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बिहार विधानसभा चुनाव : ये बेचारे जाति के मारे

Biharवीरेन्द्र सिंह परिहार

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघंचालक ने आरक्षण के संबंध में पूछे गये एक सवाल के जवाब में कहा कि एक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि किन लोगों को और कितनों दिनों तक आरक्षण की आवश्यकता है । उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी समिति में राजनीतिज्ञों से ज्यादा सेवाभावियों का महत्व होना चाहिए। इसके पहले जयपुर में स्तम्भ लेखकों के एक कार्यक्रम में 13 सितम्बर को एक सवाल के जबाब में उन्होने कहा था कि यहा जो आरक्षण के नाम पर सब कुछ चल रहा है वह आरक्षण के नाम पर राजनीति है।इसीलिए जिनका अपना कोई निहित स्वार्थ न हो ऐसे लोगों की एक कमेटी बने  जो यह तय करे कि सचमुच किनको आरक्षण की जरूरत है, और वह कितने समय तक मिलना चाहिए।जैसा कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है तदनुसार उनका मानना था कि क्रीमीलेयर को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि आरक्षण मात्र उन व्यक्तियों को मिल रहा है जो संगठित है, असंगठित लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।श्री भागवत का यह कहना था कि सचमुच में आरक्षण की राजनीति कर रहे नेताओं को जैसे बैठै-बैठाए मौका मिल गया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आरक्षण नीति में यदि मोदी सरकार ने कोई छेडछाड की तो पार्टी देशभर में आंदोलन करेगी,क्योंकि आरक्षण संबैधानिक व्यवस्था है। मायावती ने यह भी कहा कि मोहन भागवत के बयानों से दलित समाज नाराज है। फिलहाल मुददाविहीन, प्रमाणित घोटालेबाज और विशुद्व जाति की राजनीति करने वाले लालू यादव भला इस मौके पर कब चूकने वाले थे? उन्होंने कहा, आर,एस,एस, बीजेपी आरक्षण खत्म करने का कितना भी सुनियोजित माहौल बना ले देश का 80 प्रतिशत दलित,पिछडा,इनका मुहतोड करारा जवाब देगा। उन्होंने तो यहां तक कहा कि तुम आरक्षण खत्म करने की बाते कहते हो हम इसे आबादी के अनुपात में बढाएंगे। अगर किसी ने मां का दूध पिया है तो आरक्षण खत्म करके दिखाए। बिहार विधानसभा को चुनावो को दृष्टिगत रखते हुए भला नीतीश कुमार कब चुप रहने वाले थे? उन्होंन बीजेपी पर आरक्षण विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अनुसरण करना ही है जो कि उसका सुप्रीम कोर्ट है।

अब उपरोक्त  बातों के परिपेक्ष्य में यह देखे जाने भी जरूरत है कि श्री भागवत और उपरोक्त नेताओं की बातों में  कितना औचित्य है। उपरोक्त नेताओं के अनुसार जैसे श्री भागवत आरक्षण समाप्त करने के पक्षधर हों। पर यह बात पूरी तरह गलत है क्योंकि श्री भागवत ने कहीं भी ऐसा नहीं कहा कि आरक्षण व्यवस्था खत्म कर दी जानी चाहिए। उन्होंने तो मात्र इसकी समीक्षा करने की बात कही, ताकि इसका दुरूपयोग बंद हो,और सचमुच जरूरत मंदों को आरक्षण का लाभ मिल सके। मायावती कहतीं हैं कि आरक्षण संबैधानिक व्यवस्था है इसीलिए इस पर छेडछाड नहीं की जा सकती। लेकिन उन्हे यह भी पता होना चाहिए कि डॉ.अम्बेडकर ने संविधान में मात्र दस वर्षो के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। ऐसी स्थिति में यदि श्री भागवत यह कहते हैं कि आरक्षण की समय-सीमा तय होनी चाहिए तो इसे कतई अनुचित नहीं कहा जा सकता । संविधान निर्माताओं का ऐसा आशय नहीं था कि आरक्षण को स्थाई व्यवस्था बना दिया जाए। इसके अलावा यदि इन नेताओं की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति इनती निष्ठा है तों संविधान में पिछडी कही जाने वाली जातियों के लिए तो आरक्षण की व्यवस्था नहीं थी । बडी बात यह कि संविधान कोई जड व्यवस्था नहीं बल्कि किसी राष्ट्र का जीवंत दस्तावेज  होता है बदली परिस्थितियों के अनुसार किसी भी व्यवस्था पर सार्थक  बहस और समीक्षा यदि नहीं होगी तो उससे समाज की गतिशीलता निस्संदेह प्रभावित होगी।हमारे यहां इसीलिए हमारे देश में शास्त्रार्थ का प्रावधान था और यह कहा गया है-कि वादे-वादे जायते तत्वबोधे । बडा सवाल यह कि इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि वर्तमान दौर में इस आरक्षण व्यवस्था का भयावह दुरूपयोग हो रहा है जब गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट,और महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की लाइन पर खडे हो,तो समझा जा सकता है कि अब आरक्षण अपनी मूल भावना से भटक कर बंदरबाट का पर्याय हो गया है । इतना ही नही मंडल कमीशन के नाम पर जिन पिछडी जातियों को आरक्षण दिया गया है उसमें भी उसका लाभ अधिकतर यादव और कुर्मी जैसी संगठित जातियों को ही मिल रहा है। बाकी सचमुच की पिछडी और असंगठित जातियों तो सिर्फ बेवश हो कर यह देख रही है। उदाहरण के लिए नाई, कहार, लोहार, और बढई जैसी जातियेां को ले लिया जाए, क्योंकि एक तों यह संख्या में कम है या कि सचमुच  पिछडी हैं और असंगठित हैं । इसलिए आरक्षण की मलाई पिछडों में अगडी एवं संगठित जातियां खा रहीं है। अनुसूचित  जातियों  में भी कहीं न कहीं यही स्थिति है क्योंकि इसका सबसे ज्यादा लाभ मायावती के सजातीय ही ले रहे हैं। सबसे बडी बात यह कि आखिर  में मायावती, लालू यादव या नीतीश कुमार को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? यह किस बात में पिछडे हैं?  हकीकत यह है कि पता नहीं कितने अगाडी जाति के कहे जाने वाले इनकी कृपा के लिए इनके पीछे घूमते रहते हैं। इस तरह से जो मुख्यमंत्री हो गये,सांसद-विधायक हो  गये, जो प्रथम श्रेणी का शासकीय सेवक हो गया उसे आरक्षरण क्यों मिलना चाहिए यह बडा प्रश्न है?

