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चुनावों से ठीक पहले आखिर योगी आदित्यनाथ ने क्यों किया मंत्रिमंडल विस्तार

संजय सक्सेना

चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद सरकार के संवैधानिक अधिकार सीमित हो जाते हैं। तब सरकार, कार्यवाहक सरकार के रूप में कार्य करती है और कोई नीतिगत निर्णय या किसी तरह की नई घोषणा करने का अधिकार उसके पास शेष नहीं रह जाता है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने भले ही अभी अधिसूचना जारी नहीं की हो, लेकिन राजनैतिक दल तो चुनाव का बिगुल बजा ही चुके हैं। सियासी खेल में विपक्षी और सत्तारुढ़ सभी ही दल अपने-अपने हिसाब से वोटरों का ब्रेनवॉश करने में लगे हैं। कोरोना के चलते जो विपक्षी नेता घरों में कैद थे, वह जनता के बीच दम दिखा रहे हैं। विपक्ष के साथ-साथ योगी सरकार भी चुनावी मूड में आ गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रियों के पास अब सरकारी काम करने को कुछ खास नहीं बचा है, इसके उलट इनके कंधों पर इस बात की जिम्मेदारी अधिक है कि सरकार ने करीब पौने पांच वर्षों में जो काम किया है, उसे जन-जन तक पहुंचाया जाए। इसीलिए योगी और उनके मंत्रियों का अधिकांश समय सरकार के कार्यों के प्रचार-प्रचार में ही गुजर रहा हैं। अब मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक अपने कार्यालयों में नहीं दिखाई पड़ते हैं। सरकार द्वारा बहुत जरूरी फाइलें ही निपटाई जा रही हैं। वैसे भी करीब ढाई महीने के बाद विधानसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी हो जाएगी। अधिसूचना जारी होने के बाद सरकार के संवैधानिक अधिकार सीमित हो जाते हैं। तब सरकार, कार्यवाहक सरकार के रूप में कार्य करती है और कोई नीतिगत निर्णय या किसी तरह की नई घोषणा करने का अधिकार उसके पास शेष नहीं रह जाता है। ऐसे में लाख टके का सवाल यही है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ढाई महीने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार क्यों करना पड़ गया। ढाई महीने तो इन मंत्रियों का विभागीय कामकाज समझने में ही निकल जाएगा।

