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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

एक “यज्ञ” है सावरकर का जीवन- रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण देती यह पुस्तक

विजय मनोहर तिवारी
भालचंद्र दत्तात्रेय खेर और शैलजा राजे ने बहुत पहले सावरकर पर एक किताब लिखी थी, जो वर्ष 2007 में हिंदी में छपकर आई थी। इसका शीर्षक था-“यज्ञ”। मराठी रचनाकार खेर के 100 से ज्यादा उपन्यास हैं। लाल बहादुर शास्त्री और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे भारत माता के सच्चे सपूतों पर भी उन्होंने लिखा है।
शैलजा राजे और खेर दोनों ही पुणे से प्रकाशित दैनिक केसरी में रहे हैं। वे स्वातंत्र्यवीर सावरकर के अनन्य भक्त रहे हैं। शैलजा का बचपन तो सावरकर के घर में ही बीता। मुंबई के सावरकर-सदन में उनका आना-जाना था। सावरकर पर उन्हाेंने खूब लिखा।
यज्ञ की रचना के बारे में सबसे खास बात यह है कि स्वयं सावरकर के जीवित रहते उनकी मौजूदगी में इस किताब की रचना की योजना बनी थी और दोनों लेखकों से सावरकर ने बात की थी। सावरकर के देहांत के बाद इस उपन्यास को लिखा गया। हिंदी में इसे प्रभात प्रकाशन ने जब छापा तब तक मराठी में आए तीन संस्करणों में इसकी 12,000 प्रतियाँ बिक चुकी थीं।
यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक अनूठे महानायक की महागाथा है। सावरकर के व्याख्यान, उनकी अपनी रचनाएँ और उनके संघर्षपूर्ण कठिन जीवन के उतार-चढ़ावों से रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरणाें को इसमें बुना गया है।
जैसे 15 अगस्त 1947 के दिन स्वयं सावरकर आपके सामने बैठे हों और नासिक जिले के भगूर नाम के छोटे से गाँव की अपनी स्मृतियों से लेकर काले पानी की कैद, देश के बटवारे के साथ अंतत: प्राप्त स्वतंत्रता के प्रति अपनी अनुभूति की रुला देने वाली कहानी सुना रहे हों। इसे पढ़ते हुए आप स्वयं सावरकर के साथ चहलकदमी का अनुभव कर सकते हैं। देश आज़ादी के जश्न में डूबा होगा, लेकिन सावरकर की दृष्टि और हृदय में अखंड भारत के खंडित होने का आक्रोश उबल रहा था।
सावरकर के जीवन के हर हिस्से की तरह इस उपन्यास के हर पन्ने पर राष्ट्र के प्रति उनकी गहरी भावनाएँ और अंग्रेज़ों के आगे किसी चट्‌टान की तरह अडिग महान व्यक्तित्व की प्रतिमा के दर्शन होते हैं। अपने गुलाम देश की हालत ने उन्हें सदा बेचैन रखा। वे कितने भावुक थे और मन पर भारत की आज़ादी की वेदना किस हद तक गहरी थी, इस बारे में वे कहते हैं-
“चाफेकर बंधुओं की फाँसी का समाचार सुनकर मैं रात भर रोता रहा। केसरी का वह अंक, जिसमें मैंने समाचार पढ़ा था, मेरे आँसुओं से भीग गया था। रात बीत गई किंतु आँसुओं का सैलाब रोके नहीं रुक रहा था। चाफेकर बंधुओं की फाँसी ने मुझे नवजीवन दिया। तभी से मुझे विश्वास हो गया कि मेरी फाँसी से भी किसी का जन्म अवश्य होगा।”
सावरकर दोहरे चेहरे वाले कोई ऐसे राजनीतिज्ञ नहीं थे, जिनके साथ आसानी से किसी की भी पटरी बैठ जाए। 1,000 साल से गुलाम भारत की गहरी पीड़ा उनके अंतस में अंकित थी और उनके सामने अंग्रेज़ थे, जिनसे निपटने के लिए उनकी अपनी मान्यता और विश्वास थे। इसमें कोई किंतु-परंतु की गुंजाइश नहीं थी।
