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स्वर्णिम इतिहास

भारत का स्वर्णिम इतिहास भारत को ‘सोने की चिडिय़ा’ क्यों कहते थे (1)

एस. सी. जैन

भारत का एक अतीत है जो बहुत पुराना है जो वेदों के समय से लेकर दसवीं शताब्दी तक का है। भारत के उस अतीत के बारे में बात करेंगे जो हाल में हमारे सामने रहा। 100-200 साल पहले 18 शताब्दी, 17 शताब्दी व 15 शताब्दी तक आज से लगभग 100-150 साल पहले से शुरू करेंगे। पिछले हजार साल का इतिहास कैसा है। भारत के अतीत पर दुनिया भर के 200 से ज्यादा विद्वान इतिहास विशेषज्ञों ने बहुत शोध किया। ये विशेषज्ञों के बारे में क्या कहते हैं।

अंग्रेज गर्वनर थॉमस टीवी मैकोली कहता है कि भारत में मुझे आये हुए करीब सत्रह वर्ष हो गये। जब यह भारत में रहा तो भारत का काफी प्रवास किया और यात्राएं की। जब वह सत्रह साल के प्रवास के बाद इंग्लैंड गया तब उसने इंग्लैंड की संसद में एक लंबा भाषण दिया। वह कह रहा है कि उसने संपूर्ण भारत में प्रवास किया लेकिन मैंने भारत में कभी भी ऐसा व्यक्ति नही देखा जो चोर, बेरोजगार व गरीब है। वह यह बात 2-2-1836 को कह रहा है।  मानो आज से अगर हम जोड़ेंगे तो लगभग 160-170 साल पहले ये बोल रहे थे कि एक भी व्यक्ति भारत में गरीब नही है। जब कोई व्यक्ति गरीब नही है, बेरोजगार नही है तो भारत वासियों को गुलाम बनाना मुश्किल काम है। ये आसान नही है क्योंकि वह खुद कहता है जो लोग पैसे वाले होते हैं, समृद्घ होते हैं वो लोग जल्दी किसी के गुलाम नही होते।

भारत की संस्कृति और भारत की सभ्यता के बारे में भी मैकाले ने बहुत विस्तार से बताया। भारत एक समृद्घशाली देश है। इस भाषण के अंत में मैकाले ने एक वाक्य और कहा किजिस व्यक्ति के घर में भी मैं गया तो वहां सोने के सिक्कों का ढेर लगा हुआ था। जैसे कि चने, गेंहू, मक्के आदि के बोरे घरों में भरे होते हैं, वैसे ही सोने की मोहरों की बोरियां भरी हुई थीं। सामान्य से लेकर विशिष्ट घरों तक सब के पास सोने के सिक्के इतनी मात्रा में होते थे। वो कहता है कि भारतवासी कभी इन सोने के सिक्कों को गिनती नही करते थे, क्योंकि गिनने की कभी फुरसत ही नही होती है और तराजू में तोलकर रखते हैं। किसी के घर में सौ किलो, दो सौ किलो 500 किलो तक इस तरह हमारे भारत में सोने का भंडार भरा हुआ था।

एक अंग्रेजी इतिहासकार हुआ जिसका नाम विलियम डिगबी था। उसने बिना कारण कभी कोई बात नही की। कोई भी दस्तावेज बिना सबूतों के वह नही लिखता था। इसलिए इसकी इज्जत पूरे यूरोप अमेरिका में होती थी।

डिगबी ने भारत के बारे में एक बड़ी पुस्तक लिखी थी। डिगबी कहता है कि अंग्रेजों के पहले भारत विश्व का सर्वमान्य कृषि प्रधान देश ही नही, बल्कि ये सर्वश्रेष्ठ औद्योगिक और व्यापारिक देश भी था। वह कह रहा है ‘सर्वश्रेष्ठ’। महयूम डिगबी कह रहा है कि सारी दुनिया के देशों में से भारत औद्योगिक रूप से, व्यापारिक रूप से और कृषि के रूप में सर्वश्रेष्ठ देश है। भारत देश कृषि व व्यापार दुनिया में सबसे ज्यादा करता है। भारत की भूमि इतनी उपजाऊ है जितनी कि किसी भी देश की नही है। भारत के कारीगर इतने होशियार हैं जितने दुनिया में किसी भी देश के नही हैं।

