अंधविश्वासों का खण्डन समाज की उन्नति के लिए परम आवश्यक

satyarth prakashजिस प्रकार से मनुष्य शरीर में कुपथ्य के कारण समय-समय पर रोगादि हो जाया करते हैं, इसी प्रकार समाज में भी ज्ञान प्राप्ति की  समुचित व्यवस्था न होने के कारण सामाजिक रोग मुख्यतः अन्धविश्वास, अपसंस्कृति एवं किंकर्तव्यविमूढ़ता आदि हो जाया करते हैं। अज्ञान, असत्य व अन्धविश्वास का पर्याय है। जहां अज्ञान होगा वहां अन्धविश्वास वर्षा ऋतु में खेतों में खरपतवार की तरह उग ही जाया करते हैं। उदाहरण के लिये हम प्रकृति वा सृष्टि को देखते हैं तो हमारे मन में प्रश्न आता है कि यह सुव्यवस्थित संसार किसकी रचना है अर्थात् इसका रचयिता कौन है? अब इस प्रश्न के उत्तर के लिए ज्ञान की आवश्यकता है। ज्ञानी भी ऐसा हो जो लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति को ही परम प्रमाण न मानकर वैदिक परम्परा में हमारे ऋषियों व मुनियों ने विचार, ध्यान व चिन्तन द्वारा जिस सत्य को प्राप्त किया, उस ज्ञान व अनुभव से परिचित हो व उसको समझने वा मानने वाला हो। आजकल के हमारे पढ़े लिखे लोग हमारे वेद एवं अन्य ज्योतिष, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति आदि का अध्ययन तो करते नहीं, केवल विज्ञान, इतिहास व भूगोल आदि विषयों का अध्ययन कर इन प्रश्नों पर विचार करते हैं तो वह इस संसार की रचना में छिपी हुई सत्ता को जान नहीं पाते। वेदों ने कहा है कि ‘‘ईशावास्यमिदं सर्वम् यत्किंच जगत्यां जगत्’,  ‘स दाधार पृथिवीन्द्यामुतेमां’ आदि मन्त्र सूक्तियों में संसार के रचयिता को सर्वव्यापक ईश्वर बताया गया है और उसे ही पृथिवी व द्युलोक का आधार, धारणकर्त्ता व रचयिता बताया गया है। ईश्वर का युक्ति व तर्क संगत वर्णन भी वेदों में विस्तार से प्राप्त होता है। जो बात तर्क से सिद्ध वा अकाट्य हो वह सत्य होती है। सत्य निर्धारण की मुख्य विधि व प्रक्रिया यही है कि किसी विषय के पक्ष व विपक्ष के विचारों की समीक्षा की जायें और जो बातें अकाट्य हों, उनको सत्य माना जाये। ईश्वर विषय पर विस्तार से अध्ययन व निर्णय हेतु वेदान्त दर्शन की रचना महर्षि बादरायण वा वेद व्यास जी ने सहस्रों वर्ष पूर्व वैदिक काल में की थी। इसमें कहा गया है कि जिससे इस संसार की उत्पत्ति हुई है, जिससे इसका पालन वा संचालन होता है तथा अन्त में जिससे इस संसार का प्रलय व विनाश होता है, उसे ईश्वर करते है। यह ईश्वर हमारी ही तरह से एक चेतन तत्व है। अन्तर इतना है कि हम एकदेशी व अल्प हैं तथा ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वज्ञ है। सर्वव्यापकता और सर्वज्ञता उसका अनादि व नित्य गुण है। वह सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदि मूल वा आदि स्रोत है। वेदान्त दर्शन में इन लक्षणों व गुणों से युक्त ईश्वर को सिद्ध भी किया गया है। दर्शन का आधार समस्त वैदिक विचार व उनका चिन्तन है। सभी छः दर्शन चार वेदों के पोषक हैं। अतः यह सिद्ध होता है कि एक सर्वव्यापक और सर्वज्ञ सत्ता ईश्वर है जिससे, जिसके द्वारा व जिसके ज्ञान व सामर्थ्य से मूल प्रकृति नामी सत्ता जो सत्व, रज व तम गुणों वाली अनादि व नित्य है, से पूर्वोक्त ईश्वर ने इस सृष्टि को रचा वा बनाया है। यह कार्य ऐसा ही है जैसे कि हम किसी वस्तु के निर्माण का ज्ञान अर्जित कर निर्माण में उपयोगी सभी पदार्थों को एकत्र कर ज्ञान व शक्ति रूपी सामर्थ्य का प्रयोग कर पदार्थों को बनाते हैं। उद्योग में पदार्थों का निर्माण भी इसी सिद्धान्त पर होता है। यदि इच्छित वस्तु के निर्माण का ज्ञान न हो, निर्माण में आवश्यक पदार्थ उपलब्ध न हो तथा हमारे उद्योग में यन्त्र पदार्थ निर्माण के सर्वथा वा सब प्रकार से उसके अनुकूल व अनुरूप न हो तो नया इच्छित पदार्थ नहीं बन सकता है।

