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अफगानिस्तान, पाकिस्तान और तालिबान

के.पी. नैयर

जहां तालिबान ने अफगानिस्तान को तूफानी रफ्तार से अपने कब्जे में लेकर सत्ता हथिया ली वहीं पाकिस्तान अपने पुराने काम पर लग गया है, जिसे वह सबसे अच्छी तरह करना जानता है यानी दलाली। वैसे तो पाकिस्तान की जो भी प्रासंगिकता रही है, उसके मुताबिक दलाल कहना भी आंशिक रूप से न्यायोचित होगा।

भारत में बहुप्रचारित नजरिए के विपरीत, काबुल में तालिबान नीत सरकार बनने से दुनियाभर के मुल्क पाकिस्तान की आलोचना करने की बजाय नजदीकियां बढ़ाना चाहेंगे। पिछले साल दोहा में भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तालिबान के बीच वार्ता के बाद अफगानिस्तान से पश्चिमी ताकतों का हताशा भरा चरणबद्ध पलायन शुरू हुआ था, लेकिन इस समझौते का इस्लामिक सशस्त्र गुट की मंशा पर तनिक भी असर नहीं हुआ, उन्होंने इसी महीने विधिवत चुनी हुई अफगान सरकार को बुहारकर एक तरफ कर दिया।

जब तक दोहा में हुई संधि की भावना याद रहेगी, भले ही मात्रा कितनी भी कम हो, तब तक अमेरिका-तालिबान संबंध रहेंगे, लेकिन वहीं तक जहां तक तालिबान को भाएंगे। अमेरिकियों को तालिबान से कभी फायदा मिलने वाला नहीं है और यह बात वे बखूबी जानते हैं। जहां तक भविष्य में नज़र जाती है, पश्चिमी और पूरबी ताकतों के लिए अफगानिस्तान की राह पाकिस्तान से गुजरती है। यूके और जापान उदाहरण हैं। इस नियम का अपवाद सिर्फ रूस, चीन और ईरान हैं, यही वे मुल्क हैं जिन्हें तालिबानीकरण हुए अफगानिस्तान में महत्व मिलेगा।

पाकिस्तान का वर्तमान परिदृश्य बहुत कुछ वैसा है, जो 9/11 आतंकी हमले के बाद था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने आखिरी समय सीमा देते हुए कहा था ‘हर क्षेत्र से, हर मुल्क को अब फैसला लेना होगा कि वह हमारे साथ है या फिर आतंकियों की तरफ’। पाकिस्तान ‘हमारे साथ’ वाले पाले में जाने को पहले ही उत्साही था। कहा जाता है कि तत्कालीन विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल ने जनरल परवेज़ मुशर्रफ को फोन पर साफ किया था कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर अल कायदा द्वारा किए हमलों की सजा देने की राह में पाकिस्तान के पास साथ देने के अलावा कोई चारा नहीं है।

सच तो यह है कि इस ताड़ना की कतई जरूरत नहीं थी, मुशर्रफ तो खुद अमेरिका के साथ पुनः गलबहियां डालने को उत्सुक थे। इससे पहले जॉर्ज हर्बर्ट वॉकर बुश के राष्ट्रपति काल के दौरान, एक दशक तक पाकिस्तान को कटु शिकायत रही थी कि अफगानिस्तान में सोवियत संघ की घुसपैठ के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह करवाने को पाकिस्तान का इस्तेमाल बतौर एक एजेंट किया गया और सोवियत सेना की वापसी के बाद तज दिया। लेकिन 9/11 के बाद पाकिस्तान पुनः अमेरिका का दलाल बन बैठा।

जब 9/11 की घटना के बाद तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा वाशिंगटन आए थे (उन दिनों मैं अमेरिका से रिपोर्टिंग करता था) उन्होंने मुझे बताया कि वे अपने अमेरिकी वार्ताकार से पाकिस्तान की शिकायत नहीं करने वाले, इसका कोई असर नहीं होगा, क्योंकि पाकिस्तान की मदद के बिना अफगानिस्तान में अमेरिकी अभियान संभव नहीं है, फिर भले ही आतंकियों की जड़ आईएसआई क्यों न हो।

बहुत से भारतीय, जो अपने देश की आधिकारिक कूटनीति प्रतिपादित करते थे, यदि उन्हें याद दिलाऊं तो तिलमिला उठेंगे कि बृजेश मिश्रा की इस लीक, जिसका खुद वाजपेयी सरकार के अंदर विरोध था, का भारत को फायदा हुआ था। वाजपेयी सरकार के वक्त परमाणु परीक्षणों की वजह से भारत पर अमेरिका ने अनेकानेक प्रतिबंध लगा दिए थे, ठीक इसी कारण से पाकिस्तान पर भी लागू थे। हालांकि इनमें अधिकांश को वर्ष 2000 में बिल क्लिंटन की भारत यात्रा से पहले बतौर सद‍्भावना संकेत उठा लिया गया था, लेकिन बाकी के शायद अनिश्चितकाल तक बने रहते।