ऐतिहासिक सत्य है कि ब्रिटिश राज के दौर में 1921 में विभिन्न जाति सभाओं ने प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हें उंची  जाति में शामिल करने का आग्रह किया गया था।   जैसे अहीरों का कहना था कि वस्तुत: वह यादव क्षत्रिय हैं। जाट अपने को जदुवंशी ठाकुर होने का दावा कर रहे थे। इसी तरह से बंजारों का कहना था कि वह चौहान राजपूत है तो गूजर भी अपने को क्षत्रिय बता रहे थे। गडरिया अपने को पाल राजपूत कह रहे थे तो चमार-जाटव भी अपने को राजपूत कहलाने का दावा कर रहे थे । इसमे कुछ गलत भी नहीं था क्योंकि मुस्लिम काल में जब कई क्षत्रिय जाति के लोगों ने तलवार छोडकर दूसरे पेशे  जीवन यापन के लिए अपना लिए या मजबूरन उन्हे अपनाना पडा-तो वह तथाकथित छोटी जातियों में गिने जाने लगे। कहने का आशय यह कि जब तक आरक्षण  की मारा मारी नहीं थी तो अधिकांश जातियां अपने को उच्च जातियों में शामिल करना चाहती थीं। पर आरक्षण की मारा मारी के चलते संपन्न और अगडी जातियां भी अपने को पिछडी साबित करने पर तुली हैं। आरक्षण की  इस दौड में शामिल होने की होड के चलते 1950 में अनुसूचित जातियों की जो संख्या 1208 थी वह  बढकर 2011 तक 1241 हो जाती है।इसी तरह से अनुसूचित जनजातियों की संख्या 664 से 705 हो जाती हैं, पिछडी जातियों भी 1257 से 5013 हो जाती हैं। यह सब बातें तो अपनी जगह पर हैं पर लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे लोग जो अपने को जयप्रकाश नारायण और डॉ.राम मनोहर लोहिया के अनुयायी कहते हैं। जो कि जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की बात करत थे-आखिर में उनके यह तथाकथित अनुयायी इस तरह की विशुद्व जाति की राजनीति पर क्यों आमादा हैं? असलियत यह है कि इन नेताओं के पास न तो कोई सिंद्धात बचा  है और न कोई मुददे बचे हैं। मोदी के विजय रथ  के बढते इनके समक्ष अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए जाति ही इनका एकमात्र सहारा है। तभी तो लालू यादव जैसे राजनीतिज्ञ जाति आधारित गणना के आंकडे जारी करने के लिए अनशन तक करते हैं। बडी बात यह कि इस आरक्षण व्यवस्था का  सबसे ज्यादा लाभ भी ऐसे लोग ही ले रहे हैं और यदि किसी किस्म  की समीक्षा होगी तो ऐसे लोग निश्चित ही आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे। इसीलिए अपनी बोट बैंक की राजनीति और निहित स्वार्थों की सुरक्षा के लिए ये नेता एक सार्थक एवं सामयिक  विचाार पर हंगामा बरपा कर जातीयता के घनचक्कर में समाज को बांटने पर आमादा हैं। तभी तो लालू यादव बिहार में जो उम्मीदवार देते हैं उसमे सभी शर्मो-हया छोडकर 101 में 48 सजातीय होते हैं।

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