वे मानते थे कि जैसे को तैसा सबक सिखाना चाहिए। वे दुश्मन से सीधा टकराने में विश्वास करते थे, धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने की रस्म अदायगी में उनका यकीन नहीं था। सौदेबाजी की वणिकवृत्ति उनके संस्कारों में ही नहीं थी। एक निर्दोष, निष्कपट ज्योति पुंज थे सावरकर, जिनका सच्चा मूल्यांकन शेष है।
भगूर गाँव में रहते हुए उनका जीवन जिस तरह के पारिवारिक संकटों में बीता है, वह अकल्पनीय है। आज़ादी के बाद सत्ता में आए प्रथम पंक्ति के किसी भी सुप्रसिद्ध सेनानी का बाल्यकाल और युवाकाल इतनी मुश्किलों से नहीं गुज़रा होगा, जितनी सावरकर का। माँ बचपन में ही गुज़र गईं। प्लेग में भीषण कष्ट झेलते हुए पिता की मौत हुई। वे प्यास से तड़पते थे। लेकिन प्लेग में पानी देना नहीं था। भाई मरते-मरते बचा। प्लेग ने गाँव के घर-घर में मौत को रास्ता बताया था। वे कहते हैं-
“मेरे मन में बार-बार अशुभ विचार आने लगे। प्लेग से पीड़ित अण्णा नज़र आने लगे। फिर बाबा, बाल और अंत में मेरी प्रिय भाभी भी। अपने घर के सभी प्रिय व्यक्तियों की जलती चिताएँ मुझे नज़र आने लगीं। फिर वे बुझीं। चारों ओर अंधेरा फैल गया और अचानक किसी बिजली की कौंध की तरह मुझे अपनी भी चिता जलती हुई नज़र आने लगी।“
लंदन प्रवास के दौरान एक दिन वे मार्गरेट लॉरेंस के साथ लंदन टावर इसलिए जाते हैं ताकि वहाँ मौजूद एक बेशकीमती वस्तु के दर्शन कर सकें। वह वस्तु क्या थी? वह थी शिवाजी महाराज का वह बघनखा, जिसे पहनकर उन्होंने प्रतापगढ़ किले के नीचे कई गुना शक्तिशाली हमलावर अफजल खां को मारा था।
लेकिन वे यह देखकर बहुत गुस्सा हो गए कि लंदन टावर में रखा बघनखा वह नहीं था, लेकिन उसके नीचे रखी एक परची पर लिखा था कि यह बघनखा मैसूर क्षेत्र के चोरों और डाकुओं द्वारा काम में लिया जाता था। शिवाजी ने अफजल खां को जिससे मारा, वह भी इसी तरह का बघनखा था। सावरकर मार्गरेट से कहते हैं, “यही तुम लोगों का दस्तूर है। देखा नहीं कैसे घुमाफिराकर शिवाजी महाराज का जिक्र किया गया है। हमारे शिवाजी महाराज चोर-डाकू थे क्या?”
वहीं वे एक तलवार और देखते हैं। तब वे कहते हैं- “वह टीपू सुलतान की तलवार थी। उसे देखकर मेरा क्रोध और भी बढ़ गया। मैंने कहा हमारे किसी वीर की नहीं, क्रूर की तलवार है। उसका नाम था टीपू सुलतान। इसी नर राक्षस ने हम हिंदुओं पर धार्मिक अत्याचार किए, हिंदू महिलाओं से बलात्कार किए, मूर्तियों को तोड़ा। 24 घंटे में 50,000 हिंदुओं का जबर्दस्ती धर्मांतरण कराकर उन्हें मुसलमान बनाया, ऐसा दंभ भी हांकता फिरा। राक्षसों से राक्षस बनकर ही लड़ा जा सकता है। तभी विजय प्राप्त होती है।”
सावरकर को लंदन में पढ़ाई के लिए एक छात्रवृत्ति की सिफारिश खुद लोकमान्य तिलक और शिवराम महादेव परांजपे ने श्यामजी कृष्ण वर्मा से की थी। पर्सिया नाम के जिस जहाज से सावरकर ने लंदन का रुख किया था तो इन महापुरुषों के ऋण का भार महसूस करते हुए ही उन्होंने कदम आगे बढ़ाए।
मार्सेलिस बंदरगाह पर जहाज़ के पहुँचते ही सावरकर बेहद रोमांचित हो गए थे। वह उनके आदर्श पात्र मैजिनी का कार्यक्षेत्र रहा था। इटली का वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी यहाँ निर्वासित रहा था और यंग इटली नाम की एक गुप्त संस्था बनाई थी। वह सशस्त्र क्रांति का प्रबल पक्षधर था। इसलिए उसे आस्ट्रियन शासकों ने फाँसी की सज़ा सुनाई थी। उसे देश निकाला दे दिया गया था। मार्सेलिस में वे मैजिनी का वह घर ढूंढते हैं और एक ऐसी गली में जा पहुँचते हैं, जो उन्हें नासिक के तिलभांडेश्वर की गली की याद दिलाती है।
