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विश्वगुरू के रूप में भारत

भारत की प्राचीन कलाएं -1

लेखक:- प्रशांत पोळ

विश्व के किसी भी भूभाग में यदि किसी संस्कृति को टिकी रहना हैं, जीवंत रहना है, तो उसे परिपूर्ण होना आवश्यक है. ‘परिपूर्ण’ का अर्थ यह है कि उस संस्कृति को मानवीय मन का सर्वांगीण विचार करना चाहिए, समाज की इच्छाओं का विचार करना चाहिए. इस कसौटी पर हमारी भारतीय संस्कृति एकदम खरी उतरती है. इसीलिए विभाजन के पश्चात पाकिस्तान के राष्ट्रकवि कहे जाने वाले इकबाल ने लिखा था –

यूनान, मिस्र, रोमां
सब मिट गए जहाँ से…!
कुछ बात है कि हस्ती
मिटती नहीं हमारी..!!

यह ‘हस्ती’, अर्थात हमारी परिपूर्ण जीवन पद्धति. जीवनयापन करने के सभी मानकों को देखें तो हम भारतीय दुनिया से बहुत आगे थे… इस सम्बन्ध में एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ-

मैं पहली बार, सन १९९४ में अमेरिका गया था. उससे पहले जापान एवं यूरोप में कई देशों का भ्रमण कर चुका था, इसलिए अमेरिका के प्रति कोई विशेष उत्साह या कौतूहल नहीं था. परन्तु फिर भी अमेरिका की कई कहानियाँ लगातार मेरे कानों पर आती रहीं. सौभाग्य से अमेरिका में मेरी व्यवस्था देखने वाले व्यक्ति भारतीय ही निकले, एक बंगाली बाबू. इस कारण वे निरंतर मुझे अमेरिका का प्रत्येक वैभव दिखाने में जुटे हुए थे. वह मुझे “ड्राईव-इन’ की तकनीक और सुविधा दिखाने ले गए. मुझसे कहा, ‘देखिये अमेरिका में किस प्रकार सभी स्थानों पर ड्राईव-इन की सुविधा मौजूद है. गाड़ी में बैठे-बैठे मैकडोनाल्ड के पैसे चुका सकते हैं और गाड़ी में बैठे-बैठे ही अपना खाने का पैकेट भी ले सकते हैं. उन्होंने मुझे ड्राईव-इन ए टी एम मशीन भी दिखाई. निश्चित रूप से मैं थोड़ा प्रभावित तो हुआ ही था.

फिर पाँच-छः वर्षों के बाद एक बार रायगढ़ गया था. शिवाजी महाराज के उस विस्तीर्ण किले के विशाल परिसर में एक बड़ा सा मैदान था. उसे ‘होली का मैदान कहते हैं. उस मैदान में मनुष्य की सामान्य ऊँचाई जितने विशाल चबूतरे देखकर मैंने गाईड से पूछा, ‘ये क्या है..? इतने ऊँचे-ऊँचे चबूतरे किसलिए..? कौन चढ़ेगा वहाँ?’

एकदम सहज स्वर में गाईड ने जवाब दिया, ‘यह बाज़ार था. असल में उस जमाने मे घुड़सवार अपनी खरीददारी के लिए बाज़ार-हाट आते थे, परन्तु वे अपने घोड़े कहाँ बांधते? इसीलिए शिवाजी महाराज ने घोड़ों पर बैठे-बैठे ही उन्हें बाज़ार-हाट करने की सुविधा मिले, इस कारण से ऊँचे-ऊँचे चबूतरे बनवाए थे..’.

सच कहता हूँ, यह सुनकर शरीर रोमांच से काँप उठा… कौन आधुनिक है..? कौन मॉडर्न हैं..?

साढे तीन सौ वर्षों पूर्व अपनी जनता और सैनिकों की सुविधा के लिए घोड़ों पर बैठे-बैठे खरीददारी करने के लिए ‘ड्राईव-इन’ बाजार का निर्माण करने वाले शिवाजी महाराज मॉडर्न हैं, या पिछले पचास-साठ वर्ष में ड्राईव-इन का रौब दिखाने वाले अमेरिकी मॉडर्न हैं?

यह बहुत बाद का उदाहरण हैं. हम भारतीय तो प्राचीनकाल से ही आधुनिक और प्रगतिशील रहे हैं. हमारी समग्र जीवनशैली ही आधुनिक एवं उन्नत थी. ज्ञान-विज्ञान एवं अध्यात्म के क्षेत्र सहित हमारे देश में कला, संगीत जैसे विषयों का निर्माण हुआ, वह उन्नत बना और कालान्तर में प्रगल्भ हुआ. सभी कलाओं को एक निश्चित स्वरूप में बांधने का काम भारत ने किया है.

