इन्सानियत की आवाजाही का पुल

मीरा गौतम

‘आज की उर्दू कहानी’ आशा प्रभात द्वारा सम्पादित कहानी संग्रह है। उन्होंने इसमें संगृहीत कहानियों का अनुवाद उर्दू से हिन्दी में किया है। वह स्वयं उर्दू और हिन्दी की समर्थ लेखिका हैं। अत: इस अनुवाद की गुणवत्ता पर भरोसा किया जा सकता है। यही कारण है कि आशा प्रभात के हिन्दी अनुवाद में उर्दू कहानियों का लहजा और मूल अर्थ पूरी तरह उतर कर आ गया है। इस कहानी-संग्रह की परख में चार बातें खासतौर पर नजर आ रही हैं। एक—आशा प्रभात का सम्पादकीय नजरिया। दो—इस अनुवाद का मकसद। तीन—अनुवाद में अपनायी गयी तकनीक, शैली और अनुवाद प्रक्रिया के महत्वपूर्ण मानक। चार—कहानियों का कंटैंट (विषय वस्तु) और भाषा रूपांतरण में मूल अर्थ की रक्षा। दो भू-भागों में बंटे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के समानांतर किनारों पर अनुवाद के जरिये पुल का निर्माण करना ही आशा प्रभात का मकसद है। दोनों देशों के अफसाना निगार चाहते हैं कि कुछ तो ऐसा हो कि फिर सब एक सा हो जाये। दोनों देश फिर मिल बैठें। फिरकापरस्तों को जानें दें एक तरफ कि फिर हम एक हो जाएं। पाकिस्तान के आगा गुल की कहानी ‘दूसरी बाबरी मस्जिद’ का यही मकसद है। आशा प्रभात के अनुवाद में छायानुवाद ओर व्याख्यात्मक तकनीक का सही इस्तेमाल इन कहानियों को कला और शिल्प का दर्जा दे रहा है जहां अनुवाद मूल-सामग्री की खूबसूरती से दो कदम आगे बढक़र कलेजे में छेंक करता नजर आता है अपनी उत्कृष्टता के बल पर। ‘दस सरों वाला विजूका’ कहानी में तो कमाल ही हो गया है। गुलाम भारत और आजाद हिन्दुस्तान में फर्क दिखाने के लिए परवेज़ शहरयार ने ‘गोदान’ के होरी को पचहत्तर साल के हृष्ट-पुष्ट पु_ों वाले जिंदा मर्द के रूप में दिखा दिया है। बेटा गोबर दिल्ली में आईआईटी का प्रोफेसर हो गया है। भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ की दावत’ की तरह वह भी होरी-धनियां के ग्रामीण हुलिये को देखकर शरमाता है। कहानी में मूल समस्या नक्सलवाद के आतंक की है। ‘माटी हमारा जीवन है’ कहकर गांव लौटे होरी को देख, कटने को तैयार फसल में खड़ा विजूका, बेहद जहरीली मुस्कान फेंकता है। होरी फिर माथे का पसीना पोंछता है। घर पहुंचते ही नक्सलियों का फरमान आ जाता है, ‘होरी काका – लाल सलाम।’ फरमान यह है कि वे होरी की सारी फसल काट ले जायेंगे। अपना चौथा हिस्सा होरी चाहे जहां रखे। नक्सलवाद के खूनी जबड़े होरी की फसल पर घात लगाकर बैठे हैं। थर-थर कांपता होरी पीछे पलटकर देखता है तो गुलाम भारत में जमींदारों का भय और पुलिस की वर्दी का आतंक गांव को चैन नहीं लेने देता था। आजाद हिन्दुस्तान में नक्सली आतंक ने जीने के लिए जमीन नहीं छोड़ी है। कहानी के ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ को आशा प्रभात पूरी तरह अनुवाद में उतार लायी है। कहानी यह भी साबित करती है कि उर्दू के लेखक हिन्दी के ‘कंटैंट’ से किस कदर जुड़े हैं कि कहीं फर्क ही नजर नहीं आता। होरी को तो पाठकों ने जिंदा देख ही लिया है।

सिद्दीकी आलम की कहानी ‘ढाक बन’ में इस कदर काव्यात्मकता है कि गद्य और कविता का फर्क ही मालूम नहीं होता। वर्षा, अन्धकार और अन्धड़ के बीच जनजातीय समाज की झरना का मंगरू की मृतात्मा से बातें करने के लिए ढाक वन में भटकना ‘चंद्रकांता संतति’ के टुकड़ों की याद दिलाता है।

