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इतिहास के पन्नों से

गुर्जर प्रतिहार वंश की महानता और श्रेष्ठता

कल हमने राजपूतों का उदय, अधिवाशन एवं उत्पत्ति के विषय में विद्वान, इतिहासकार ,इतिहासज्ञ के विचार पढ़े।
आज हम गुर्जर प्रतिहार की उत्पत्ति छठी से 12वीं सदी तक का पढ़ते हैं।
जिस पुस्तक से हम पढ़ रहे हैं और प्रस्तुत कर रहे हैं वह राजस्थान की कला ,संस्कृति और इतिहास लेखक डॉ महावीर जैन व अन्य से उद्धत हैं।

“राजपूत काल के प्रारंभ में जिन राजपूत वंशों का प्रभुत्व रहा उनमें गुर्जर प्रतिहारो का नाम सबसे ऊपर गिनाया जा सकता है। राजस्थान के सातवीं से आठवीं सदी के राजस्थान प्राप्त शिलालेखों एवं ताम्र पत्रों में प्रतिहार (गुर्जर प्रतिहार) शासकों के उल्लेख बहुत अधिक संख्या में प्राप्त होते हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि प्रतिहारो ने अपने वंश के शासन का प्रारंभ सर्वप्रथम राजस्थान में ही किया होगा। छठी शताब्दी के लगभग से राजस्थान का दक्षिणी पश्चिमी क्षेत्र गुजरात्रा कहलाता था। जोधपुर व आसपास के क्षेत्र उसमें शामिल थे। जोधपुर व अन्य पड़ोसी क्षेत्रों में प्राप्त अभिलेखों से ज्ञात होता है कि प्रतिहारों का अधिवाशन इस क्षेत्र में छठी सदी के लगभग मध्य में हो गया था । गुजरात्रा प्रदेश के शासक होने के कारण धीरे-धीरे इन्हें गुर्जर प्रतिहार कहा जाने लगा।
प्रतिहारो की उत्पत्ति के संबंध में भी इतिहासकार एकमत नहीं है। कुछ इनको गुर्जर जाति से उत्पन्न मानते हैं तो कुछ गुर्जर का आशय गुर्जरात्रा क्षेत्र (गुजरात) आदि से लेते हैं। नीलगुंड, राधनपुर, देवली एवं कर_ हाड के शिलालेखों में प्रति हारों को गुर्जर नाम से संबोधित किया गया है। पंपा द्वारा रचित” विक्रमार्जुन विजय “में महिपाल प्रतिहार को गुर्जर राज कहा गया है। इस संबंध में अलग-अलग विद्वानों के निम्न मत हैं।

भगवान लाल इंद्र जी

प्रतिहार गुर्जर थे। जो कुषाण शासक कनिष्क के शासन काल में पश्चिमोत्तर भागों से होकर विदेशों से यहां आए, तथा यहीं बस गए ।गुजरात राज्य में रहने के कारण यह गुर्जर कहलाए ।

हर्ष के समय भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भीनमाल ( पीलो मोलो, भीनमाला) को गुर्जर साम्राज्य की राजधानी बताया है ।
अरब यात्रियों ने इन गुर्जरों को जुर्ज लिखा है जो गुर्जर शब्द का ही एक विकृत रूप है।
( मेरी स्वयं की मान्यता है कि आज का जॉर्जिया देश पहले गुर्जर देश हुआ करता था जिसको अरब के लोग जुर्ज्ज, जुरजा, कहते थे जो बाद में जॉर्जिया कहा जाने लगा। यह रूस के पश्चिम में भूमध्य सागर के पास में स्थित है। गाजियाबाद में आयोजित एक सभा के दौरान अपने उद्बोधन में मैंने
अपने समाज के लोगों के समक्ष इस तथ्य को रखा था। इस सभा की अध्यक्षता पूर्व मंत्री श्री रामचंद्र विकल द्वारा की गई थी। लोगों ने सहज रूप से लेकिन आश्चर्यजनक मानते हुए स्वीकार किया था।
इस प्रकार जॉर्जिया तथा मध्य एशिया से गुर्जरों का विकास संभव हो सकता है।)
भोज प्रथम जिसे बंगाल के देव पाल ने परास्त किया था, गुर्जर था।

गुर्जर प्रतिहारो को गुर्जर जाति का सिद्ध करने वाले ऐतिहासिक अभिलेख।

अमोघ वर्ष का 871 ईसवी का संजन ताम्रपत्र।
कर्क राज् का बड़ौदा ताम्रपत्र 811 से 812 ईसवी।
चेदी राजा कर्ण का गो हरवा अभिलेख।
शिरूट शिलालेख।
चंदेल धन्ग का 954 ईसवी का खजुराहो शिलालेख।

गुर्जर राजा मंथन देव का 960 ईसवी का राजौर गढ़ अभिलेख।
नीलगुंड, राधनपुर, देवली तथा करहाड के शिलालेखों में।

गुर्जर प्रतिहारो को गुर्जर सिद्ध करने वाले साहित्यिक प्रमाण।

उद्योतन सूरी द्वारा लिखित ग्रंथ “कुवलयमाला” जाबालीपुर अर्थात जालौर के प्रतिहार नरेश वत्सराज के दरबारी कवि उद्योतन सूरी जैन मुनि ने 778 ईसवी में कुवलयमाला नामक ग्रंथ की रचना प्राकृत भाषा में की। इसमें वत्सराज के राज्य प्रदेश को गुर्जर देश कहा गया है, और वहां की प्रमुख जाति गुर्जर का उल्लेख किया है।

जिनसेन सूरी कृत हरिवंश पुराण।
783 ईसवी में वर्द्धमान पुर (बड़वान) नगर में गुर्जर प्रतिहारो के सामंत राजा धनराज चापउत्कट के समय जिनसेन सूरी ने “हरिवंश पुराण “नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें अवंती(अवंतिका उज्जैन उज्जयिनी भी इतिहास में दर्ज है इसके अध्ययन के उपरांत यह भ्रांति भी दूर होती है कि वीर विक्रमादित्य, राजा भर्तहरि एवं उनके वंश की 9 वी पीढ़ी में राजा भोज जो 11 वीं सदी में हुए थे वह भी गुर्जर नरेश थे इन्हीं राजा भोज ने भोज पाल अर्थात भोपाल बसाया था इन्हीं राजा भोज के दरबार में बहुत सारे कभी रहते थे यह परमार वंशी धारानगर वर्तमान में धार मध्य प्रदेश के नरेश थे इसी राजा भोज ने राजा सुहेलदेव के साथ मिलकर बहराइच में महमूद गजनबी के भांजे सालार मसूद की सेना को गाजर मूली की तरह काट कर सालार मसूद का वध किया था और सोमनाथ के मंदिर का अपमान और भारत माता को पद दलित करने के अपमान का बदला लिया था) नरेश राजा वत्सराज का उल्लेख है।