दरअसल, यही सच है कि योगी मंत्रिमंडल का विस्तार सरकार और ठीक से चल सके, इसके लिए नहीं किया गया है, बल्कि इस विस्तार के पीछे की मंशा सौ फीसदी सियासी है। इसीलिए विपक्ष भी मंत्रिमंडल विस्तार पर तंज कर रहा है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सवाल खड़ा कर रहे हैं कि सरकार के पास जब बजट ही नहीं है तब मंत्री काम क्या करेंगे। ऐसे ही आरोप बसपा और कांग्रेस की तरफ से भी लगाए जा रहे हैं, जिसको विपक्ष की बौखलाहट बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। विपक्ष के आरोपों में इसलिए भी दम नजर आता है क्योंकि जो नए मंत्री बनाए गये हैं, उनकी सबसे बड़ी योग्यता यही है कि वह बीजेपी के जातिगत समीकरण में फिट बैठते हैं। भाजपा इन्हीं सात नये चेहरों के सहारे 2022 का चुनावी समीकरण साधने की कोशिश में है। बात नये मंत्रियों की जाति की करें तो सात में छह चेहरे गैर यादव पिछड़ी जाति और गैर जाटव अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के और एक ब्राह्मण चेहरा है। इन चेहरों के सहारे ही बीजेपी समग्र हिंदुत्व के संदेश को मजबूती प्रदान करना चाही है।
इस विस्तार के पीछे शोषित व वंचित वर्गों को सत्ता में भागीदारी देने का बड़ा सियासी संदेश भी है तो सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि आखिर बीजेपी ने किसी दलित जाटव या फिर पिछड़ों में जाट और यादवों को  क्यों तरजीह नहीं दी, जबकि किसान आंदोलन के चलते जाट मोदी-योगी सरकार से अच्छे खासे नाराज चल रहे हैं। वहीं यादव लोगों को भी लग रहा है कि योगी सरकार में उनके साथ दोयम दर्ज का व्यवहार किया जा रहा है तो इसके पीछे की बीजेपी की रणनीति का समझना होगा। बीजेपी को इस बात का अहसास अच्छी तरह से है कि अंदरखाने में दलितों और पिछड़ों के बीच काफी मतभेद उभरे हुए हैं। इसीलिए गैर जाटव दलितों को लगता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने उनके साथ कभी न्यायसंगत व्यवहार नहीं किया, इसीलिए 2014 से 2019 तक दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव में गैर जाटव दलित बीजेपी के पक्ष में मतदान करते रहे। इसी तरह से पिछड़ों में भी काफी मनमुटाव है। इसीलिए गैर यादव पिछड़ों को हमेशा इस बात का मलाल रहता है कि समाजवादी पार्टी राजनीति भले ही पिछड़ों की करती हो, लेकिन जब सत्ता की मलाई चखने की बारी आती है तो यादवों के खाते में आती है। बीजेपी इसी गैर जाटव और गैर यादव वोटरों की नाराजगी को बीजेपी के लिए बड़ा हथियार बना कर वोट बैंक में बदलना चाह रही है। तमाम मंचों पर बीजेपी के नेता बताते भी रहते हैं कि मायावती के राज में जाटव और समाजवादी राज में यादव वोटरों के अलावा किसी को भी फायदा नहीं मिलता है।
बात पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे ताकतवर और बीजेपी से नाराज दिख रहे जाट वोटरों को प्रतिनिधित्व नहीं दिए जाने की करें तो ऐसा लगता है कि बीजेपी जाट वोटरों को लेकर अलग रणनीति पर चल रही है। संभवतः बीजेपी को लगता होगा कि यदि जाट वोटरों को याद दिलाया जाएगा कि किस तरह से 2013 में मुजफ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगों के समय कथित रूप से समाजवादी पार्टी सरकार ने दंगाइयों को इनाम और पीड़ितों पर फर्जी मुकदमे ठोके थे तो जाट वोट आसानी से बीजेपी की झोली में गिर जाएगा। इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। 26 सितंबर 2021 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय किसान मोर्चा द्वारा आयोजित किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि मुजफ्फरगर दंगों में किसानों ने जान गंवाई थी और तत्कालीन समाजवादी सरकार ने दंगाइयों को सम्मानित करने का कृत्य किया। बात नये कृषि कानून के खिलाफ पश्चिमी यूपी में सुलग रहे किसान आंदोलन की कि जाए तो मोदी-योगी सरकार किसानों को दिल खोलकर पैसा बांट रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना सबसे अधिक होता है, इसलिए गन्ने की कीमत बढ़ा दी गई है। चीनी मिल मालिकों पर गन्ना किसानों का बकाया अदा करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।

