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बेरोजगारी की डराती तस्वीर

प्रमोद भार्गव

भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बना देने का सपना दिखाने वालों की नींद अब टूटनी चाहिए। जिस युवा जनसंख्या के बूते इक्कीसवीं शताब्दी के भारतीय युवाओं की शताब्दी होने का दंभ भरा जा रहा है, उसे उत्तर प्रदेश में खड़ी शिक्षित बेरोजगारों की फौज ने आईना दिखा दिया है, जहां विधानसभा सचिवालय में चपरासी के महज तीन सौ अड़सठ पदों के लिए तेईस लाख आवेदन प्राप्त हुए हैं। औसतन एक पद के लिए छह हजार अर्जियां! इस सच्चाई को अगर नजरअंदाज किया गया तो अराजकता के हालात बनने में देर नहीं लगेगी।

किसी भी विकासशील देश के लिए यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसकी युवा पीढ़ी उच्चशिक्षित होने के बावजूद आत्मनिर्भरता के लिए चपरासी जैसी सबसे छोटी नौकरी के लिए लालायित है। इक्कीस करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में चपरासी के लिए जो तेईस लाख अर्जियां आई हैं, उनमें चाही गई न्यूनतम शैक्षिक योग्यता पांचवीं पास तो केवल 53,426 उम्मीदवार हैं, लेकिन छठी से बारहवीं पास उम्मीदवारों की संख्या बीस लाख के ऊपर है। इनमें 7.5 लाख इंटर पास हैं। इनके अलावा 1.52 लाख उच्चशिक्षित हैं। इनमें विज्ञान, वाणिज्य और कला से उत्तीर्ण स्नातक और स्नातकोत्तर तो हैं ही, इंजीनियर और एमबीए भी हैं। साथ ही दो सौ पचपन अभ्यर्थी पीएचडी हैं। शिक्षा की यह सर्वोच्च उपाधि इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि जिस विषय में छात्र ने पीएचडी की है, उस विषय का वह विशेषज्ञ है। यह उपाधि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भर्ती किए जाने वाले सहायक प्राध्यापकों की वांछित योग्यता में जरूरी है। जाहिर है, सरकार के समक्ष यह संकट खड़ा हो गया है कि वह आवेदनों की छंटनी का आधार क्या बनाए और परीक्षा की ऐसी कौन-सी तरकीब अपनाए कि प्रक्रिया पूरी हो जाए? क्योंकि जिस बड़ी संख्या में आर्जियां आई हैं, उनके साक्षात्कार के लिए दस सदस्यीय दस समितियां बना भी दी जाएं तो परीक्षा निपटाने में चार साल से भी ज्यादा का समय बीत जाएगा।

सरकारी नौकरियों में आर्थिक सुरक्षा की वजह से उनके प्रति युवाओं का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है। दुनिया में आई आर्थिक मंदी के चलते भी इंजीनियरिंग और एमबीए के डिग्रीधारियों को संतोषजनक रोजगार नहीं मिल रहे हैं। भारत में औद्योगिक और प्रौद्योगिक क्षेत्रों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में कुछ दिन पहले लेखपाल के चौदह सौ पदों के लिए सत्ताईस लाख युवाओं ने आवेदन किए थे। छत्तीसगढ़ में चपरासी के तीस पदों के लिए पचहत्तर हजार अर्जियां आई थीं। केरल में क्लर्क के साढ़े चार सौ पदों के लिए ढाई लाख आवेदन आए। कोटा में सफाईकर्मियों की भर्ती के लिए डिग्रीधारियों की फौज कतार में खड़ी हो गई थी। मध्यप्रदेश में भृत्य पदों की भरती के लिए आयोजित परीक्षा में भी उच्चशिक्षितों ने भागीदारी की थी। केंद्र सरकार की नौकरियों में भी कमोबेश यही स्थिति बन गई है। कर्मचारी चयन आयोग की 2013-14 की छह परीक्षाओं में भागीदारी करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा थी। निजी कंपनियों में अनिश्चितता और कम पैकेज के चलते, सरकारी नौकरी की चाहत युवाओं में इस हद तक बढ़ गई है कि पिछले पांच साल में अभ्यर्थियों की संख्या में दस गुना वृद्धि हुई है।