यदि हम अपनी गायन / वादन परंपरा को देखें, तो यह बहुत ही प्राचीन है. देवी सरस्वती एक प्राचीन देवता हैं. उनके हाथों में हमें वीणा दिखाई देती है. नौवीं शताब्दी में श्रृंगेरी में निर्मित शारदाम्बा देवी का मंदिर यह सरस्वती देवी का ही मंदिर है. गदग में भी देवी सरस्वती का एक मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित है. परन्तु सरस्वती की मूर्तियां इससे भी पहले के कालखंड की प्राप्त होती रहती हैं. सरस्वती की सबसे प्राचीन मूर्ति भी भारत में ही खोजी गई है, जो कि पहली शताब्दी की है. कहीं-कहीं नृत्य शारदा की मूर्ति भी मिलती है, परन्तु अधिकाँश मूर्तियां अपने हाथ में वीणा लिए हुए हैं. अर्थात वीणा नामक वाद्य को हम कितना पुराना मानें?? कम से कम एक – दो हजार वर्ष पुराना तो माना ही जा सकता है. अर्थात हमारी संस्कृति में संगीत का उल्लेख कितने प्राचीनकाल से है.

सरस्वती द्वारा धारण की जाने वाला ‘वीणा’ नामक तंतुवाद्य कम से कम चार हजार वर्ष पुराना होने का अनुमान है. प्राचीनकाल में ‘एकतंत्री वीणा’ हुआ करती थी. भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में ‘चित्रा’ (७ तारों की) तथा ‘विपंची’ (९ तारों की), इन प्रमुख वीणाओं का उल्लेख किया है, साथ ही घोषा, कच्छभी जैसी दोयम दर्जे की वीणाओं का उल्लेख भी है.

परन्तु संगीत का उल्लेख हमारे वैदिक कालखंड से ही देखने को मिलता है. ऋग्वेद को विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है, जो कि पाँच हजार वर्ष पुराना है. ऋग्वेद में संगीत का उल्लेख है. यजुर्वेद के ३० वें काण्ड के १९ एवं २० वें मंत्र में अनेक वाद्यों को बजाए जाने का उल्लेख है. अर्थात उस जमाने में भी ‘वाद्यों को बजाना’ कला ही मानी जाती थी. वाण, वीणा, कर्करीया, तंतुवाद्य के साथ ही अवनद्ध वाद्यों के तहत दुंदुभी, गर्गरा, एवं सुषिर वाद्यों के अंतर्गत बाकुर, नाड़ी, तनव एवं शंख इत्यादि का उल्लेख आता है.

सामवेद में संगीत का विस्तार से वर्णन मिलता है. उस काल में स्वरों को ‘यम’ कहा जाता था. सामवेद में ‘साम’ का घनिष्ठ सम्बन्ध संगीत से ही था. यह इतना घनिष्ठ है कि ‘छान्दोग्योपनिषदः’ में प्रश्न पूछा गया है,

‘कां साम्नो गतिरीती?
स्वर इति होवाच

अर्थात ‘साम’ की गति क्या है? इसका उत्तर है – स्वर.

वैदिक काल में तीन स्वरों के गायन को ‘साम्रिक’ (वर्तमान में ‘सामूहिक’) कहा जाता था. ये स्वर थे – ग, रे, स.. आगे चलकर यह सात स्वर बने. स्वरों के जो क्रम निर्धारित किए गए और जिनसे एक समूह बना उसे ‘साम’ कहा जाने लगा. फिर बाद में यूरोप वालों ने उनके संगीत के इन क्रमों को ‘स्केल’ नाम दिया.

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि भारत की संस्कृति में लगभग तीन से चार हजार वर्ष पहले पूर्णतः विकसित संगीत हुआ करता था. आगे चलकर भरत मुनि का नाट्यशास्त्र हमें मिला, और भारतीय संगीत की प्राचीनता पर मुहर लग गई.

भरत मुनि का कालखंड ईसा पूर्व लगभग पाँच सौ वर्ष पहले माना जाता है. परन्तु इस सम्बन्ध में कुछ विवाद भी है. कोई इनका जन्म ईसा पूर्व सौ वर्ष पहले हुआ, ऐसा भी कहते हैं. परन्तु चाहे जो भी हो, भरत मुनि के इस नाट्यशास्त्र ने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात प्रतिपादित की, वह ये कि भारतीय कलाएं अपने पूर्ण विकसित स्वरूप में तथा एकदम वैज्ञानिक पद्धति के साथ अस्तित्त्व में थीं, यह ठोस स्वरूप में सिद्ध हुआ.

इस ग्रन्थ में नाट्यशास्त्र के साथ ही अन्य सहायक कलाओं की भी व्यवस्थित जानकारी दी गई है. गीत-संगीत संबंधी विस्तृत विवरण इस ग्रन्थ में मिलता है.