चाफेकर बंधुओं का बलिदान सावरकर ने सदा याद रखा। एक जगह वे कहते हैं- “चाफेकर बंधु कितने छोटे थे आयु में। कल के छोकरे जैसे। किंतु उन्होंने शत्रु से बदला लेने की ठान ली। सिंह शावकों के जोश ने उन्होंने शस्त्रु पर आक्रमण किया। शत्रु को मौत के घाट उतार ही दिया। शोले से शोला भड़कता है, वीरता से वीरता चेतती है। चिंगारी दावानल बन जाती है।”
किसी मुकदमे के बगैर उन्हें दो आजन्म कारावास सुनाए गए। उनका एक भाई कालेपानी में ही था। बाद में वे भी वहीं गए। भतीजे की मौत हो चुकी थी। छोटा भाई जेल में था। सावरकर का अपना बेटा प्रभाकर भी मौत के मुँह में चला गया। पूरा परिवार उजड़ चुका था और सुबह की किसी रोशनी की किरण की कोई उम्मीद नहीं थी।
अंडमान में उनकी यातना की कोई तुलना कांग्रेस के खादीधारी जेलभोगियों से नहीं की जा सकती। जब आप सावरकर के संघर्ष और त्याग को देखते हैं तो कांग्रेस एक ड्रामेबाज मंडली नजर आती है, जिसे अंग्रेज़ों ने आज़ादी की लड़ाई में एक पक्ष के रूप में बातचीत के लिए मान्यता दे रखी है और चूँकि शांतिपूर्ण संवाद में उसकी अहिंसक आस्था है, जो अंग्रेज़ों के लिए सुविधाजनक है इसलिए काम करने की अधिक आज़ादी के चलते आम लोगों तक उसकी पहुँच भी दूसरों से ज्यादा है।
यातना का वास्तविक अर्थ, जितना सिहरन भरा है, उस लिहाज से कांग्रेस के वीरों ने जेल की बहुत आरामदेह यात्राएँ कीं, जहाँ रहकर वे मज़े से पत्र भी लिख सकते थे, किताबें भी लिख सकते थे, मीडिया से मेलजोल कर सकते थे और छूटकर जिनके स्वागत में विजय रैलियाँ भी निकल सकती थीं। वह आज के किसी विश्रामगृह को जेल घोषित करने जैसा था।
एक मिलीजुली कुश्ती, जब चेहरे पर शिकन आए बगैर देश का बटवारा स्वीकार करना बिल्कुल असहनीय नहीं था और लाखों लोगों को सरहद पार माैत के मुँह में धकेलकर भी जिनके नेता सफेद झक कुर्ते-पाजामे में लाल किले पर शपथ लेने में कोई हिचक नहीं रखते थे। सत्ता ही उनका ध्येय बन गई। सावरकर के लिए यह अंत तक असहनीय था।
सावरकर को सहन करने का सामर्थ्य कांग्रेस में नहीं है। इंदिरा गांधी ने उनके योगदान को स्वीकार कर उनपर डाक टिकट जारी कर एक तरह से प्रायश्चित ही किया था लेकिन आज की कांग्रेस का कोई नेता सावरकर के पैरों की धूल बराबर नहीं है।
यह किताब सावरकर की प्रेरक ऊर्जा से भरी है। सावरकर का जीवन राष्ट्र को भव्य और दिव्य देखने की बेचैनी से भरा है। उनकी सोच पर शिवाजी की छाप स्पष्ट है। वो शिवाजी जिन्होंने सिर्फ 50 साल की उम्र में एक सच्चे राष्ट्रनायक की तरह व्यवहार किया और अपने समय की सबसे कठिन परिस्थितियों का अपने ही लोगों की दगाबाजी के बीच पूरी ताकत से मुकाबला किया और जीते।
मराठी में यह किताब खूब पढ़ी और सराही गई। हिंदी अनुवाद भी प्रभावशाली है। करीब 400 पेज की इस पुस्तक के पहले पन्ने से लेकर आखिरी पन्ने तक सावरकर आपसे रूबरू हैं। अपनी कहानी कह रहे हैं। दरअसल वह अपनी नहीं भारत की कहानी कह रहे हैं। यह किताब सावरकर के बहाने एक ऐसे अभागे मुल्क का बयान है, जो अपने ही तपस्वी वीरों को पहचानने में हमेशा देर करता है। उसे ठगों की सोहबत ज्यादा मुफीद लगती है।

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