अभी हमने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को उनकी जयंती के अवसर पर याद किया है। उन्हें आपातकाल का लोकनायक माना गया है, उनके नाम के स्मरण मात्र से आपातकाल की स्मृतियां और आपातकाल के प्रति जिज्ञासाएं अनायास ही उभर आती हैं। आपातकाल की घोषणा के विषय में यह प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से आता है कि क्या आपाताकल की घोषणा आवश्यक थी? दूसरे आपातकाल की घोषणा के पश्चात 19 महीनों में जो कुछ हुआ क्या वह न्यायोचित था?

जब 1977 में कांग्रेस सरकार को लोगों ने आम चुनाव में धूल चटाकर सत्ता से बाहर कर दिया और देश के शासन की बागडोर जनता पार्टी ने संभाली, तो प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार ने 1977 में ‘शाह आयोग’ की नियुक्ति की। इस आयोग का मुख्य कार्य इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजना था, जो हमने ऊपर उठाये हैं।

‘शाह आयोग’ ने उस समय श्रीमति इंदिरा गांधी को अपने समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किया था। श्रीमती गांधी इस आयोग के समक्ष प्रस्तुत हुईं और उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि उन्हें किन कारणों से आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी? श्रीमती गांधी ने अपने पक्ष को स्पष्ट करते हुए उस समय के विपक्ष पर यह आरोप लगाया था ‘‘कि विनाशकारी शक्तियां उन्हें असंवैधानिक उपायों से सत्ता से हटाकर स्वयं सत्तासीन होना चाहती थीं।’’

श्रीमती गांधी का कहना था कि बांगलादेश से लाखों शरणार्थियों के आगमन, पाकिस्तान से युद्घ और 1974 के भयंकर सूखे व तेल संकट से निपटने के लिए सरकार भरसक कोशिश कर रही थी, परंतु विपक्षी दल लोकतांत्रिक संस्थाओं को ठप्प करने पर उतारू हो गये थे। गुजरात और बिहार की जनता द्वारा चुनी गयी विधानसभाओं और सरकारों पर ‘विनाशकारी शक्तियों’ के द्वारा प्रहार किया गया। परिणामस्वरूप विधानसभा गठन के कुछ ही महीनों के पश्चात गुजरात विधानसभा को भंग करना पड़ गया। श्रीमती गांधी का यह भी आरोप था कि जयप्रकाश नारायण उस समय सेना और पुलिस को सरकार के विरूद्घ विद्रोह के लिए उकसा रहे थे।

श्रीमती गांधी ने ‘शाह आयोग’ के समक्ष स्पष्ट किया था कि साम्प्रदायिक और सामंती शक्तियां सरकार के विकास कार्यों में बाधा डाल रही थी, जैसा कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के समय इन शक्तियों का वास्तविक स्वरूप देखा गया था। श्रीमती गांधी का मत था कि राष्ट्र की एकता लोकतांत्रिक अधिकारों से भी अधिक महत्वपूर्ण है, और जब संपूर्ण देश की एकता को ही संकट हो तो उस समय लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को असीमित नही रखा जाना चाहिए।

श्रीमती गांधी का यह भी मत था कि उस समय भारत की एकता और सुरक्षा दोनों को संकट था। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरूआ थे, जिन्होंने श्रीमती गांधी की चाटुकारिता करते हुए यहां तक कह दिया था कि ‘इंदिरा इज इंडिया एण्ड इंडिया इज इंदिरा।’ देवकांत बरूआ ने ऐसा इसलिए कहा था कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता की गारंटी इस समय केवल इंदिरा गांधी ही हैं।

जब आपातकाल समाप्त हो गया तो इंदिरा विरोधी नेता इंदिरा गांधी के ‘शाह आयोग’ के समक्ष दिये गये उपरोक्त तर्कों से पूर्णत: असहमत थे। उनका कहना था कि खतरा देश की एकता को नही, बल्कि स्वयं इंदिरा गांधी को था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने आपको प्रधानमंत्री बनाये रखने के लिए आपातकाल लागू करने का निर्णय लिया था। इन लोगों का यह भी कहना था कि बिहार में जयप्रकाश नारायण को आंदोलनकारियों ने यह विश्वास दिलाया था कि वे शांति भंग नही होने देंगे। वास्तव में इंदिरा गांधी ने यूपी हाईकोर्ट के उस निर्णय से घबराकर देश में आपातकाल लागू किया था, जिसमें उनके चुनाव को ही न्यायालय में गैर कानूनी घोषित कर दिया था। इससे प्रधानमंत्री को त्यागपत्र देना पड़ सकता था।

‘शाह आयोग’ ने अपने निष्कर्ष में यह स्पष्ट किया था कि ‘आपातकाल की घोषणा देश की जनता के साथ धोखेबाजी थी।’ ‘शाह आयोग’ का यह भी निष्कर्ष था कि आपातकाल की घोषणा करने से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल और तत्कालीन गृहमंत्री ब्रह्मानंद रेड्डी तक से भी कोई सलाह नही ली थी, इस प्रकार आपातकाल की घोषणा प्रधानमंत्री का व्यक्तिगत निर्णय था। आयोग का मत था कि देश में एक आपात स्थिति पहले से ही लागू थी जोकि 1971 के भारत पाक युद्घ के समय लागू की गयी थी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ऐसे प्रयास किये थे कि प्रमुख समाचार पत्रों के 26 जून के प्रात:कालीन संस्करण निकल नही सके। इसके लिए प्रधानमंत्री ने समाचार पत्र कार्यालयों की बिजली बंद करा दी थी। प्रधानमंत्री के निर्देशों पर अमल करते हुए करीब एक लाख दस हजार लोगों को निवारक नजरबंदी कानूनों के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया था। सरकार ने अपने ही दल के सदस्यों और विपक्षी दलों के नेताओं के टेलीफोन टेप करने आरंभ कर दिये थे। इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ मंत्री बाबू जगजीवनराम पर कड़ी निगरानी रखी गयी, और उनके टेलीफोन टेप करने की सरकार की नीति को ‘शाह आयोग’ ने अनुचित करार दिया।

उस समय अटल बिहारी वाजपेयी को बंगलौर की जेल में रखा गया था। जहां उन्होंने ‘कैदी कविराय’ के नाम से कुंडलियां लिखी थीं। उनकी इन कुंडलियों में जहां उनका विनोदी स्वभाव झलकता था, वहीं उस समय की व्यवस्था पर एक करारा व्यंग्य और यथार्थ को छूती हुई उनकी कलम की ताकत का अनुभव भी होता है। उन्होंने लिखा था-

जेपी डारे जेल में, ताको यह परिणाम,
पटना में परलै भई, डूबे धरती धाम।
डूबे धरती धाम मच्यो कोहराम चतुर्दिक,
शासन के पापन को परजा ढोवे धिक-धिक।
कह कैदी कविराय प्रकृति का कोप प्रबल है,
जयप्रकाश के लिए धधकता गंगाजल है।’

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