गुजरात के नए ‘सरदार’ भूपेंद्र पटेल और उनकी ताजपोशी

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महर्षि दयानंद ,सरदार वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी, गुजरात की भूमि के ऐसे तीन हीरा हैं जिन्होंने अपनी विशेष प्रतिभा से इस पवित्र धरती का नाम रोशन किया है। संयोग से इन तीनों महापुरुषों की इसी पवित्र धरती से देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी आते हैं। ऐसा नहीं है कि इन तीन महानायकों के अतिरिक्त गुजरात की पवित्र भूमि ने देश के लिए अन्य कोई महानायक ना दिया हो ? प्राचीन काल से ही इस पवित्र भूमि ने देश,धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अनेकों हीरे प्रदान किए हैं। परंतु आधुनिक इतिहास के संदर्भ में प्रसंगवश हमने केवल 3 महापुरुषों का नाम ही यहां पर लिया है।          
  इस पवित्र भूमि गुजरात से जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र में प्रधानमंत्री बने हैं तबसे यहां भाजपा का कोई प्रभावशाली नेता ऐसा नहीं हो पाया जो इस राज्य को नरेंद्र मोदी के पैटर्न पर ढंग से चला सके। भाजपा के लिए भी यह चिंता का विषय है कि यहां पार्टी के लिए कोई ऐसा चेहरा उपलब्ध नहीं हो पा रहा जो प्रधानमंत्री के गृह प्रांत को सुव्यवस्थित ढंग से चला सके। ऐसे में यदि भाजपा यहां से हारती है तो माना यह जाएगा कि देश के प्रधानमंत्री जिस प्रांत से आते हैं वहां की जनता ने ही उनका साथ छोड़ दिया है ? यदि पिछले विधानसभा चुनावों के समय की परिस्थितियों पर विचार किया जाए तो भाजपा को यहां कोई बहुत बड़ी सफलता उस समय नहीं  मिली थी। बस, यही कारण है जिसके चलते भाजपा को यहां जल्दी-जल्दी चेहरे बदलने पड़ रहे हैं।
   अब गुजरात भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र पटेल को राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाया गया है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वह ‘भाजपा की अपेक्षाओं’ पर खरा उतरेंगे। उनसे यह भी अपेक्षा है कि वे भारत के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को मजबूती देते हुए उन सभी देश विरोधी शक्तियों का जमकर सामना करेंगे जो किसी न किसी प्रकार से हिंदुत्व के लिए खतरा बन चुके हैं । इसके अतिरिक्त जनता जिन चीजों को प्राथमिकता के आधार पर अपने लिए चाहती है, उन्हें उपलब्ध कराने के प्रति भी वह संवेदनशीलता प्रकट करेंगे।     
      ।घाटलोडिया सीट से विधायक पटेल ने विधिवत राज्य के नये मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाल लिया है। पटेल को पूर्व मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करीबी रहीं आनंदीबेन पटेल का बेहद करीबी माना जाता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि राजनीति में जो ऊपर बैठा होता है वह नीचे के सभी पदों पर अपने विश्वसनीय व्यक्तियों की नियुक्ति करना चाहता है। यह राजनीति का ही नहीं समाज का भी नियम है कि लोग अपनी टीम बनाते समय अपने विश्वसनीय लोगों को प्राथमिकता देते हैं। इस प्रकार की कार्यशैली स्वाभाविक भी है , क्योंकि जब टीम में एक जैसी सोच, एक जैसी मानसिकता और एक दिशा में काम करने वाले लोग होते हैं तो कार्यों को सही ढंग से अंजाम तक पहुंचाने में सुविधा होती है। जैसे ही व्यवस्था में कोई व्यक्ति विपरीत दिशा में सोचने या काम करने वाला आ जाता है तो उससे व्यवस्था को सुचारू रूप से गतिशील रखने में कठिनाई होती है। ऐसे में यदि गुजरात के नए ‘सरदार’ श्री पटेल प्रधानमंत्री मोदी की पसंद हों और उन्हें इसीलिए गुजरात के नए सरदार के रूप में शपथ दिलाई गई हो तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी को बदलकर नए मुख्यमंत्री का चेहरा तलाशने के पीछे भाजपा के चाहे जो भी कारण रहे हों, पर हम राजनीति में मुख्यमंत्री के रूप में काम करने वाले लोगों को बार-बार बदलना उचित नहीं मानते। जिस पार्टी की सरकार केंद्र में हो उसका कोई भी मुख्यमंत्री किसी भी प्रांत में खुलकर निर्णय लेने और काम करने की क्षमता हासिल नहीं कर पाता। क्योंकि उस पर केंद्र की तलवार लटकती रहती है। यदि उसने अपने आपको ‘स्थापित’ करने का प्रयास किया तो ऊपर से ‘पर कतरने’ में देर नहीं लगती। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि राजनीतिक पार्टियां उन छतरियों की तरह होती हैं जिन पर ‘पर कैच’ किए गए ‘कबूतर’ बैठे रहते हैं। ये मुख्यमंत्री, ये विधायक, ये सांसद – सब राजनीति छतरियों पर बैठने वाले वही कबूतर हैं जिनके ‘पर कैच’ कर दिए जाते हैं । जो ना तो लंबी उड़ान भर पाते हैं और ना ही खुलकर हंस पाते हैं । ऐसे में कोई भी मुख्यमंत्री खुलकर खेलने की स्थिति में नहीं आ पाता ।
      वैसे भी लोकतंत्र में 5 वर्ष का समय संवैधानिक ढंग से किसी एक सरकार को चुनते समय लोग प्रत्येक मुख्यमंत्री को भी देते हैं। यह बात हमें ध्यान रखनी चाहिए कि जैसे केंद्र में किसी प्रधानमंत्री को चुनते समय या सरकार बनाते समय लोग देश के संभावित या घोषित प्रधानमंत्री को भी 5 वर्ष का समय देते हैं वैसे ही किसी मुख्यमंत्री को भी 5 वर्ष का समय दिया जाता है। यह कौन सी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है कि केंद्र में बैठा प्रधानमंत्री किसी भी मुख्यमंत्री को बदलने या उसे ‘चलता करने’ की क्षमता हासिल करे ? आखिर उसे यह शक्ति संविधान का कौन सा प्रावधान या धारा या अनुच्छेद देता है ?
     हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब नेताओं को जल्दी-जल्दी बदला जाता है तो उससे देश या देश का कोई प्रांत ‘प्रयोगशाला’ बन कर रह जाता है । उससे प्रशासनिक कार्यों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। वैसे भी 5 वर्ष का समय कोई अधिक नहीं होता। 5 वर्ष में तो कई लोग प्रशासनिक क्षमता हासिल कर कार्य करना ही सीख पाते हैं । यदि इतनी ही देर में उसे बदलने या कुर्सी से उतार फेंकने का समय आ जाए तो फिर इतना ही समय अगले मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को भी प्रशासनिक क्षमता प्राप्त करने के लिए चाहिए। इससे हमारे देश की उन्नति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । इस व्यवस्था को कैसे सुधारा जाए और कैसे एक व्यक्ति के प्रशासनिक अनुभव का लाभ अधिक से अधिक उठाया जाए ? – यह अब हमारे लिए राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनना चाहिए।
   गुजरात के नए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल का नाम कैसे और कब मुख्यमंत्री के रूप में चर्चा में आ गया या अगले मुख्यमंत्री के रूप में कैसे सर्वसम्मति प्राप्त कर गया? यह जानना भी बहुत आवश्यक है। भूपेंद्र पटेल का मुख्यमंत्री बनाया जाना कई लोगों के लिए बहुत ही आश्चर्यजनक रहा है।
    जब गुजरात के नए मुख्यमंत्री के नाम पर गर्मागर्म चर्चा भाजपा के खेमों में चल रही थी तब विधायक दल की बैठक में दो केंद्रीय मंत्रियों मनसुख मांडविया और पुरुषोत्तम रूपाला के अतिरिक्त लक्षद्वीप के विवादित प्रशासक प्रफुल्ल खोड़ा पटेल और राज्य के कृषि मंत्री आरसी फालदू का भी नाम चर्चा में रहा। यह सारे नाम चर्चाओं में अलग धरे रह गए और बड़े गोपनीय और नाटकीय ढंग से भूपेंद्र पटेल को ‘गुजरात के सरदार’ की जिम्मेदारी सौंप दी गई । जानकारों का कहना है कि अंतिम क्षणों तक श्री पटेल स्वयं भी यह नहीं जानते थे कि उन्हें गुजरात के नए मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार का नाटकीय और रहस्यमयी राजनीतिक परिवेश आज के तथाकथित ‘चाणक्यों’ के लिए बहुत अनुकूल हो सकता है जो उन्हें यह भी सोचने के लिए उत्साहित कर सकता है कि वह बहुत बड़े विद्वान और राजनीति के ‘कुशल खिलाड़ी’ हैं, परंतु वास्तव में यह स्थिति पूर्णत: लोकतांत्रिक नहीं कही जा सकती। लोकतंत्रिक व्यवस्था तो वहीं कहीं जा सकती है जिसमें ‘लोक निर्णय’ और लोकमत को सर्वोच्चता दी जाती हो। जहां लोक पर निर्णय थोपे जाते हों, उसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। हमें यहां पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय राजनीति में ऐसा नहीं है कि यह कार्य प्रधानमंत्री मोदी के रहते ही हो रहा है । लोक पर निर्णय थोपने की परंपरा तो इस देश में कांग्रेस ने डाली थी। जिसकी भाजपा आलोचना करती रही। यदि अब भाजपा भी उसी नीति – रणनीति को अपना रही है तो उसमें और कांग्रेस में अंतर कहां रह गया ? कांग्रेस की ही ‘बी टीम’ बनकर सपा और बसपा तो और भी अधिक तानाशाही दृष्टिकोण रखते हुए एक परिवार की जागीर बन कर रह गई हैं।
  ‘रामभक्तों’ के लिए उचित लोकतांत्रिक परंपरा यही है कि जैसे श्रीराम को राजा बनाने से पहले राजा दशरथ ने अपने मन्त्रियों, जनप्रतिनिधियों व जनता के संभ्रांत लोगों से यह पूछा था कि आप मेरे उत्तराधिकारी के रूप में किसे राजा के रूप में देखना पसंद करोगे ? और जब जनता ने यह कह दिया कि श्रीराम ही इस पद के अनुकूल हैं, तभी उन्होंने राजा के पद पर श्रीराम को नियुक्त करने का निर्णय लिया था, वैसे ही किसी भी मुख्यमंत्री को हटाने से पहले लोकतंत्र की इस परिपाटी का पालन किया जाना चाहिए।
