लियोनार्दो उनके राष्ट्रीय गौरव ,हमारे कौन ?

लेखक:- प्रशांत पोळ
इस बार यूरोप प्रवास में इटली में अच्छा खासा घूमना हुआ. इटली तो इसके पहले भी तीन – चार बार गया था. लेकिन तब अपना काम कर के जल्द लौट आना, यही दिनचर्या होती थी. पर्यटक इस नाते इटली देखना रह गया था, जो इस बार संभव हो सका.

लेकिन इस बार मिलान, वेनिस, रोम आदि स्थानों पर विस्तार से घूमना हुआ. इन सभी स्थानों पर एक बात समान थी – लिओनार्दो दा विंची. लिओनार्दो की मूर्तियां, पुतले, उनके जीवन कार्य संबंधी प्रदर्शनी, उनके कार्य पर परिचर्चा.. पूरे बारह महीने इटली में यही चलता रहता हैं. हमारे प्रवास के समय, वेनिस में लिओनार्दो ने मनुष्य की शरीर रचना के संबंध जो चित्र बनाएं थे, उनकी प्रदर्शनी चल रही थी. रोम में, वेटिकन सिटी के अंदर, पोप के महल के एक छोटे से हिस्से में, लिओनार्दो ने बनाएं हुए एक पेंटिंग पर विश्लेषणात्मक कार्यशाला और प्रदर्शन चल रहे थे. फ्लोरेंस यह लिओनार्दो का जन्मगाव रहा हैं. वहां मेरा जाना हुआ नहीं. लेकिन लिओनार्दो केवल फ्लोरेंस के हीरो नहीं हैं, पूरे इटली के हैं.

सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में इटली में लिओनार्दो दा विंची ने धूम मचाई थी. अत्यंत प्रतिभाशाली लिओनार्दो कला, जीवन, विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों में नए नए आयाम निर्माण कर रहे थे. सन १४५२ से १५१९ यह लिओनार्दो का कार्यकाल रहा हैं. यही समय यूरोप में रेनेसां (पुनर्जागरण, पुनरुत्थान) का था. लिओनार्दो जैसे कलाकार एक नए यूरोप का निर्माण कर रहे थे.

लिओनार्दो ने ‘द लास्ट सपर’, मोनालिसा जैसी अमर कलाकृतियां बनाई. वे चित्रकारी साथ वास्तुकला, यांत्रिकी, शरीर रचना शास्त्र, जल-गति-विज्ञान, भौतिकी आदि सभी में सिध्दहस्त थे. उनके बनाएं स्केचेस के आधार पर, आगे, लगभग सवा चार सौ वर्षों के बाद हेलीकॉप्टर और पैराशूट की रचना हो सकी. उन्होंने भविष्य की तकनिकी के बारे में बहुत कुछ लिख के रखा, जिसमे से अधिकतम बाते प्रत्यक्ष रुप में साकार हुई.

लिओनार्दो प्रतिभाशाली थे, उनकी कला के बारे में बाते करना चाहिए, उनको याद करना चाहिए और ये ठीक भी हैं. पूरी इटली लिओनार्दो को कृतज्ञतापूर्वक याद करती हैं. इटली की युवा पीढ़ी उन्हें अपना हीरो मानती हैं.

लेकिन ये सब देखकर मेरे मन में एक जबरदस्त टीस उठी. हमारे देश में लिओनार्दो जैसे अनेक प्रतिभाशाली लोग हुए. उन्होंने पूरे विश्व को ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया हैं. इन अनेकों में एक नाम हैं – वराहमिहिर.

वराहमिहिर का कार्यकाल सन ४९९ से ५८७ तक का रहा हैं. अर्थात लिओनार्दो से लगभग एक हजार वर्ष पहले. वे प्रख्यात खगोलशात्री थे. ज्योतिष शास्त्र में गणना में जो प्रिसिशन (अयनांश – प्रिसिशन के लिए संस्कृत शब्द) होता हैं, उसका मान ५०.३२ सेकंड्स हैं, यह सबसे पहले इन्होने खोजा. ईरान के पारसी शहंशाह, नौशेरवां के अनुरोध पर उन्होंने जुन्दीशापुर में वेधशाला की स्थापना की थी. वे गणिततज्ञ भी थे.

