आत्मा को मनुष्य की योनि मिलना परमात्मा की दया तथा कृपा का परिणाम है : वेदानंद सरस्वती

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ओ३म्
-स्वामी वेदानन्द सरस्वती (निधन 12-6-2021) को श्रद्धांजलि-

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(वेदों के उच्च कोटि के विद्वान एवं योग साधक व उपासक स्वामी वेदानन्द सरस्वती, उत्तरकाशी का दिनांक 12-6-2021 को निधन हो गया। उनका निधन आर्यसमाज की अपूरणीय क्षति है। वैदिक साधन आश्रम तपोवन स्वामी जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप उनका वैदिक साधन आश्रम तपोवन में दिनांक 19-10-2019 को दिया गया एक उपदेश व उसका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है। -सम्पादक, पवमान।)

वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून के अक्टूबर, 2019 में आयोजित शरदुत्सव के चौथे दिन दिनांक 19-10-2019 को प्रातः 7.00 बजे से यज्ञ, भजन एवं सत्संग का आयोजन आश्रम की 3 किमी0 दूर पर्वतीय स्थान पर वनों से आच्छादित ईकाई के परिसर में सोल्लास सम्पन्न हुआ। इस स्थान पर आर्यसमाज के शीर्ष संन्यासी महात्मा आनन्द स्वामी, स्वामी योगेश्वरानन्द सरस्वती, महात्मा प्रभु आश्रित, महात्मा दयानन्द, स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती आदि अनेक योग साधको ने तप व साधना कर आध्यात्मिक उन्नति का लाभ प्राप्त किया है। प्रातः सामवेद पारायण यज्ञ आर्यजगत के शीर्ष विद्वान एवं गीतकार पं0 सत्यपाल पथिक जी के ब्रह्मत्व में सम्पन्न हुआ। इस यज्ञ में गुरुकुल पौंधा के दो ब्रह्मचारियों ने मन्त्रपाठ किया। देश के अनेक स्थानों से आये वैदिक धर्म एवं संस्कृति के अनुरागी दम्पतियों व परिवारों में इस आयोजन की शोभा को बढ़ाया। आर्यजगत के शीर्ष विद्वान पं0 उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ, स्वामी वेदानन्द सरस्वती उत्तरकाशी, डा0 आचार्य धनंजय, ओजस्वी वक्ता पं0 शैलेश मुनि सत्यार्थी जी, भजनोपदेशक श्री रुहेलसिंह आर्य, श्री आजादसिंह आजाद, श्री दर्शनकुमार अग्निहोत्री, श्री प्रेमप्रकाश शर्मा जी, पं0 सूरतराम आदि ने इस आयोजन की शोभा को बढ़ाया एवं इसमें चार चांद लगाये।

आयोजन में उत्तरकाशी से पधारे विद्वान स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी ने अपने सम्बोधन में परमात्मा तथा आत्मा शब्दों की चर्चा की। स्वामी जी ने कहा कि वृक्षों एवं वनस्पतियों में भी जीव होता है। उनके अनुसार जगत की रचना में ईश्वर सहित प्रकृति का भी योगदान है। प्रकृति को उन्होंने जड़ बताया। उन्होंने कहा कि प्रकृति में ज्ञान गुण नहीं है। आत्मा और परमात्मा ज्ञान से युक्त सत्तायें हैं। आत्मा अल्पज्ञ है। इसके ज्ञान की सीमायें हैं। मनुष्य के पास ज्ञान होता जिसे वह प्रयत्न व पुरुषार्थ से बढ़ा सकता है। परमात्मा की संगति से जीवात्मा के ज्ञान में वृद्धि होती है और यह मुक्ति तक पहुंच जाता है। स्वामी जी ने कहा कि आत्मा तीन प्रकार के बन्धनों में बंधा हुआ है। आत्मा को मनुष्य की योनि मिलना परमात्मा की दया तथा कृपा का परिणाम है। उन्होंने कहा कि यह निश्चित नहीं है कि हमारा अगला जन्म भी मनुष्य योनि में ही होगा। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य का आत्मा सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर तथा कारण शरीर में बंधा हुआ है। मनुष्य के शरीर में 17 तत्वों का समावेश है। स्वामी जी ने आगे कहा कि कारण शरीर में अहंकार तथा चित्त के संस्कार होते हैं। इसी से मनुष्य को जन्म मिलता है।