आशा प्रभात की नजर कहानी के रहस्यमय माहौल को बुनने पर टिकी हुई है। अब जरा पाकिस्तानी कहानी ‘परदानशीं’ के दीदार कर आंखें तर कर लें। बुर्के में ढके-दबे हुस्न की झलक देखिये क्या गुल खिला रही है। कहानी कहती है कि खूबसूरती के कद्रदानों के जी में मैल हो, यह जरूरी तो नहीं। मेहंदी लगे संगमरमरी हाथों और गदराई कलाइयों पर डपटने के बावजूद आंखें उन पर टिक कर जम जाएं तो हंटर तो बरसेंगे ही।

नसरीन दर्जी के यहां कपड़े सिलवाने जाती तो नाप देते वक्त खुले कटावदार गिरेबान में से निकलती गरदन बेशकीमती वाइन के गिलास की तरह चमक-चमक उठती कि नाप लेते वक्त दर्जी मास्टर थूक निगलने लगता। और नाप के लिए लगा फीता फिसल-फिसल पड़ता। हुस्न के कद्रदानों में खोट नहीं था। खोटा तो बदजुबान नसरीन का दिल था जिसकी फितरत में इन्सानियत की बू ही नहीं थी।

पाकिस्तान के आगागुल की कहानी ‘दूसरी बाबरी मस्जिद’ साम्प्रदायिक हिंसा और शमन की ऐसी तस्वीर पेश कर रही है जो फिरकापरस्तों के लिए बड़ा सबक है। हिंसा, आगजऩी और फसाद की गली-मोहल्लों में फैली लपटों को दोनों मजहबों के लोग बड़ी सूझबूझ से शांत कर देते हैं। दोनों मजहब मिलकर साम्प्रदायिक हिंसा की तह में जाकर उन कारणों को भी पूरी तरह खत्म कर देते हैं जिसके जुनून में बेकसूर इनसान हलाक हो जाते हैं।

कहानी का माहौल ही इस कहानी की खासियत है और सबसे बड़ी खासियत कहानी में यह है कि साम्प्रदायिकता के बुनियादी सवाल का जवाब यहां मौजूद हैं। ‘बाप और बेटा’ में एक ऐसे उम्रदराज शख्स की जद्दोजहद है जो घरबारी और जवान बच्चों का बाप है। पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक वर्जनाओं के बीच उसकी जिस्मानी भूख अचेतन में दबी रह जाती है।

बेटी की उम्र की लडक़ी के साथ कैफे में छेड़-चंूट करते हुए वह बेटे द्वारा पकड़ लिया जाता है। गहरे अवसाद में डूबे अपने शौहर को देख बीवी समझती है कि इसे भूत चिपट गये हैं। धीरे-धीरे वह इस अवसाद से उबर जाता है। बेटा इसे सहज रूप में लेता है। कहानी मनोवैज्ञानिक है और फ्रायड के ‘दमित इच्छा के सिद्धांत’ पर केंद्रित है। यह उन हसरतों की कहानी है जहां उम्र मायने नहीं रखती। आशा प्रभात मनोविज्ञान से जुड़े शब्दों के अनुवाद ‘अर्थात’ कहकर खोलती हैं। कहीं-कहीं पर अर्थ के लिए ब्रैकेट (कोष्ठक) शैली भी अपनायी गयी है। मसलन ‘यंबरजल’ (नर्गिस के फूल) कहानी में कोष्ठक शैली से अर्थ स्पष्ट किया गया है। सांस्कृतिक अर्थों के लिए अनुवाद का यह बड़ा ही माकूल तरीका है। कश्मीर घाटी में निरंतर होने वाली आतंकवादी घटनाओं को यह कहानी ‘आंखों देखा हाल’ के रूप में उजागर करती है। आगे बढऩे और पढऩे-लिखने को मोहताज इस कहानी के करेक्टर चौराहों पर होने वाले भीषण विस्फोटों में सांसें लेते हैं।

इस संग्रह में कुछ ऐसी भी कहानियां हैं जिनके ओर-छोर ढूंढऩे के लिए रात-दिन की कवायद चाहिए। ये कहानियां धीमे-धीमे ही खुलती हैं। इस कहानी-संग्रह ने उर्दू और हिन्दी को अनुवाद के जरिये इतने करीब ला खड़ा किया है कि दोनों देशों का जमीनी बंटवारा अब दिखाई ही नहीं देता। दिख रही है तो आदमियत की वह आवाजाही जो उर्दू और हिन्दी की सूचना-क्षमता और सम्प्रेषण की ताकत से कामयाब हुई है।

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