भारतीय ज्ञान का खजाना – भारत की समृध्द खाद्य संस्कृति

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अभी तक आप यही जानते होंगे कि आलू विदेशीयों (पुर्तगालियों) द्वारा लाई गई फसल है, लेकिन अत्रि विक्रमार्क जी का मानना कुछ और है –

आलू Potato

आलुः (संस्कृत)

पिण्डालु = पिण्डाकार आलुः(गोल आलु? पहाड़ी घुइयां) राजनिघण्टु।

“पिण्डालुर्मधुरः शीतः मूत्रकृच्छ्रविनाशनः।

दाहशोषप्रमेहघ्नो वृष्यः सन्तर्पणो गुरुः”

और भी कहा गया है कि आलु कफ कारक है किन्तु वात कारक अधिक होता है।

चरकसंहिता सूत्रस्थान में #आलुकानि च सर्वाणि…(२७.९९) ऐसा उल्लेख है जिसे

आयुर्वेददीपिका में आलुकानि पिण्डालुकादीनि कहकर स्पष्ट कर दिया गया है। भावप्रकाश मध्यम खण्ड में भी पिण्डालु है।
सुश्रुत-संहिता सूत्र स्थान अध्याय ४६ में
पिण्डालुकमध्वालुक-हस्त्यालुककाष्ठालुकशङ्खा लुकरक्तालुक……… कन्दप्रभृतीनि ॥२९८॥
सुश्रुत ने आलू के विविध प्रकार बताये : पिण्डालु (देशी आलू), मध्वालु (मीठा आलू/पहाड़ी आलू), हस्त्यालु (बण्डा), काष्ठालु (कचालू, कड़ा होने के कारण विलम्ब से पकने वाला), रक्तालु (रतालू)

शङ्खालु (शकरकन्द)-> महिष कन्द के अर्थ में शंखालु दिया है,

शंखाकृति कन्द को शङ्खालु कहा गया. यह लक्षण शकरकन्द में मिलता है.
{ #सुश्रुत का काल तो ज्ञात ही होगा सबको }

भारत में आलू कब से खाया जा रहा है, यह प्रश्न प्रायः उठाया जाता है और ज्ञान दिया जाता है कि आलू भारतीय मूल का नहीं है। बहकावे में मत आइये किसी के, हर दिन आलू खाइये…
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

कुछ समय पहले मैंने चावल पर पोस्ट लिखी थी, अब प्रशांत पोळ जी खाद्य परम्परा पर कुछ और बातें बता रहे हैं-

समूचे विश्व को मोह लेने वाला ‘डोसा’ अथवा ‘मसाला डोसा’ (दोसा) नामक पदार्थ कितना पुराना है..? इस बारे में निश्चित रूप से कोई नहीं बता सकता. परन्तु लगभग दो हजार वर्ष से अधिक पुराना है, यह तो निश्चित है. अर्थात इतिहास के ज्ञात साधनों एवं तमाम दस्तावेजों की पड़ताल करते हुए पीछे चलें, तो हमें पता चलता है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अत्यंत स्वादिष्ट यह ‘डोसा’ दक्षिण भारत में खाया जाता था.

यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि भारतीय संस्कृति की संपन्नता में केवल वास्तुशास्त्र ही नहीं… केवल कला एवं नाट्य क्षेत्र नहीं… केवल विज्ञान नहीं… केवल अध्यात्म नहीं… अपितु समृध्द खाद्य संस्कृति भी मौजूद थी. अर्थात जीवन के सभी अंगों की परिपूर्णता थी.