बहरहाल, बात मंत्रिमंडल विस्तार की कि जाए तो योगी मंत्रिमंडल के तीन मंत्रियों की कोरोना के चलते हुई दुर्भाग्यपूर्ण मौत से उत्पन्न क्षेत्रीय व जातीय असंतुलन को दूर करने के साथ पश्चिम व पूर्वांचल के बीच भी संतुलन साधा गया है। यही नहीं, इसके जरिए पार्टी के कोर वोट के साथ नए वर्गों को भी साथ लाने का संदेश है। जिन लोगों को शपथ दिलाई गई है उनमें जितिन प्रसाद के रूप में एक अगड़ा (ब्राह्मण), तीन पिछड़े, दो अनुसूचित जाति और एक अनुसूचित जनजाति का चेहरा है। संजीव कुमार गोंड के रूप में अनुसूचित जनजाति के किसी चेहरे को पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल करके न सिर्फ प्रदेश में जहां-तहां बसे वनवासी और आदिवासी जातियों को भाजपा के साथ लाने, बल्कि मिर्जापुर, सोनभद्र के साथ चित्रकूट के कुछ हिस्सों में इनके कारण मतदान पर पड़ने वाले प्रभाव का ध्यान देते हुए सियासी समीकरणों को साधने की कोशिश की गई है। विस्तार में पश्चिम से चार व पूरब से तीन चेहरों को लेकर क्षेत्रीय संतुलन बनाने पर भी ध्यान दिया गया है।
कुर्मी वोट भाजपा का परंपरागत मतदाता माना जाता है। बीते दिनों संतोष गंगवार की केंद्रीय मंत्रिमंडल से विदाई के बाद बरेली के बहेड़ी से ही भाजपा विधायक छत्रपाल गंगवार को मंत्रिमंडल में लेकर भाजपा ने कुर्मियों की नाराजगी का खतरा दूर करने के साथ इनके सम्मान का ध्यान रखने का संदेश दिया है। प्रदेश की अनुसूचित जाति की आबादी में करीब 3 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाली खटीक व सोनकर बिरादरी को भी इस विस्तार में जगह देकर गैर जाटव मतदाताओं की भाजपा के साथ लामबंदी मजबूत की गई है। बलरामपुर से विधायक पल्टूराम और मेरठ की हस्तिनापुर से विधायक दिनेश खटीक के रूप में इन्हें दो स्थान देकर भाजपा ने अपने परंपरागत कोर वोट को संतुष्ट ही नहीं किया, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि उसे अपने कोर वोट का पूरा ख्याल है। डॉ. संगीता के रूप में न सिर्फ पूर्व के मंत्रिमंडल में शामिल कमल रानी वरुण की मौत से कम हुए महिला प्रतिनिधित्व को संतुलित किया गया है, बल्कि पूर्वी यूपी में वोटों के लिहाज से प्रभावी बिंद जाति को भी साधने का काम करके पिछड़ों में 10 प्रतिशत की भागादारी वाली निषाद व मल्लाह जैसी बिरादरियों के समूह को और मजबूती से साथ रखने की कोशिश की है।
लोकसभा के दो बार सांसद और केंद्र की मनमोहन सरकार में मंत्री रहे शाहजहांपुर के जितिन प्रसाद को लेकर न सिर्फ चेतन चौहान की मृत्यु से मंत्रिमंडल में घटे अगड़ी जाति के प्रतिनिधित्व को संतुलित किया गया है, बल्कि प्रदेश में बीते कुछ महीनों से ब्राह्मणों की अनदेखी की खबरों को भी खारिज करने की कोशिश की है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि भाजपा में शामिल होने से पहले जितिन ने खुद इस मुद्दे पर अभियान चलाया था। जाहिर है कि भाजपा ने उन्हें ही कैबिनेट मंत्री की शपथ दिलाकर यह संदेश दे दिया है कि वर्तमान सरकार में ब्राह्मणों की अनदेखी की अटकलें पूरी तरह निराधार हैं। इसी तरह धर्मवीर प्रजापति को मंत्री बनाकर भाजपा ने पिछड़ों में गैर यादव 3 प्रतिशत प्रजापति व कुम्हार जाति को भाजपा के साथ जोड़ने की कोशिश की है।
योगी मंत्रिमंडल के विस्तार में सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि भाजपा ने अपने सहयोगी अपना दल (एस) और निषाद पार्टी को जगह नहीं दी है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव 2022 अपना दल और निषाद पार्टी के गठबंधन के साथ लड़ने का ऐलान किया है। 26 सितंबर को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में अपना दल (एस) के अध्यक्ष आशीष पटेल को मंत्री बनाए जाने की अटकलें थीं। अपना दल की ओर से आशीष को मंत्री बनाए जाने की मांग भी की जा रही थी। वहीं निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद को विधान परिषद में सदस्य मनोनीत तो कराया गया है, लेकिन मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गयी है। हालांकि अपना दल की अनुप्रिया पटेल को केंद्र सरकार में राज्यमंत्री बनाया गया है।

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