भारतीय शिल्प कला : कला की सर्वोच्च अभिव्यक्ति

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लेखक:- प्रशांत पोळ

सन १९५७ की घटना है. उज्जैन में रहने वाले एवं पुरातत्व विषय के विश्व प्रसिध्द जानकार, डॉक्टर श्रीधर विष्णु वाकणकर, ट्रेन से दिल्ली से इटारसी प्रवास कर रहे थे. भोपाल स्टेशन निकलने के बाद उन्हें पहाड़ों के बीच कुछ विशेष फॉर्मेशन दिखाई दिए. डॉक्टर वाकणकर ने वे फॉर्मेशन तत्काल पहचान लिए, क्योंकि उन्होंने वैसे ही फॉर्मेशन स्पेन और फ्रांस में भी देखे थे. इसीलिए डॉक्टर वाकणकर का कौतूहल जागृत हुआ और पुरातत्त्व विभाग की एक टीम लेकर वे उन पहाड़ों के बीच जा पहुँचे.

वाकणकर जी के इन प्रयासों के कारण भारतीय इतिहास का, भारतीय कला का, भारतीय शिल्पशास्त्र का एक छोटासा रोशनदान खुला. यह स्थान था भीमबेटका. यहाँ पर लगभग ४०,००० वर्ष पहले के दीवारों पर उकेरे हुए चित्र मिले. प्राचीन भारतीय कला का यह पहला नमूना था..!

आज की तारीख में भीमबेटका को यूनेस्को के संरक्षित स्मारकों की सूची में रखा गया है. यहाँ पर लगभग साढ़े सात सौ शैलाश्रय अथवा शैलगृह (सरल भाषा में कहें तो ‘गुफाएं’) हैं. इनमें से पाँच सौ गुफाओं में चित्रकारी स्पष्ट दिखाई देती है. इन चित्रों में बाघ, हिरन, हाथी, बैल, मोर इत्यादि प्राणियों के चित्र हैं. प्रमुख बात यह है कि इन चित्रों में घोड़ा भी है. अर्थात भारत में अति-प्राचीनकाल से मनुष्य के साथ घोडा भी था यह सिद्ध होता है. कुछ इतिहासकारों ने ऐसा नरेटिव बनाने का प्रयास किया हैं कि अरबी आक्रमणकारी, अपने साथ घोड़ा नामक प्राणी भारत लेकर आए थे.

विश्व के अन्य देशों के मुकाबले भारत में अत्यंत सुन्दर एवं शास्त्रीय पध्दति की मूर्तिकला विकसित हुई थी. लेकिन आक्रांताओं ने भारत में जो मूर्तिध्वंस किया, उसके कारण विश्व में सबसे शुरुआती की कही जानी मूर्तियों की खोज में जो मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, उनमें से भारत की एक भी नहीं है. ‘लौवेन्मेंश फिगरीन’ नामक मूर्ति जो विश्व की सबसे पहली मूर्ति मानी जाती है वह जर्मनी के आल्प्स पर्वत क्षेत्र में प्राप्त हुई है. कार्बन डेटिंग के परिणामों के अनुसार संभवतः यह मूर्ति तीस से पैंतीस हजार वर्ष पुरानी होने का अनुमान है.

इजिप्त में दिखाई देने वाले स्फिंक्स एवं मूर्तियां इसके काफी बाद के कालखंड की, अर्थात ईसा के पूर्व ढाई हजार वर्ष पुरानी हैं. रूस के साईबेरिया इलाके में लकड़ी की जो प्रतिमा मिली है, उसे ‘शिगीर आयडल’ कहा जाता है. यह मूर्ति लगभग ग्यारह हजार वर्ष पहले की (अर्थात ईसा पूर्व नौ हजार वर्ष पहले) की है. तुर्कमेनिस्तान में मिली हुई मूर्तियां छः हजार वर्ष से अधिक प्राचीन हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस मूर्ति में भारतीय शैली की झलक दिखाई देती है.
मूलतः बहुत प्राचीन मूर्तियों के निर्माण में ‘मिट्टी’ एक सहज एवं सरल माध्यम के रूप में दिखाई देती है. परन्तु ‘मिट्टी’ की मूर्तियां अधिक समय तक टिकाऊ नहीं होने से मिट्टी की मूर्तियां अधिक नहीं मिलतीं. फ्रांस में आदिमानवों की गुफाओं में लगभग पन्द्रह हजार वर्ष पूर्व की मिट्टी से बनी हुई जंगली भैंसे की आकृतियाँ खोजी गई हैं. भारत में सिंधु घाटी के उत्खनन में पकाई हुई मिट्टी के कई अच्छे शिल्प प्राप्त होते हैं. सिंधु घाटी, अर्थात मोहन जोदड़ो एवं हडप्पा का कालखंड साढ़े पाँच हजार वर्ष पूर्व का माना जाता है.