खाद्य संस्कृति के बारे में हमारे पूर्वजों ने बहुत ही गहराई से विचार किया हुआ है. आधुनिक आहारशास्त्र जिन बातों को मजबूती से रखने का प्रयास करता है, वह सभी बातें कई हजार वर्ष पहले भारतीय आहारशास्त्र ने बताई हुई हैं. ‘आहार एवं शरीर का, आहार एवं मन का, आहार एवं चित्तवृत्ति का आपसी अंतर्संबंध होता है’ यह बात हमारे पूर्वजों ने कई हजार वर्षों पूर्व लिख रखी है. यह निश्चित रूप से अदभुत है. प्राचीनकाल में उन्नत माने जाने वाले ग्रीक, इजिप्त अथवा चीनी संस्कृतियों में ऐसी खाद्य संस्कृति दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती. दुर्भाग्य से हमें अपनी ही उन्नत, स्वास्थ्ययुक्त एवं परिपूर्ण आहार प्रणाली की कद्र ही नहीं है.

ऐसा अनुमान है कि ‘भगवत गीता’ नामक ग्रन्थ लगभग साढ़े पाँच से छः हजार वर्ष प्राचीन है. यहाँ तक कि पाश्चात्य विद्वान भी अपने शोध एवं सूत्रों के हवाले से ‘गीता’ को लगभग ढाई से तीन हजार वर्ष पहले लिखी गई है, ऐसा मानते हैं. इस गीता के सत्रहवें अध्याय में ८, ९ और १० क्रमांक के श्लोक हैं, जो हमारे जीवन पर आहार के प्रभाव एवं परिणामों के बारे में बताते हैं. सात्विक, राजसी एवं तामसिक, इस प्रकार के तीन स्वभाव वाले विभिन्न व्यक्तियों के शारीरिक पोषण के लिए तीन प्रकार के आहार ग्रहण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. और इन्हीं तीन मानसिक वृत्तियों का अनुसरण करके उनके कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं, ऐसा साफ परिलक्षित होता है..!

उदाहरणार्थ आठवाँ श्लोक देखें.. –

आयु सत्त्वबलारोग्य सुखाप्रीतिविवर्धना, रस्याः,
स्निग्धाः, स्थिराः, हृदयः, आहाराः, सात्त्विकप्रियाः ||८||

अर्थात आयुष्य, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख एवं प्रसन्नता में वृद्धि करने वाले रसयुक्त, स्निग्ध, लंबे समय तक खराब न होने वाले एवं मन को रुचिकर लगने वाले आहार सात्त्विक वृत्ति के लोगों के प्रिय होते हैं.

एक परिपूर्ण, वैज्ञानिक एवं प्राचीन खाद्य संस्कृति की विरासत वाला हमारा देश, दुनिया का एकमात्र देश है. ऋग्वेद के समय से ही विभिन्न ग्रंथों में आहारशास्त्र के उल्लेख मिलते हैं. ‘यजस्वम तत्रं त्वस्वाम’ (अपने शरीर का पोषण करके उसका सम्मान करें) ऐसे उल्लेख अनेक स्थानों पर हैं. भोजन में गेहूँ, जौ, दूध का समावेश होना चाहिए, ऐसे भी वर्णन ग्रंथों में आते हैं. अथर्ववेद के छठवें अध्याय के १४०/२ सूक्त में कहा गया है कि चावल, जौ, उडद एवं तिल्ली से बने पदार्थ एक योग्य आहार हैं.’

इन लिखे हुए ग्रंथों का समर्थन करने वाले अनेक तथ्य मेहरगढ़, हडप्पा और मोहन जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त भी हुए हैं. इनके अनुसार लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज गेहूँ, जौ, दूध इत्यादि से बने हुए पदार्थ खाते थे. विशेष बात यह है कि भोजन में मसालों का उपयोग किए जाने के सबूत भी उत्खनन में मिलते हैं. दालचीनी, कालीमिर्च का उपयोग भारतीय भोजन में कई हजार वर्षों पहले से किया जा रहा है.