कल्हण कृत राज तरंगिणी।
कश्मीर के राज दरबारी कवि एवं लेखक कल्हण ने राज तरंगिणी नामक ग्रंथ की रचना की इसमें गुर्जर साम्राज्य के महान शासक मिहिर भोज का उल्लेख है।

और अब अरब लेखकों सुलेमान अल मसूदी अल इदरीसी अलबरूनी आदि ने गुर्जरों को जुर्ज़, जुर्ज्र, लिखा है ।अल मसूदी ने गुर्जरों की उपाधि” वराह” का भी उल्लेख किया है।

कन्नड़ कवि पंप का पंप भारत विक्रमार्जुन विजय।
कवि पंप ने पंप भारत की रचना 941 में की थी उन्होंने कन्नौज नरेश महिपाल को गुर्जर राजा लिखा है।

बाणभट्ट कृत हर्षचरित।

थानेश्वर एवं कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के दरबारी कवि बाणभट्ट ने हर्षचरित नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें गुर्जर शब्द का उल्लेख किया गया है। हूण हरिण ,केसरी सिंधु राज ज्वर ,गुर्जर प्रजगरो,। इसमें महाराज हर्ष के पिता राजा प्रभाकर वर्धन को हूण रुपी हरिन के लिए के लिए केसरी यानी सिंह ,सिंधु राज के लिए ज्वर यानी बुखार तथा गुर्जर राजा की नींद हराम करने वाला बताया है। यहां गुर्जर शब्द गुर्जर जाति, गुर्जर राजा तथा गुर्जर राज्य तीनो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।

कक्कुक।
बाऊक के बाद कक्कुक राजा बना। घटियाले से मिले हुए दोनों शिलालेख इसी के हैं। इन शिलालेखों में राजा कक्कुक को मरू माड, वल्ल, त्रवणी, अज्ज, गुर्जरा, आदि राज्यों में ख्याति फैलाने वाला आदर्श राजा लिखा है ।उसने वट्ट नानक (वेड़ा नाना) नामक दुर्गम पहाड़ पर नगर बसाया । इसने आभीरों(अहीरों) के आक्रमणों को विफल कर दिया था ।अपनी विजय स्वरूप उसने मंडोर और रोसिंह कूप नामाक स्थानों पर विजय स्तंभ बनवाएं। रोहिंसकूप नगर में कककुक ने विष्णु देव का मंदिर बनवाया।
कक्कूक न्यायी, प्रजा पालक एवं विद्वान था, और संस्कृत में काव्य रचना भी करता था। घटियाले के संस्कृत शिलालेख के अंत में एक श्लोक उसका बनाया हुआ खुदा है, और साथ में यह भी लिखा है कि यह श्लोक स्वयं कक्कुक का बनाया हुआ है। मंडोर के प्रतिहारों की कक्कुक तक की श्रंखला बद्ध वंशावली ही उपलब्ध है। मंडोर का गढ़ इंदिरा शाखा के प्रतिहारों ने प्रतिहार हम्मीर से तंग आकर राव वीरम के पुत्र राठौड़ चूंडा को 1395 ईस्वी में दहेज में दे दिया था। इस घटना के साथ ही मंडोर प्रतिहारो के राजनीतिक विस्तार का इतिहास समाप्त हो गया। मंडोर शाखा के प्रतिहारों का राज्य विस्तार अनुमानित है कि जोधपुर से 40 मील उत्तर-पश्चिम और 60 मील के लगभग उत्तर पूर्व में चारों ओर फैला था। इनका राज्य विस्तार काठियावाड़ तक हो गया था ।राजस्थान के बचे हुए कुछ भाग कन्नौज के या मालवा तथा गुजरात के प्रतिहारों के अधीन थे। उद्योतन सूरी के अनुसार गुर्जरों की मातृभाषा गुर्जर अपभ्रंश (प्राकृत अपभ्रंश) और संस्कृत थी।
नंदीपुर (भंडौच )के गुर्जर प्रतिहार।
नांदीपुर, नंदोद , भंडोंच,।
गुर्जर राज्य का संस्थापक गुर्जर हरिश्चंद्र का पुत्र दद्द प्रथम राजा था। जो नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर समुद्र के नजदीक स्थित बंदरगाह तथा प्राचीन कालीन राजा बलि के यज्ञ का स्थल है। यहां भृगु ऋषि का आश्रम था ।मंडोर नरेश रज्जिल के लघु भ्राता दद्द प्रथम ने मंडोर तथा भीनमाल के गुर्जर राजाओं की सहायता से ही नागवंशी तथा वनवासी राजा निरहूलक के राज्य प्रदेशों पर अधिकार किया था ।नंदीपुर इन की राजधानी थी । दद्द प्रथम के गुर्जर राज्य की उत्तरी सीमा माही नदी थी, तथा दक्षिणी सीमा ताप्ती नदी थी। अतः इस गुर्जर राज्य में माही कांटा ,अनूप प्रदेश,( नर्मदा घाटी )और लाट देश (नर्मदा ताप्ती का दोआबा क्षेत्र) सम्मिलित थे ।
कलचुरी 595 ईसवी का दान पत्र महाराज दद्द प्रथम के समय का है। सनखेड़ा दान पत्रों में दद्द प्रथम को नागकुल नाशक तथा सूर्य उपासक तथा गुर्जर नृप लिखा है।
वीतराग जय भट्ट प्रथम।
महाराजा दद्द प्रथम का पुत्र जय भट्ट प्रथम था जो अपने पिता के बाद राजा बना। जिसको वितराग भी कहते थे ।यह हर्षवर्धन के समकालीन था ।सनखेड़ा दान पत्रों में उसके द्वारा सभी शत्रुओं पर पूर्ण विजय प्राप्त करना लिखा है। उमेता, ललुआ और बेगुमरा
शिलालेखों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि जय भट्ट प्रथम ने वल्मी की सेना को गुजरात के काठियावाड़ प्रांत में हराया था ,और उसने माही नदी तक गुर्जर राज्य की सीमा बढ़ाई ।कलचुरी नरेश बुधराज तथा वल्मी नरेश उसकी अधीनता मानते थे। जय भट्ट प्रथम के राज्य की पूर्वी सीमा में विंध्याचल की पश्चिमी श्रेणी थी।