भारत में मधुमक्खियों के छत्ते से निकलने वाले मोम से तैयार की गई प्रतिमाएं भी मिलती हैं. आगे चलकर इस मोम के माध्यम से मिट्टी के साँचे तैयार किए जाने लगे और इन्हीं में ढालकर धातुओं की मूर्तियां तैयार की जाने लगीं. मोहन जोदड़ो स्थित नृत्यांगना की एक छोटी सी सुन्दर मूर्ति प्राचीनतम भारतीय धातुशिल्प का एक प्रातिनिधिक उदाहरण है. मोहन जोदड़ो एवं हडप्पा में खोजी गई मूर्तियां और मेसोपोटेमिया में मिली हुई मूर्तियों में काफी समानता दिखाई देती है. इस मूर्तिशिल्प में सबसे सुरक्षित मूर्ति एक मनुष्य की है. लगभग सात इंच ऊँचा मस्तक और मजबूत कंधे वाली यह मूर्ति किसी पुजारी के समान लगती है. इसके चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी है और शरीर किसी शाल जैसे वस्त्र से ढंका हुआ है.

इसी उत्खनन में अनेक मुद्राएँ (Seal) भी प्राप्त हुई. यह मुद्राएं चौकोर हैं, और इन पर बैल इत्यादि प्राणियों के चित्र खुदे हुए हैं. परन्तु बैल अथवा अन्य जानवरों की आकृतियाँ एकदम कलात्मक तरीके से चित्रित की गई हैं. चार सौ से अधिक आकारों में बनाई गई इन मुद्राओं की संख्या दो हजार से भी अधिक है.

भारत में मूल प्रतिमा को मोम से बनाकर उसका सांचा तैयार करने वाली पद्धति चलन में थी. इस तकनीक को प्राचीन शिल्प साहित्य में ‘मधुच्छिष्ट विधान’ कहा गया है. सर्वप्रथम मिट्टी की बजाय शहद के मृदु मोम के सांचे बनाकर प्रतिमाओं का निर्माण किया जाता था. इसके पश्चात मिट्टी, गोबर और धान के अवशेषों के मिश्रण में पानी मिलाकर बनाई गई लुगदी से उस प्रतिमा को आच्छादित किया जाता था. प्रतिमा निर्माण से पहले ही मोम की एक मोटी परत इसमें जुडी होती थी. यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस मोम का दूसरा सिरा प्रतिमा को आच्छादित करने वाले सांचे के पिछले भाग से जुड़ा रहता था. जब इस सांचे को सुखाकर भट्टी में डाला जाता था, तो इसमें से सारा मोम पिघलकर उस सांचे के पिछले भाग में स्थित नली में बाहर निकल जाता था और सांचे के अंदर उस प्रतिमा के आकार का खोखला भाग निर्मित हो जाता था. इसी खोखले भाग में पिघली हुई धातु (तांबा, पीतल अथवा सोने-चाँदी) का रस डालकर बिलकुल मोम की मूल प्रतिमा जैसी धातु की प्रतिकृति प्राप्त की जाती थी. सांचे से निकली हुई प्रतिमा को नक्काशीदार धातुपत्रों से सजाने-संवारने अथवा धातु के हथौड़े से ही ठोंक-ठोंक कर मूर्तियाँ बनाने की परंपरा प्राचीनकाल से दिखाई देती है.

