मनुष्य की उलझन और ‘मैं’ और ‘मेरा’ का समाधान

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मनुष्य ब्रह्म और काया को देख अथवा समझ नहीं पाता ।
प्रश्न क्यों नहीं विमोचन या देख पाता?
उत्तर क्योंकि शरीर में छिपा हुआ चेतन एवं विभू दिखाई नहीं देते। लेकिन चेतन चेतना करता रहता है अर्थात् चेतावनी देता रहता है ,परंतु विषय भोगों में फंसकर मनुष्य चेतावनी को अर्थात चेतन की चेतना को अनसुनी कर देता है , उपेक्षित कर देता है।
प्रश्न विषय भोगों में मन क्यों लगा रहता है?
उत्तर विषय भोगों में मन इसलिए लगा रहता है कि मृत्यु याद ही नहीं आती।
प्रश्न मनुष्य छल कपट आदि क्यों करता है?
उत्तर इसलिए की अज्ञानता वश परमात्मा को सर्वव्यापक नहीं समझता अर्थात ईश्वर सभी जगह विद्यमान हैं, सर्वत्र उपस्थित है, इस सिद्धांत की उपेक्षा कर देता है।इसलिए पाप करता है।
अगर जीव समझ ले कि ईश्वर यहां भी उपस्थित हैं, वहां भी उपस्थित है और सभी जगह उपस्थित है ,जो सर्वांतर्यामी है , सर्वव्यापक है,अर्थात वह सब जगह मुझे देख रहा है तो जीव पाप कर ही नहीं सकता, पाप हो ही नहीं सकता।
अब उसी मूल प्रश्न पर की जीव ब्रह्म और काया का विमोचन क्यों नहीं कर पाता पर लौट कर के आते हैं।
एक अन्य प्रासंगिक प्रश्न भी उत्पन्न होता है कि जीव के चले जाने के बाद या मृत्यु को प्राप्त हो जाने के पश्चात कौन चला गया? कौन गुजर गया ?वह कौन था?
वास्तव में उत्पत्ति एवं नाश है ही नहीं ,यह केवल प्रतीति मात्र है ।यह केवल भ्रांति मात्र है ।यह ऐसा हमको होता हुआ केवल दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार जन्म मृत्यु दोनों ही प्रतीति अर्थात भ्रांति मात्र हैं।
जीव की उत्पत्ति, स्थिति वा प्रलय किस प्रकार होती है इसको देखें।
जल में आपने तरंग उठती हुई देखी ।जो तरंग कुछ समय तक जल में बनी रहती है ,और हमको दिखाई देती रहती है ,लेकिन किनारे की ओर पहुंचते-पहुंचते समाप्त हो जाती है । जल शांत हो जाता है । जल जल ही रह जाता है।
एक और उदाहरण से जानें। आपके पास सोना है ।
सोना को आप सुनार के पास लेकर जाते हैं ।सुनार से कहते हैं कि इसमें से कंठी बना दे । फिर कुछ समय बाद कहते हैं कंठी तोड़कर माला या मोहर बना दे ।अब देखिए सोना तो सोना ही रहा है । कुछ समय के लिए कंठी में और कुछ समय के लिए मोहर् में अर्थात कंठी रुपी शरीर में अथवा मोहर के शरीर में दिखाई पड़ रहा था ।लेकिन मौलिक रूप से केवल सोना था। सुनार के पास जाने के पश्चात दूसरा शरीर धारण कर लेता है ।तो यहां अध्यात्म कथा में सुनार ईश्वर है जो भिन्न-भिन्न रूप में हमारे शरीरों को बना रहा । जो मृत्यु रूपी अग्नि पर तपाकर पुन: शुद्ध जीवन दे देता है सुनार की तरह। परंतु जिसके साथ शरीर बना रहा वह केवल जीव है। जीव अमर है ,अनादि है ,अचल है,नित्य है।
तीसरा एक
