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इतिहास के पन्नों से

” गद्दारों के शीशमहल “

इतिहास के कुछ तथ्य विवादित रहते हैं भले ही शेष इतिहास निर्विवादित रहता हो। इतिहास लिखा ही इस भाव से जाता है कि भावी पीढ़ियां, संतति या राष्ट्रजन अतीत की घटनाओं से प्रेरणा लें भले ही घटना गौरव का भाव प्रदान करें या लज्जा का। भारत में प्राचीन वैदिक काल से लेकर मौर्य काल तक अनेक वीर प्रतापी भू-पाल रहे हैं तो वही बात हम मध्यकाल की करें यह काल भी बहुत से राजाओं की वीरता से शून्य ना रहा है लेकिन कुछ ऐसे राजा हुए हैं जो वीर होते हुए भी उनका नाम आज भी देश व सनातन के गद्दारों की सूची में रखा जाता है। यह कोई आवश्यक नहीं है कोई वीर है तो वह राष्ट्रभक्त भी रहा होगा ।

आम जन 11वीं शताब्दी के कन्नौज के राजा जयचंद को ही गद्दारी का पर्याय मानते हैं, जबकि यह विवादित तथ्य है जयचंद गद्दार थे या राष्ट्र भक्त ?लेकिन 16वीं शताब्दी के आमेर जयपुर के कछवाहा राजपूत राजा मानसिंह के गद्दार राष्ट्रघाती चरित्र को लेकर कोई संशय किसी भी मन में नहीं रहना चाहिए। जब देश को इस वीर राजा की वीरता की आवश्यकता थी भारत में पैर पसारते मुगल साम्राज्य के पांवों को उखाड़ फेंकने के लिए तो यह राजा महाराणा प्रताप जैसे स्वाभीमानी राष्ट्र धर्म भक्त हिंदू राजाओं के विरुद्ध अकबर के साथ हाथ मिलाकर उसकी ओर से सैन्य मोर्चो को फतह कर रहा था। अपने जीवन में लड़ी गई 60 से अधिक लड़ाईया में यह कभी नहीं हारा मुगलों के 40 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले साम्राज्य में आधे से अधिक साम्राज्य के विस्तार में इसका भुजबल लगा था। अकबर की ओर से इसे बंगाल ,काबुल व बिहार का सूबेदार बनाया गया आज की राजनीतिक भाषा में कहे तो यह तीन-तीन प्रांतों का चीफ मिनिस्टर रहा। यदि मानसिंह अकबर का साथ ना देता तो आगरा व महज कुछ सैकड़ो वर्ग किलोमीटर में सिमटा मुगल साम्राज्य समूचे राजपूताने शेष भारत में अपने पैर नहीं पसारता चित्तौड़गढ़ का जौहर हल्दीघाटी का संग्राम ना होता। आमेर का राजा मानसिंह यदि महाराणा प्रताप सहित अन्य हिंदू राजाओं का साथ देता तो यह देश अकबर के बाद जहांगीर औरंगजेब जैसे क्रूर मजहबी शासको की क्रूरता का शिकार ना होता ना ही भारत में हिंदुओं का मतांतरण होता आज के भारत में जो 20 करोड़ तथाकथित अल्पसंख्यक हैं इनकी निर्मिति का बीज मानसिंह ने ही बोया था, नतीजा भारत आज सांप्रदायिकता तुष्टिकरण राष्ट्रद्रोह विभिन्न जिहादों की चपेट में है इतिहास की घटनाएं भूतकाल में घटित होती है लेकिन उसके दुष्प्रभाव दीर्घ भविष्य में आते रहते हैं । मानसिंह ने अकबर का साथ देते हुए यह समझौता किया था कि वह जिन राजाओं को जीतेगा उन राजाओं की जमीन पर अधिकार अकबर का होगा और जो हीरे रत्न जवाहरात प्राप्त होंगे वह मानसिंह के हिस्से में आएंगे मुगलों के साथ मिलकर उसने अपने ही हिंदू राजाओं को लूटा नगरों में आग लगाई उसके कारण असंख्य स्त्रियों को जौहर करना पड़ा।