लेकिन अफगानिस्तान पर चढ़ाई की गर्ज से बुश और पॉवेल पाकिस्तान पर लगाए गए तमाम प्रतिबंध हटवाना चाहते थे, क्योंकि इनके कायम रहते अमेरिका अलकायदा के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर सकता था। आज की तरह, तब भी ‘काबुल का रास्ता पेशावर होकर’ जाता था (वहां स्थित पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय को भरोसे में लिए बिना कुछ नहीं हो सकता) और ‘पेशावर’ तक पहंुच प्रतिबंधों की वजह से संभव नहीं थी। लिहाजा बुश के पास पाकिस्तान और भारत, दोनों पर लगे प्रतिबंध एक-साथ उठाने के सिवा कोई राह नहीं थी।

बृजेश मिश्रा का मानना था कि पाक-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति या संसद से शिकायत करने से दोनों मुल्कों पर लगे प्रतिबंध उठाने की प्रक्रिया लटक जाती। बल्कि उन्होंने खास आरके मिश्रा को गुप्त वार्ता के लिए पाकिस्तान भेजा ताकि दोनों मुल्क प्रतिबंध उठवाने को समन्वित दबाव बना सकें।

भारत के लिए, राष्ट्रपति क्लिंटन की यात्रा से पूर्व प्रतिबंध उठाने को सीनेटर सैम ब्राउनबैक द्वारा बनाए गए ‘ब्राउनबैक एमेन्डमेंट्स 1 और 2’ भारत-अमेरिका के बीच बराबर की जीत वाले थे। सच तो यह है कि ब्राउनबैक चाहते थे कि पाकिस्तान पर ‘प्रैस्लर एमेंडमेंट’– जो कि अमेरिका के हाथ में पाकिस्तान के लिए चाबुक था– समेत तमाम प्रतिबंध हटा लिए जाएं। लेकिन ब्राउनबैक की सिफारिशें स्वीकार करने के अगले ही दिन मुशर्रफ के सैनिक विद्रोह से प्रैस्लर प्रतिबंध हटाने का फैसला टालना पड़ा था। विश्व में कहीं भी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार का तख्तापलट करने पर अमेरिका नई सत्ता पर प्रतिबंध लगाता आया है।

अफगानिस्तान में बड़ी पश्चिमी ताकतों का दलाल वाला रुतबा पुनः हासिल करने को उम्मीद है पाकिस्तान त्रि-आयामी रणनीति अपनाएगा। एक, खुद को भी आतंकवाद का शिकार दर्शाना और अमेरिकी सत्ता-गलियारों में इस दावे पर यकीन करने वाले मिल भी जाएंगे। दूजा, अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में शरणार्थियों की संभावना दिखाकर अमेरिका से पैसे ऐंठना, जो न केवल इन शरणार्थियों की मदद करने बल्कि कट्टरता निवारण करने के नाम पर होगा, तीसरा, कोविड-19 महामारी और अफगानिस्तान से व्यापार में आई कमी से बनी आर्थिक बदहाली का वास्ता देना, ताकि पश्चिमी आर्थिकियों से बेहतर व्यापारिक रिश्ते बन पाएं।

लेकिन क्या यह रणनीति कारगर होगी? यदि पाकिस्तान के 75 साल के इतिहास को देखें, तो रणनीति अपना ध्येय प्राप्त कर लेगी। जब तक ट्रंप ने पाकिस्तान को मिलने वाली अधिकांश सहायता बंद नहीं की थी, उससे पहले 16 सालों में पाकिस्तान को कम से कम 33 बिलियन डॉलर की अमेरिकी मदद मिली थी। सहायता करने में अन्य सहयोगी देश भी ज्यादा पीछे नहीं थे। इस बार जैसी दोस्ती रूस-पाकिस्तान के बीच है वैसी इतिहास में कभी नहीं रही, और रूस तालिबान पर पाक-सेना के प्रभाव का फायदा उठाना चाहेगा। चीन अब वैश्विक आर्थिक शक्ति है और वह भी पाकिस्तान की माली मदद करेगा।

यदि कुछ भी कारगर नहीं रहा तो फिर हमेशा की तरह पाकिस्तान के पास ब्लैकमेल करने वाला पैंतरा तो है ही। पाकिस्तान परमाणु अस्त्र संपन्न देश है, इसलिए यह डरावा दिखाना कि कहीं आतंकियों के हाथ न पड़ जाएं, यह भय पश्चिमी जगत को सदा सताता आया है। पाकिस्तान का यह कहना कि जिहादियों द्वारा उसकी 20 करोड़ आबादी वाली जमीन उर्वरक हो सकती है, यह धमकी भी प्रत्येक पश्चिमी नागरिक की रीढ़ में सिहरन पैदा करने को काफी है। काबुल में हुए सत्ता-परिवर्तन के आलोक में पाकिस्तान अपने इस ‘सरमाए’ को कितना भुना पाता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रधानमंत्री इमरान खान अपने पत्ते कितनी शातिरता से चलते हैं।

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