अब प्रश्न यह उठता है कि विश्व का सबसे पुराना संगीत कौन सा है? अथवा सबसे पुराना वाद्य कौन सा माना जाएगा? ऐसा कहते हैं कि ईसा पूर्व ४००० वर्ष पहले मिस्र के लोगों ने बांसुरी जैसे कुछ वाद्यों का निर्माण किया था. डेनमार्क में भी ईसा पूर्व २५०० वर्ष पहले ट्रम्पेट जैसे वाद्य का निर्माण हुआ था.
परन्तु पाश्चात्य संस्कृति को सुरों की विशिष्ट श्रेणी में पहुँचाया पायथागोरस ने, अर्थात ईसा पूर्व ६०० वर्ष पहले. इन्होने स्वरों का मंडल तैयार किया एवं उसकी गणितीय परिभाषा में रचना की.

दुर्भाग्य से भारत में हजारों प्राचीन ग्रन्थ और उनके अवशेष मुस्लिम आक्रमणों में नष्ट हुए. इसलिए हमें अपना एक निश्चित इतिहास निर्धारण करना संभव नहीं होता. परन्तु ईसा पूर्व २५०० वर्ष पहले की कुछ जानकारियां अवश्य मिलती हैं एवं उसके अनुसार संगीत अथवा वाद्यों में कोई नई खोज हुई है, ऐसा प्रतीत नहीं होता. किसी एकाध विकसित कला को शब्दबद्ध करने संबंधी विवरण हमें मिलता है. अर्थात ये कलाएं और वाद्य उससे भी बहुत पहले के थे यह स्पष्ट होता हैं.

परन्तु ऋग्वेद एवं सामवेद में संगीत का उल्लेख देखते हुए यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि हमारा संगीत कम से कम पांच हजार वर्ष पुराना तो है ही. और मजे की बात यह भी है कि सामवेद के सूत्रों में हमें एक पूर्ण विकसित तथा प्रगल्भ संगीत व्यवस्था दिखाई देती हैं.

वेदों के साथ ही अनेक उपनिषदों से भी गीत-संगीत एवं अन्य कलाओं का उल्लेख मिलता है. श्रोत सूत्रों में से एक कात्यायन का श्रोत सूत्र है. मूलतः यह वैदिक कर्मकांड संबंधी ग्रन्थ है. परन्तु उसमें भी विभिन्न उत्सवों के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों की भरमार है. इस श्रोत सूत्र का कालखंड लगभग साढे तीन हजार वर्षों पूर्व का माना जाता है.

जब हम पश्चिमी संगीत का विचार करते हैं, तब एक मजेदार बात पता चलती है. पश्चिमी संगीत में दो हजार / ढाई हजार / तीन हजार वर्ष पहले के उल्लेख मजबूती से किए हुए दिखाई देते हैं और इन उल्लेखों में कोई नई खोज, अथवा किसी नए आविष्कार के बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया है.

इसके उलट भारतीय ग्रंथों में हमें जो वर्णन मिलता है, वह किसी विकसित संगीत पद्धति की जानकारी रहती हैं. सामवेद के सूत्रों में भी विकसित किए गए संगीत का उल्लेख भी है. इसका सीधा अर्थ है कि भारतीय संगीत पूर्णरुप से शास्त्रशुध्द पद्धति से, हजारो वर्ष पहले विकसित हो चुका था. कितने वर्षों पहले?? यह कहना कठिन है…!

हमारा एक और दुर्भाग्य ये भी है कि भारतीय कलाओं के बारे में इतिहास में जो भी सन्दर्भ आते हैं, वे अधिकांश पश्चिमी शोधकर्ताओं के ही होते हैं. ब्रॉडीज़, वुइनडिश, वी. स्मिथ, पिशेल, याकोबी, हार्मन कीट… इत्यादि शोधकर्ताओं का बोलबाला है. स्वाभाविक है कि भारतीय संगीत के इतिहास को एक विशिष्ट उपेक्षित निगाह से ही देखा गया है.

जैसे गीत-संगीत का मामला है, वैसे ही नाटक के बारे में भी है. भारत के समान विकसित नाट्यशास्त्र यदि सर्वांग रुप में कहीं प्रसारित हुआ, तो वह देश है ‘ग्रीस’. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी में इस बात को लेकर जबरदस्त विवाद उत्पन्न हुआ था कि क्या भारतीयों द्वारा ग्रीस के रंगभूमि की नकल की गई, अथवा ग्रीस की रंगभूमि ही भारतीय नाट्यशास्त्र से प्रभावित होकर उभरकर आई थी…!

इन दोनों बातों में से कौन सी बात सही है…? यह हम अगली कड़ी में देखेंगे…!
✍🏻 प्रशांत पोळ

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