गोशाला को लाभदायक बनाना जरूरी

calf-cowजगजीत सिंह दुखिया

जब तक गाय दूध देती है, तब तक उसकी खूब सेवा होती है और जैसे ही गाय ने दूध देना छोड़ा नहीं कि वह सडक़ पर आ जाती है। सड़क़ पर आने के बाद वह अपना पेट पालने के लिए किसी खेत में घुसेगी या फिर कोई और नुकसान करेगी। तब तो स्थिति और भयावह हो जाती है, जब माता कही जाने वाली गाय को बुरी तरह पीटा जाता हैज्मनुष्य आरंभ से ही स्वार्थी रहा हैऔर उसकी यह आदत आज भी बदस्तूर जारी है। हम उदाहरण लोगों द्वारा छोड़े पशुओं का ही लेते हैं, जिन्हें मनुष्य अपना मतलब साधने के बाद छोड़ देता है। जब तक गाय दूध देती है, तब तक उसकी खूब सेवा होती है और जैसे ही गाय ने दूध देना छोड़ा नहीं कि वह सडक़ पर आ जाती है। सड़क़ पर आने के बाद वह अपना पेट पालने के लिए किसी खेत में घुसेगी या फिर कोई और नुकसान करेगी। तब तो स्थिति और भयावह हो जाती है, जब माता कही जाने वाली गाय को बुरी तरह पीटा जाता है। इसी हालत को देखते हुए माननीय हाई कोर्ट ने लावारिस पशुओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण फैसला दिया था। प्रदेश में सरकार ने हर पंचायत में गोशाला या गोसदन खोलने के आदेश दे रखे हैं, ताकि लावारिस पशुओं से निजात मिल सके, जो फसलों का नुकसान कर रहे हैं और सडक़ों पर दुघर्टनाओं का कारण बन रहे हैं। यह सब माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार हो रहा है, नहीं तो सरकार के पास इन बातों के लिए समय ही कहां है। हिमाचल हाई कोर्ट ने प्रत्येक पंचायत के प्रधान को निर्देश दिए हैं कि हर पंचायत में एक गोशाला या गोसदन खोला जाए और कोई भी लावारिस पशु सडक़ों पर घूमता न मिले।

हम देख रहे हैं कि इस तरफ बहुत कम प्रधानों का ध्यान गया है और न ही उनके वश की बात है। इस संदर्भ में जो कुछ भी सकारात्मक हो रहा है, वह वही लोग कर रहे हैं, जो धार्मिक तौर पर गोवंश को प्यार करते हैं और इसकी पूजा करते हैं। सरकार तो हिमाचल हाई कोर्ट के दिशा-निर्देश के कारण हरकत में आई है, वह भी बहुत धीमी गति से। जहां तक प्रधानों का प्रश्न है, इन कामों के लिए उनके पास भी समय नहीं है। अब तो बिलकुल ही नहीं, क्योंकि पंचायतों के चुनाव आने वाले हैं। वे तो अपनी कुर्सी बचाने के फिक्र में हैं। यह समस्या प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय समस्या है। अत: इसके लिए एक मकम्मल राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए। कन्याकुमारी से कुल्लू मनाली तक अगर हम सफर करें तो हर जगह, हर शहर व कस्बे में बेसहारा पशु नजर आ जाएंगे। खासकर सडक़ों के इर्द-गिर्द फसलों का नुकसान तो होता ही है, पर दुर्घटनाओं के कारण कई कीमती जानें चली गईं और भविष्य में भी यह खतरा टला नहीं है। हम हर रोज ऐसी खबरें पढ़ते रहते हैं। हरियाणा सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाया है जिसमें लावारिस पशुओं पर काबू पाने के लिए हर जिले को 20 लाख रुपए देने का ऐलान किया है। अब मुश्किल यह है कि आवारा पशुओं में अधिक संख्या सांडों की है। खेतीबाड़ी अब मशीनों से होती है। बैलों से खेती का काम बहुत कम लोग करते हैं। इसलिए जब गऊ बछड़े को जन्म देती है तो उसे कुछ देर बाद छोड़ देते हैं। खुला रहकर वह बहुत शक्तिशाली हो जाता है और जल्दी पकड़ा नहीं जाता। इसी कारण दुर्घटनाएं होती हैं। जो गोवंश हम दूसरे देशों से दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए लाए हैं, वह भी इन लावारिस पशुओं की अधिकता का कारण है। दूध तो वे अधिक देती हैं, पर वैज्ञानिक तरीके से गाभिन होने के बाद भी यह गउएं दूध देती रहती हैं। दूध के लालच में किसान गऊ के सूने तक दूध लेता रहता है। उस गाय में इसी कारण इतनी कमजोरी आ जाती है कि वह दोबारा गाभिन नहीं हो पाती और उसे भी लावारिस छोड़ दिया जाता है। इस तरीके से इन पशुओं की संख्या बढ़ती ही जाती है। खुले फिरने वाले बैल या सांड अकसर आने-जाने वाले राहगीरों  पर हमला कर देते हैं। अत: यह समस्या ऐसी है, जिस पर बहुत संजीदगी से गौर होनी चाहिए। इतना बड़ा काम करने के लिए कोई विशेष महकमा  खोलना पड़ेगा या पशु चिकित्सा विभाग को और बढ़ाकर इसको यह जिम्मेदारी दी जाए। यह पंचायतों के वश की बात नहीं है। गोशालाओं या गोसदनों का उचित प्रबंध करके इसे लाभदायक  बनाया जा सकता है।

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