मेहेरगढ़ वर्तमान पाकिस्तान में बलूचिस्तान स्थित एक छोटा सा गाँव है. वर्ष १९७४ में वहाँ सबसे पहले ‘जीन-फ्रान्कोईस जरीगे’ नामक फ्रांसीसी पुरातत्व वैज्ञानिक ने उत्खनन शुरू किया था, और उसे ईस्वी सन से सात हजार वर्ष पूर्व के एक गाँव के अवशेष प्राप्त हुए. महत्त्वपूर्ण बात यह कि इस उत्खनन में विश्व की सबसे प्राचीन कृषि के बहुत ही ठोस सबूत प्राप्त हुए. अर्थात आज तक के उपलब्ध आंकड़ों एवं सबूतों के आधार पर स्पष्ट रूप से ऐसा कहा जा सकता है कि विश्व में ‘खेती’ की संकल्पना सबसे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में आरम्भ हुई थी.

विभिन्न प्रकार की दालें (मसूर, तुअर इत्यादि) उगाना, गेहूँ का उत्पादन करना, इस गेहूँ को पीसकर उसका आटा तैयार करना एवं उस आटे से भिन्न-भिन्न पदार्थ तैयार करना… यह सब आठ-नौ हजार वर्ष पहले से ही भारतीयों को ज्ञात था.

विश्व की खाद्य संस्कृति को भारत का सबसे बड़ा योगदान कौन सा है..? जी हाँ… मसालों का. आज से लगभग दो-तीन हजार वर्ष पूर्व भारत से बड़े पैमाने पर मसालों का निर्यात किया जाता था, इसके स्पष्ट प्रमाण अब मिल चुके हैं.

इस लेखमाला के ‘भारतीय संस्कृति के वैश्विक पदचिन्ह -१’ नामक आलेख में इजिप्त के बेरेनाईक नामक उत्खनन प्रकल्प का उल्लेख आया हुआ है. इस बेरेनाईक बंदरगाह की खुदाई के दौरान एक पेटी में आठ किलो काली मिर्च प्राप्त हुई थी. कार्बन डेटिंग के अनुसार यह काली मिर्च पहली शताब्दी के ईस्वी सन ३० से ईस्वी सन ७० के बीच की निकली. यह तथ्य इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि वर्षों पहले भारत से मसालों का निर्यात हुआ करता था.

काली मिर्च, दालचीनी, तेजपान, खड़ा धनिया इत्यादि मसालों के पदार्थों की खोज भारतीयों ने हजारों वर्ष पहले ही कर ली थी. आगे चलकर इन मसालों की मदद से भारत में विभिन्न भौगोलिक प्रदेशों के अनुसार अलग-अलग पदार्थ तैयार होने लगे. यह पदार्थ अत्यंत स्वादिष्ट थे. इसीलिए हजारों वर्ष पूर्व उस कालखंड में भी हमारे भारतीय व्यंजनों का स्वाद विदेशी यात्रियों को मोहित कर लेता था. मूलतः ब्रिटिश ‘प्रोफ़ेसर अंगस मेडिसन’, हॉलैंड के ग्रोंइंगेन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हुआ करते थे. उन्होंने विश्व की अर्थव्यवस्था के बारे में एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है, ‘द वर्ल्ड इकॉनमी – ए मिलेनियम पर्सपेक्टिव’. विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में इस ग्रन्थ को अच्छा खासा प्रमाण माना जाता है. उन्होंने इस ग्रन्थ में लिखा है कि, आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले भारत का जो माल यूरोप जाता था, वह इटली के दो शहरों – जिनोया और वेनिस के जरिये जाता था. और मसालों के इस व्यापार के आधार पर यह दोनों शहर उस कालखंड में यूरोप के सर्वाधिक अमीर शहरों में गिने जाते थे. जिन वस्तुओं के कारण इन शहरों को धनलाभ प्राप्त होता था, उनमें प्रमुखता से थे ‘भारतीय मसाले’…!

