैं। जबकि कायदे से तो कृषि कानूनों के विरोध में जारी आंदोलन का 26 जनवरी की दिल्ली की घटना के बाद ही पटाक्षेप हो जाना चाहिए था, लेकिन आंदोलन को राजनैतिक संरक्षण के चलते ऐसा नहीं हुआ। संभवतः यह देश का पहला सबसे बड़ा आंदोलन होगा, जिसमें समस्या का समाधान निकालने के लिए दोनों पक्षकारों के बीच किसी तरह की कोई बातचीत ही नहीं हो रही है। यद्यपि सरकार और किसान संगठन लगातार बातचीत की जरूरत बताते रहते हैं, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई तो इसकी वजह यही है कि मोदी सरकार संसद से पास कानून को कुछ लोगों के दबाव में आकर वापस लेकर कोई नई परम्परा नहीं डालना चाहती है, जबकि किसान संशोधन की बजाए कृषि कानून को रद्द कराने की मांग पर अड़े हुए हैं। ऐसा ही दबाव सीएए के खिलाफ आंदोलन के समय भी मोदी सरकार पर डाला गया था।
सरकार बार-बार कह रही है कि किसान संगठन कृषि कानूनों की खामियां बताएं, तो वह उन्हें दूर करने के लिए आगे बढ़े। इसके जवाब में किसान संगठन यह कहते रहे कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने से कम कुछ भी मंजूर नहीं। सरकार इस पर राजी नहीं हुई, तो किसान संगठन भी अपना आंदोलन जारी रखने पर अड़ गए। उनकी ओर से साफ कहा गया कि जरूरत पड़ी तो 2024 तक या उसके आगे भी किसानों का आंदोलन जारी रहेगा।

फिलहाल किसान आंदोलन को शुरू हुए करीब एक वर्ष होने को है और दोनों पक्षों के बीच सहमति तो दूर बातचीत शुरू होने के भी कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। दोनों ही पक्ष अपने रवैये से टस से मस नहीं होना चाहते हैं। सबसे हास्यास्पद बात यह है कि अपने-अपने रवैये पर अडिग दोनों पक्ष बातचीत की जरूरत भी जताते हैं और इसके साथ एक दूसरे के खिलाफ हमलावर भी हैं। ऐसा लग रहा है कि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहते हों। कुल मिलाकर पिछले दस महीनों में सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच सहमति की जगह कटुता और वैमनस्यता ही बढ़ी है। लखीमपुर खीरी की घटना ने दोनों के बीच और अधिक कटुता और वैमनस्य बढ़ाने का ही काम किया है। लखीमपुर की घटना से पूर्व 26 जनवरी को लाल किले की घटना के समय भी सरकार और आंदोलनकारी किसान आमने-सामने आ गए थे। दोनों के बीच काफी टकराव देखने को मिला था।
दरअसल, मोदी सरकार और किसान आंदोलनकारियों के बीच जारी लंबे गतिरोध की एक वजह विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा किसान संगठनों के साथ खुलकर खड़ा हो जाना भी है। यह मोदी विरोधी दल किसानों की आड़ लेकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए सरकार को कोसते रहे और किसान संगठनों की पीठ थपथपाते रहे। विपक्षी दलों के किसान संगठनों के साथ खड़े होने से उनके और सरकार के बीच जारी गतिरोध कम होने के बजाय और बढ़ गया। यह गतिरोध कहां तक पहुंच गया है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि अभी जब प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर गए तो राकेश टिकैत ने ट्वीट कर जो बाइडन से भारत सरकार की शिकायत की। इस गतिरोध से न तो सरकार का कुछ बिगड़ा और न ही किसान संगठनों का, लेकिन उसका भुगतान देश करता रहा है। कुल मिलाकर राकेश टिकैत की जिद्द के चलते किसान आंदोलन ऐसे अंधे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां से आगे कुछ दिखाई-सुझाई नहीं दे रहा है।

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