सुभाष बाबू : कांग्रेस बनाम भाजपा

247578-netaji-subhas-chandra-boseडॉ. वेदप्रताप वैदिक

नेताजी सुभाषचंद्र बोस को लेकर फिर विवाद छिड़ गया है। पश्चिमी बंगाल की सरकार ने नेताजी संबंधी गुप्त फाइलें जनता के लिए खोल दी हैं। 12744 पृष्ठों की 64 फाइलों में से कई बातें सामने आई हैं। उनमें से दो बातें मुख्य हैं। एक तो नेताजी के परिवार के लोगों पर नेहरु-सरकार जबर्दस्त जासूसी करती रही और दूसरी बात यह कि नेताजी के रिश्तेदार और कुछ अन्य लोग यह नहीं मानते कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान की एक हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यह भी मान लिया गया कि गुमनामी बाबा या शौलमारी बाबा या अन्य किसी अज्ञात नाम से नेताजी आज़ादी के बाद कई वर्षों तक भारत में ही रहे।

स्वातंत्र्रय सेनानियों में गांधी के बाद सबसे लोकप्रिय नेता सुभाष बाबू ही थे। सुभाष बोस ने गांधी के उम्मीदवार पट्टाभी सितारमैया को भी कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में हरा दिया था। यदि जवाहरलाल नेहरु सुभाष-परिवार पर जासूसी करवाते थे तो यह तो बिल्कुल स्वाभाविक ही था। यदि सुभाष बाबू वाकई जिंदा होते और भारत आ जाते तो नेहरु सरकार को लेने के देने पड़ जाते। कोई भी सरकार अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम क्यों नहीं करेगी?

जहां तक सुभाष बाबू के निधन होने की बात है, लगभग हर भारतीय को इस बारे में संशय रहा है। सुभाष बाबू के विश्व-व्यक्तित्व के चारों ओर ऐसा रहस्यमय प्रभामंडल बन गया था कि वे महानायक की तरह अजर-अमर हो गए हैं लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि क्या सुभाष बाबू किसी गुमनाम साधु की तरह अज्ञातवास में रह सकते थे? क्या वे नेहरु से डर गए थे? या क्या वे हताशा (ड्रिपेशन) के शिकार हो गए थे? क्या उन्हें भारत की दुर्दशा की कोई चिंता नहीं थी? यदि थी तो वे मैदान में क्यों नहीं आए? इन प्रश्नों का उन लोगों के पास कोई जवाब नहीं है, जो कई साधुओं और बाबाओं के चेहरों में सुभाष बाबू का चेहरा थोप रहे हैं।

सुभाष बाबू को कांग्रेस बनाम भाजपा का मामला बनाना भी उचित नहीं है, क्योंकि इंदिराजी ने सुभाष बाबू के सम्मान में कोई कोताही नहीं की। उनके सम्मान में डाक टिकिट जारी हुए, फिल्में बनीं, राष्ट्रीय छुट्टी रखी गई, सडक़ों और भवनों का नामकरण हुआ। 1969 में इंदिराजी जब काबुल गईं तो वे मेरे अनुरोध पर उस कमरे में जानेवाली थीं, जिसमें सुभाष बाबू यूरोप जाने के पहले छिपकर रहते थे। काबुल के ‘हिंदू गूजर’ मोहल्ले के उस कमरे को मैंने ढूंढ निकाला और सुभाष बाबू के चितर््को मैंने वहां प्रतिष्ठित कर दिया। मुझे अफगान विदेश मंत्री डॉ. खान फरहादी ने बताया कि वह स्थान इतना असुरक्षित है कि वहां इंदिराजी नहीं जा पाएंगी। अच्छा होता कि इंदिराजी के जमाने में ही उनके बारे में सारे गुप्त दस्तावेज़ प्रकट कर दिए जाते। पता नहीं, सरकार क्यों झिझक रही है? जैसे कांग्रेसी सरकारें झिझकती रहीं, वैसे ही भाजपा सरकार भी झिझक रही है।

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