हालाँकि यूरोप में भारतीय मसाले मुख्यतः जानवरों का माँस पकाकर बनाए जाने वाले माँसाहारी व्यंजनों के लिए उपयोग में आते थे. शाकाहारी पदार्थ बनाना पश्चिमी लोगों को आता नहीं था. इसके दो प्रमुख कारण थे – पहला तो यूरोप की जलवायु विषमता के कारण वहाँ वनस्पतियों का उत्पादन तुलनात्मक रूप से कम था और दूसरा कारण यह कि उन यूरोपियन लोगों को शाकाहारी पदार्थों की विविधता के बारे में ज्ञान ही नहीं था.

आज से लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व मैं अपने एक क्लायंट से मिलने ज़ुरिक (स्विट्ज़रलैंड) गया था. हमारी भेंट के पश्चात, वह मुझे वहाँ स्थित एक भारतीय रेस्टोरेंट में ले गया. वहाँ पर बातचीत करते समय उसने मुझसे कहा कि, कुछ दिनों पूर्व उसने शाकाहारी बनने का निर्णय लिया. चूंकि इसके पहले कभी शाकाहारी भोजन ज्यादा लिया नही था, इसलिए पहला प्रयोग तीस दिनों के लिए करने का तय किया. परन्तु केवल पाँच – छः दिनों के भीतर ही वह शाकाहारी भोजन से ऊब गया. फिर अगले दस – पंद्रह दिन उसने किसी तरह व्यतीत किए. अंततः तीन सप्ताह के बाद उसने अपना शाकाहारी होने का निर्णय बदलते हुए पुनः माँसाहार शुरू कर दिया.

मैंने पूछा, “ऐसा क्यों..?”

उसने कहा, “रोज-रोज इस प्रकार के घासफूस खाकर बेहद ऊब गया था… प्रतिदिन कच्ची सब्जियाँ, उबली हुई सब्जियाँ और उनका सलाद कोई व्यक्ति आखिर कितने दिन खा सकता है..?”

मैंने कहा, “अरे भाई, केवल कच्ची और उबली हुई सब्जियाँ ही क्यों खाना? हजारों प्रकार के पदार्थ हमारी शाकाहारी पद्धति में हैं. अब यहाँ इस रेस्टोरेंट में ही देख लो…”

उसने कहा, “हाँ सही है, परन्तु ये बात मुझे पहले कहाँ पता थी..? मुझे तो शाकाहारी भोजन का अर्थ कच्ची और उबली हुई सब्जियाँ ही मालूम था. इन सब्जियों में भारतीय मसाले डालकर उसे पावरोटी के साथ खाने लायक स्वादिष्ट पदार्थ बना सकते हैं, यह बात हम पश्चिमी लोगों को कहाँ ज्ञात थी..?”

भारत ने अत्यंत रुचिकर, स्वादिष्ट एवं पोषक पद्धति की खाद्य संस्कृति समूचे विश्व को प्रदान की है. आज विश्व का ऐसा कोई देश नहीं है, जहाँ यदि जनसँख्या पचास हजार भी है, तब भी वहाँ एकाध भारतीय रेस्टोरेंट तो अवश्य मिलेगा. चीनी और इटैलियन खाद्य संस्कृति के समान ही, बल्कि कई मामलों में इनसे काफी अधिक ही, भारतीय खाद्य संस्कृति विश्व के कोने-कोने में पसर चुकी है. डोमिनोज़ जैसी कंपनियों ने इटैलियन पिज्ज़ा और पास्ता को विश्वव्यापी बनाया है. परन्तु यह भारतीयों का दुर्भाग्य है कि इडली, दोसा, वडा-पाव, छोले-भठूरे जैसे अनेक व्यंजनों को बनाने वाली विश्वव्यापी रेस्टोरेंट्स की श्रृंखला हम भारतीयों को निर्माण करना नहीं आया.

जबकि भारतीय व्यंजनों में जबरदस्त विविधता है… केवल दक्षिण भारतीय खाद्य पदार्थ कहने से काम नहीं चलता. इसमें भी आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल के व्यंजन भिन्न-भिन्न हैं. डोसा और वडे यह दो-तीन हजार वर्ष पहले से ही भारत में प्रचलित हैं. परन्तु इडली नामक व्यंजन भारत का नहीं है. इडली व्यंजन भारतीयों का तो है, लेकिन भारत से बाहर का. जावा-सुमात्रा (इंडोनेशिया) के भारतीय राजाओं के दक्षिण भारतीय रसोईयों ने हजार-बारह सौ वर्ष पहले फर्मेंटेशन पद्धति से इडली नामक व्यंजन को तैयार किया था. वह जावा-सुमात्रा होते हुए दक्षिण भारत पहुँचा और फिर समूचे विश्व में फ़ैल गया. बेल्लारी जिले के ‘शिवकोटीचार्य’ ने ईस्वी सन ९२० में कन्नड़ भाषा में लिखी हुई पुस्तक, ‘वड्डराधने’ में ‘इड्लीगे’ शब्द का उल्लेख किया हुआ मिलता है.

‘इन्डियन करी’ नामक व्यंजन विश्व में अत्यधिक प्रसिद्ध है. विश्व की अनेक ‘सेलेब्रिटीज़’ को इस भारतीय करी के स्वाद का चस्का लगा हुआ है. ‘करी’ अर्थात भारतीय मसालों से बनने वाली ‘ग्रेवी’. यह ग्रेवी शाकाहारी और माँसाहारी, दोनों प्रकार के पदार्थों में उपयोग की जा सकती है. इस करी का इतिहास भी मनोरंजक एवं प्राचीन है. यह शब्द तमिल भाषा के ‘कैकारी’ नामक शब्द से बना है. तमिल में कैकारी का अर्थ है विभिन्न मसालों का मिश्रण करके बनी हुई सब्जी.

विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में भोजन से पहले प्रार्थना करने की परंपरा है. ईसाईयों, यहूदियों में यह परंपरा विशेष रूप से पालन की जाती है. भारतीयों में भी इस प्रार्थना परंपरा का महत्त्व है. हम अन्न को पूर्णब्रह्म मानते हैं. ‘भोजन’ नामक शब्द को सिद्ध करने की लिए पाणिनी ने धातुसूत्र लिखा हुआ है – ‘भुज पालन अयवहार्यो’. इसी को आगे बढ़ाते हुए, भोजन करने से पूर्व हम जो मन्त्र कहते हैं, वह है –

ॐ अन्नपते अन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः ।
मम दातारं तारिषऽ ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ।।
(यजुर्वेद – ११-८३)

अर्थ – हे (अन्नपते) अन्न के पति भगवन्, (नः) हमे (अनमीवस्य) कीट आदि रहित (शुष्मिणः) बलकारक (अन्नस्य) अन्न के भण्डार (देहि) दीजिये. (प्रदातारं) अन्न का खूब दान देने वाले को (प्रतारिष) दु:खो से पार लगाईये (नः). हमारे (द्विपदे चतुष्पदे) दोपायो और चौपायो को (ऊर्जं) बल (धेहि) दीजिये.

अथवा

ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्र्ह्यागनौ ब्रह्मणा हुतं |
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना || (गीता – अध्याय ४, श्लोक २४)
अर्थ – जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्मसमाधि हो गयी है उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है।

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शांति शांति शांति… (कठोपनिषद – कृष्ण यजुर्वेद)
अर्थ – परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए, हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें, हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो, हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।

कुल मिलाकर बात यह है कि हम भारतीय लोग एक परिपूर्ण, वैज्ञानिक एवं पोषक प्रकार की प्राचीन खाद्य संस्कृति के संवाहक हैं. इस संस्कृति पर गर्व करने में कोई समस्या नहीं है, अपितु हमारी यह प्राचीन खाद्य संस्कृति विश्व के समक्ष अधिकाधिक लाने की आवश्यकता है….!
✍🏻प्रशांत पोळ