बहुत अच्छा उदाहरण भी है। मिट्टी को कुम्हार लाता है और उसमें से नाना प्रकार के बर्तन बना देता है घड़ा, नाद ,सकोरा आदि
आदि ।
जब यह मिट्टी का बर्तन फूट जाता है ,तो मिट्टी मिट्टी मिल में जाती है ।अर्थात वह तो कुछ समय के लिए घड़े में अथवा सकोरा में दिखाई ही पड़ रही थी। वह एक स्थिति हुई, अर्थात शक्ल में, आकृति में थी। अब बाबू मिट्टी का बर्तन फूट जाने के बाद वह स्थिति भी नहीं रही जो मिट्टी थी मिट्टी ही रह गई।
यही यथार्थ है। यही शाश्वत सत्य है।
इसीलिए कहा गया।
माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा मैं रोदूंगी तोय ।
चौथा एक उदाहरण और लेते हैं ।एक ट्यूबवेल चलता होता है। पानी की हौज बनी होती है ।पानी उस हौज में पाइप से आता है । जब हौज से बाहर जाता है तो पानी के बुलबुला बनते हैं । वे बुलबुले कुछ दूर तक चलते हैं ।आकृति बुलबुले की दिखाई पड़ती है ,फिर नष्ट हो जाती है । यह बुलबुले की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय काल था।जिसके लिए निम्न प्रकार कहा गया
“पानी कैसा बुदबुदा अस मानस की जात।
देखत ही छुप जाएंगे जो तारे प्रभात।”
अर्थात प्रभात में जैसे सूर्य के निकल जाने के पश्चात तारे छुप जाते हैं, ऐसे ही मृत्यु के पश्चात मनुष्य की वह स्थिति शरीर की नस होती है।
इससे स्पष्ट होता है की उत्पत्ति अर्थात पैदा होना , स्थिति यानी शरीर , तो मात्र प्रतीति है।
यह केवल देह की उत्पत्ति, स्थिति, विनाश होता है।
परंतु देह के साथ जो आत्मा है अर्थात शरीर धारण करने के पश्चात जो जीवात्मा कही जाती है,उस जीवात्मा का नाश कभी नहीं होता। क्योंकि आत्मा अमर है। केवल शरीर का नाश होता है।
प्रकृति में केवल सत होता है। आत्मा में सत और चित् दो गुणतत्व होते हैं
यदि आत्मा में सत ना होता तो असत भान पड़ता और असत की तीनों काल में प्रतीति नहीं होती ।किंतु आत्मा था ,आत्मा है, और आत्मा रहेगा। इसलिए तीन काल में प्रतीति उसकी होती रहती है। हम यूं भी कह सकते हैं कि आत्मा सत् है , वह आत्म चित यानी कि चेतन है, क्योंकि यदि आत्मा चेतन न होता और जड़ होता तो जड़ आदि शरीर आदि को कैसे जान सकता, शरीर को कैसे चलाता, किंतु शरीर को जानता है , उसको चलाता है सारी क्रियाओं का अधिष्ठाता है,इसलिए आत्मा चेतन है। इसलिए उसको सत _चित धारक ही कह सकते हैं।
चारों ओर ,एक ही शोर “मैं” हूं, “मैं “कर दूंगा , “मैं “नहीं होने दूंगा। लेकिन ही “मैं” हूं कौन,? कोई कहता है ये मेरा हाथ है , यह मेरा सिर है, मेरा पैर है अर्थात “मैं “तो कोई और ही है, वह “मैं” जो है वह वही जीवात्मा है जो यह कह रही है ,अंदर बैठी हुई कि यह मेरा सिर है, यह मेरे हाथ हैं ।इस जन्म में मेरा नाम अमुक है, अर्थात मुझे इस नाम से जाना जाता है, सरल शब्दों में कह सकते हैं कि इस शरीर में जो जीवात्मा आई है , इस शरीर की पहचान अमुक नाम से है। इस देह का जो प्रकाशक अर्थात प्रकाश करने वाला या ज्ञाता अर्थात इसको जानने वाला जो साक्षी रूप में अंदर बैठा है, जो परमात्मा तत्व है, जो चेतन है ,उसी में अहम भाव करना और उसे ही “मैं” समझना चाहिए।