वर्ष 2008-09 में यह परीक्षा 10.27 लाख आवेदकों ने दी। वहीं 2011-12 में यह संख्या बढ़ कर 88.65 लाख हो गई और 2012-13 में यह आंकड़ा एक करोड़ की संख्या को पार कर गया। एनएसएसओ की रिपोर्ट बताती है कि अकेले उत्तर प्रदेश में एक करोड़ बत्तीस लाख बेरोजगारों की फौज आजीविका के लिए मुंह बाए खड़ी है। जाहिर है, हमारी शिक्षा पद्धति में खोट है और वह महज डिग्रीधारी निठल्लों की संख्या बढ़ाने का काम कर रही है। अगर वाकई शिक्षा गुणवत्तापूर्ण और रोजगारमूलक होती तो उच्चशिक्षित बेरोजगार एक चौथे दर्जे की नौकरी के लिए आवेदन नहीं करते। ऐसे हालात से बचने के लिए जरूरी है कि हम शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन कर इसे रोजगारमूलक और लोक-कल्याणकारी बनाएं।

बेरोजगारों की इस फौज ने दो बातें एक साथ सुनिश्चित की हैं। एक तो हमारे शिक्षण संस्थान समर्थ युवा पैदा करने के बजाय, ऐसे बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रहे हैं, जो योग्यता के अनुरूप नौकरी की लालसा पूरी नहीं होने की स्थिति में कोई भी नौकरी करने को तत्पर हैं। दूसरे, सरकारी स्तर की छोटी नौकरियां तत्काल भले ही पद और वेतनमान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण न हों, लेकिन उनके दीर्घकालिक लाभ हैं। उत्तरोत्तर वेतनमान और सुविधाओं में इजाफा होने के साथ आजीवन आर्थिक सुरक्षा है। स्वायत्त निकायों में तो चपरासियों को भी अधिकारी बनने के अवसर सुलभ हैं।

इनमें कामचोर और झगड़ालू प्रवृत्ति के कर्मचारियों को भी सम्मानपूर्वक तनखा मिलती रहती है। अगर आप में थोड़े-बहुत नेतृत्व के गुण हैं तो कर्मचारी संगठनों की मार्फत नेतागिरी करने के बेहतर वैधानिक अधिकार भी उपलब्ध हैं। रिश्वतखोरी की गुंजाइश वाला पद है तो आपकी आमदनी में दूज के चांद की तरह श्रीवृद्धि होती रहती है। इसीलिए उज्जैन नगर निगम के एक चपरासी के पास से लोकायुक्त की पुलिस ने करोड़ों की संपत्ति बरामद की है। बर्खास्त कर्मचारियों की सेवाएं बीस-पचीस साल बाद भी समस्त स्वत्वों के साथ बहाल कर दी जाती हैं। लिहाजा, हैरत की बात नहीं कि आइटी क्षेत्र में गिरावट के बाद तकनीक में दक्ष युवा भी चपरासी और क्लर्क बनने को छटपटा रहे हैं।

छठा वेतनमान लागू होने के बाद सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण और भी बढ़ा है। इसके चलते साधारण शिक्षक को चालीस-पैंतालीस हजार और महाविद्यालय के प्राध्यापक को एक-सवा लाख वेतन मिल रहा है। सेवानिवृत्त प्राध्यापक को बैठे-ठाले साठ-सत्तर हजार रुपए तक पेंशन मिल रही है। ऐसी पौ-बारह सरकारी नौकरियों में ही संभव है। अगर इन कर्मचारियों को सातवां वेतनमान और दे दिया जाता है, तो बाकी लोगों से उनकी प्राप्तियों की खाई और भी चौड़ी हो जाएगी। इससे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विसंगतियां बढ़ेंगी। इसलिए क्या यह अच्छा नहीं होगा कि सरकार सातवें वेतनमान की सौगात देने से पहले समाज पर पडऩे वाले इसके दुष्प्रभावों की पड़ताल करे?

आज चालीस प्रतिशत से भी ज्यादा खेती-किसानी से जुड़े लोग वैकल्पिक रोजगार मिलने की स्थिति में खेती छोडऩे को तैयार हैं। किसानी और लघु-कुटीर उद्योग से जुड़ा युवक, जब इस परिवेश से कट कर डिग्रीधारी हो जाता है तो अपनी आंचलिक भाषा के ज्ञान और स्थानीय रोजगार की समझ से भी अनभिज्ञ होता चला जाता है। लिहाजा, नौकरी नहीं मिलने पर पारंपरिक रोजगार और ग्रामीण समाज की संरचना के प्रति भी उदासीन हो जाता है। ये हालात युवाओं को कुंठित, एकांगी और बेगानों की तरह निठल्ले बना रहे हैं।

अक्सर कहा जाता है कि शिक्षा व्यक्तित्व के विकास के साथ-साथ रोजगार का मार्ग भी खोलती है। लेकिन चपरासी की नौकरी के परिप्रेक्ष्य में डिग्रीधारी बेरोजगारों की जो तस्वीर पेश हुई है, उसने समस्त शिक्षा प्रणाली को कठघरे में ला खड़ा किया है।

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