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पर्व – त्यौहार

श्रावणी और रक्षाबंधन मनाया जाता था कभी श्रावणी उपाकर्म के नाम से : स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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“श्रावणी और रक्षाबंधन, आज देश भर में यह पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।”
“वास्तव में आज का मुख्य पर्व ‘श्रावणी उपाकर्म’ है। इसका अर्थ है, वेदों के विशेष स्वाध्याय अध्ययन का पर्व।” आज श्रावण मास की पूर्णिमा है, इसलिए श्रावणी कहलाती है। उपाकर्म का अर्थ होता है आरंभ करना। प्राचीन काल में आज के दिन यह वेद प्रचार अध्ययन स्वाध्याय का पर्व आरंभ होता था, इसलिए इसे श्रावणी उपाकर्म कहते हैं। और आज से आरंभ हो कर 4 महीने तक चलता था।
बाद में यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त हो गई। और लोग कहीं 1 सप्ताह तक वेद प्रचार करने लगे। और फिर समय की कमी के कारण यह 3 दिन तक सीमित रह गया। और बहुत जगह तो आजकल एक ही दिन में वेद प्रवचन कर के इस पर्व को समाप्त कर देते हैं।
“इस पर्व पर लोग पुराना यज्ञोपवीत भी बदल लेते थे, और नया धारण करते थे। बड़ा उत्साह का वातावरण होता था।” जैसे आज भी शादी विवाह के अवसर पर लोग नए कपड़े पहनते हैं, इसी तरह से इस पर्व पर यज्ञोपवीत भी नया पहना जाता था। यज्ञोपवीत बदलने की परंपरा आज भी बची हुई है।
परन्तु रक्षाबंधन का पर्व तो बाद में इसी दिन जुड़ गया। “इतिहास में ऐसा बताते हैं, कि कभी चित्तौड़गढ़ की महारानी कर्णावती ने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेज कर, गुजरात के राजा से अपनी रक्षा का निवेदन किया था। हुमायूं राजा ने उसे स्वीकार कर लिया, और महारानी कर्णावती की रक्षा की।” महारानी कर्णावती और हुमायूं राजा लगभग बराबर की या आस पास की उम्र के होंगे। इस कारण महारानी कर्णावती ने राजा हुमायूं को राखी बांध कर अपना भाई बना लिया। आस पास की उम्र वालों में यही संबंध बनता है, भाई-बहन का। “तबसे यह परंपरा चल पड़ी, कि जब किसी स्त्री को, रक्षा के लिए किसी पुरुष की सहायता की आवश्यकता पड़ती थी, तो वह महारानी कर्णावती का अनुकरण करते हुए उस पुरुष को रक्षा सूत्र अर्थात प्रतीक रूप में एक धागा बांध कर उसे अपना रक्षक बना लेती थी। आरंभ में क्योंकि महारानी कर्णावती ने राजा हुमायूं को भाई बनाया था, तो लोगों में यह प्रथा चल पड़ी, कि यह भाई बहन का पर्व है।” “जबकि यह प्रथा भाई बहन के संबंध की द्योतक नहीं है, बल्कि रक्षक और रक्ष्य के संबंध की द्योतक है।”
इस नियम के आधार पर पत्नियां अपने पति को रक्षा सूत्र बांध सकती हैं। बहनें भाइयों को रक्षा सूत्र बांध सकती हैं। बूढ़ी माताएं अपने बेटों को रक्षा सूत्र बांध सकती हैं, और उन्हें अपने कर्तव्य की याद दिला सकती हैं, कि उन पुरुषों को अपने घर की स्त्रियों की रक्षा करनी है। “इस प्रकार से ‘रक्षक और रक्ष्य’ की भावना से इस रक्षाबंधन पर्व को देखना चाहिए। न कि भाई बहन के संबंध से।”
परंतु आज कल का प्रचलन में तो यही है कि बहनें भाई को राखी बांध कर उन्हें अपना रक्षक होने का वचन स्मरण कराती हैं। भाई बहन तो समान उम्र के कारण एक संबंध मान लिया जाता है। “इस पर्व के संदर्भ में, यदि दोनों पुरुष स्त्री आस-पास की उम्र के हों, तो भाई बहन का संबंध कहलाता है। यदि स्त्री बड़ी और पुरुष अधिक छोटा हो, तो मां बेटे का संबंध कहलाता है। यदि स्त्री छोटी और पुरुष अधिक बड़ा हो, तो पिता पुत्री का संबंध कहलाता है।”
“आज भी हम किसी बड़ी उम्र की स्त्री को ‘माता जी’ ही बोलते हैं, चाहे वह बिल्कुल अनजान भी क्यों न हो। बराबर उम्र वाली को बहन जी कहते हैं। और छोटी हो तो बिटिया कहते हैं।” इस प्रकार से कोई भी स्त्री किसी भी पुरुष को उम्र के हिसाब से रक्षा सूत्र बांधकर अपनी रक्षा का वचन याद दिला सकती है।
सभी को यह विचार करना चाहिए, कि जो दुष्ट लोग अन्य स्त्रियों पर ग़लत दृष्टि और भावना रखते हैं, उन्हें यह सोचना चाहिए, कि स्त्रियां/माताएं हमारे घर में भी हैं। बहनें हमारे घर में भी हैं। “यदि कोई हमारी बहनों माताओं को बुरी दृष्टि से देखेगा, तो हमें भी अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए हमें भी दूसरी स्त्रियों को माता बहन की दृष्टि से देखना चाहिए। और उनके साथ किसी प्रकार का कोई दुर्व्यवहार या अत्याचार नहीं करना चाहिए।”

“यह रक्षा सूत्र का त्योहार सिर्फ एक दिन का नहीं है। यदि सब लोग आज के पर्व को केवल एक दिन तक सीमित न रखकर ऐसा विचार करें, कि हमें यह रक्षा का वचन प्रतिदिन और पूरे वर्ष निभाना है, तो देश दुनिया में बहुत अधिक शांति एवं निर्भयता होगी, और यह धरती स्वर्ग बन जाएगी।” “रक्षाबंधन पर्व की आप सभी को बहुत शुभकामनाएं।”

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