महाराजाधिराज प्रशांतराग दद्द द्वितीय

महाराजा जय भट्ट प्रथम के 2 पुत्र थे। एक दद्द द्वितीय दूसरा रणग्रह।
जय भट्ट प्रथम के बाद उसके पुत्र द द्वितीय का राज्याभिषेक हुआ। महाराजा प्रशांतराव दद्द द्वितीय की उपाधि थी।।
इसके राज में चीनी यात्री ह्वेनसांग आया था उसने भरूच (भडोच ) बंदरगाह को गुर्जर राज्य की आमदनी का स्रोत बताया था। दद्द द्वितीय के बड़ौदा के सनखेड़ा नामक स्थान से सनखेड़ा दान पत्र अभिलेख मिले हैं ।इनकी भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है ।यह अभिलेख दो ताम्र पत्रों पर लिखा गया है। तथा नंदोद से जारी किया गया था ।यह अभिलेख संधि विग्रहक विदेश मंत्री रेव ने सन 641 ईसवी में लिखा था ।महाराज दद्द द्वितीय ने अपने कैरादान पत्रों में अपने दादा दद्द प्रथम को गुर्जर राज वंश में उत्पन्न होना उत्कीर्ण करवाया है। इसके अनुसार दद्द द्वितीय सूर्य देव का उपासक था। महाराज दद्द द्वितीय के समय की प्रमुख घटना उत्तरा पथ सम्राट हर्षवर्धन तथा दक्षिणा पथ सम्राट पुलकेशिन द्वितीय के मध्य नर्मदा घाटी का युद्ध है। इस युद्ध के समय वल्लभी नरेश ध्रुवसेन द्वितीय ने पश्चिमी मालवा को छोड़कर दद्द द्वितीय के यहां आश्रय लिया था। धुर्वसेन द्वितीय को सम्राट हर्ष के विरुद्ध शरण देने के कारण ही दद्द द्वितीय की गणना महान शासकों में होने लगी।

जय भट्ट द्वितीय।

महाराज दद्द द्वितीय का पुत्र जय भट्ट द्वितीय राजा बना। जय भट्ट द्वितीय चालुक्य विक्रमादित्य प्रथम के समय चालूक्यों का सामंत् रहा।

दद्दा तृतीय।
राजा जय भक्त द्वितीय का पुत्र तृतीय था। इसने अपने पराक्रम से पंचमहाशब्द तथा बहूसहाय नामक उपाधि धारण की। दद्द तृतीय शिव उपासक था। उसने वल्वी नरेश शिलादित्य द्वितीय पर विजय प्राप्त की थी।

जय भट्ट तृतीय दद्द तृतीय का पुत्र था। उसकी उपाधि महा सामंतधीपति थी। वह चालूक्यों का सामंत था। राजा जय भट्ट तृतीय के बाद उसका पुत्र अहीरोल दद्द चतुर्थ राजा बना।

जय भट्ट चतुर्थ।

राजा अहिरोल के बाद उसका पुत्र जय भट्ट चतुर्थ राजा बना ।उसने अरब आक्रमणकारियों को पराजित किया। जय भट्ट चतुर्थ इस वंश का अंतिम शासक था ।इस शाखा के गुर्जर प्रतिहारो के लिए सामंत या महासामंत शब्दों का प्रयोग मिलता है। जिससे यह प्रमाणित होता है कि इस शाखा के गुर्जर प्रतिहार कभी सार्वभौमिक सत्ता के रूप में नहीं रहे।

भीनमाल गुर्जर चावड़ा वंश।

गुर्जरों की चावड़ा शाखा का भीनमाल में राज्य चावड़ों का प्राचीनतम राज्य कब स्थापित हुआ, इसके ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। यह गुर्जर राज्य दक्षिण के चालूक्यों तथा उत्तरी भारत के हर्षवर्धन के समकालीन था ।इस गुर्जर राज्य का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग, संस्कृत के विद्वान कवि माघ ,ज्योतिष के विद्वान ब्राह्मण गुप्त ,हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट, आदि ने किया है। वी एन पुरी, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, कनिंघम, मुंहनोत नैंसी आदि ने भी भीनमाल के चावड़ा गुर्जर राज्य का वर्णन किया है।
भीनमाल गुर्जर राज्य के उत्तर में मंडोर का गुर्जर प्रतिहार राज्य, दक्षिण में वल्लभी का मैत्रक राज्य तथा नंदीपुर भड़ौच का गुर्जर प्रतिहार राज्य ,पूर्व में मंदसौर तथा उज्जैन के गुर्जर प्रतिहार राज्य तथा पश्चिम में बंदरदीव का चावड़ा गुर्जर राज्य थे। भीनमाल चावड़ा गुर्जर राज्य की सीमा इन राज्यों की सीमाओं से घिरी थी।

इस चावड़ा गुर्जर राज्य की राजधानी भीनमाल वर्तमान जालौर जिले में थी ।प्राचीन काल में यहां गौतम ऋषि का आश्रम था ।इसके प्राचीन नाम रतनमाल, पुष्यमाल, भीलमाल व श्रीमाल थे ।यह नगर लूनी नदी के पूर्व में आबू पर्वत के उत्तर में है। अरबों द्वारा नष्ट किए जाने के बाद चावड़ो के शेष राज्य को गुर्जर प्रतिहारो ने अपने अधीन कर लिया।

चीनी यात्री ह्वेनसांग सन 641 ईसवी में भीनमाल आया था। उसने राज्य का नाम कू ची लो( गुर्जर या गुजरत्रा) लिखा है। तथा गुजरात की राजधानी का नाम पी लो मा लू (भीनमाल) लिखा है। इसके अनुसार चावड़ा गुर्जर क्षत्रिय थे ।वह बौद्ध धर्म को मानते थे।

अंग्रेज व्यापारी निकोलस डपलेट ने 1611 ईस्वी में भीनमाल की यात्रा की थी।
जैक्सन ने छठी सदी में गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल को बताया था कवि माघ भीनमाल के निवासी संस्कृत के विद्वान कभी मांगने भीनमाल में शिशुपाल वध नामक काव्य लिखा था माघ ने किस काल में भीनमाल में बसंतगढ़ का भी वर्णन किया है एवं सुप्रभात देव को यहां का शासक बताया ब्रह्मगुप्त भीनमाल के चाप वंशी महाराज व्याघ्र मुख के समय में ब्रह्मगुप्त नामक जोशी ने 628 ईसवी में ब्रह्म सपोर्ट सिद्धांत नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की ब्रह्मगुप्त ने गणित पर खंड खाद्य ग्रंथ भी भीनमाल में ही लिखा था इस वंश के विनाश का उल्लेख 739 ईसवी के कल्चर ओं के दान पत्र में हैं कलचुरी के दान पत्र में हैं ।
चालुक्य पुलकेशिन द्वितीय का 634 ईसवी के ऐहोल अभिलेख से स्पष्ट है कि लाट गुर्जर राज्य के अलावा भीनमाल का गुर्जर चावड़ा राज्य गुजरत्रा कहलाता था। पुलकेशी अवनीजलाश्रय का 739 ईसवी का नौसेरी दान पत्र।

इस दान पत्र में पुलकेशी अवनीजनाश्र्य ने गुर्जरों वा चावडो को अरबों द्वारा जीतने में लूटने का उल्लेख है ।स्पष्ट है कि भीनमाल का चावड़ा गुर्जर राज्य में नियुक्त प्रांतीय शासक जुनैद खान द्वारा गुजरात राज्य पर आक्रमण करने के समय 725 ईसवी तक कायम था।
भीनमाल गुर्जर राज्य में भीनमाल (गौतम ऋषि का आश्रम )जालौर (जाबालि आश्रम) बसंतगढ़ (वशिष्ठ आश्रम) चंद्रावती ,बगड़ी नगर , खेराड़ी, पाली ,बघेरा, सरना, दांता ,व नेटोरा , माहोल (मालव) नगर, मूंगथल, आदि शामिल थे।

