कांग्रेस के लिए मुश्किल होता जा रहा है अपना ही इलाज

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अवधेश कुमार अवध

कांग्रेस की दुर्दशा का इससे बड़ा प्रमाण कुछ और नहीं हो सकता कि उसके बारे में जो भी नकारात्मक टिप्पणी कर दीजिए सब सही लगता है। केंद्रीय नेतृत्व यानी सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा जो दांव लगाते हैं वही उलटा पड़ जाता है। कन्हैया कुमार को पार्टी में शामिल कराना भी एक दांव है। जिग्नेश मेवानी ने केवल विधायकी बचाने के लिए कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण नहीं की है, अन्यथा वह भी कांग्रेसी हो गए हैं। दुर्भाग्य देखिए कि कांग्रेस ने कन्हैया और जिग्नेश को पार्टी का अंग बनाने की पत्रकार वार्ता को व्यापक रूप देने की रणनीति बनाई लेकिन पंजाब का घटाटोप भारी पड़ गया। राहुल गांधी पत्रकार वार्ता से अलग रहे और पंजाब के बारे में पूछे गए प्रश्नों का जवाब दिए बिना 24, अकबर रोड से बाहर निकल गए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जिस तरह नेहरू इंदिरा परिवार के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं वैसा कांग्रेस के इतिहास में देखा नहीं गया।
मर्ज बढ़ाने वाली दवाएं
बहरहाल, किसी राजनीतिक दल में असंतोष, विद्रोह, अंतर्कलह अस्वाभाविक नहीं है। नेतृत्व की भूमिका उनके कारणों को ठीक से समझ कर सही निर्णय लेने की होनी चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व इन भूमिकाओं में लगातार विफल साबित हुआ है। उसके द्वारा उठाए समाधान के कदम नए संकट का कारण बनते हैं। इसमें यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या कन्हैया और जिग्नेश कांग्रेस में व्याप्त महासंकट के समाधान का वाहक बनेंगे या भविष्य में उसकी वृद्धि का कारण ?
पहले यह समझने की कोशिश करें कि इनको पार्टी में लाने के पीछे की दृष्टि क्या है। एक सोच यह है कि कांग्रेस के चुनावी पतन का बड़ा कारण मुसलमानों और दलितों के बीच व्यापक जनाधार का लगभग खत्म हो जाना है। इन दोनों समूहों को जहां भी कांग्रेस से अलग राजनीतिक विकल्प मिलता है वहां उसके साथ जाते हैं। मगर एक समूह ऐसा भी है जो विचारधारा के स्तर पर ऐसे राजनीतिक दल या गठबंधन को समर्थन देता है या देना चाहता है जिसमें बीजेपी को हराने की क्षमता दिखाई दे। कन्हैया कुमार लिबरल सेकुलर धारा का एक चेहरा बन चुके हैं। दलित समुदाय के जिग्नेश मेवानी भी उसी धारा से आते हैं। तो माना यह जा रहा है कि इन दोनों को आगे लाकर कांग्रेस अपने इस खोए जनाधार को पाने के साथ ही बीजेपी के विरुद्ध पार्टी या मोर्चा की तलाश करने वालों के आकर्षण का केंद्र भी बन सकती है।
कांग्रेस के साथ वामपंथी धारा के लोगों का संबंध नया नहीं है। 1967 में 8 राज्यों में कांग्रेस की पराजय तथा संविद सरकारों के गठन के बाद इंदिरा गांधी ने वामपंथी धारा के लोगों को महत्व दिया और उस सोच के तहत कई कदम उठाए। 1975 में आपातकाल लगाने का सीपीआई ने समर्थन किया था। 1977 के चुनाव में भी कांग्रेस को सीपीआई का समर्थन मिला था। बीजेपी के उभार के बाद सीपीएम की अगुआई में सेक्युलरवाद को बचाने के नाम पर बीजेपी विरोधी गठबंधन बनाने की कोशिशों का ही परिणाम 2004 में यूपीए के रूप में सामने आया था। शायद राहुल, प्रियंका और सोनिया फिर वैसा ही कुछ हो जाने की उम्मीद कर रहे हैं।