खण्डन का अर्थ किसी पदार्थ को तोड़ना है। सत्य तो सत्य है उसका खण्डन वा उसका तोड़ना सम्भव नहीं है। असत्य व अज्ञान ऐसा है कि जिससे मनुष्य को हानि होती है और वह उस अज्ञानाधारित कार्य से इच्छित लक्ष्य व उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाता। अतः हमें अपनी बुद्धि से मनन कर इच्छित विषय के सभी पहलुओं पर विचार कर, जो उद्देश्य को पूरा करने वाले पहलु हैं, उन्हें उपयोग में लाना होता है और जो अनुपयोगी होते हैं, उन्हें छोड़ना होता है वा अज्ञानियों को उन अज्ञानतापूर्ण कार्यों से छुड़वाने के लिए उनका खण्डन व सत्य पदार्थ, पक्ष व पहलुवों का मण्डन कर समझाना होता है। इस कसौटी वा तुला पर हम अपने जीवन के प्रत्येक कार्य व चिन्तन को देख व परख कर ग्रहण व त्याग कर सकते हैं। सबसे पहला कार्य तो यह करना है कि हम सब सभी सत्य विद्याओं का अध्ययन करें। आधुनिक ज्ञान सब अच्छा नहीं है और प्राचीन ज्ञान सब बुरा व अनुपयोगी नहीं है। हमें दोनों में सत्य ज्ञान व विद्याओं का ग्रहण व असत्य ज्ञान तथा विद्याओं का त्याग करना चाहिये। जहां तक इस संसार के निर्माता को समझना है तो हमें केवल वेद और वैदिक साहित्य की ही शरण लेनी चाहिये। महर्षि दयानन्द ने ईश्वर के सत्य स्वरूप के निर्धारण के लिए सत्यार्थ प्रकाश नाम का ग्रन्थ लिखा है जो सभी प्रकार की सत्य मान्यताओं से हमारा परिचय कराता है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी इसी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में असत्य, मिथ्या, अज्ञान व तर्कहीन मान्यताओं का परिचय कराकर उनका वेद, युक्ति व तर्क आदि प्रमाणों से खण्डन किया है। यदि हम सत्य को जानना चाहते हैं तो हमें सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन करना ही होगा। सत्य का ज्ञान हो जाने व जीवन में उसका आचरण करने से हम उन्नति को अथवा जीवन में विकास जो कि उन्नति का ही पर्याय है, प्राप्त होते हैं और विपरीत स्थिति में अवनति व गिरावट को प्राप्त होते हैं। इसी कारण महर्षि दयानन्द ने वेदों के आधार पर सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहने को कहा है। वह उपदेश करते हैं कि सत्य को मानना और मनवाना और असत्य को छोड़ना और छुड़वाना उन्हें व सभी मनुष्यों का अभीष्ट होना चाहिये। बहुत से लोग उनके खण्डन करने को बुरा मानते थे परन्तु यही कहा जा सकता है कि ऐसे लोग अज्ञानी व स्वार्थी ही हो सकते हैं। कोई भी ज्ञानी व्यक्ति असत्य के खण्डन व सत्य के मण्डन से नाराज व उद्विग्न कभी नहीं हो सकता। ज्ञानी व विवेकपूर्ण व्यक्ति वही हो सकता है जो असत्य के खण्डन का प्रशंसक व सत्य के मण्डन का भी प्रशंसक हो। विगत लगभग 140 से कुछ अधिक वर्षों में महर्षि दयानन्द द्वारा खण्डित व मण्डित मान्यताओं को किसी मत, सम्प्रदाय, धार्मिक संस्था का कोई भी धर्म गुरू व विद्वान युक्ति व प्रमाण पूर्वक खण्डन व प्रतिवाद नहीं कर सका। इससे सिद्ध हो गया है कि महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन में जो कहा था वह सर्वथा व पूर्णतः सत्य था व आज भी है।