चावड़ा राजपूतों के अन्य राज्य काठियावाड़ में वधवान तथा पाटन में अनहिलवाडा थे।

गुर्जर राजा सत्ताश्रय के पुत्र रज्जिल के राज्य की राजधानी बसंतगढ़ भीनमाल गुर्जर राज्य के अधीन थी ।बसंतगढ़ नगर धातु प्रतिभाओं की ढलाई के लिए प्रसिद्ध था। भीनमाल गुर्जर राज्य में अनेक सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ। जिसमें अनादरा, बसंतगढ़, बर्मन, वासा, मूंगथल और पिंजवाड़ा के सूर्य मंदिर प्रसिद्ध है ।
साहित्य।
भीनमाल गुर्जर राज्य में साहित्य भी प्रचुर मात्रा में लिखा गया।
ब्रह्मगुप्त का ब्रह्मास्फूट सिद्धांत ,
माघ ने भीनमाल में शिशुपाल वध नामक महाकाव्य की रचना की।
सिद्धऋषि कीउपमिति भाव प्रपंच कथा ।
धनेश्वर का सुर सुंदरी कहा ग्रंथ ,।
धनपाल का भविष्य कहा ग्रंथ।

रघुवंशी प्रतिहार।
जालौर उज्जैन व कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार।
रघुवंशी प्रतिहारो ने चावडों से भीनमाल का राज्य छीना। तदअंतर आबू, जालौर आदि स्थानों पर उनका अधिकार रहा, और फिर उज्जैन उनकी राजधानी रही। इन्होंने आगे चलकर कन्नौज के महाराज को अपने अधिकार में ले लिया ,और वहां अपनी राजधानी स्थानांतरित की। इसलिए रघुवंशी प्रतिहारो को कन्नौज के प्रतिहार भी कहते हैं। इस शाखा के प्रति हारों का भी उद्भव स्थान मंडोर ही प्रतीत होता है। इनका राज आठवीं सदी में 730 ईसवी के लगभग से मुख्यतः प्रारंभ माना जाता है। नागभट्ट प्रथम नागाव्लोक, जालौर, अवंती, कन्नौजी प्रतिहारों की नामावली नागभट्ट प्रथम लगभग 730 ईसवी के आसपास से प्रारंभ होती है। इस वंश के प्रवर्तक नागभट्ट प्रथम को नागावलोक भी कहते हैं ।नागभट्ट प्रथम को राजा भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में नारायण की उपाधि दी गई है ।इसमें उल्लेख है कि प्रतिहार वंश में त्रैलोक्य अर्थात तीन लोग का रक्षक अद्भुत पुरातन मुनि नारायण का अवतार रूप राजा नागभट्ट उत्पन्न हुआ। उसने अरब सेना को सिंधु नदी के पश्चिम में खदेड़ने का काम किया। इस विजय के कारण ही उसे नारायण का अवतार रक्षक माना जाने लगा। नागभट्ट प्रथम ने ही वर्तमान गुजरात ,राजस्थान, मालवा, चंबल घाटी ,हरियाणा, सतलज के दक्षिण का मैदान आदि प्रदेशों पर गुर्जर साम्राज्य की स्थापना की ।अवंती के प्राचीन नगर उज्जैन को उसने अपनी राजधानी बनाया। दशरथ शर्मा नागभट्ट की राजधानी जालौर मानते हैं। जेसी घोष भी नागभट्ट प्रथम की राजधानी उज्जैन ही मानते हैं ।उस समय उज्जैन तथा जालौर गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के प्रमुख नगर थे। नागभट्ट ने समस्त छोटे-छोटे गुर्जर राज्यों पर अधिकार कर एकछत्र राज्य की स्थापना की। दक्षिण में लाट देश पर भी नागभट्ट ने अधिकार किया। इसका पता 756 ईसवी के हनसोट ताम्रपत्र अभिलेख से चलता है ।इस अभिलेख में गुर्जरों की चौहान गुर्जर शाखा के राजा भरतभट्ट दितीय ने अपने स्वामी महाराजा का नाम नागाव्लोक नागभट्ट लिखा है और स्वयं को महा सामंतअधिपति लिखा है। नागभट्ट प्रथम ने जुनैद खा के नेतृत्व में अरब आक्रमणकारियों पर भी विजय हासिल की ।राष्ट्रकूट राजा दंतीदुर्ग ने भी अरबों के विरुद्ध नागभट्ट प्रथम का साथ दिया ,तथा दोनों ने अपनी इस सफलता पर उज्जैन नगरी में हिरण्यगर्भ महादान समारोह आयोजित किया ।नागभट्ट के समकालीन पड़ोसी राजा दंतीदुर्ग, ललितादित्य और यशोवर्मन थे। इनसे गुर्जर राजा नागभट्ट के अच्छे संबंध थे। गुर्जर साम्राज्य के दक्षिण में दांतीदुर्ग ,उत्तर-पूर्व में यशोवर्मन कन्नौज का और उत्तर में ललितआदित्य का कश्मीर का राज्य था। गुर्जर राजा नागभट्ट ने अपने पड़ोसी राज्यों से युद्ध नहीं किया तथा अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखा।

महाराज ककुस्थ ( कक्कुक) ।
महाराजा नागभट्ट प्रथम के भ्राता के पुत्र कक्कुक नागभट्ट के उत्तराधिकारी के रूप में राज्य सिंहासन पर अभिषेक हुआ । जिसके समय गुर्जर राज्य की सीमा यथा स्थान बनी रही। इनके बाद उनके लघु भ्राता देव शक्ति का राज्याभिषेक हुआ।

महाराज देव शक्ति (देवराज)

गुर्जर प्रतिहार महाराज देव शक्ति के समय गुर्जर साम्राज्य पर किसी पड़ोसी राज्य के द्वारा आक्रमण नहीं किया गया अर्थात गुर्जर साम्राज्य की सीमाएं बराबर बनी रहे।
महाराज वत्सराज महाराज देव शक्ति की रानी भूयिका देवी से वत्सराज नामक पुत्र हुआ ।मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में महाराज वत्सराज को बहू संख्य के भू_भूतों तथा “उनके शक्तिशाली सलाहकारों की गति को समाप्त करने वाला” कहा है महुव शिलालेख महाराज की प्रशस्ति है ।महाराज वत्सराज के शासनकाल में उनकी राजधानी जालौर में उनके दरबारी जैन मुनि उद्योतन सूरी ने 778 ईसवी में कुवलयमाला ग्रंथ की रचना की ,जिसमें महाराज वत्सराज को रनहस्तीन कहा गया है। 783 ईसवी में वर्द्धमान पुर में जैन मुनि जिनसे हरिवंश पुराण की रचना की इसके अनुसार 778 ईसवी में महाराज वत्सराज की राजधानी जालौर थी ,तथा अवंती भी उसके अधीन थी ।गुर्जर नरेश ने कन्नौज नरेश इंद्र युद्ध को युद्ध में पराजित किया और अपना सामंत बनाया ।वत्सराज ने गौड़ों की प्रभुसत्ता को भी हर लिया था ।वत्सराज ने बंगाल के राजा धर्मपाल को भी पराजित किया ,तथा मगध ,बिहार और पश्चिम बंगाल पर अधिकार किया और अपने पैतृक राज्य की सीमाएं उत्तर में हिमालय तक तथा पूर्व में मगध बिहार और पश्चिम बंगाल तक विस्तृत की।