किंतु तब और आज के राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक परिवर्तन आ चुका है। 1970 के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी जैसी सशक्त पार्टी नहीं थी। दूसरे, वामपंथी विचारधारा को अपनाना या उसे पर्दे के पीछे थिंक टैंक के रूप में महत्व देना एक बात है और किसी को एक प्रमुख चेहरा बनाकर पार्टी में लाना दूसरी बात। कन्हैया हो या जिग्नेश दोनों की छवि वैचारिक प्रतिबद्धता वाले वामपंथी की नहीं है। जिग्नेश को दलितों का व्यापक समर्थन भी नहीं है। एक बड़ा वर्ग कन्हैया के लिए देशद्रोही शब्द प्रयोग करता है। इस शब्द प्रयोग को अनुचित मानने वाले भी हैं पर एक बड़े समूह की धारणा ऐसी है तो उसका राजनीतिक परिणाम उसी रूप में आएगा। उनके विरुद्ध व्यापक ध्रुवीकरण होना निश्चित है। इस धारा के बीजेपी विरोधी लोगों का पूरा जमावड़ा पिछले लोकसभा चुनवों के दौरान बेगूसराय में हुआ था। बावजूद इसके, कन्हैया वह चुनाव बुरी तरह हारे। सीपीआई से अलग होने के बाद कन्हैया की छवि वामपंथी धारा में भी बिगड़ी है। प्रश्न उठाया जा रहा है कि जो व्यक्ति जेएनयू में वामपंथी छात्र इकाई का नेता रहा, अध्यक्ष बना, जिसने मार्क्स, लेनिन, माओ की वकालत की, उसे इस विचारधारा का वाहक कांग्रेस कैसे दिख गया?
अनुभवी नेताओं के सवाल
प्रशांत किशोर को ज्यादा महत्व देने या कन्हैया और मेवानी को पार्टी में लाने का विरोध करने वाले सभी वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं। हालांकि इनमें किसी ने कांग्रेस के उद्धार की कोई ग्राह्य रूपरेखा सामने नहीं रखी है। इनकी मूल छटपटाहट सत्ता से वंचित होने तथा लंबे समय तक सत्ता में वापसी की संभावना नहीं दिखने के कारण पैदा हुई। फिर भी इनके प्रश्नों और सुझावों को गलत नहीं कहा जा सकता। पार्टी की एकमात्र चिंता उसके पुनर्जीवन की होनी चाहिए न कि किसी व्यक्ति, परिवार या व्यक्तियों के समूह को बनाए रखने की। पार्टी के पतन को देखते हुए भी कांग्रेस का एक वर्ग उन सबको पार्टी विरोधी करार देने पर तुला है जो नेतृत्व और उनके निर्णयों पर प्रश्न उठाते हैं, कार्यसमिति की बैठक बुलाने या चुनाव कराकर राष्ट्रीय अध्यक्ष से नीचे तक निर्वाचन की मांग कर रहे हैं। कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, मनीष तिवारी, भूपेंद्र सिंह हुड्डा आदि कांग्रेस विरोधी हो गए, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है।
कन्हैया और जिग्नेश कांग्रेस में व्याप्त संकट के समाधान की भूमिका निभा सकते हैं ऐसा मान लेना बेमानी होगा। कल चुनावों में सफलता न मिलने पर ये प्रश्न नहीं उठाएंगे या पार्टी नहीं छोड़ेंगे इसकी भी गारंटी नहीं है। वास्तव में सकारात्मक आलोचना तथा उपयोगी सुझावों को विरोधियों की करतूत मान और अपने ही नेताओं की अनसुनी कर लिए गए इस तरह के फैसलों से कांग्रेस का

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