संसार में बिजली का तार दिखाई देता है लेकिन उसके अंदर व्यापक बिजली दिखाई नहीं देती ।उसी प्रकार शरीर में आत्मा दिखाई नहीं दे रही है, शरीर दिखाई देता है जैसे मुस्लिम औरतें बुर्का पहनकर चलती हैं तो बुर्का दिखाई देता है। औरत नहीं। परंतु औरत बुर्के में से सबको देख रही होती है ।ऐसे ही जीवात्मा इस शरीर के अंदर बैठी हुई सारे कर कार्यों को देख रही होती है। इसीलिए उसको साक्षी कहा गया है। वह आपको अर्थात मनुष्य को सही मार्ग पर चलने की चेतना देती है ,प्रेरणा देती है इसलिए उसको चेतन कहा गया।
एक और उदाहरण से इसको समझ लें।
हमारे शरीर में नेत्र होता है वह हमारे शरीर का एक अंग है ।लेकिन नेत्र सब को देखता है किंतु बाकी अंग नेत्र को नहीं देख सकते ।ऐसे ही चेतन आत्मा शरीर में वह तत्व है जो सब अंगों को जाने।
अब प्रश्न उठता है कि
आत्मा को साक्षी कैसे कह सकते हैं?
साक्षी के 3 लक्षण होते हैं समीपवर्ती ,निष्पक्ष और चेतन।
यह तीनों लक्षण आत्मा के अंदर विद्यमान हैं। वह समीपवर्ती भी है ,निष्पक्ष भी है ,और चेतन भी। इसलिए आत्मा साक्षी है।
संसार में जो ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या है, इस भावना को निश्चित करके नामरूपात्मक ,जगदा धार, जगता कार वृत्ति का बोध करते हैं उन्हें ही ज्ञानी कहा जाता है।
बहुत कम लोग होते हैं जो यह समझ पाते हैं कि मैं कौन हूं?
मैं कहां से आया हूं ?
मुझे कहां जाना है?
यह मेरी कौन सी यात्रा है?
यह मेरा कौन सा पड़ाव है यात्रा का?
यह मेरी एक अनंत यात्रा है?
मैं एक राही हूं ?
जब सत _चित आत्मा के पास है तो उसको खोज आनंद की है ।वह आनंद केवल परमात्मा के पास है। इसलिए आत्मा अर्थात मैंआनंद का राही कहा जाता है। ईश्वर से मिलने की राह पर है।क्योंकि ईश्वर में ही पूर्ण सत् ,चित् और आनंद है ।इसलिए मनुष्य(आत्मा) को चाहिए कि वह जो सत और चित का स्वामी तो है , तीसरे तत्व आनंद की प्राप्ति करने के लिए प्रयासरत रहे। उसी की यात्रा सफल होती है। उसी का जीवन सफल और सुफल होता है। क्योंकि
आत्म तत्व चल तथा शरीर अचल है।
आत्मा नित्य और शरीर अनित्य है।
आत्मा चेतन और शरीर अचेतन है
आत्मा निर्विकार और शरीर विकारवान है।

आत्मबोध ।
आत्मबोध के बिना के ज्ञान नहीं मिल सकता ।
यह सब कुछ पाया जा सकता है आत्म नियंत्रण से, क्योंकि आत्म नियंत्रण से असीम नियंत्रण शक्ति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपने आपको आत्म नियंत्रण से सही_ सही समझ लेता है, वह अपना सच्चा साथी बन जाता है।यहां तक कि मंत्र विद होने से आत्मविद होना ज्यादा अच्छा है अर्थात अपने आप को पहचानना की आप कौन हैं?