हमारे देश में कांस्य शिल्प अथवा धातुशिल्प की परंपरा बहुत प्राचीन है. ‘यजुर्वेद’ में चाँदी, सीसा और कांसा नामक धातुओं का उल्लेख लोहे जैसी अन्य धातुओं के साथ आता है. अर्थात इन धातुओं का उपयोग कैसे किया जाए, इसकी जानकारी तत्कालीन लोगों को थी. कुछ वर्षों पूर्व औरंगाबाद के पास स्थित ‘दायमाबाद’ के उत्खनन में प्राप्त मूर्तियाँ पंचधातु से निर्मित थीं और कार्बन डेटिंग द्वारा इनका कालखंड तीन हजार वर्ष पुराना सिध्द हो चुका है. इस उत्खनन में प्राप्त प्राणियों की ठोस प्रतिमाओं में खिलौनों जैसे पहिये भी लगे हुए हैं. दो पहियों की बैलगाड़ी भी इस उत्खनन में प्राप्त हुई है.

चौथी शताब्दी के बाद से सांचे और भराव की, अर्थात धातुओं की, मूर्तियाँ तथा अन्य वस्तुएँ बड़े पैमाने पर मिलती हैं. साधारणतः तीन प्रकार की धातुओं से वस्तुओं का निर्माण किया जाता था.

१) देवी-देवताओं की मूर्तियाँ
२) पूजा में काम आने वाले उपकरण – उदाहरणार्थ – दीपक, पूजा की घंटी, खड़े एवं दीवार पर टांगने लायक दीपक इत्यादि
३) दैनंदिन उपयोग में आने वाली वस्तुएँ, जैसे विविध प्रकार के बर्तन, हथियारों की मूठ इत्यादि.

तंजावूर जिले का ‘नाचीर कोईल’ नामक गाँव साँचे की मूर्तियों को ढालने के लिए प्रसिद्ध था, क्योंकि वहाँ पर कावेरी नदी की पीली मिट्टी बड़ी मात्रा में मिलती है, जो कि साँचा बनाने के लिए एकदम उपयुक्त थी. इसी कारण से असम के गुवाहाटी, सातर्बरी, मणिपुर, वाराणसी इत्यादि स्थान धातुओं की मूर्तियों एवं वस्तुओं के लिए अत्यंत प्रसिद्ध हुआ करते थे.

परन्तु धीरे-धीरे शिल्पशास्त्र में भारत के कलाकारों का कौशल विकसित हो रहा था. आगे चलकर इसी कौशल के आधार पर समूचे दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय शिल्प कलाकारों ने अदभुत शिल्पों की रचना करके दिखाई. गांधार शैली एवं मथुरा शैली, इन दोनों प्रकार के प्रवाह से भारतीय शिल्पशास्त्र विकसित होता गया.

परन्तु हडप्पा संस्कृति एवं उसके बाद मौर्य शासन, इनके बीच लगभग दो हजार वर्षों के कोई भी शिल्प हमें नहीं मिले. मौर्य साम्राज्य में निर्मित किए गए शिल्प के बारे में, उस शिल्प की भव्यता एवं प्रमाणबद्धता के बारे में सिकंदर के समय भारत आए हुए ग्रीक इतिहासकार मेगास्थनीज़ ने बहुत कुछ लिखा हुआ है. इसी श्रृंखला में उनके द्वारा लिखी गई ‘इंडिका’ नामक पुस्तक में पाटिलपुत्र के विभिन्न शिल्पों के बारे में, तथा नगर की भव्यता के बारे में भी उन्होंने विस्तार से लिखा है.

सम्राट अशोक का कालखंड ईसा पूर्व ३०४ से लेकर २३२ वर्ष तक था. अर्थात आज से लगभग साढे बाईस सौ वर्ष पहले. अशोक के कालखंड की अनेक प्रतिमाएं, अनेक शिल्पाकृति आज भी हमें देखने को मिलते हैं. अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था और बौद्ध धर्म के प्रसार हेतु उसने मूर्तिकला को माध्यम बनाया. अनेक स्तंभ, अनेक स्तूप, अनेक शिलालेख, अनेक मूर्तियाँ उसने बनवाईं. उसके काल में निर्मित किए गए चार सिंहों का प्रतीक, आज ‘अशोक चिन्ह’ के रूप में भारत की राष्ट्रीय पहचान है. सिंहों का यह प्रतीक चिन्ह थाईलैंड से भी प्राप्त हुआ है.