    खैर,अब विचार करते हैं गुजरात की भीतरी राजनीति पर। जिसमें कई चेहरों ने नए चेहरे को आगे लाने में पर्दे के पीछे से सक्रिय भूमिका निभाई। किसी के अहम की पुष्टि हुई तो किसी के अहम को चोट पहुंची। वास्तव में इस खेल को समझना भी बहुत आवश्यक है। गुजरात की अंदरूनी राजनीति से परिचित एक पत्रकार ने डॉयचे वेले से बातचीत में कहा कि भूपेंद्र पटेल को यह पद मिलना आनंदीबेन का बदला है। वह बताती हैं, “भूपेंद्र पटेल आनंदीबेन के बेहद करीबी हैं। जिस तरह आनंदीबेन पटेल को पद से हटाया गया था, उसका बदला अब उन्होंने भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनवाकर ले लिया है।” भूपेंद्र पटेल अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन और अहमदाबाद अर्बन डिवेलपमेंट अथॉरिटी में रहे हैं। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्र बनाए जाने से राज्य में बीजेपी मजबूत होगी। बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने ट्वीट कर इस फैसले का स्वागत किया।
उन्होंने लिखा, “बहुत अच्छी बात है कि भूपेंद्र पटेल को गुजरात का नया मुख्यमंत्री चुना गया है। अब बीजेपी का गुजरात की सत्ता में लौटना सुनिश्चित है।” विजय रूपाणी के साथ क्या हुआ? विजय रूपाणी को गृह मंत्री अमित शाह का बेहद करीबी माना जाता है। गुजरात की राजनीति पर निगाह रखने वाले लोग मानते हैं कि अमित शाह के कारण ही रूपाणी को मुख्यमंत्री पद मिला था लेकिन पार्टी और जनता दोनों में उनकी छवि वैसी नहीं बन पाई, जिसके द्वारा बीजेपी चुनाव जीत सके। ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ तो इस तरह की बातें भी चर्चा में हैं कि अमित शाह ने कुछ दिन पहले विजय रूपाणी को बता दिया था कि अब उन्हें नहीं बचाया जा सकता।  एक पत्रकार बताती हैं, “विजय रूपाणी को हटाने के पीछे एक बड़ी वजह भ्रष्टाचार भी है। उनकी छवि खराब हो रही थी।” विजय रूपाणी ने 2016 में पद संभाला था और शनिवार को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। हालांकि इस बड़े बदलाव की चर्चा गलियारों में तभी से गर्म थी जब अमित शाह गुजरात दौरे पर गए थे।
    अब चाहे जो कुछ भी हो, अब तो यही सत्य है कि गुजरात के मुख्यमंत्री इस समय भूपेंद्र पटेल हैं। जिन्हें शुभकामना देना हमारा भी कर्तव्य है । उन्हें शुभकामनाएं अर्पित करते हुए हम यह अपेक्षा करते हैं कि वे गुजरात में ‘सबका साथ -सबका विकास, सबका- विकास और सबका प्रयास” –  की मोदी जी की नीति को यथार्थ में क्रियान्वित करेंगे। वह सत्ता में लौटेंगे या नहीं यह तो जनता पर निर्भर करता है। पर हम उनसे यह अपेक्षा अवश्य करेंगे कि यदि वह सत्ता में लौटते हैं तो किसी ‘चुनावी धांधली’ या ‘गड़बड़ी’ के कारण नहीं बल्कि जनता के आशीर्वाद को प्राप्त करके लौटें। इसी से देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होना संभव है। गुजरात को जीतना जैसे अन्य राजनीतिक पार्टियों का राजनीतिक अधिकार है वैसे ही भूपेंद्र पटेल का भी अधिकार है, परंतु जैसे हम अन्य लोगों से राजनीतिक शुचिता की अपेक्षा करते हैं, वैसे ही श्री पटेल से भी राजनीतिक शुचिता की उच्चता को बनाए रखने की अपेक्षा करते हैं। वह आज ‘सरदार’ भी हैं और ‘पटेल’ भी हैं, इस बात को ध्यान में रखकर वह ‘मजबूत’ निर्णय लेकर आगे बढ़ें। निश्चित रूप से नियति उनकी प्रतीक्षा कर रही है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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