अब खण्डन की देशोन्नति में भूमिका पर विचार करते हैं। खण्डन करने से असत्य व अज्ञान का नाश होता है। देशोन्नति में असत्य व अज्ञान बाधक होते हैं, यह सर्वमान्य सिद्धान्त है। उदाहरण रूप में विचार कर सकते हैं कि यदि देश व समाज के सभी लोग असत्य भाषी अर्थात् झूठे और मिथ्याचारी हों तो क्या समाज व देश उन्नति कर सकते हैं? उसका एकमात्र उत्तर है कि नहीं कर सकते। सत्य सदा सर्वदा प्रशंसनीय और असत्य व अन्धविश्वास सर्वदा निन्दनीय होने से खण्डनीय हैं। देश में जितने अधिक मनुष्य सत्याचारी वा सदाचारी, चरित्रवान, देशभक्त, ईश्वरभक्त, जातिवाद, ऊंच-नीच, छोटे-बड़े की भावना से मुक्त होंगे वह समाज व देश उतना ही उन्नत होगा। यूरोप में उन्नति का कारण ही वहां अन्धविश्वासों की कमी व देशवासियों के आदर्श चरित्र हैं। वहां भ्रष्टाचार, असत्य व्यवहार, जन्मना जातिवाद, ऊंच-नीच, सामाजिक विषमता, मिथ्या ईश्वरोपासना, मिथ्या धार्मिक कर्मकाण्ड, व्रत व उपवास आदि न्यूनातिन्यून है जिससे वह प्रगति व उन्नति कर रहे हैं। हमारा सारा देश व विश्व के सभी देश अधिकांश रूप में यूरोप के वैज्ञानिकों के आभारी हैं जिनकी कृपा व वैज्ञानिक अनुसंधानों के कारण हमें अपने दैनिक जीवन में उपयोग की वस्तुएं यथा विद्युत व इससे संचालित यन्त्र, कार, सुविधादायक भवन व आवास, टेलीफोन, कम्प्यूटर, रेल व वायुयान, अच्छी सड़के, रोगोपचार व शल्य क्रिया का ज्ञान आदि उपलब्ध हैं। यह सब सत्य की खोज व इससे प्राप्त देनें हैं। दूसरी ओर हमारा देश आज भी अज्ञान, अन्धविश्वास, असत्य, मिथ्याचारों व सामाजिक विषमताओं के झंझावतों में उलझा हुआ है जो हमें पतन, अवनति व गुलामी की ओर ले जा रहे हैं। आज इसी कारण कुछ लोग तो बड़े बड़े धन कुबेर बन गये हैं और दूसरी ओर न लोगों को पेट भर भोजन है, न चिकित्सा व्यवस्था है, न अच्छा आवास न अन्य सुविधायें हैं। हमारे अधिकांश देशवासियों का नरक से भी बुरा जीवन है और हम गर्व करते हैं कि हमारा देश सृष्टि का धर्म, ज्ञान व विद्या का आदि स्रोत रहा है। यह पूर्ण सत्य होते हुए भी वर्तमान परिस्थितियों में हमें मिथ्या अभिमान से ग्रसित प्रदर्शित करता है। देश के मानव मानव में जमीन आसमान का अन्तर हमारी शासन प्रणाली की देन के साथ सबके लिए एक समान, निःशुल्क, वैदिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा के न होने के कारण है। इसका उत्तरदायित्व भी किसी न किसी रूप में शासन प्रणाली को ही है जिसमें अनेक सुधारों की आवश्यकता है। अतः असत्य का खण्डन कर ही समस्याओं का निदान किया जा सकता है। असत्य के खण्डन से ही देश सबल, उन्नत व विकसित होगा। इस देश को उन्नत व विकसित उसी दिन कहा जायेगा जिस दिन सभी देशवासी वैदिक शिक्षा से शिक्षित होकर परस्पर एक दूसरे को मित्र, बन्धु व सबको एक परिवार के सदस्य अर्थात् ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की दृष्टि से देखेंगे और  मानेंगे।

हम समझते हैं कि यह सिद्ध सत्य सिद्धान्त है कि असत्य के खण्डन और सत्य के मण्डन से ही व्यक्ति, समाज व देश का विकास व सर्वांगीण उन्नति सम्भव है और इसके विपरीत स्थिति हमें अवनति की ओर ले जाती है।

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