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भयानक राजनीतिक षडयंत्र

क्या उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकेगा किसान आंदोलन ?

  बृजेश शुक्ल

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में किसान पंचायत में जब किसान नेता अपनी मांगों को लेकर केंद्र और राज्य की योगी सरकार पर हमला कर रहे थे तो यह सवाल भी पूछा जा रहा था कि क्या किसान आंदोलन उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई नया अध्याय लिखने जा रहा है। यह प्रश्न लाजिमी है क्योंकि राज्य में किसान आंदोलन का सर्वाधिक असर पश्चिम के कुछ जिलों में है। यह वह भूमि है, जहां कभी किसान नेता चौधरी चरण सिंह का डंका बजता था, लेकिन धीरे-धीरे उनका यह गढ़ कमजोर होता चला गया।
जोरदार मुकाबला

हालत यह हो गई कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) का यह गढ़ ध्वस्त हो गया। चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत के स्वामी चौधरी अजीत सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी लोकसभा चुनाव हार गए। क्या किसान आंदोलन से राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव आएगा? क्या इस बार बीजेपी का किला पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धराशायी हो जाएगा? क्या किसान आंदोलन उत्तर प्रदेश की राजनीति में वह परिवर्तन ला पाएगा, जो केंद्र की सत्ता को भी हिला दे? इन सवालों के जवाब तो भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना तय है कि इस बार पश्चिम उत्तर प्रदेश में जोरदार मुकाबला होगा। इस राजनीतिक महाभारत के लिए मैदान अभी से सजने लगा है।

किसान पंचायत में जुटी भारी भीड़ से आंदोलन को तो मजबूती मिलेगी ही, इससे विपक्षी दलों का हौसला भी बढ़ा होगा। किसान नेताओं को लगता है कि मुजफ्फरनगर की किसान पंचायत केंद्र सरकार को बातचीत के लिए विवश कर देगी, लेकिन चुनाव की तैयारी में लगे राजनीतिक दल इसमें अपने लिए खाद और पानी तलाश रहे हैं। विपक्षी दलों को भरोसा है कि किसान आंदोलन वह संजीवनी है, जो उनकी पार्टी के लिए वरदान साबित होगी। यह संजीवनी बीजेपी को रास्ते से हटा देगी और उन्हें सत्ता तक ले आएगी। आरएलडी मानकर चल रहा है कि यह उसके लिए अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने का अवसर है। अगर वह इसे अभी हासिल नहीं कर पाया तो आगे बड़ी मुश्किल होगी। जमीनी स्तर पर देखने से भी लगता है कि किसान आंदोलन के समर्थक और उनके कर्ता-धर्ता आरएलडी के साथ हैं। उनका झुकाव न तो ज्यादा कांग्रेस की तरफ है और ना ही बीएसपी की ओर। इसलिए आरएलडी को इस आंदोलन से कहीं ज्यादा उम्मीदें हैं। वह सफलता को लेकर आश्वस्त भी है। भारतीय किसान यूनियन से जुड़े नेता वे सारे प्रयास कर रहे हैं, जिससे वह गठजोड़ फिर कायम किया जा सके, जो चौधरी चरण सिंह ने मजबूती से तैयार किया था। यानी मुस्लिम और जाट गठजोड़। यह गठजोड़ 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के कारण टूट गया था। तब जाटों और मुसलमानों के बीच दरार पड़ गई थी। आज ये दोनों समुदाय एक दूसरे से जुड़ते हुए दिख रहे हैं।

यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या किसान आंदोलन ही विपक्ष की राजनीति का खेवनहार हो सकता है? इसमें दो राय नहीं कि जाट बहुल पश्चिम उत्तर प्रदेश में न सिर्फ किसान आंदोलन को बल्कि आरएलडी को भी उतना ही मुखर समर्थन भी मिल रहा है। इसकी वजह ‘जाट भूमि’ को प्रभावित करने वाले मुद्दे हैं। असल में, 2019 लोकसभा चुनाव में जाटों के नाम पर राजनीति करने वाले क्षत्रपों को एहसास हो गया था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक धारा बदल रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में एसपी, बीएसपी और आरएलडी के गठबंधन के बावजूद अजीत सिंह और जयंत चौधरी का अपने क्षेत्रों मुजफ्फरनगर और बागपत से हार जाना बहुत बड़ी राजनीतिक घटना थी।
उस वक्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ा और सवर्ण मतदाता बीजेपी के साथ थे। इसीलिए इतने मजबूत जातीय समीकरणों से बने महागठबंधन से बीजेपी ने कांटे की लड़ाई लड़ी थी। पिछले दो वर्ष में क्या इस समीकरण में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है? यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन एक बात साफ दिखती है कि जाट मतदाता पिछली बार से कहीं ज्यादा इस बार आरएलडी के साथ खड़े हैं। इसलिए शह और मात का खेल अभी से ही शुरू हो गया है।
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उधर, बीजेपी साबित करने में जुटी है कि यह बड़ी-बड़ी जोत वाले कुछ लोगों का आंदोलन है और इसका आम किसानों से कुछ लेना देना नहीं है। वह समझाने में लगी है कि किसान पंचायतों में जुटने वाली भीड़ किसानों की नहीं बल्कि विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं की है। उसका कहना है कि अगर ये लोग किसान होते तो आंदोलन का असर उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी होता। पिछड़ों और सवर्ण बहुल गांव में जाने से आंदोलन के बारे में सुर बदले दिखते हैं। इसमें दो राय नहीं है कि पिछड़ों के बीच बीजेपी की पकड़ अभी भी मजबूत बनी हुई है। दूसरी ओर, किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं ने शुरुआत में गलती की थी। उन्होंने तब किसान की जगह खाप पंचायतें आयोजित कीं और यह उनके पक्ष में नहीं गया। अब किसान नेता सतर्क हैं और वे किसी भी कीमत पर इसे किसान आंदोलन ही बनाए रखना चाहते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आंदोलन के जाति विशेष का होने का संदेश न जाए।

आंदोलन का भविष्य
वर्ष 2019 और आज की चुनावी परिस्थितियों के बीच एक अंतर भी है। बीएसपी अकेले ही मजबूती से यहां चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसका जनाधार है। 2019 में मैंने जब इस इलाके का दौरा किया था तो यह साफ दिखता था कि बीएसपी समर्थित वोट चुनावी गठजोड़ के कारण एकजुट होकर महागठबंधन के साथ गया था। इस बार ऐसी संभावनाएं बहुत कम हैं।
2019 में मुसलमानों के सामने भी कोई उलझन नहीं थी क्योंकि बीजेपी का मुकाबला सीधे महागठबंधन से था। इस बार ऐसी स्थिति नहीं है। किसान आंदोलन इस क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित जरूर कर रहा है, लेकिन सामाजिक समीकरण बहुत उलझे हुए हैं। फिर भी यहां चुनावी जंग तीखी भी होगी और रोचक भी। यह भी तय है कि चुनावी नतीजे ही तय करेंगे कि किसान आंदोलन सफल रहा या असफल।

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