Categories
पर्यावरण

कुदरत के नजारे – कुमारी कंदम : किंगडम ऑफ अर्थ


जब अटलांटिस पिरामिड को गूगल अर्थ से देखा गया तो पश्चिम में हल्ला मच गया कि उन्होंने प्लेटो द्वारा वर्णित स्वर्ग को ढूंढ निकाला किंतु इधर कुछ खोजों में वह थ्योरी पलटनी शुरू हो गयी है, अटलांटिस में प्राप्त रथ, मूर्तियाँ और मन्दिर और भौगोलिक अवस्थित कुछ और कहानी कह रहे हैं, भारत भूमि का एक हिस्सा जो मेडागास्कर से लेकर आस्ट्रेलिया तक फैला था उस पर पल्लवित भारतीय संस्कृति और सभ्यता का उल्लेख और भी समीचीन हो जाता है जब हम किंगडम ऑफ़ अर्थ अर्थात कुमारी कंदम की बात करते हैं । कुमारी कंदम मेडागास्कर से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक आप्लावित एक भूभाग है जिसका जिक्र स्कन्द पुराण में मिलता है।

हिन्द महासागर के पानी में डूबे प्राचीन भूमि के भाग का जिक्र पूर्व के कई तमिल साहित्य लेखों में आता रहा है। कहानी के अनुसार एक भूमि का भाग था जहाँ पाण्ड्य राजाओं का शासन था जो बाद में समुद्र में डूब गया था। अग्रेज़ी भूवैज्ञानिक फिलिप स्कालेटर ने लीमर नामक बदंर के जीवाश्मों को लेकर एक अध्ययन किया जिसमें उसने लीमर बन्दर के जीवाश्मों को मेडागास्कर द्वीप और भारत की भूमि से प्राप्त किया पर उसे हैरानी तब हुई जब उसे अफ्रीका की मुख्य भूमि में लीमर बन्दर का कोई जीवाश्म नहीं मिला। क्योंकि मेडागास्कर द्वीप भारत की तुलना में अफ्रीका से काफी पास है। अपनी पुस्तक द मैमल्स ऑफ़ मेडागास्कर में वह लिखता है कि मेडागास्कर और भारत कभी जुड़े हुए थे यानी ये दोनों एक बड़े महाद्वीप का हिस्सा थे। इसे पढ़ते हुए आप इस बात का ध्यान रखिये कि रामायण की कथा में बंदरों ने भगवान राम की सहायता की थी। इस बात का भी ध्यान रखिये कि माया सभ्यता और होंडुरास पर हनुमान जी के पुत्र मकरध्वज का शासन था। फिलिप के इस सिद्धांत को उस समय के वैज्ञानिक समुदाय में मान्यता प्राप्त हुई क्योंकि सिद्धांत इस बात की पुष्टि कर रहा था कि हो सकता है लीमर बन्दर प्राचीन समय में मेडागास्कर से भारत या भारत से मेडागास्कर चले आयें हों। इस क्षेत्र को फिलिप ने लेमुरिया का नाम दिया पर हम इसे ग्रेटर किष्किंधा कह सकते हैं।

आज से 14,500 वर्ष पहले समुद्र का जलस्तर 100 मीटर कम था और आज से 10,000 साल पहले ये 60 मीटर तक कम था । जैसे जैसे ग्लोबल वार्मिंग की दर 12,000 से 10,000 वर्ष पहले बढ़ी है यह समय समय पर बाढ़ के रूप में सामने आई है । इसके कारण से भारत और श्रीलंका के निचले इलाकों के आसपास की बेहद प्राचीन बस्तियाँ पानी में डूब गयी।

हमें पढ़ाया गया कि आदि मानव की उत्पत्ति अफ्रीका में हुयी पर बिना लेमुरिया का अध्ययन किये इस तथ्य को कैसे सत्य माना जा सकता है। मेडागास्कर से चलकर अफ्रीका को निवास स्थान बना लेना बड़ी बात नही जबकि लेमुरिया यानी कुमारी कंदम डूब गया हो।