लूट के माल को भोगने के लिए उसने आमेर के किले में दिवाने- आम के पास अपनी दो रानियों के लिए शीश महल का निर्माण आरंभ कराया है जो 44 वर्षों में बनकर निर्मित हुआ। आरंभ उसने कराया महल निर्माण कार्य को पूरा उसके परवर्ती राजा मिर्जा जयसिंह ने किया यह मिर्जा जयसिंह भी मानसिंह के ही नक्शे कदमों पर चला शिवाजी व औरंगज़ेब की लड़ाई में इसका पलड़ा औरंगजेब की ओर ही झुका रहा एक ऐतिहासिक पत्र जो आज एक सार्वजनिक ऐतिहासिक दस्तावेज है उसमें मराठा छत्रपति शिवाजी ने पत्र लिखकर मिर्जा जयसिंह को दूतकारा था उसके सनातन व राष्ट्र विरोधी निर्णय के लिए। मार्च 2026 महीने में मुझे राजस्थान के चित्तौड़गढ़ कुंभलगढ़ आमेर आदि किलों को गहनता से देखने समझने का अवसर मिला ‘भारत को समझो अभियान’ के तहत भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार आर्य जी आदि इतिहास के विद्वानों के साथ साथ अन्य प्रबुद्ध आर्य जनों का प्रतिनिधिमंडल भी था जिसमें उगता भारत अखबार के चैयरमैन एडवोकेट देवेंद्र आर्य भी शामिल थे। इन किलों की आज भौतिक स्थिति ही बता रही है इन किलो में रहने वाले कौन मुगलों के साथ थे तो कौन मुगलों के प्रति वफादार थे। आमेर के किले में बने शीश महल में विशेष कांच का प्रयोग किया गया है इन कांच के टुकड़ों को 16वीं शताब्दी में मानसिंह आदि ने समुंदर पार यूरोपीय देश बेल्जियम से मंगाया था 25 मिलियन अर्थात ढाई करोड़ से अधिक कांच के टुकड़ों का प्रयोग शीश महल के निर्माण में हुआ है निसंदेह यह वास्तु कला का एक अद्भुत नमूना है जहां रात की रोशनी में एक माचिस या मोमबत्ती जलाने मात्र से इस महल की छत तारों की तरह टिमटिमाने लगती है संगमरमर से निर्मित इस महल में बहुत सुंदर फूल पत्तियों की नक्काशी की गई है फूलों के निर्माण में भी अद्भुत कला कौशल का प्रदर्शन है एक ही फूल को यदि आप हाथ रखकर विभिन्न कोणों से निहारते हैं तो हाथी बिच्छू आदि विभिन्न जीव जंतुओं का रुप वह धारण कर लेता है। शीश महल की दीवारों पर ईरानी चित्रकला का भी प्रयोग हुआ है हैरत की बात यह है फूल पत्तियों के रंगों का निर्माण फल सब्जियां से निर्मित प्राकृतिक रंगों का प्रयोग हुआ है सदियों बाद आज भी रंग फीका नहीं पड़ा है वहीं आज हम देखते हैं केमिकल इंजीनियरिंग ने जहां इतनी तरक्की कर ली है वहां आज भी तमाम पेट निर्माता कंपनियों के महंगे से महंगे पेंट 1 साल में ही बेदम हो जाते हैं। सोने की विशेष पॉलिश भी जगह-जगह महल की दीवारों व छत पर की गई है। यह शीश महल सर्दियों में प्रयोग के लिए बनवाया गया था जब इसमें महज प्रज्वलित कुछ सैकड़ो दीपको के जलाने मात्र से ही गर्म हो जाता था इस पर लगे कांच के कारण दीपकों की उष्मा को कांच अवशोषित करते थे एक्सचेंज आफ हीट होता था।

अद्भुत कला कौशल के संयोजन की रचना होने के बावजूद शीश महल आज भी यथार्थ निष्पक्ष दृष्टि से इतिहास को देखने वाले सनातन व राष्ट्र प्रेमी जनो के लिए कभी भी अचरज की विषय वस्तु नहीं रहा वहीं चित्तौड़ का खंडित साधारण लाल पत्थरों से निर्मित किला आज भी संगमरमर से निर्मित आमेर के शीश महल स्नानागार जैसी संरचनाओं पर भारी पड़ता है दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं राष्ट्रभक्ति स्वाभिमान शौर्य राष्ट्र व धर्म द्रोह से निर्मित वैभव संपदा को महत्वहीन निस्तेज कर ही देता है।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता, ग्रेटर नोएडा

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