कहर बरसा था दिल्ली में उन दिनों

प्रस्तुति रोहताश सिंह आर्य-

बादशाह बहादुर शाह जफर के कैद हो जाने के बाद अंग्रेजों के जासूसों ने खबर दी कि बादशाह के बेटे हुमायूं के मकबरे में ही छिपे हुए हैं और इन लोगों ने भी बगावत के दौरान अंग्रेजों का कत्ल करने में हिस्सा लिया था। अंग्रेज अधिकारी हडसन यह खबर पाकर झूम उठा।

उसने जनरल विल्सन से बादशाह के बेटों को गिरफ्तार करने की इजाजत ली और निकल पड़ा।  उसके साथ सौ के करीब घुड़सवार सैनिक थे। दिल्ली पर कंपनी का पूरी तरह  नियंत्रण हो गया था। जासूस मुंशी रज्जबअली और मिर्जा इलाहीबख्श भी उसके साथ थे।

तीनों शहजादे मिर्जा मुगल, खिजर सुलतान और मिर्जा अबूबकर मकबरे के भीतर ही मौजूदद थे। हडसन बाहर की रूक गया और उसने शहजादों को आत्मसमर्पण करने का संदेश भिजवाया। शहजादों ने शर्त रखी कि अगर उनकी जान बख्श दी जाए तो वे बिना लड़े आत्मसमर्पण करने को तैयार है। इस पर हडसन ने अपनी असमर्थता जताई और कहा कि इसका अधिकार मात्र जनरल विल्सन को ही है।

शहजादों की समझ में कुछ नही आ रहा था। कुछेक लोगों ने सलाह दी कि उन्हें तैमूरी खानदान की इज्जत की लाज रखते हुए लड़ते हुए शहीद हो जाना चाहिए। तीनों तैयार भी हो गये लेकिन इन्हें लेकर चल दिया। थोड़ी दूर चलने के बाद उसने शहजादों के कपड़े उतरवा दिये और उन्हें गोली मार दी। उनकी लाश को लेकर वह कोतवाली आया और चौराहे पर  फांसी पर लटका दिया। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शहजादों का सिर धड़ से अलग कर दिया गया और सिर बादशाह के पास भेज दिये गये। हडसन खुद बादशाह को यह तोहफा देना चाहता था।

इनके सिर खूनी दरवाजे पर लटका दिये गये। इसी दरवाजे पर दारा और अब्दुरहीम खां खानखाना के लडक़ों के सिर भी लटकाये गये थे।

तब दिल्ली के आसपास सात रियासतें थीं। झज्जर, पाटौदी, दुजाना, लुहारी, बल्लभगढ़, फर्रूखनगर, बहादुरगढ़ और दादरी।

क्रांति के दमन के तुरंत बाद अंग्रेजों ने इन रियासतों को सबक सिखाने का फैसला किया। झज्जर के नवाब अब्दुल रहमान पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने मेटकॉफ साहब को पनाह नही दी जब वे बागियों से बचने के लिए उनके दरवाजे तक गये थे। बादशाह को पकड़ लिया गया और फांसी देकर उनकी रियासत जब्त कर ली गयी। बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने कई अधिकारियों की रक्षा नही की जिसके चलते यह अधिकारी बागियों के हाथों में मारे गये। नाहरसिंह को भी फांसी दे दी गयी। इसी तरह फर्रूखनगर के नवाब अहमद अली को फांसी देकर उनकी रियासत छीन ली गयी।

लुहारी के रईस अमीउद्दीन खां और नवाब जयाउद्दीन कुछ दिनों तक कैद रहे। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। पाटौदी और दुजाने की रियासतें भी बच गयीं। बहादुरगढ़ दादरी की रियासत जब्त कर ली गयी। नवाब बहादुरजंग को लाहौर भेज दिया गया और उन्हें पांच सौ रूपये माहवार पेंशन देने की घोषणा कर दी गयी।

(साभार)

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