हम शांति पाठ करते समय ‘ओ३म् द्यौ: शांतिरंतरिक्षं शांति : पृथिवी:….’ के मंत्र से द्यौलोक से लेकर पृथ्वी तक और जलादि प्राकृतिक पदार्थों से लेकर वनस्पति जगत तक में शांति शांति भासने का वर्णन करते हैं, और अंत में इन सबमें व्याप्त इस शांति के लिए प्रार्थना करते हैं कि यही शांति मुझे भी प्राप्त कराइये। क्योंकि शांति और प्रगति का अन्योन्याश्रित संबंध है, जहां शांति है वहीं प्रगति है। जहां शांति नही वहां प्रगति नही।

मनुष्य सृष्टि प्रारंभ से ही शांति की खोज में रहा है। क्योंकि उसका अभीष्ट परमशांति (मोक्ष) को प्राप्त करना है, इसलिए वह चाहता है कि सर्वत्र व्याप्त शांति की भावना का वास उसके अंत:करण में हो जाए। संसार के क्लेशों के कारण उसके हृदय में आया कलुष भाव मिटे और वह शांत निभ्र्रांत होकर अपने अभीष्ट की साधना में मग्न रहे।

शांति की खोज में लगे मानव समाज को कुछ कालोपरांत उसी के मध्य से निकले लोगों ने अपने उपद्रवों और उत्पातों से दुखी करना आरंभ कर दिया तो राज्य की उत्पत्ति का प्रश्न सामने आया। राज्य की उत्पत्ति होने पर राज्य ने अपनी प्रजा की सुखशांति को अपना राजधर्म घोषित किया, अर्थात सर्वत्र शांति हो और शांति के उस परिवेश में लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए शांतिपूर्ण जीवन यापन करें, यह राज्य का धर्म घोषित किया गया। यह तो सब कुछ हो गया पर अभी राजधर्म को लागू करने के लिए बल और दण्ड की भी आवश्यकता थी। इसके लिए क्षत्रिय वर्ग को नियुक्त किया गया। ये लोग अवैतनिक रहकर राजधर्म के निर्वाह में राजा को अपनी सेवाएं दिया करते थे। असामाजिक लोगों के दमन में राज्य इनकी सेवा लेता था, यही राजा का बल होता था और यही उसका दण्ड होता था। इसी बल से कालांतर में स्थायी सेना का विकास हुआ। इस सेना के डंडे से आतंकवादी कांपते थे अर्थात उन्हें ‘दण्ड’ का भय रहता था। डंडा दण्ड शब्द से ही बना है। इस प्रकार सेना की समाज की शांति व्यवस्था और व्यक्ति की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान है। समाज में शांति इसलिए है कि उसके भीतर रहने वाले असामाजिक लोगों को ‘दण्ड का भय’ है और व्यक्ति उन्नति इसलिए कर रहा है कि उसको असामाजिक लोगों से कोई भय नही है।

विश्व को सेना का वास्तविक आदर्श भारत ने दिया है। भारत की सेना का वास्तविक उद्देश्य समाज के आततायी लोगों का विनाश करना और सज्जन प्रकृति के लोगों को जीने योग्य वातावरण उपलब्ध कराना रहा है। इसलिए प्राचीनकाल से ‘शांति सेना’ केवल भारत ने ही बनायी है। दूसरे लोगों की सेनाएं सेना नही रही हैं। क्योंकि उनकी सेना का उद्देश्य कभी भी शांति व्यवस्था की स्थापना करना नही रहा है, अपितु उनका उद्देश्य शांतिपूर्ण जीवन जी रहे लोगों के माल को लूटना रहा है। इसलिए वह आर्मी (अर्थात भुजबल-मुठमर्दी से कार्य करने वाला संगठन) है। इसे आज एक ‘डकैत गिरोह’ भी कह सकते हैं। मजहब के नाम पर विश्व में कई सौ वर्षों तक जो आतंक मचता रहा, वह इसी ‘आर्मी’ की देन रहा है। यह ‘आर्मी’ किसी के अधिकारों का हनन करती है, जबकि हमारी सेना व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का सम्मान करती है और उन्हें यदि किसी वर्ग से संकट है तो उससे उनकी रक्षा भी करती है।

इस प्रकार भारत की सेना का गौरवशाली इतिहास है। इसका भारत के जनजीवन में ही नही अपितु प्राणिमात्र के जीवन में भी महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि शांति की हमारी सार्वत्रिक कामना और प्रार्थना को यह सेना ही संपन्न कराती है। हर प्राणी की जीवन रक्षा तभी संभव है जब असामाजिक और उग्रवादी लोग (प्रकृति से छेड़छाड़ करने वाले या निरीह प्राणियों का वध करके उन्हें खाने वाले लोग) समाज में ना रहेंगे। इस कार्य को सेना ही करती है। आज समाज में सर्वत्र अशांति इसलिए है कि समाज ही असामाजिक लोगों के अधिकारों का रक्षक बन रहा है। मानवाधिकारों के नाम पर अमानवीय और राक्षस लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए सेना के हाथ बांध दिये गये हैं।

हमारे जीवन की रक्षा के लिए इतने महत्वपूर्ण संस्थान सेना को हम एक बोझ ना समझें। पर लग यह रहा है कि ‘वन रैंक वन पैंशन’ के लिए पिछले लगभग अस्सी दिनों से जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे पूर्व सैनिकों के प्रति हम असंवेदनशीलता प्रकट कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भारत की कत्र्तव्यनिष्ठ और धर्मनिष्ठ सेना के पूर्व सैनिकों की मांग पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सेना उनके अपने ‘मिशन’ को भी पूर्ण कराएगी यह ध्यान रखना चाहिए। ‘राक्षसों’ के नाश के लिए जिस संगठन की निष्ठा जीतनी आवश्यक है, उसे अपने प्रति अविश्वास से या विद्रोह के भाव से भरना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नही माना जा सकता। क्या ही अच्छा होता कि देश के प्रति आज भी ईमानदार पूर्व सैनिकों की मांग को मानने की घोषणा प्रधानमंत्री लालकिले की प्राचीर से ही कर देते। वह इसे क्रियात्मक रूप देने के लिए वर्षांत तक का या इस वित्तीय वर्ष के समाप्त होने तक का समय ले सकते थे, पर घोषणा लालकिले से की जाती तो अच्छा लगता। जेटली कह रहे हैं किसैनिकों की प्रत्येक वर्ष पेंशन/वेतन की समीक्षा की मांग नही मानी जा सकती, उनकी बात ठीक हो सकती है पर यह भी तो सच है किवोट मांगते समय देश के खजाने या आर्थिक संसाधनों का ध्यान क्यों नही रखा जाता? उस समय थोक के भाव घोषणाएं की जाती हैं और जब उन्हें पूरा करने का समय आता है तो उनसे राजनीतिज्ञ भागते हैं। यह मतदाताओं के साथ धोखा नही तो क्या है?

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