नागभट्ट द्वितीय।

महाराज वत्सराज की रानी सुंदर देवी से उत्पन्न नागभट्ट नामक पुत्र वत्सराज के बाद राजा बना ।इसकी उपाधि परम भट्ठारक महाराजाधिराज परमेश्वर थी इसका उल्लेख 815 ईसवी के बुचकला अभिलेख में हुआ है। ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार नागभट्ट द्वितीय ने बंगाल के राजा धर्मपाल के सामंत राजा चकरायुद्ध को युद्ध में मारा तथा कन्नौज पर अधिकार कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। उसने मुंगेर युद्ध में बंगाल के पाल शासक धर्मपाल को हराया ।इस विजय के बाद उसने परम भट्ठारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की ।नागभट्ट द्वितीय की बंगाल विजय का कर्कराज के बड़ौदा ताम्रपत्र में उल्लेख है ।
नागभट्ट द्वितीय की कन्नौज विजय तथा धर्मपाल पर मुंगेर युद्ध में विजय के उपरांत आंध्र, कलिंग ,विदर्भ तथा सेंधव के राजाओं ने बगैर युद्ध किए ही नागभट्ट द्वितीय की अधीनता स्वीकार की। नागभट्ट द्वितीय ने किरात, तुरुष्क (अरबों) पर विजय प्राप्त की तथा वत्स देश (कन्नौज तथा मत्स्य के बीच का प्रदेश )भी जीता ।
चंद्रप्रभु सूरी के प्रभावक चरित्र के अनुसार नागभट्ट द्वितीय का स्वर्गवास 833 ईसवी में हुआ, लेकिन कुछ विद्वान मानते हैं कि उन्होंने गंगा में जल समाधि ली। नागभट्ट भगवती देवी का परम भक्त था नागभट्ट द्वितीय के समय गुर्जर साम्राज्य की सीमाएं उत्तर में हिमालय दक्षिण में नर्मदा नदी तक थी और पश्चिम में सिंध के पूर्वी बंगाल तथा संपूर्ण आर्यावर्त में गुर्जर साम्राज्य था ।नर्मदा के दक्षिण में लाट देश गुर्जर समाज का अंग था जो राष्ट्रकूट गोविंद तृतीय के समय उनके अधीन हो गया था ।इसे नागभट्ट द्वितीय ने जीता तथा पुनः गुर्जर साम्राज्य का अंग बनाया। नागभट्ट द्वितीय एक वीर साहसी ,कूटनीतिक, साहित्य प्रेमी और धार्मिक प्रवृत्ति वाला शासक था। उसने बली प्रबंध नामक ग्रंथ की रचना की। गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी जालौर, अवंती को छोड़कर कन्नौज को राजधानी बनाने का श्रेय गुर्जर नरेश नागभट्ट द्वितीय को ही है। कन्नौज गुर्जर साम्राज्य के पतन तक गुर्जर प्रतिहारो की राजधानी रही।

रामभद्र (रामदेव)

सम्राट नागभट्ट द्वितीय की रानी श्रीमती इष्टा देवी से रामभद्र का जन्म हुआ।अपने पिता की मृत्यु के उपरांत रामभद्र देव का राज्याभिषेक हुआ। रामभद्र ने 3 वर्ष तक राज्य किया उसके अल्प शासनकाल में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ बल्कि प्रतिहारो की शक्तिक्षीण हुई। रामभद्र के समय बंगाल नरेश देव पाल ने गुर्जर साम्राज्य की कुछ प्रदेशों पूर्वी बिहार और उड़ीसा पर अधिकार कर लिया था। महाराजा श्री रामभद्र देव की रानी अप्पी देवी से मिहिर भोज देव नामक पुत्र हुआ। ग्वालियर शिलालेख के अनुसार रामभद्र सूर्य का उपासक था। उसने अपने पुत्र का नाम मिहिर (सूर्य) भोज देव रखा था।

मिहिर भोज देव प्रथम।

अपने पिता श्री रामभद्र देव की साम्राज्य की सीमाएं रक्षण में लापरवाही देखकर उसने अपने पिता को राज सिंहासन से अपदस्थ किया तथा स्वयं राजा बन गया। मिहिर भोज के शासनकाल में प्रतिहारों की शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची ।उसके शासन की सीमाएं पश्चिम में सिंधु के पूर्वी तट तक ,पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय व सतलाज तथा दक्षिण में नर्मदा नदी तक थी, अर्थात संपूर्ण आर्यवर्त में गुर्जर साम्राज्य स्थापित था ।उसका शासन पूर्वी पंजाब अधिकांश राजपूताना उत्तर प्रदेश का अधिकांश भाग, मालवा, सौराष्ट्र एवं ग्वालियर तक विस्तृत हो गया था। अरब यात्री सुलेमान ने मिहिर भोज के कुशल प्रशासन एवं शक्तिशाली सेना की प्रशंसा की है ।
दौलतपुरा ताम्रपत्र में महाराज श्री भोज देव की उपाधि प्रभाससूर्य दी गई है। देवगढ़ आहार तथा ऊना नामक अभिलेखों में मिहिर भोज की उपाधि परम भट्ठारक महाराजाधिराज परमेश्वर उत्कीर्ण है। यह उपाधि सभी उपाधियों को स्वयं समाहित कर लेती है। महाराज श्री भोज देव के सिक्कों पर श्रीमद् आदीवाराहा उपाधि और मिहिर भोज का नाम उत्कीर्ण है। सम्राट मिहिर भोज के सिक्के हरियाणा में रोहतक , हांसी , हिसार भिवानी व चरखी दादरी आदि स्थानों से बड़ी मात्रा में मिले हैं।
दशरथ शर्मा के अनुसार नवी सदी में मिहिर भोज भारत का सबसे महान शासक था ।
कवि राजशेखर इसके समय में ही था। अरबों द्वारा मुस्लिम बनाए गए भारतीय नागरिकों को महाराज भोज के समय पुन: हिंदू धर्मी बनाया गया था ।यह कार्य ऋषि देव तथा मेगातिथि नामक विद्वानों के परामर्श पर किया गया।
(इन्हीं मिहिर भोज देव को विद्वानों ने गुर्जर सम्राट मिहिर भोज लिखा है तथा लिखा है कि इनके समय में संपूर्ण आर्यवर्त में गुर्जर साम्राज्य स्थापित था । यह बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है। यह वही तथ्य है , सत्य है जिस पर आज गुर्जर और राजपूत आपस में विवाद करके आगामी दिनांक 22 सितंबर 2021 को गुर्जरों की राजधानी कहे जाने वाली दादरी कस्बे में स्थित गुर्जर सम्राट मिहिर भोज महाविद्यालय में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ करेंगे।
कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि दोनों जातियां आज एक दूसरे के विरुद्ध विष वमन कर रही हैं ,और बिना इतिहास को जाने, बिना इतिहास के तथ्यों को पढ़ें एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए प्रयास कर रही हैं। यह प्रदेश और देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। इसमें मैं अधिकतर राजपूतों को दोषी मानता हूं क्योंकि वे अपने पिता को पिता न कहकर ,अपने पूर्वजों को पूर्वज ने मानकर दूसरों के पूर्वजों को अपना कह रहे हैं।)