जीवन कई परतों में विकसित हुआ किसी एक परत के आधार पर मनमुताबिक विश्लेषण करना और श्रुति तथा पौराणिक आख्यायनों को मिथ्या बताना किसी भी लिहाज से सही नही कहा जा सकता। आवश्यकता है स्थापित तथ्य नये शोध के के प्रकाश में अवलोकन किया जाए।
✍🏻पवन विजय

“कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत के हर कोने को कुदरत ने खूबसूरती से संवारा है और यहीं वजह है कि दुनियाभर से लोग इन नजारों को देखने के लिए आते हैं. केरल (Kerala) के इडुक्की जिले में खिलने वाले नीलकुरिंजी फूल (Neelakurinji Flowers) भी इनमें से एक हैं, जिन्हें देखने के लिए लोग लाखों रुपये खर्च कर पहुंचते हैं. इन दिनों इडुक्की जिला नीलकुरिंजी फूलों से गुलजार हो गया है और शालोम पहाड़ी प्राकृतिक खूबसूरती में चार चांद लगा रही है।
नीलगिरी नाम भी इसी फूल के कारण पड़ा है।

नीलकुरिंजी फूल (Neelakurinji Flowers) बेहद ही दुर्लभ हैं और ये 12 सालों में सिर्फ एक बार खिलते हैं. नीलकुरिंजी एक मोनोकार्पिक पौधा होता है, जो खिलने के बाद जल्दी ही मुरझा भी जाता है और फिर इसे दोबारा खिलने में 12 साल का लंबा समय लग जाता है।

नीलकुरिंजी फूल (Neelakurinji Flowers) की खास बात है कि ये सिर्फ भारत में ही खिलते हैं. नीलकुरिंजी फूल आमतौर पर केरल के अलावा तमिलनाडु में भी अगस्त से लेकर अक्टूबर तक खिलते हैं।

नीलकुरिंजी फूल (Neelakurinji Flowers) का भारत में एक सांस्कृतिक महत्व भी है. केरल की मुथुवन जनजाति के लोग इस फूल को रोमांस और प्रेम का प्रतीक मानते हैं. कथाओं के मुताबिक इस जनजाति के भगवान मुरुगा ने इनकी जनजाति की शिकारी लड़की वेली से नीलकुरिंजी फूलों की माला पहनाकर शादी की थी. इसी तरह पश्चिमी घाट की पलियान जनजाति के लोग उम्र का हिसाब इस फूल के खिलने से लगाते हैं.

नीलकुरिंजी फूल (Neelakurinji Flowers) के लिए कुरिंजीमाला नाम का संरक्षित क्षेत्र यानी सैंक्चुअरी भी है, जो मुन्नार से 45 किलोमीटर दूर है. 2006 में केरल के जंगलों का 32 वर्ग किलोमीटर इलाका इस फूल के संरक्षण के लिए सुरक्षित रखा गया था. इसे कुरिंजीमाला सैंक्चुअरी का नाम दिया गया.”

इतना सब कुछ ठीक है… लेकिन आपने ऊपर ध्यान दिया पहाड़ी के नाम के ऊपर ??
पहाड़ी का नाम है “शालोम पहाड़ी” .. याने Shalom Hill … मलयालम में “Shalomkunnu” .. मलयालम में kunnu मतलब पहाड़ी … और Shalom मतलब ??
ये शब्द कहाँ से आया ??

जैसे “रामसेतु” एडम ब्रीज हो गया वैसे ही ये….!!