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा था कि अध्यात्म क्या है?
श्री कृष्ण ने बहुत सुंदर उत्तर दिया कि स्वभाव ही अध्यात्म है।
मनुष्य मनुष्य बने ,पशु न बने। पशु को नहीं पता कि मैं कहां से आया हूं ?कहां जा रहा हूं? मनुष्य को तो परमात्मा ने बुद्धि दी है। मनुष्य को यह पता होना चाहिए कि उसकी यात्रा चल रही है । वह कुछ समय के लिए यहां पर इस शरीर में आया है।
इसलिए ज्ञानी बन कर वर्तमान शरीर में ठीक प्रकार से समझ कर परिस्थिति के अनुसार आचरण करते हुए स्थिति_ प्रज्ञ होकर ईश्वर की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता रहे। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसीलिए मैं(जीव) इस संसार में आया हूं।
इसलिए ज्ञानी तन से, निस्वार्थ भाव से जनहित के कार्य करता है। सर्व _भूते हितेरता की भावना रखता है। मन से प्राणी मात्र के प्रति प्रेमभाव रखता है। तथा बुद्धि से आत्म वृद्धि, आत्म रमण ,आत्म क्रीडा करता हुआ जीवन यात्रा करता है। इसलिए दृश्य मान जगत को मिथ्या समझते हुए बस जो अदृश्य है, उसको सत्ता मानना और ग्रहण करता है।
लेकिन जीवन में हम उल्टी क्रिया करते हैं जैसे जो दिखाई नहीं देता (ईश्वर)उसको पाने की चेष्टा नहीं करते और जो दिखाई देता है(प्रकृति) जो नाशवान है उसको सब कुछ समझ लेते हैं। हम यह नहीं समझ पाते कि हमारा शरीर भी प्रकृति है,जो जड़ है।
एक कवि ने कितना सुंदर लिखा है।
जो आज नया वह कल पुराना
आजकल में फंसा जमाना।
किसी को आना किसी को जाना।
ना कोई नया न कोई पुराना।
आज को पकड़ो न इसे गंवाना।
कल काल का कहते खाना।
आजकल को जिसने जाना।
खुशियों का भर लिया खजाना।

स्पष्ट हुआ कि जिसने आज मनुष्य देह को पकड़कर उसका सदुपयोग कर लिया उसका खजाना खुशियों से भर गया।
जैसे अंगूर किसमिस का कलेवर है तो इस शरीर को भी आत्मा का कलेवर मान लो ना।
अपने बारे में स्वयं जानने को ही आत्मज्ञान कहते हैं, आत्मबोध कहते हैं । आत्मज्ञान का बहुत महत्व है ,जो हमारे ऋषियों ने, मनीषियों ने वर्णित किया है। मानव को आत्मज्ञान की परम आवश्यकता है। आत्मज्ञान होने पर वह सुख-दुख, राग द्वेष आदि में समान रहेगा ।आत्मज्ञान उसकी इच्छाएं और चिंताएं दूर करता है ।मनुष्य को संसार चक्र में भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है ।यह तभी संभव है जब हम स्वयं को , अर्थात अपने आत्मतत्व को और अपने निर्माता परमात्मा को जान लेंगे।
जीव शरीर सुख न देखकर आत्मा की उन्नति हेतु प्रयास करें ,क्योंकि शरीर क्षणिक है और आत्मा स्थाई। आत्मा को जाने बिना अपने अस्तित्व का ज्ञान और आत्मिक ज्ञान के बिना मनुष्य मानवता को भूल गया है। वह स्वयं को और अपने अस्तित्व को भूल चुका है ।वह भूल गया है कि हम ईश्वर की संतान हैं। वह वह भूल गया है कि ईश्वर ही हम सब के संचालक परमपिता है। ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए मनुष्य आज हर तरह के काम में लिप्त है। अनुचित साधन का प्रयोग करके धन उपार्जन करने में लगा है।ऐसी विषम परिस्थितियों में उसे आत्मज्ञान की अत्यधिक आवश्यकता है। क्योंकि ईश्वर प्राप्ति का, सानिध्य का अवसर (केवल्य में अथवा मोक्ष में) मनुष्य को ही मिलता है । परंतु इस महत्वपूर्ण शरीर को प्राप्त करके भी जीवन को जीव ने विषय_ वासनाओं में बिता दिया।
इस दुर्लभ अवसर को जीव ने खो दिया। जीव ने दिव्य शक्ति के द्वारा जागृत करने पर भी आत्मा के संबंध में ज्ञान प्राप्त नहीं किया । दूसरी तरफ मनुष्य भौतिक सुखों के नहीं मिलने पर जीवन को व्यर्थ समझता है । जबकि विचार करना चाहिए कि इंद्रिय और विषयों के संग जो सुख प्राप्त होता है क्या वही वास्तविक सुख है ?