इसी शाखा में सम्राट मिहिर भोज के पश्चात उनका पुत्र महेंद्र पाल प्रथम राजा बना।
महेंद्र पाल ने गुर्जर साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखा क्योंकि उनके समय अरबों का कोई आक्रमण नहीं हुआ ।वर्तमान मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान ,पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तरी बंगाल, उड़ीसा आदि प्रदेश गुर्जर साम्राज्य के अधीन थे।

महाराज भोज देव द्वितीय।

सम्राट महेंद्र पाल के 3 पुत्र थे उन्होंने अपने जीवन काल में किसी को भी राजगद्दी का अधिकारी नियुक्त नहीं किया ।तीनों में संघर्ष हुआ। तीनों पुत्रों में से भोज देव द्वितीय ने अपने ससुर कोकल देव प्रथम कलचुरी के पुत्र साकिल से मदद लेकर महिपाल को गद्दी से अपदस्थ किया और स्वयं राजा बना।

महाराज महिपाल।

महाराज महिपाल को विरासत में मिला गुर्जर साम्राज्य सुन रहा तथा उत्तर व दक्षिण में साम्राज्य का विस्तार हुआ महाराज महिपाल एक विद्वान शासक थे अपने शासन के आरंभ में राष्ट्रकूट इंद्र तृतीय के आक्रमण से हताश नहीं होकर उन्होंने तुरंत ही अपनी सेना मजबूत की। उन्होंने सैनिकों को नगद वेतन भुगतान की परंपरा डाली। उनकी सेना सुव्यवस्थित सुसंगठित एवं अनुशासित थी। महाराज महिपाल के समय में सभी सामंत गुर्जर समाज के प्रति स्वामी भक्त बने रहे।

विनायक पाल देव प्रथम।

हरीश सेन ने इनके समय में व्रत कथा को की रचना की विनायक पाल देव एक विद्वान कुशल एवं जनप्रिय और प्रजा हितकारी शासक था विनायक पाल की उदार नीतियों के कारण सभी सामंत गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के प्रति स्वामी भक्त बने रहे।

महेंद्र पाल देव द्वितीय।

विनायक पाल देव के बाद महेंद्र पाल देव द्वितीय तथा महेंद्र पाल के बाद देव पाल देव कन्नौज का शासक बना। जिस को सत्ता से अलग कर विजयपाल देव राजा बना ।विनायक देव द्वितीय, महिपाल देव द्वितीय, विजयपाल देव के समय में लगभग आधा आर्यवर्त गुर्जर प्रतिहारो के साम्राज्य से निकल गया था।
राज्यपाल देव।
लगभग 990 ईसवी में राज्यपाल देव राजा बना आर्यावर्त के दक्षिण भाग श्री विजय पाल देव के समय ही गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य से निकल चुके थे श्री राज्यपाल देव के समय में राजौर गढ़ के गुर्जर तथा शाकंभरी के चौहान भी स्वतंत्र हो गए।
उसी समय महमूद गजनवी ने कन्नौज पर चढ़ाई कर दी पर विजय प्राप्त की। राज्यपाल ने सुल्तान की अधीनता स्वीकार की ।बाद में कालिंजर के राजा नंदराय (गंड, चंदेल) ने कन्नौज को घेर कर राज्यपाल को मार डाला ।राज्यपाल के वंशज यशपाल के समय गाहरवाल माहिचंद्र का पुत्र चंद्र देव सन 1093 के आसपास कन्नौज का राज्य प्रतिहारो से छीनकर वहां का स्वामी बन गया। विक्रमी संवत 1200 सौ के आसपास नाडोल के चौहान रायपाल ने जिस का शिलालेख विक्रम संवत 1189 से 1200 से1202 तक के मिले हैं मंडोर प्रतिहारो (पड़िहार ) से छीन लिया तब सहजपाल वहां का राजा था।

राजगढ़ के गुर्जर प्रतिहार।
अलवर राज्य के राजगढ़ से 960 ईसवी के शिलालेख से पाया जाता है कि उस समय रायपुर राजू गढ़ पर प्रतिहार गोत्र का गुर्जर महाराजाधिराज सावट का पुत्र मदन देव राज्य करता था और कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहार का सामंत था।

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के पतन का कारण।
1 गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण गुर्जर प्रतिहार शासकों द्वारा सामंत राजाओं को अपनी स्वयं की सेना रखने का अधिकार देना था। इससे सामंत अधिक शक्तिशाली हो गए थे।
2 विदेशी आक्रमण के समय छोटे-छोटे प्रांतों के स्वतंत्र शासक एक नहीं हो सके तथा एक-एक कर हारते गए ।”