अरे जब जीसस बाबा मुरुगन स्वामी बन गए तो उनकी पहाड़ी को “शालोम” होना ही था।

शालोम हिल्स … इस नाम से बहुते हाई फाई मिशनरी स्कूल भी है। गुड़गांव वाला तो कुछ ज्यादा ही नामी है।
उफ्फ्फ… ये गोड्स ओन कंट्री।
✍🏻गंगवा
खोपोली से।

मेरु तथा अन्य नगर-रामायण में घर का एक प्रकार मेरु कहा है-वाल्मीकि रामायण– किष्किन्धा काण्ड-सर्गः३३-

विंध्य मेरु गिरि प्रख्यैः प्रासादैः नैकभूमिभिः। ददर्श गिरि नद्यः च विमलाः तत्र राघवः ॥४-३३-८॥

वाल्मीकि रामायण, सुन्दर काण्ड, नवमः सर्गः ॥५-९॥

मेरु मन्दर संकाशैरुल्लिखद्भिरिवाम्बरम्। कूटागारैः शुभाकारैः सर्वतःसमलङ्कृतम्॥५-९-१४॥

अयोध्या काण्ड, त्रिसप्ततितमः सर्गः-

तं हि नित्यं महाराजो बलवन्तं महाबलः। उपाश्रितो ऽभूद्धर्मात्मा मेरुर्मेरु-वनं यथा॥२-७३-१५॥

मेरु नगर का भी एक प्रकार है। मेरु भवन में घर की छत चतुष्कोण मेरु जैसी होती है। बर्मा का पैगोडा भी वैसा ही बनता था। चपटे मेरु जैसी भूमि पर बना नगर भी मेरु है। केन्द्र के उच्चतम स्थान से चार दिशाओं में जल का निकास होगा। मद्द्य एशिया मे मेरु का मीर हो अया है। मीर का अन्य अर्थ प्रथम या सर्वोच्च अधिकारी भी है। अजय-मेरु, जैसलमेर, कमलमीर, चीन तथा थाइलैण्ड के सुमेरु।

उरु-पृथ्वी की गोल सतह जैसी भूमि पर बना नगर उरु है। सर्वोच्च केन्द्र स्थान से वृत्त की परिधि दिशा में जल निकास होता है-कई त्रिज्या की दिशा में। सबसे पहले विष्णु ने उरु नगर बनाये थे। बाद में वरुण ने भी उरु बनाया। यह इराक का सबसे पुराना नगर उर था जहां की उर्वशी थी। दक्षिण भारत के नगरों के नाम उरु या उर हैं-एल्लुरु, नेल्लोर, चित्तूर, तंजावुर, बंगलूरु, मंगलूरु आदि।

उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८), शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग् वेद १/९०/१)

श्री यन्त्र की तरह बना नगर श्रीनगर है। यह भारत में ३ प्रसिद्ध थे-श्रीविद्यानगर (नाम बदल कर विजय नगर होने के बाद मुस्लिम आक्रमण में नष्ट हो गया।

पुर-परस्पर लम्ब रूप सड़कों का जाल होने पर पुर कहलाता है। आयत की एक भुजा से विपरीत भुजा की तरफ जल का निकास होता है। नदी किनारे नगरों के लिए यह उपयुक्त है। इन्द्र ने बहुत से पुर बनाये थे। उनको वास्तोष्पति, पुरन्दर कहते हैं। चीन का पुराना पेकिंग भी एक पुर है।

वज्र नगर-सबसे पुराना वज्र नगर यादवों ने इराक में बनाया था, जिसे अरबी में बसरा (वज्र) कहते हैं। नदी मे दोनों तरफ नगर बनाने के लिये यह उपयुक्त है। ताश खेल का डायमण्ड आकार या आयत जैसा होगा जिसका कर्ण नदी का प्रवाह है। चेक राज्य का प्रयाग (प्राग) भी इसी प्रकार का है। यह नदियों के संगम पर होने से प्रयाग कहलाता है, जैसे भारत के प्रयाग।
✍🏻अरुण उपाध्याय

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
holiganbet güncel
imajbet güncel
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betyap güncel
betpark giriş
betpark giriş
betyap giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
holiganbet giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betwoon giriş
betwoon giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betwoon giriş
betwoon giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş