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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

भारत के वीर सपूत शहीद राजगुरू

अमृता गोस्वामी 

16 वर्ष की आयु में राजगुरू, चंद्रशेखर आजाद की पार्टी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गए। इस क्रांतिकारी दल में राजगुरू को ‘रघुनाथ’ और ‘एम महाराष्ट्र के नाम से जाना जाता था। यहां पर ही राजगुरू की मुलाकात भगत सिंह और सुखदेव से भी हुई।

भारत में ऐसे हजारों वीर सपूतों ने जन्म लिया जिन्होंने सिर्फ और सिर्फ भारत की आजादी के सपने देखे और उसके लिए ही जिए। भारत के ऐसे ही महान देशभक्तों में एक नाम है शिवराम हरि राजगुरु का जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों, उनकी दासता उनके कुशासन से भारत माता की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की भी आहुति दे दी।

“मैं दुनिया से चला जाऊँगा, परंतु मेरी मौत देश में एक नई क्रांति को जन्म देगी। मैं फिर आऊँगा और तब तक बार-बार आता रहूँगा, जब तक मेरा देश गुलामी की बेड़ियों से आजाद नहीं हो जाता। यह बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, मेरी मौत से हजारों राजगुरु उठ खड़े होंगे, जो ब्रिटिश सरकार को भारत से उखाड़ फेंकेंगे।“ यह शब्द थे भारत की आजादी के लिए बलिदान देने वाले महान क्रांतिकारी शिवराम हरि राजगुरू के।

राजगुरू का जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे, महाराष्ट्र के खेड़ा गाँव (वर्तमान राजगुरु नगर) में एक ब्राम्हण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री हरि नारायण और माता का नाम पार्वती बाई था। यह आश्चर्यजनक है कि जन्म के समय राजगुरू के लिए किसी ज्योतिषी ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि आगे चलकर यह बच्चा कुछ ऐसा करेगा जिससे उसका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाएगा, जो सच साबित हुआ। 
राजगुरू जब सिर्फ 6 साल के थे उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। राजगुरू की रूचि पढ़ाई की बजाय खेलकूद में अधिक थी जिससे उनके भाई नाराज हो गए। जिसके बाद अपनी माता के साथ राजगुरू वाराणसी आ गए, वाराणसी में पढ़ाई के दौरान राजगुरू की मुलाकात महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद से हुई जिनसे वे काफी प्रभावित हुए। चन्द्रशेखर आजाद ने उन्हें निशानेबाजी की शिक्षा दी। कुछ ही समय में राजगुरू क्रांतिकारी दल के विश्वस्त सदस्य बन गए। 
16 वर्ष की आयु में राजगुरू, चंद्रशेखर आजाद की पार्टी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गए। इस क्रांतिकारी दल में राजगुरू को ‘रघुनाथ’ और ‘एम महाराष्ट्र के नाम से जाना जाता था। यहां पर ही राजगुरू की मुलाकात भगत सिंह और सुखदेव से भी हुई। एक जैसे विचारों के चलते राजगुरू, भगतसिंह और सुखदेव परम मित्र बन गए और एक साथ मिलकर कई क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह राजगुरू के आदर्श थे।

बात 1927 की है जब वाइसराय लार्ड इरविन ने भारत में वैधानिक सुधार के लिए साइमन कमीशन का गठन किया, इस कमीशन में अध्यक्ष से लेकर सारे सदस्य अंग्रेज थे। पूरे भारत में इसका जमकर विरोध हुआ। भारत में ‘साइमन गो बैक’ के नारे लगाए गए। 30 अक्टूबर 1928 में जब साइमन कमीशन के सात सदस्यों की टीम संवैधानिक सुधारों की समीक्षा एवं रिपोर्ट  तैयार करने के लिए लाहौर पहुंची तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व में भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू सहित कई क्रांतिकारियों ने मिलकर इसका जमकर विरोध किया जिससे वहां काफी भीड़ इक्ट्ठा हो गई। माहौल को बिगड़ता देखकर लाहौर के पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दे दिया और पुलिस उपअधीक्षक सैंडर्स लोगों पर टूट पड़ा। भगत सिंह और उनके साथी इस अत्याचार के खिलाफ आगे आए किन्तु लाला लाजपत राय ने उस समय उन्हें शांत रहने को कहा। प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज के साथ ही स्वयं स्कॉट ने लाठी से लाला लाजपत राय को निर्दयता से पीटा जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। लाला लाजपत राय की मौत से क्रांतिकारियों का जैसे खून खौल उठा।
चंद्रशेखर आजाद सहित भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, जय गोपाल इत्यादि कई क्रांतिकारियो ने मिलकर फैसला किया कि इसका प्रतिशोध केवल खून के बदले खून से ही लिया जाएगा और फिर भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू ने मिलकर स्कॉट को मौत के घाट उतारने के लिए योजना बनायी।
17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश अफसर एएसपी जॉन सांडर्स जब दफ्तर से बाहर निकला अपनी योजना के तहत राजगुरु और भगत सिंह ने उस पर गोलियां चलाकर हत्या कर दी। इस घटना ने भारत में अंग्रेजों की सत्ता को हिलाकर रख दिया । अगले दिन लाहौर की दीवारों पर इश्तिहार चिपका दिया गया कि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध ले लिया है। अपने इस कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम देने के बाद चंद्रशेखर आजाद के समझाने पर राजगुरू वहां से पुणे चले गए और कुछ समय तक वहीं रहें।
साल 1929 में ब्रिटिश राज्य की तानाशाही उनके दमनकारी कानून पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिसप्यूट बिल पेश होने के विरोध में दिल्ली के सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने की योजना बनाई गई जिसे भगतसिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने अंजाम दिया। इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए 8 अप्रैल, 1929 को सेंट्रल असेंबली में पर्चियां बांटी गईं और बम फेंका गया जिसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि अंग्रेजों के कुशासन के खिलाफ आजादी का बिगुल बजाना था, यह बम असेंबली की खाली जगह पर फेंका गया जिससे कोई हताहत न हो। इसके बाद भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बिना किसी विरोध के गिरफ्तारी दे दी।

बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद सभी सबूत इक्ट्ठा कर राजगुरु और सुखदेव को भी गिरफ्तार कर लिया गया। राजगुरु स्वभाव से ज्यादा बोलने वाले थे। पुणे में उन्होंने कई लोगों से सांडर्स वध की चर्चा कर दी जिससे वे गुप्तचरों की निगाह में आ गए और 30 सितम्बर, 1929 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, उन पर सांडर्स वध का मुकदमा चलाकर मृत्युदंड घोषित किया गया। 
बटुकेश्वर दत्त को असेंबली में बम फेंकने के लिए कालापानी की सजा दी गई वहीं भगतसिंह सहित राजगुरू और सुखदेव को ब्रिटिश अफसर सांडर्स की हत्या का दोषी करार देकर फांसी की सजा सुनाई गई। लाहौर के जेल 23 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दी गई। 
भारत की आजादी के लिए इन तीनो महान क्रांतिकारियों ने भारत की जयकार करते हुए हँसते-हँसते फांसी के फंदे को अपने गले लगाया। 
आज 24 अगस्त देश भक्त राजगुरू का जन्म दिवस है। भारत के वीर सपूत राजगुरू आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं किन्तु भारत की स्वतंत्रता के लिए उनके बलिदान को देश कभी भुला नहीं सकता, देश के इतिहास में राजगुरू का नाम सदा अमर रहेगा।

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