भारत के कारीगर हाथ से कपड़ा बनाते हैं उनका बनाया हुआ कपड़ा रेशम का तथा अन्य वस्तुएं पूरे विश्व के बाजार में बिक रही हैं और जब इन वस्तुओं को भारत के व्यापारी बेचते हैं तो बदले में वो सोना और चांदी की मांग करते हैं। जो दुनिया के सारे व्यापारी भारत को आसानी से दे देते हैं। वह कह रहा है कि भारत का कपड़ा और अन्य वस्तुएं दुनिया के बाजार में बिकती हंै और भारतवासी इनके बदले में सोना लेते हैं, क्योंकि यहां की वस्तुएं सर्वश्रेष्ठ होती हैं, और दुनिया का कोई देश इन्हें बना नही सकता। इनकी कारीगरी और हुनर भारत और सिर्फ भारत के पास ही है। भारत देश में इन वस्तुओं के उत्पादन के बाद की जो बिक्री की प्रक्रिया है वो दूसरे देशों के पास नही है अत: भारत में सोना और चांदी ऐसे प्रवाहित होता है जैसे नदियों में पानी प्रवाहित होता है। दुनिया का सारा सोना चांदी भारत में ही एकत्रित हो गया। दुनिया का सारा सोना, चांदी भारत में आता तो है लेकिन बाहर नही जाता। भारतवासी कभी किसी देश से कोई वस्तु नही खरीदते थे क्योंकि वे सारी वस्तुओं का निर्माण खुद करते थे। आज से 300 साल पहले का भारत निर्यात प्रधान देश था और अन्य देशों से आयात नही करता था।

फ्रासंवा फयांग नाम का एक और अंग्रेज इतिहासकार था जिसने 1711 में भारत के बारे में बहुत बड़ा ग्रंथ लिखा है, और उसमें उसने सैकड़ों प्रमाण दिये हैं।

फयांग अपनी पुस्तक में कहता है कि भारत देश में मेरी जानकारी में 36 तरह के ऐसे उद्योग चलते हैं जिनमें उत्पादित होने वाले हर वस्तु विदेशों में निर्यात होती है। फिर वह आगे लिखता है कि भारत के सभी शिल्प और उद्योग उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ, उत्कृष्ट और कीमत में सबसे सस्ते हंै। सोना, चांदी, लोहा, इस्पात, तांबा और अन्य धातुएं, लकड़ी के सामान मूल्यवान दुर्लभ पदार्थ थे, सब वस्तुएं भारत में इतनी विविधता के साथ बनती थी जिनका कोई अंत नही हो सकता और जो सबसे महत्वपूर्ण बात वो कह रहा है वह यह है कि मुझे जो प्रमाण मिले हैं उसके आधार पर उनसे यह पता चलता है कि भारत का निर्यात अन्य देशों में पिछले तीन हजार साल से बिना रूके चल रहा है। 17वीं शताब्दी में 1000 साल पहले पूरी गणना की जाए तो महात्मा बुद्घ के लगभग 500 वर्ष पहले हमारे देश के तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म के लगभग 650 वर्ष पहले भारत दुनिया के सभी देशों के बाजार में सबसे ज्यादा निर्यात करने वाला देश था।

भारत में दुनिया का सबसे बेहतरीन कपड़ा बनता था और सारी दुनिया के देशों में बिकता था। मार्टिन नाम का जो स्कॉटिश इतिहासकार है, वह कहता है कि मुझे ये स्वीकार करने में कोई शर्म नही है कि भारतवासियों ने सारी दुनिया को कपड़ा बनाना और पहनना सिखाया है। वह कहता है हम अंग्रेजों ने और सहयोगी जातियों के लोगों ने भारत से ही कपड़ा बनाना सीखा है और पहनना भी सीखा है।

रोमन साम्राज्य में जितने भी राजा रानी थे वे सभी भारत से कपड़े मंगाते रहे थे और पहनते रहे। उनसे उनका जीवन चलता रहा है। एक फारसी इतिहासकार है जो 1750 में आया, उसका नाम टैवर्नियर है, वे कहते हैं कि भारत के वस्त्र इतने सुंदर व इतने हल्के हैं कि हाथ पर रखो तो पता ही नही चलता है। सूत की महीन कताई मुश्किल से नजर आती है।

क्रमश:

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