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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

संस्कृत भाषा और हमारे प्रधानमंत्री

डा. विष्णुकांत शास्त्री भारतीय संस्कृति के विषय में लिखते हैं :-‘‘जीवन को सुसंस्कृत करते रहने के तीन साधन हमारे पूर्वजों ने बताये हैं। गुणाधान (गुणों को अर्जित करना) दोषापनयन (दोषों को दूर करना) और हीनांगपूत्र्ति  (सतकर्म के लिए अन्य लोगों से सहायता साधन-आवश्यक अवयव प्राप्त करना)। ऋग्वेद की ही उक्ति है-‘‘आ नो भद्रा : क्रतवो यंतु विश्वत:….’’ अर्थात सभी दिशाओं से शुभ ज्ञान की प्राप्ति….प्रश्न उठता है कि गुण और दोष के निर्धारण का आधार क्या होना चाहिए? सीधा उत्तर है-हमारी परंपरा ने सच्चिदानंद को सर्वोपरि माना है। अत: जो कुछ उसके अनुकूल है, वह गुण और जो कुछ उनके प्रतिकूल है वह दोष है। उदाहरणार्थ गीता के 16वें अध्याय में वर्णित दैवी संपदा को अर्जनीय गुण समूह और और आसुरी संपदा को त्याज्य दोष समूह कहा जा सकता है। हमें निरंतर अपना और अपने समाज का निरीक्षण करते रहना चाहिए और गुणों का अर्जन तथा दोषों का त्याग करते रहना चाहिए तभी हम सुसंस्कृत होंगे और समाज को सुसंस्कृत बना सकेंगे। संस्कृति के लिए यही मानदंड सच है। समरसता और सदभाव बनाये रखने वाली ज्ञानधारा और आनंद की वृद्घि करने वाली व्यवस्था संस्कृति है, एवं उसकी विरोधी व्यवस्था विकृति है।’’

हमारे हर नये संस्करण का नाम संस्कारों से युक्त जीवन जगत का नाम संस्कृति है और इस प्रकार के नवीन संस्करणों को निकालने वाली और जीवन-जगत को सुव्यवस्थित बनाकर उसे एक प्रकार की उत्कृष्टता प्रदान करने वाली भाषा संस्कृत है।

ऐसी देववाणी भाषा संस्कृत के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक ही कहा है कि संस्कृत भाषा में ज्ञान का अपार भंडार है। यह सर्वमान्य सत्य है कि विश्व की समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत है। पर जब हम ऐसा कहते हैं कि विश्व की समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत है, तो हमसे अन्य भाषाओं का तुष्टिकरण करते-करते एक चूक हो जाती है कि हम विश्व की बोलियों को भाषा का स्तर दे जाते हैं। विश्व की कथित भाषाएं भाषा नही हंै, वे तो बोलियां हैं। बोली भाषा का अवशिष्ट भाग होता है, टूटा-फूटा भाग होता है, जूठन होती है, उसकी विकृति होती है। जिस भाषा के पास मूल शब्द हो वही भाषा मौलिक भाषा होती है। वैज्ञानिक भाषा होती है। जिस भाषा के पास मौलिक भाषा के मूल शब्दों की टूटन-फूटन या जूठन हो वह बोली होती है। विश्व की सभी भाषाओं को हम इसलिए भाषा न कहकर बोली कहते हैं कि उनके पास संस्कृत के मूल शब्दों की विकृति है। उसी विकृति से ही उन्होंने भाषा होने का भ्रम उत्पन्न कर लिया है।

नरेन्द्र मोदी अपनी भाषा और भूषा के प्रति विशेष ध्यान देते हैं। एक समय होता था जब लालकिले से प्रधानमंत्रियों के सिर पर ‘गांधी टोपी’ दीख करती थी, पर अब टोपी भी गयी अब तो ‘पगड़ी’ की बहार आयी है। जिससे सारा देश पगड़ी धारी हो गया है। यह पगड़ी जहां हमें विशेष जिम्मेदारी की अनुभूति कराती है वही हमें गर्वोन्नत भी करती है। हमारी भूषा की यह स्थिति है तो भाषा की स्थिति भी यही है। संस्कृत विश्व की एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें एक भी शब्द गाली के लिए प्रयोग नही किया जाता। इसीलिए यह भाषा देववाणी है। इस देववाणी के पास सुई से लेकर हवाई जहाज बनाने तक की विधियां छिपी पड़ी हैं। तकनीक छिपी पड़ी, विज्ञान छिपा पड़ा है, व्यक्ति के विकास की सारी व्यवस्था और सारे रहस्य छिपे पड़े हैं, सारे विश्व में शांति कैसे स्थापित हो, मानव कैसे मानव बने, और कैसे वह आवागमन के चक्र से छूटकर आनंदलोक का वासी बने, ये सारे उपाय भी छिपे पड़े हैं। जितना अनंत व्योम है, उतनी ही अनंतता संस्कृत के ज्ञान की है।

संस्कृत के ज्ञान की उस अनंतता और व्यापकता को नापने की बात यदि देश का प्रधानमंत्री कहता है तो यह शुभसंकेत है-‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के जागरण का।

हमारा प्रधानमंत्री मोदी से विनम्र अनुरोध है कि भारत जैसे पंथनिरपेक्ष देश की एकता के दृष्टिगत संस्कृत की नैतिक शिक्षा को हर विद्यालय में अनिवार्यत: लागू कराया जाए। मानव-निर्माण के लिए जितनी उपयोगी संस्कृत है उतनी कोई अन्य भाषा नही है। इसलिए संस्कृत के विकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। कंप्यूटर के लिए संस्कृत को सबसे उपयोगी भाषा माना गया है-इसलिए कंप्यूटर में भी संस्कृत का प्रयोग कराना सिखाया जाए। इसकी सूक्तियां, श्लोक और मंत्रादि को प्राथमिक स्तर की शिक्षा में ही बच्चों को सिखाने की व्यवस्था की जाए। यदि प्रधानमंत्री ऐसा कुछ कर पाते हैं तो उनके कार्य से राष्ट्र ही नही मानवता भी कृत कृत्य हो उठेगी।

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