यदि वही वास्तविक सुख होता तो सदैव विद्यमान रहता । जैसे पतंगे दीपशिखा में सुख वृद्धि करने उसके निकट जाते हैं , फिर जलकर नष्ट हो जाते हैं।
यही दशा विषय भोगों को भोगने से है। जीव को मोह, राग_ द्वेष से निकलकर ऊपर उठना(उर्ध्वगति) करनी चाहिए, परंतु जीव प्रकृति में और फसने लगते हैं । इसलिए अधोगति की तरफ चले जाते हैं।
जब हम जानेंगे कि यह संसार मिथ्या है, और शारीरिक सौंदर्य नश्वर है ,तभी हमारी आत्मिक उन्नति हो पाएगी ।
जब हम आत्मा की बात करते हैं तो हमारा प्रयास होता है कि उसकी विशुद्ध तम और विराटतम स्थिति में आयें। तब हमारे चित के सागर में इच्छाएं की लहरें नहीं उठ ती । हम हर कोने से पूर्ण हो जाते हैं , जब हम अपने आप को आत्मा के रूप में पाते हैं , तथा शरीर को नश्वर मान लेते हैं,तभी हम इन इच्छाओं का जाल तोड़ पाते हैं। तभी शांति की गंगा अवतरित होती है । तब हम आध्यात्मिक शांत होते हैं। तभी हम आनंदित हो सकते हैं।
इसके लिए प्रभु से याचना करें तो केवल (त्रिविद्या )ज्ञान कर्म और उपासना, (भक्ति )का दान मांगे ,सन्मार्ग मांगे, पवित्र बुद्धि मांगे ,धर्मानुसार अर्थ और काम करते हुए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने के लिए प्रार्थना ईश्वर से करें। हम अपने हृदय मंदिर को इस प्रकार साफ _स्वच्छ करके सजाएं कि वहां परमात्मा का वास सहजता से हो जाए।
हमें सोचना होगा कि
“इस संसार में मुसाफिर थे सभी।
कोई जल्दी और कोई रुक कर गया।”
जाना सबको, गुजर ना सबको है।
जीव ऐसे गुजर जाता है जैसे आकाश से हवाई जहाज कुछ समय के लिए दिखाई पड़ता है और ओझल हो जाता है , तब कहते हैं कि वह वायुयान गुजर गया ।ऐसे ही मनुष्य ,जो आया था, अर्थात् जो (उत्पत्ति)पैदा हुआ ,शरीर में आया( स्थिति )चला गया (प्रलय ,)तो गुजर गया कहा जाता है।
इसलिए कहते हैं कि आज अमुक व्यक्ति गुजर गया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि
जीवन में सबसे बड़ा प्रश्न ही मृत्यु है । मृत्यु का उत्तर जीवन है। क्योंकि जिसका जीवन है उसकी ही मृत्यु होती है। जिसकी उत्पत्ति है उसी का विनाश है। यह अटल सत्य है। यह शाश्वत सत्य है।
इति
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट चेयरमैन उगता भारत।

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