अलबत्ता भारतीय शिल्पशास्त्र का उच्च स्थान और शीर्ष कलाकृतियाँ हमें बहुत आगे के कालखण्ड में, अर्थात सातवीं और आठवीं शताब्दी में देखने को मिलती हैं. वेरूळ (अंग्रेजी में एलोरा) स्थित ‘कैलाश मंदिर’ दुनिया का एक अदभुत आश्चर्य है. एक ही विशाल शिलाखण्ड को काट-छाँट कर बनाया गया यह शिल्प मानवीय शिल्पकला का अविश्वसनीय और अप्रतिम उदाहरण है. ऐसा अनुमान है कि लगभग सन ६०० से ७५० के बीच इन गुफाओं और कैलाश मंदिर का निर्माण किया गया है. हालाँकि कुछ पुरातत्वविदों के अनुसार इसका कालखंड और भी पहले का है. फिर भी जितने उपलब्ध प्रमाण हैं, उनके अनुसार वेरूळ की इन शिल्पकला का कालखंड राष्ट्रकूट शासकों का है. ऐसा माना जाता है कि राजा कृष्ण (प्रथम) ने आठवीं शताब्दी के आरम्भ में इन गुफाओं के निर्माण का आरम्भ किया. परन्तु एच. गोझ नामक इतिहासकार के अनुसार कृष्ण राजा के भतीजे दान्तिदुर्ग (सन ७३५-७५६) ने अपनी युवावस्था में ही इनका निर्माण कार्य आरम्भ करवा दिया था. अलबत्ता एम. के. ढवलीकर नामक इतिहासकार के मतानुसार राजा कृष्ण ने यह शुरू किया था.

फिर भी इतना तो निश्चित है कि उस कालखंड में जो भी निर्माण हुए, वे अदभुत हैं. मानवीय बुद्धि को अचंभित कर देने वाले हैं. सम्पूर्ण विश्व में कहीं भी, एक ही शिलाखण्ड को ऊपर से नीचे की ओर काटकर-छाँटकर-खोदकर ऐसा भव्य शिल्प नहीं बनाया गया है…!

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे मंदिर परिसर के सभी शिल्प अत्यंत सुन्दर और प्रमाणबध्द हैं. अत्यंत कुशल एवं बुद्धिमान मूर्तिकारों / कारीगरों ने इन शिल्पों को तैयार किया है. निश्चित रूप से यह निर्माण कार्य कुछ पीढ़ियों द्वारा लगातार, अपना पूर्ण हुनर दिखाते हुए, पूर्ण किया गया होगा. हमारा दुर्भाग्य है कि आज हमारे पास इन मूर्तिकारों की, कलाकारों की, योजनाकारों की कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है.

यह मंदिर, पट्टडकल (कर्नाटक) स्थित विरूपाक्ष मंदिर जैसा है, जो कि कांची स्थित कैलाश मंदिर की प्रतिकृति है. २७६ फुट लम्बाई, १५४ फुट चौड़ाई, और ९० फुट ऊँचाई का यह आश्चर्यजनक मंदिर सभी दृष्टि से वैशिष्ट्यपूर्ण है. इस मंदिर को यूनेस्को द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक की सूची में भी स्थान मिला हुआ है.

आगे चलकर ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में पश्चिम दिशा से आने वाले मुस्लिम आक्रमण तीव्र होते चले गए, इस कारण इन मंदिरों का निर्माण कार्य धीमा पड़ गया और इसी के साथ अत्यंत उन्नत किस्म की भारतीय शिल्पकला का पतनकाल आरम्भ हुआ. कालान्तर में विश्व को अचंभित करने वाले शिल्पों का निर्माण करने वाले हम भारतीय, अपनी ही उच्च विरासत को भूलते चले गए…!!
✍🏻प्रशांत पोळ

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