वराहमिहिर का लिखा हुआ एक ग्रन्थ प्रसिध्द हैं – बृहत्संहिता. यह विश्वकोष का एक प्रकार हैं. इसमें वराहमिहिर ने अनेक विषयों पर जानकारी दी हैं. वर्षा, पर्जन्य पर महत्वपूर्ण जानकारी हैं. भूमिगत जल ढूंढने के प्रकार बताएं गए हैं. ग्रहों की गति, ग्रहण के तिथियों की गणना आदि सब अत्यंत शुध्दता के साथ करने की विधि बताई हैं. ध्यान रहे, यह सब आज से डेढ़ हजार वर्ष पहले का ज्ञान हैं.

अब थोड़ी तुलना करे – इटली में लिओनार्दो राष्ट्रीय हीरो हैं. सभी को उनकी जानकारी हैं. पूरा इटली देश उन्हें सतत कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता हैं. उनके बारे में बात करने में गर्व का अनुभव करता हैं..!

और हमारे देश में..? दस में से नौ लोगों को वराहमिहिर या इन जैसे हमारे राष्ट्रीय हीरों की जानकारी ही नहीं हैं. विश्व में प्रथम स्थान प्राप्त करने की अभिलाषा रखने वाला हमारा देश, अपने राष्ट्रिय प्रतिभावंतों को, राष्ट्रीय गौरव को ही यदि नहीं पहचानता हो, उनकी बात करना दकियानुसी मानता हो, तो हमारी अभिलाषा पूर्ण होने की बात फिजूल हैं..!
✍🏻प्रशांत पोळ

प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान से परिचय कराने के लिये दो लेखमाला – हमारा वैभवशाली वैज्ञानिक अतीत और भारतीय ज्ञान का खजाना प्रारंभ की जा रही है-

हमारा वैभवशाली वैज्ञानिक अतीत –

वेदों के ज्ञाता महर्षि सायण ने सूर्य की गति खोज निकाली थी. सायण, विजयनगर साम्राज्य के मंत्री थे. सन १३८७ में इनकी मृत्यु हुई हैं. कल्पना करे, जब, सारा पाश्चात्य जगत पृथ्वी को चपटी मान रहा था, सूर्य पृथ्वी को चक्कर लगाता हैं, ऐसा मान रहा था, और जब सायण के २०० वर्ष बाद, यूरोप में गैलीलियो ने कहा की पृथ्वी सूर्य का भ्रमण करती हैं, तो उन्हें जेल डाला गया. ऐसे समय में सन १४०० के आरंभ में ही सायण ने सूर्य की निश्चित गति का अध्ययन कर लिया था –
प्रकाश के वेग की गणना आधुनिक भौतिकी की अद्भुत अविष्कारों में से एक है जिस की त्रुटी रहित गणना १८ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में की गयी । परन्तु इस वेग की गणना भारत के मनीषियों ने प्राचीन काल में ही कर ली थी
ऋग्वेद के प्रथम मंडल के ५ ० वें सूक्त के चौथे श्लोक पर भाष्य करते हुए महर्षि सायण ने निम्न श्लोक प्रस्तुत किया
“तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥”
-सायण ऋग्वेद भाष्य १. ५ ० .४
अर्थात आधे निमेष में २ २ ० २ योजन का मार्ग तय करने वाले सूर्य तुम्हे नमस्कार है
इस श्लोक के अनुसार यदि हम निमेष को समय की आधुनिक मात्रक सेकंड में एवं योजन को मीटर में परिवर्तित कर वेग की गणना करे तो वेग का मान उतना ही आता है जितना की आधुनिक यंत्रों से मापन करने पर ।
यह एक संयोग नहीं कहा जा सकता
18 निमीष = 1 काष्ठ;
30 काष्ठ = 1 कला;
30 कला = 1 मुहूर्त;
30 मुहूर्त = 1 दिन व् रात (लगभग 24 घंटे )
24 घंटे = 30303018= 486000 निमेष
24 घंटे में सेकंड हुए = 24
60*60 = 86400 सेकंड
1 निमिष = 86400 /486000 = .17778 सेकंड
1/2 निमिष =.08889 सेकंड
2202 योजन = 8 * 2202 = 17616 मील
अतः वेग = दूरी / समय
= 17616/0.8889
= 186000 मील प्रति सेकंड
यह सर्वथा अद्भुत हैं..!!
(क्रमशः……..)
✍🏻प्रशांत पोळ

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