उपरोक्त विवरण हमने डॉ महावीर जैन की पुस्तक से लिया। उसको यथावत प्रस्तुत किया है। हमने एक भी शब्द न तो कम किया है और न अधिक की। तथा न हीं शब्दों में परिवर्तन करने का प्रयास किया है।लेकिन कोष्टक में जहां-जहां भी लिखा गया है वह मेरे निजी विचार हैं।
इसके अध्ययन करने के उपरांत यह बात स्पष्ट एवं सिद्ध हो गई है की गुर्जर प्रतिहार वंश पूरे भारतवर्ष में अपना शासन स्थापित करने में सफल रहा था। तथा गुर्जर प्रतिहार वंश ही बार-बार विद्वानों के द्वारा लिखा गया है। इसलिए आज राजपूतों के द्वारा सम्राट मिहिर भोज के नाम के पहले गुर्जर शब्द लिखने पर जो आपत्ति हो रही है उनको पहले इतिहास में संशोधन कराना पड़ेगा। अन्यथा उनकी की जा रही मेहनत सफल नहीं हो सकती।
अब हम कुछ अन्य विद्वानों की इतिहास के बारे में दी गई जानकारी पर विचार करते हैं जो निम्न प्रकार हैं।
सर्वप्रथम हम इस पर विचार करते हैं की राजपूत शब्द प्रचलन में कब से आया?
इस राजपूत शब्द में कौन-कौन सी जाति, कुल और गोत्र शामिल हैं?
भारतीय इतिहास में राजपूत शब्द 12 वीं शताब्दी के दौरान सुना जाना प्रारंभ हुआ ।यह राजपूत शब्द किसी एक जाति विशेष के लिए न होकर संपूर्ण क्षत्रिय जातियों ने अपने एक संघ के रूप में अपने लिए स्वीकृत किया था। इस संबंध में “भारतीय संस्कृति के रक्षक” नामक अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 33 पर प्रसिद्ध इतिहासकार श्री रतन लाल वर्मा जी लिखते हैं कि “तुर्कों के साथ भविष्य में होने वाले आक्रमणों का मुकाबला करने के लिए विभिन्न जातियों के लोगों ने राजपूत नामक जातीय संगठन बनाया था क्योंकि राजपूत शब्द से उनके राजवंशी होने का बोध होता था ।मेरी पहली पुस्तक “गुर्जर वीरगाथा” की भूमिका में प्रसिद्ध राजपूत विद्वान ठाकुर पी एन सिंह ने राजपूत जाति का बनना केवल गुर्जरों से ही इस प्रकार लिखा है। इस शासक वर्ग अर्थात गुर्जर जाति के सैनिकों व अन्य लोगों को अन्य जातियों के लोगों द्वारा आदर के लिए राजपूत्र नाम से पुकारा जाता था। बाद में यह आदर सूचक शब्द जातिवाचक बन गया। जो कुछ भी हो परंतु यह सत्य है कि गुर्जरों तथा अन्य अनेक आर्य, अनार्य, दासी पुत्र आदि से मिश्रित राजपूत जाति 12 वीं शताब्दी के अंत में मुसलमानों द्वारा भारत विजय के बाद बनी थी। जिसमें गुर्जर जाति के अधिकांश कुल गोत्रों के अनेक जत्थे मालवा के परमारो की भांति विद्रोही होकर और अन्य कारणों से अपनी जाति छोड़ राजपूत जाति संघ में सम्मिलित हुए थे। वर्तमान राजपूत जाति में करीब 70% लोग गुर्जर जाति के हैं। परंतु सभी कुल गोत्रों के कुछ लोगों ने विभिन्न जातियों की मिश्रित जाति राजपूत में सम्मिलित होना पसंद नहीं किया। वह अपने गौरवशाली नाम गुर्जर से ही चिपके रहे। विशेषकर विघटित गुर्जर सोलंकी साम्राज्य के अंतर्गत गुर्जरों के सभी गोत्रों के जनसाधारण, सैनिक ,सामंत सोलंकी सम्राट गुर्जर ही रहे, और उनका प्रदेश में गुजरात तत्काल “गुर्जर भूमि” रह गया ।जबकि पुराने गुर्जर देश का उत्तर पूर्व विभाग जयपुर, जोधपुर, बीकानेर आदि राजपूत रियासतों के कारण तभी से राजस्थान कहलाया ।
श्री वर्मा जी द्वारा लिखी गई यह पुस्तक बहुत पते की है इसमें भारतीय इतिहास की सही परंपराओं का तो हमें बोध होता ही है साथ ही यह भी पता पड़ता है कि हमारे छत्रिय वंशी शासकों में देश धर्म के लिए एक साथ आने की उस समय कितनी ललक थी ।श्री वर्मा जी द्वारा राजपूत विद्वान लेखक के द्वारा कही गई बात से हम इसलिए सहमत हैं कि भारत में विदेशी आक्रमणकारियों का सामना करने के लिए एक बार नहीं कई बार हमारे वीर हिंदू युवाओं ने राष्ट्रीय सेना और गठबंधन का गठन किया था ।
इसके बाद दूसरे युवा एवं प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ राकेश आर्य का क्या कहना है ,इसको भी देखते हैं।
डॉ राकेश आर्य द्वारा एक पुस्तक” भारत के 1235 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास “लिखी गई है।
जिसमें उन्होंने लिखा है कि भारतवर्ष के छत्रिय योद्धाओं ने अपने देश धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ कई बार सैनिक मोर्चा या राष्ट्रीय सेना बनाई ऐसे में यदि सभी क्षत्रिय जातियों ने मिलकर राजपूत नाम से अपने आप को संबोधित करते हुए एक राष्ट्रीय मोर्चा विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध उस समय खोल लिया हो तो इसमें किसी भी प्रकार की संभावना का प्रश्न नहीं उठता वैसे भी आबू पर्वत पर जब वशिष्ठ मुनि ने छत्रिय शासकों को या कुलों को अपने साथ लिया था तो उसकी अनिवार्य शर्त भी यही थी कि आप सभी मेरे साथ आकर मुझे इस बात के प्रति आश्वस्त करें कि हम देश को विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षित करेंगे और गुलाम नहीं होने देंगे। अब जबकि 12 वीं शताब्दी के आते-आते विदेशी आक्रमणकारी भारत के कुछ क्षेत्रों पर अपने पैर जमाने में सफल हो गए थे तो स्वाभाविक था कि वशिष्ठ मुनि के समय लिए गए संकल्प में आ रही गिरावट को दृष्टिगत रखते हुए हमारे शासकों में भीतर ही भीतर इस बात का चिंतन चल रहा हो कि एक साथ बैठा जाए ।सभी जाति, कुल और गोत्र के लोग एक साथ बैठकर इस बात पर विचार विमर्श करें कि ऐसा क्या किया जा सकता है जिससे विदेशी आक्रमणकारियों को भारत में पैर जमाने से रोका जाए? सब भारतीय क्षत्रियों के चरित्र के अनुकूल यह बहुत संभव है कि उन्होंने “राजपूत “शब्द के नीचे सभी को एकजुट करना स्वीकार कर लिया हो। इतिहास की इस उपलब्धि को मिले उचित स्थान।
डॉ राकेश आर्य का अपनी उपरोक्त पुस्तक में कहना है कि इस पर और अधिक शोध की आवश्यकता है। यदि यह सत्य है तो इसे अपने राष्ट्रीय इतिहास में हमारे इतिहास नायकों का महान चरित्र स्वीकार करते हुए उचित स्थान मिलना चाहिए ।जिससे यह बात पुष्ट होगी कि हमारे महान पूर्वजों ने 12वीं शताब्दी के आरंभ में विदेशियों के द्वारा जब मां भारती को पद दलित करने का कार्य किया जा रहा था तो उसका उन्होंने एकजुटता से सामना किया था। उसके विरुद्ध के लोग हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे थे बल्कि उसका सामना करने के लिए संयुक्त मोर्चा बना रहे थे, और अपने आप को जातीय भेदभाव से ऊपर उठकर राजपूत नाम से संबोधित कराने में गर्व और गौरव की अनुभूति कर रहे थे।