चावल का जिक्र किसी भी बाइबिल में नहीं आता, ईजिप्ट की सभ्यता भी इसका जिक्र नहीं करती। पश्चिम की ओर पहली बार इसे सिकंदर लेकर गया और अरस्तु ने इसका जिक्र “ओरीज़ोन” नाम से किया है। नील की घाटी में तो पहली बार 639 AD के लगभग इसकी खेती का जिक्र मिलता है। ध्यान देने लायक है कि पश्चिम में डिस्कवरी और इन्वेंशन दो अलग अलग शब्द हैं और दोनों काम की मान्यता है। दूसरी तरफ भारत में अविष्कार की महत्ता तो है, लेकिन अगर पहले से पता नहीं था और किसी ने सिर्फ ढूंढ निकाला हो तो खोज के लिए कोई विशेष सम्मान नहीं मिलता।

इस वजह से पश्चिमी देशों के वास्को डी गामा और कोलंबस जैसों को समुद्री रास्ते ढूँढने के लिए अविष्कारक के बदले खोजी की मान्यता मिलती है लेकिन भारत जिसने पूरी दुनियां को चावल की खेती सिखाई उसे स्वीकारने में भारतीय लोगों को ही हिचक होने लगती है। कैंसर के जिक्र के साथ जब पंजाब का जिक्र किया था तो ये नहीं बताया था कि पंजाब सिर्फ भारत का 17% गेहूं ही नहीं उपजाता, करीब 11% धान की पैदावार भी यहीं होती है। किसी सभ्यता-संस्कृति में किसी चीज़ का महत्व उसके लिए मौजूद पर्यायवाची शब्दों में भी दिखता है। जैसे भारत में सूर्य के कई पर्यायवाची सूरज, अरुण, दिनकर जैसे मिलेंगे, सन (Sun) के लिए उतने नहीं मिलते।

भारतीय संस्कृति में खेत से धान आता है, बाजार से चावल लाते हैं और पका कर भात परोसा जाता है। शादियों में दुल्हन अपने पीछे परिवार पर, धान छिड़कती विदा होती है जो प्रतीकात्मक रूप से कहता है तुम धान की तरह ही एकजुट रहना, टूटना मत। तुलसी के पत्ते भले गणेश जी की पूजा से हटाने पड़ें, लेकिन किसी भी पूजा में से अक्षत (चावल) हटाना, तांत्रिक विधानों में भी नामुमकिन सा दिखेगा। विश्व भर में धान जंगली रूप में उगता था, लेकिन इसकी खेती का काम भारत से ही शुरू हुआ। अफ्रीका में भी धान की खेती जावा के रास्ते करीब 3500 साल पहले पहुंची। अमेरिका-रूस वगैरह के लिए तो ये 1400-1700 के लगभग, हाल की ही चीज़ है।

जापान में ये तीन हज़ार साल पहले शायद कोरिया या चीन के रास्ते पहुँच गया था। वो संस्कृति को महत्व देते हैं, भारत की तरह नकारते नहीं, इसलिए उनका नए साल का निशान धान के पुआल से बांटी रस्सी होती है। धान की खेती के सदियों पुराने प्रमाण क्यों मिल जाते हैं ? क्योंकि इसे सड़ाने के लिए मिट्टी-पानी-हवा तीनों चाहिए। लगातार हमले झेलते भारत के लिए इस वजह से भी ये महत्वपूर्ण रहा। किसान मिट्टी की कोठियों में इसे जमीन में गहरे गाड़ कर भाग जाते और सेनाओं के लौटने पर वापस आकर धान निकाल सकते थे। पुराने चावल का मोल बढ़ता ही था, घटता भी नहीं था। हड़प्पा (लोथल और रंगपुर, गुजरात) जैसी सभ्यताओं के युग से भी दबे धान खुदाई में निकल आये हैं।

