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आज का चिंतन

अग्निहोत्र करने से वेद सफल हो जाते हैं : स्वामी धर्मेश्वरानंद सरस्वती

ओ३म्

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[निवेदन- स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी आर्यसमाज के उच्चकोटि के संन्यासी, विद्वान, प्रचारक एवं गुरुकुलों के संचालक थे। कुछ वर्ष पूर्व उनका अचानक हृदय गति रुक जाने से देहावसान हो गया था। हमने अनेक स्थानों पर उनको अनेक बार सुना है। वह जब भी मिलते थे हमें स्नेह देते थे। उनका व्यक्तित्व भी सुन्दर एवं आकर्षक था। उन्हें स्मरण करने के लिए आज हम
उनका एक व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन्होंने देहरादून स्थित गुरुकुल पौंधा के उत्सव के समापन समारोह में दिनांक 2-6-2019 को दिया था। हम आशा करते हैं कि आपको स्वामी जी के विचार पढ़कर लाभ होगा।]

श्रीमद् दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, पौन्धा-देहरादून के उन्नीसवें तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव का समापन रविवार दिनांक 2-6-2019 को सोल्लास हुआ। प्रातः चतुर्वेद पारायण यज्ञ की पूर्णाहुति हुईं। यह यज्ञ मुम्बई के सुप्रसिद्ध आर्य विद्वान डा0 सोमदेव शास्त्री जी ने आचार्य डा0 यज्ञवीर एवं गुरुकुल के 6 ब्रह्मचारियों के सामूहिक मन्त्रपाठ की सहायता से यज्ञ के ब्रह्मा के रूप में सम्पन्न कराया। यज्ञ पांच वृहद यज्ञ-कुण्डों में किया गया जिसमें बड़ी संख्या में यज्ञप्रेमी ऋषिभक्त उपस्थित थे। मंच स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती, स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती एवं स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी आदि विद्वान सन्यासियों एवं शीर्ष विद्वानों सहित अनेक भजनोपदेशकों से शोभायमान हो रहा था। यज्ञ के मध्य में ही स्वामी धर्मेश्वरानन्द जी को संक्षिप्त सम्बोधन के लिये आमंत्रित किया गया।

स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी ने महाभारत के यक्ष प्रश्नों की चर्चा करते हुए कहा कि यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि वेद की सफलता किसमें है? इसका उत्तर देते हुए युधिष्ठिर ने यक्ष को कहा था कि अग्निहोत्र करने से वेद सफल हो जाते हैं। स्वामी जी ने कहा कि धन का दान व उपभोग से धन की सफलता होती है। उन्होंने आगे कहा कि धन का दान व उपभोग न करने से धनवान व्यक्ति का नाश हो जाता है।

स्वामी जी ने कहा कि आज गुरुकुल में चारों वेदों के मन्त्रों से किया गया यज्ञ सफल हुआ है। यह यज्ञ 24 अप्रैल, 2019 से आरम्भ किया गया था और 40 दिनों में पूरा हुआ है। स्वामी जी ने कहा कि इस यज्ञ को करके हमने परम धर्म का पालन किया है। वेदों को पढ़ना तथा सुनना व सुनाना परम धर्म की श्रेणी में आता है। अतः इस चतुर्वेद पारायण यज्ञ से हम सबने परम धर्म का पालन किया है। स्वामी जी ने कहा कि आपने वेद प्रवचन सुनकर भी परम धर्म का पालन किया है। वेदोक्त धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं है।

स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी ने तीर्थ की चर्चा की। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि आप यहां स्वयं आते हैं और अपने साथ दूसरों को भी लाते हैं। आपका यह कार्य पुण्य का कार्य है। स्वामी जी ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक टाल में आग लग गई जिससे वहां रखी सभी कीमती लकड़ियां व भवन जल कर नष्ट हो गये। वहां उपस्थित एक युवक ने टाल के स्वामी को सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए कहा कि आपका बहुत नुकसान हो गया। इस पर सेठ बोला कि नहीं मेरा नुकसान नहीं हुआ। मैंने दुकान व लकड़ियों का बीमा करा रखा था। मुझे नुकसान की पूरी भरपाई बीमा कम्पनी कर देगी। स्वामी जी ने कहा कि इसी प्रकार यज्ञ करने से हमारा वर्तमान एवं भविष्य का जीवन बीमे की ही तरह से सुरक्षित रहता है। यज्ञ करने से यज्ञकर्ता का जीवन सौभाग्य को प्राप्त होता है।

स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती जी ने गुरुकुल पौंधा के आचार्य डा0 धनंजय जी के कार्य एवं व्यवहार की प्रशंसा की। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए स्वामी जी ने कहा कि यज्ञ करने से वेदों की रक्षा होती है। आप लोग इस गुरुकुल को जो दान देते हैं उसका यहां सदुपयोग हो रहा है। स्वामी जी ने सभी श्रोताओं को अपनी शुभकामनायें दी और अपने वक्तव्य को विराम दिया। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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