इस प्रकार उस समय हमारे महान पूर्वज अपनी राष्ट्रीय एकता का परिचय दे रहे थे। उन्होंने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए अपने जातीय भेदभाव को मिटाने का सद संकल्प लिया और उसके लिए एक पहचान, एक सोच ,एक चाल और एक दिशा” राजपूत” शब्द देकर निर्धारित की। सचमुच देश हित में ऐसा महान कार्य कोई महान जाति ही कर सकती है। जिसे निश्चित रूप से उन्होंने हिंदुत्व के ध्वज के नीचे रहकर करना उचित समझा। अपने आप को राजपूत कहना उनके इस चिंतन को प्रकट करता है कि वह क्षत्रिय परंपरा के प्रतिनिधि बनकर हिंदुत्व के लिए प्राण पण से कार्य करेंगे और किसी भी विदेशी आक्रमणकारी को भारत में पैर नहीं जमाने देंगे। एक प्रकार से सभी शासक लोगों ने “राजपूत “शब्द अपने लिए पंथनिरपेक्षता एवम जाति से ऊपर उठकर के एक मार्ग चुना था ।जिसे उस समय का क्रांतिकारी निर्णय कहा जाना चाहिए। याद रहे कि कोई विदेशी इतिहासकार हमारे इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना को कभी नहीं लिखेगा क्योंकि उसे तो हम लोगों को यही बताना है कि हम तो सदा लड़ते रहे और परस्पर फूट के कारण विदेशियों के सामने आते रहे। इस घटना को तो हमको स्वयं ही समझना और महिमामंडित करना होगा कि हमने विदेशियों के विरुद्ध उस समय अपना राष्ट्रीय चरित्र प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय एकता का प्रमाण दिया था। जब स्वयं को सबने क्षत्रिय का समानार्थक राजपूत कलवाना आरंभ किया था। इस प्रकार की मान्यता से हमारे जातीय विद्वेष के भाव समाप्त होंगे और हम अपने आप को यह अनुभव करेंगे कि हम सब एक ही मूल की शाखाएं हैं और उसी के लिए समर्पित रहकर काम करते रहने के अभ्यासी रहे हैं। इस प्रकार की मान्यता को पुष्ट करने से यह भी लाभ होगा कि जो गुर्जर शासक होकर भी अपने आप को राजपूत कहलाने लगे थे और भारतीय राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर ऐसा लिखने लगे थे यद्यपि यह मूल रूप में गुर्जर ही थे”
वास्तव में गुर्जर जाति एक महान जाति है।
अगर हम बहुत दूर न जाएं केवल डेढ़ सौ वर्ष पहले की बात करें सन 18 57 में मेरठ से कोतवाल धन सिंह चपराना ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजाया था ,जो गुर्जर जाति से थे।
उस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में धन सिंह कोतवाल का साथ देने के लिए दादरी के राव उमराव सिंह भाटी गुर्जर ,नवाब माला गढ़ के प्रधानमंत्री श्री इंदर सिंह राठी गुर्जर जिनका गांव गुठावलीजनपद बुलंदशहर में है,तथा बहसूमा हस्तिनापुर के राजा राव कदम सिंह नागर गुर्जर ने मिलकर भारत को आजाद करने का बीड़ा उठाया था।
तैमूर लंग को लंगड़ा करने वाली रामप्यारी गुजरी थी। सन 10 36 तक कन्नौज पर गुर्जर प्रतिहार वंश का राज्य रहा।
सन 1192 ईस्वी तक दिल्ली पर पृथ्वीराज चौहान का राज्य रहा।
इस प्रकार विदेशी आक्रांता मुसलमानों ने सत्ता हमारे हाथों से छीनी थी।
हमारे पूर्वज उसको भूले नहीं थे जैसे किसी के खेत की मेड काट ली जाए और उस पर झगड़े और मारकाट होती है हमारे तो राज्य छीने गए थे तो गुर्जरों के वंशज भूले नहीं थे और वह निरंतर स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रयास करते रहे थे और सत्ता से टकराते रहे थे।
निश्चित रूप से गुर्जरों ने किसी भी विदेशी आक्रांता को अपना फूफा या जीजा नहीं बनाया।
गुर्जरों के लिए यह कितने गर्व की बात है?
किसी भी गुर्जर ने किसी भी अंग्रेज को अपने घर में अपने बीवी बच्चों के साथ नहीं सुलाया।
किसी भी गुर्जर की राष्ट्रभक्ति पर आज तक प्रश्नचिन्ह नहीं लगा।
जिन्होंने सत्ता के साथ संघर्ष नहीं किया, बल्कि सत्ता के साथ जो मिलकर के रहे ,सत्ता के समक्ष समर्पण किए ,अपनी बहन_ बेटी विदेशी आक्रांताओं को सौंपी जिन्होंने अपनी इज्जत खोई उन लोगों में गुर्जर नहीं है।
आज महारानी लक्ष्मी बाई के साथ गद्दारी करने वाले सत्ता प्राप्त करते हैं, सत्ता का आनंद लेते हैं।
अंग्रेजों के साथ ,विदेशी आक्रांताओं के साथ जिस तरह से गुर्जरों ने संघर्ष किया वह किसी अन्य जाति में मिलता नहीं ।इसीलिए अंग्रेजों ने गुर्जरों से नाराज होकर गुर्जरों को most irreconciliable enemies लिखा । अर्थात एक ऐसे शत्रु जिनसे कभी समझौता मत करना और उनका विश्वास मत करना। अर्थात यह बहुत ही गंदे लोग हैं।
अंग्रेजों ने ऐसा क्यों लिखा? ऐसा क्या कर दिया था गुर्जरों ने अंग्रेजों के साथ?
क्योंकि गुर्जरों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को नाकों चने चबा दिए थे। इसलिए गुर्जरों के लिए जो गंदे से गंदे शब्द अंग्रेज लिख सकते थे वह लिखें।
18 57 की क्रांति को दबाने के पश्चात भी
नवाब वाली दाद खान मालागढ़ जनपद बुलंदशहर के प्रधान मंत्री श्री इंदर सिंह राठी गुर्जर का पौत्र विजय सिंह पथिक गुर्जर आजीवन भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करता रहा जो राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र में आंदोलन करने के कारण पूरे भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विश्व में जाना पहचाना नाम है। जिसके विषय में कहा जाता है कि गांधी जी ने भी कहा था कि यदि आंदोलन करना किसी से सीखना है तो विजय सिंह पथिक से सीखो।
वर्तमान में जो काले अंग्रेज हैं वह भी उन्हीं अंग्रेजों के मानस पुत्र हैं जो गुर्जरों को आज भी उपेक्षित भाव से देखते हैं ।मुझे उनके ऊपर बड़ी दया आती है उनकी बुद्धि पर तरस आता है।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि जो लोग अंग्रेजों से मिलकर के रहे उनको “सर” के खिताब मिले उपाधियां मिली, जागीर ,जमीदारी ,रियासत मिली।
वास्तव में गुर्जर एक राष्ट्रवादी कौम है।
मैं इस कौम पर गर्व करता हूं।
देवेंद्र सिंह आर्य ,
चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र।

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