स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी ने मनुष्य के शरीर और ईश्वरीय ज्ञान वेद की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि मृत्यु या हत्या आदि होने पर भी आत्मा अभाव रूपी नाश को प्राप्त नहीं होता। स्वामी जी ने कहा कि जो मनुष्य अपनी आत्मा को देख लेता या साक्षात्कार कर लेता है उसे स्वामी कहते हैं। उन्होंने कहा कि संसार की सबसे बड़ी चीज ज्ञान है। स्वामी जी ने कहा कि धर्म प्रजा की रक्षा करता है। धर्म मनुष्य व उसके जीवन की रक्षा भी करता है। धर्म के पालन से ही राष्ट्र की रक्षा होती है। वैदिक विद्वान स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी ने धर्म के दश लक्षण धैर्य, क्षमा, इन्द्रियों का दमन, अस्तेय तथा शौच आदि भी श्रोताओं को बताये। उन्होंने कहा कि धर्म के चार चरण सत्य, दया, दान तथा परिश्रम होते हैं। स्वामी जी ने यह भी बताया कि झूठ बोलने वाले व्यक्ति को यज्ञ का फल नहीं मिलेगा। स्वामी जी ने दान का उल्लेख किया और कहा कि सबको दूसरों को निःशुल्क विद्या का दान देना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि विद्वान शिष्यों को पढ़ायंे और उन्हें विषय को खोल-खोल कर पढ़ाये। स्वामी जी ने यह भी कहा कि वेदों के ज्ञानी को ही ब्राह्मण कहना सार्थक होता है। ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य विद्या का दान करना होता है। वेदों के विद्वान स्वामी जी ने श्रोताओं को कहा कि अपने सम्पर्क में आने वालों को अभय दान दो। स्वामी जी हरयाणा के एक पिता-पुत्र के विवाद को सुलझाने का प्रकरण भी प्रस्तुत किया। पिता द्वारा पुत्र के पास जाकर अपनी गलती स्वीकार कर लेने के बाद दोनों में परस्पर पूर्ववत् सौहार्द स्थापित हो गया था। स्वामी जी ने कहा कि यम और नियमों का पालन करने से अपना जीवन अच्छा बनता है और दूसरों को भी लाभ होता है। वैदिक विद्वान स्वामी वेदानन्द जी ने कहा कि वेद के अनुसार 10 माह का गर्भकाल पूर्ण होने पर बच्चा जन्म लेता है। इसको उन्होंने अनेक उदाहरण देकर प्रमाणित किया। इसके साथ ही स्वामी जी का प्रवचन समाप्त हो गया।

यज्ञ के ब्रह्मा पं0 सत्यपाल पथिक जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि सबको यज्ञ करना व कराना आना चाहिये। कहीं किसी संस्कार के अवसर पर यदि पुरोहित जी न हों तो वहां उपस्थित आर्यसमाज के सदस्यों को स्वयं ही पुरोहित के कार्य को सम्पन्न कर देना चाहिये। पथिक जी ने हैदराबाद के आर्यसमाज के इतिहास पुरुष बंसीलाल जी के विवाह की घटना का स्मरण कराया। इस आयोजन में कन्यापक्ष ने पौराणिक पुरोहितों को बुलाया था। आर्यसमाज के पुरोहित की अनुपस्थिति में बंसीलाल जी ने संस्कार विधि की दो प्रतियां मंगाईं और कन्या व वर ने उसके आधार पर अपने अपने मन्त्रों का पाठ कर पूर्ण वैदिक रीति से विवाह संस्कार को सम्पन्न कराया। मूर्धन्य विद्वान एवं भजनोपदेशक पं. सत्यपाल पथिक जी ने कहा कि आर्यसमाज के सदस्यों को संस्कार विषयक किसी भी आवश्यकता की पूर्ति के लिये तत्पर रहना चाहिये।

आश्रम के प्रधान श्री दर्शन कुमार अग्निहोत्री जी ने कहा कि वह सन् 1950 से पहले से इस तपोभूमि से परिचित हैं। उन दिनों वह बच्चे थे और अपने माता-पिता के साथ यहां आया करते थे। उन्होंने बताया कि यहां आने के लिये रास्ता नहीं होता था। हमें झाड़ियों को हटाना पड़ता था और सर्प आदि विषैले जन्तुओं का भी खतरा होता था। उन्होंने बताया कि तपोभूमि के इस स्थान पर महात्मा आनन्द स्वामी, स्वामी योगेश्वरानन्द सरस्वती तथा प्रभु आश्रित जी महाराज आदि योग साधकों ने तप किया है। इनके बाद महात्मा दयानन्द वानप्रस्थी एवं अन्य योगाभ्यासी भी यहां साधना रूपी तप करते रहे हैं और साधना से उन्हें हुए लाभों को वह बताते रहे हैं। श्री अग्निहोत्री जी ने कहा कि इस तपोभूमि में आना हम सबका सौभाग्य है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आप सब लोग भविष्य में भी इस स्थान पर आकर साधना करके लाभ उठायेंगे। प्रधान श्री अग्निहोत्री जी ने कहा कि मैं आशा करता हूं आप को इस स्थान पर यज्ञ व ध्यान साधना से लाभ हुआ होगा। उन्होंने सभी विद्वानों एवं अतिथियों का स्वागत किया और सबको धन्यवाद दिया। ओ३म् शम्।

प्रस्तुतकर्ता मनमोहन कुमार आर्य

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