मुसलमानों को सशक्त बनाने और ‘सबका साथ सबका विकास’ में मुसलमानों के साथ पक्षपात जैसी बातें होने के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान की समीक्षा कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन पर ‘मुस्लिम नेता की तरह बोलने’ का आरोप लगाया है। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने जो कुछ कहा है उस पर उन्हें उत्तर देने के लिए शिया धर्मगुरू कब्ले सादिक का यह कथन पर्याप्त है, जिसमें उन्होंने मुसलमानों के साथ अन्याय की बात करने वालों को आड़े हाथों लिया है। वह कहते हैं कि जो लोग यह कहते हैं कि इस देश ने हमें कुछ नही दिया वे पहले यह सोचें कि उन्होंने देश को क्या दिया है? पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने देश को दिया तो देखिये देश ने उनके लिए क्या कुछ नही किया? आप या तो मौलाना आजाद बनिये या डा. कलाम।

सादिक बोले हम मुसलमान हैं, कसम खाकर कहते हैं कि मां के बाद हमें मुल्क प्यारा है। गवर्नर हिंदू हैं, और हम मुसलमान। हम भी देशभक्त हैं और वे भी। एक देशभक्त दूसरे के काम आ रहा है। गवर्नर बीजेपी के आदमी हैं लेकिन बेहद ब्राड माइंडेड।

कितनी आश्चर्यजनक बात है कि जो शब्द हमारे उपराष्ट्रपति के होने चाहिए थे उन्हें एक धर्मगुरू कह रहा है। उपराष्ट्रपति के शब्दों के विषय में तो कल्बे सादिक साहब ने ऐसा बोलकर स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे शब्द तो किसी धर्मगुरू के भी नही हो सकते।

हामिद अंसारी साहब देश में मुुसलमानों की पहचान को लेकर दुखी हैं, जबकि सारी दुनिया को पता है कि मुसलमान जितना हिंदुस्तान में सुखी है उतना तो वह पाकिस्तान में भी नही है। उसकी धार्मिक आजादी पर किसी भी हिंदू को कोई कष्ट नही है। हिंदू देश में ‘समान नागरिक संहिता’ की बात कहते हैं तो उसका अभिप्राय भी किसी की धार्मिक आजादी को निगलना नही है, अपितु ‘सबका विकास और सबका साथ’ ही उसका अर्थ है।

क्या हामिद अंसारी बता पायेंगे कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से भागकर आये करोड़ों हिंदू शरणार्थी जिन्हें अब केन्द्र सरकार भारत की स्थायी नागरिकता दे रही है, किसी धार्मिक पहचान के संकट से दुखी होकर नही भागे हैं और क्या भारत से एक भी मुसलमान पाकिस्तान या बांग्लादेश की नागरिकता पाने के लिए केवल इसलिए भागता दिखायी दिया है कि इस देश में उसकी पहचान का संकट है?

इस देश ने सचमुच मुसलमानों को बहुत कुछ दिया है, सबसे बड़ी बात तो यह है कि देश के अधिकांश मुसलमान धर्मांतरित हैं, इसलिए देश का बहुसंख्यक हिंदू उनसे इसलिए प्यार करता है कि उनके और हमारे पूर्वज एक हैं इसलिए ये भी अपने भाई हैं। पर कष्ट तब होता है जब कुछ लोग धर्मांतरण के घातक खेल को स्थायी अधिकार बनाकर उसी के बल पर आज भी संख्या विस्तार से राष्ट्र विभाजन की तैयारी करते दिखाई देते हैं। हामिद अंसारी साहब के पास उन लोगों के लिए संभवत: शब्द नही हैं।

संविधान सभा में प्रो. के.टी शाह ने धर्मांतरण के मौलिक अधिकार के विरूद्घ अपनी राय रखते हुए कहा था कि शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों तथा शरणालयों में धर्म प्रचार को प्रतिबंधित किया जाए। क्योंकि ऐसी अनेकों घटनायें हैं जब धर्म परिवर्तन के लिए स्थितियों का अनुचित लाभ लिया गया जो अत्यंत निंदनीय है। प्रो. शाह का यह कथन एक समान शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।

इसी बात को और भी अधिक प्रमुखता से उठाने वाले तजम्मुल हुसैन का कहना था कि मजहब व्यक्ति का निजी मामला होना चाहिए। मैं क्यों आपसे कहूं कि आप मेरे तरीके से अपनी आत्मा को शक्ति दो और आप क्यों मुझसे कहें कि मैं आपके तरीके से अपनी आत्मा को शक्ति दूं। अगर इस पर सिद्घांतत: सहमति है तो फिर धर्म के प्रचार की बात क्यों? ईमानदारी से अपने घर पर धर्म को मानो और आचरण करो। इसका प्रदर्शन प्रचार के लिए मत करो। अगर आपने इस देश में धर्म का  प्रचार प्रारंभ कर दिया तो आप समस्या बन जायेंगे।

आज हामिद अंसारी साहब जैसे लोगों को मुसलमानों को समझाना चाहिए कि अधिक बच्चे पैदा करने का अर्थ है ‘गरीबी और भुखमरी’ को बढ़ावा देना। समय आगे बढऩे का है साथ ही आधुनिकता के साथ समन्वय स्थापित करके देश के विकास में सहयोग देने का है। बड़े-बड़े धर्मांतरणों से भी समस्यायें निपटी नही हैं, उलझी ही हैं। ‘गरीबी और भुखमरी’ का ईलाज धर्मांतरण भी नही है। पाकिस्तान के रूप में राष्ट्रांतरण भी कराके देख लिया गया, परंतु वहां की गरीबी और भुखमरी दुनिया की सबसे बड़ी गरीबी और भुखमरी में गिनी जाती है। इसलिए लोगों को बहकाने या भडक़ाने के स्थान पर विज्ञानसंगत बातों से उनका परिचय कराया जाना आवश्यक है। इसके लिए उन जैसे लोग फतवाबाजी में लगे लोगों को समझायें कि लोगों की भाषण और अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित मत करो।

संभवत: उपराष्ट्रपति महोदय को जानकारी हो गयी होगी कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में संचालित ब्रिज कोर्स के डायरेक्टर प्रो. राशिद शाज के खिलाफ दारूल उलूम देवबंद ने फतवा जारी किया है कि उसकी किताबों से पढऩे से पता चलता है कि इनका लेखन गुमराह करने वाला है, उनका अकीदा और नजरिया कुरान के खिलाफ है। अच्छा हो कि देश में ऐसी बातों को रोकने के लिए अंसारी साहब जैसे लोग सामने आयें। उपराष्ट्रपति के पद पर बैठे व्यक्ति को एक संप्रदाय विशेष के लिए कुछ ऐसा बोलना जिससे अनावश्यक उत्तेजना बढ़े उचित नही है।

ऐसी वक्तव्यों से देश में निराशा का माहौल बनता है। जिससे राष्ट्रीय नेताओं की पहचान भी मजहबी नेताओं के जैसी बनती है।

विकास में सबसे पहले खड़े व्यक्ति की बात करना राष्ट्रीय नेताओं को शोभा देता है, विकास की पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा व्यक्ति केवल भारतीय है। वह मुसलमान या हिंदू नही है वह किसी जाति का सदस्य भी नही है। उसी की बात करो, उसी का साथ दो….तो कोई बात बने।

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