नाम के महत्व पर ध्यान देने से भी इतिहास खुलता है। जैसे चावल के लिए लैटिन शब्द ओरीज़ा (Oryza) और अंग्रेजी शब्द राइस (Rice) दोनों तमिल शब्द “अरिसी” से निकलते हैं। अरब व्यापारी जब अरिसी अपने साथ ले गए तो उसे अल-रूज़ और अररुज़ बना दिया। यही स्पेनिश में पहुंचते पहुँचते अर्रोज़ हो गया और ग्रीक में ओरिज़ा बन गया। इटालियन में ये रिसो (Riso), in हो गया, फ़्रांसिसी में रिज़ (Riz)और लगभग ऐसा ही जर्मन में रेइज़ (Reis) बन गया। संस्कृत में धान को व्रीहि कहते हैं ये तेलगु में जाकर वारी हुआ, अफ्रीका के पूर्वी हिस्सों में इसे वैरी (Vary) बुलाया जाता है। फारसी (ईरान की भाषा) में जो ब्रिन्ज (Brinz) कहा जाता है वो भी इसी से आया है।

साठ दिन में पकने वाला साठी चावल इतने समय से भारत में महत्वपूर्ण है कि चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी उसका जिक्र आता है। गौतम बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन भी धान से आता है और बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति के समय भी सुजाता के खीर खिलाने का जिक्र आता है। एक किस्सा ये भी है कि गौतम बुद्ध के एक शिष्य को किसी साधू का पता चला जो अपने तलवों पर कोई लेप लगाते, और लेप लगते ही हवा में उड़कर गायब हो जाते। बुद्ध के शिष्य नागार्जुन भी उनके पास जा पहुंचे और शिष्य बनकर चोरी छिपे ये विधि सीखने लगे। एक दिन उन्होंने चुपके से साधू की गैरमौजूदगी में लेप बनाने की कोशिश शुरू कर दी।

लेप तैयार हुआ तो तलवों पर लगाया और उड़ चले, लेकिन उड़ते ही वो गायब होने के बदले जमीन पर आ गिरे। चोट लगी लेकिन नागार्जुन ने पुनः प्रयास किया। गुरु जबतक वापस आते तबतक कई बार गिरकर नागार्जुन खूब खरोंच और नील पड़वा चुके थे। साधू ने लौटकर उन्हें इस हाल में देखा तो घबराते हुए पूछा कि ये क्या हुआ ? नागार्जुन ने शर्मिंदा होते आने का असली कारण और अपनी चोरी बताई। साधू ने उनका लेप सूंघकर देखा और हंसकर कहा बेटा बाकी सब तुमने ठीक किया है, बस इसमें साठी चावल नहीं मिलाये। मिलाते तो लेप बिलकुल सही बन जाता !

सिर्फ किस्से-कहानियों में धान-चावल नहीं है, धान-चावल की नस्लों को सहेजने के लिए एक जीन बैंक भी है। अपनी ही संस्कृति पर शर्मिंदा होते भारत में नहीं है ये इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट (IRRI) फिल्लिपिंस में है। फिल्लिपिंस का ही बनाउ (Banaue) चावल की खेती के लिए आठवें आश्चर्य की तरह देखा जाता है। यहाँ 26000 स्क्वायर किलोमीटर के इलाके में चावल के खेत हैं। ये टेरेस फार्मिंग जैसी जगह है, पहाड़ी के अलग अलग स्तर पर, कुछ खेत तो समुद्र तल से 3000 फीट की ऊंचाई पर भी हैं। इनमें से कुछ खेत हजारों साल पुराने हैं और सड़ती वनस्पति को लेकर पहाड़ी से बहते पानी से एक ही बार में खेतों में सिंचाई और खाद डालने, दोनों का काम हो जाता है।

इस आठवें अजूबे के साथ नौवां अजूबा ये है कि भारत में जहाँ चावल की खेती 16000 से 19000 साल पुरानी परम्परा होती है, वो अपनी परंपरा को अपना कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ! कृषि पर शर्माने के बदले उसे भी स्वीकारने की जरूरत तो है ही।
✍🏻आनन्द कुमार

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