मातृभूमि_प्रेम_सर्वोपरि_जानिए_महाबलिदानी माता_पन्नाधाय_का_सम्पूर्ण_इतिहास

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महाबलिदानी माता पन्नाधाय का जन्म चित्तौड़गढ़ के निकट माताजी की पांडोली नामक गांव में हुआ.. इनके पिता का नाम हरचंद सांखला था.. पन्नाधाय का विवाह आमेट के निकट स्थित कमेरी गांव में रहने वाले सूरजमल चौहान से हुआ…||

1527 ई. में खानवा के युद्ध के बाद 1528 ई. में महाराणा सांगा का स्वर्गवास हो गया.. 1531 ई. तक महाराणा सांगा के पुत्र महाराणा रतनसिंह मेवाड़ के शासक रहे.. फिर महाराणा विक्रमादित्य मेवाड़ की गद्दी पर बैठे.. जो कि एक कमजोर शासक थे…||

1534 ई. में जब गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया.. तब राजमाता कर्णावती ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ली.. पन्नाधाय इन्हीं राजमाता कर्णावती की सेवा में नियुक्त थीं…||

राजमाता कर्णावती ने पन्नाधाय को बुलाया और कहा कि “मेरे दोनों पुत्र विक्रमादित्य और उदयसिंह को अब मैं तुम्हें सौंपती हूँ.. इनको इनके ननिहाल बूंदी लेकर जाना और जब चित्तौड़ से शत्रु खदेड़ दिए जाएं .. तभी इनको वापिस लाना”

राजमाता कर्णावती ने हज़ारों राजपूतानियों के साथ जौहर किया.. बहादुरशाह ने चित्तौड़गढ़ जीत लिया.. फिर मेवाड़ के सामन्तों के जोर-शोर से फिर से चित्तौड़गढ़ पर मेवाड़ का अधिकार हो गया…||

महाराणा सांगा के बड़े भाई उड़न पृथ्वीराज की दासी पूतलदे से उनका एक बेटा हुआ.. जिसका नाम बनवीर था.. महाराणा सांगा ने बनवीर को बदचलनी के सबब से मेवाड़ से निकाल दिया था.. मौका देखकर ये फिर मेवाड़ आया…||

1535 ई. में बनवीर ने चित्तौड़ के कई खास सरदारों को अपनी तरफ मिलाया और तलवार से महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी.. फिर बनवीर ने कुंवर उदयसिंह को मारने के लिए उनके कक्ष में प्रवेश किया…||

पन्नाधाय ने कुंवर उदयसिंह के वस्त्र अपने पुत्र चन्दन को पहनाकर उसको कुंवर उदयसिंह के स्थान पर लिटा दिया.. राजगद्दी के नशे में चूर बनवीर कुँवर उदयसिंह को ढूंढते हुए महलों में आया और पन्नाधाय से पूछा कि “उदयसिंह कहाँ है पन्ना.. आज मेवाड़ की राजगद्दी और मेरे बीच आने वाले उस आख़िरी कांटे को भी निकाल फेंकने आया हूँ”

पन्नाधाय ने जान बूझकर बनवीर को रोकने का प्रयास किया.. ताकि बनवीर को शक ना हो.. बनवीर ने पन्नाधाय को हटाया और चन्दन को ही कुंवर उदयसिंह समझकर पन्नाधाय की आँखों के सामने तलवार से चन्दन के दो टुकड़े कर दिये…||

अपने पुत्र के दो टुकड़े होते देख भी पन्नाधाय उफ़ तक न कर सकीं.. उनका हृदय जैसे थम सा गया..बनवीर खुशी के मारे राजगद्दी की तरफ गया.. पन्नाधाय कीरत बारी (वाल्मीकि) के सेवक के ज़रिए बड़े टोकरे में पत्तलों से ढंककर कुंवर उदयसिंह को छुपाकर निकलीं…||

बहुत से लोग अज्ञानवश इस समय कुँवर उदयसिंह को एक दुधमुंहा बालक बताते हैं.. जबकि वास्तविकता में कुँवर की आयु इस समय 13-14 वर्ष थी…||

पन्नाधाय नदी किनारे पहुंची और यहीं अपने पुत्र चंदन का अंतिम संस्कार किया.. एक माँ को इस समय आत्मग्लानि में डूबकर पश्चाताप करना चाहिए था.. परन्तु प्रश्न मातृभूमि का था.. पन्नाधाय यहां नहीं रुकीं.. क्योंकि अभी कुँवर उदयसिंह के प्राणों का संकट टला नहीं था…||

पुत्र की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी.. कि पन्नाधाय अपने पति सूरजमल के साथ कुंवर उदयसिंह को लेकर देवलिया पहुंची.. देवलिया के रावत रायसिंह सिसोदिया ने इनकी बड़ी खातिरदारी की, पर जब पन्नाधाय ने कुंवर उदयसिंह को देवलिया में शरण देने की बात कही..तो रावत रायसिंह ने बनवीर के खौफ से ये काम न किया…||

रावत रायसिंह ने पन्नाधाय को एक घोड़ा देकर विदा किया.. पन्नाधाय कुंवर उदयसिंह को लेकर डूंगरपुर पहुंची.. डूंगरपुर के रावल आसकरण ने भी बनवीर के डर से उन्हें शरण नहीं दी.. रावल आसकरण ने उन्हें खर्च व सवारी देकर विदा किया…||

आखिरकार पन्नाधाय कुम्भलगढ़ पहुंची.. जहाँ उन्हें शरण मिली.. कुम्भलगढ़ के किलेदार आशा देवपुरा ने अपनी माँ से इजाजत लेने के बाद कुंवर उदयसिंह को अपने यहाँ रखना स्वीकार किया…||

भला एक माँ द्वारा दिया गया ऐसा अद्वितीय बलिदान व्यर्थ कैसे जाता.. धीरे-धीरे यह ख़बर फैलती गई ..कि महाराणा उदयसिंह जीवित हैं.. सामन्तों ने महाराणा उदयसिंह का राज्याभिषेक कर दिया.. 1540 ई. में महाराणा उदयसिंह ने महाराणा विक्रमादित्य व चन्दन के हत्यारे बनवीर को चित्तौड़गढ़ के युद्ध में परास्त करके उसका अस्तित्व ही नष्ट कर दिया…||

महाराणा उदयसिंह ने पन्नाधाय को चित्तौड़गढ़ में बुलवाया.. लेकिन पन्नाधाय वहां फिर कभी न आई..महाराणा उदयसिंह जानते थे.. कि पन्नाधाय के बलिदान के सामने उनके लिए कुछ भी कर पाना सूरज को रोशनी दिखाने के बराबर है.. लेकिन फिर भी वे पन्नाधाय के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहते थे…||

इसलिए 1564 ई. में चांदरास गाँव में महाराणा उदयसिंह ने साह आसकर्ण देवपुरा (आशा देवपुरा) को धाय माता पन्नाधाय की सुरक्षा के लिए 451 बीघा भूमि का ताम्रपत्र प्रदान किया.. मेवाड़ में इतने बड़े भूभाग के अनुदान का यही एक मात्र लेख है.. इस ताम्रपत्र पर “संवत् 1621 आसोज सुदी नवमी” अंकित है…||

प्रस्तुति ; मिथिलेश कुमार गुर्जर

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