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इतिहास के पन्नों से

वार रिपोर्टर थे संजय महाभारत में

 

मॉडर्न जर्नलिज्म की एक प्रमुख शाखा है war journalism/ Repoorting ( युद्ध पत्रकारिता) बड़े ही साहसी होते हैं यह युद्ध पत्रकार अपनी जान पर खेलकर आधुनिक वियतनाम वार, द्वितीय विश्व युद्ध ,इराक- अमेरिकी युद्ध में प्रमुख भूमिका निभाई है अपने क्षेत्र में पत्रकारों ने| इस समय जर्मनी रूस अमेरिका के वार रिपोर्टों का दबदबा है war रिपोर्टिंग में मिलिट्री ऑपरेशन ,मिलट्री टैक्टिक्स, मिलिट्री साइंस टेक्नोलॉजी का वर्णन किया जाता है |

 

 

लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा विश्व का प्रथम वॉर रिपोर्टर संजय था |जिसने महाभारत जैसे भीषण संग्राम का सारा घटनाक्रम महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया था.. कुछ भ्रांत धारना है जिनको दूर हमें करना चाहिए जैसे कि कहा जाता है संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी इसी से उन्होंने युद्ध का वर्णन किया लेकिन ऐसा नहीं है महाभारत में इसका कहीं उल्लेख नहीं है.. अपितु महाभारत में ऐसा उल्लेख है संजय युद्ध शुरू होने से पहले युद्धभूमि पहुंच जाते थे युद्ध खत्म होने के पश्चात सारा वृत्तांत महाराज धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर पहुंचकर सुनाते थे |

महाभारत के शल्य पर्व के नवम अध्याय के आखिरी श्लोकों से यह बात स्पष्ट हो जाती है | संजय रिपोर्टिंग के साथ-साथ कौरवों की ओर से युद्ध भी लड़ते थे युद्ध भूमि में बंदी भी बनाए गए और महर्षि व्यास की कृपा से मुक्त भी किए गए | महाभारत शल्य पर्व के 9 से लेकर 12 अध्याय के दर्जनों से श्लोक यही सिद्ध कर रहे हैं|

संजय अपनी आपबीती ,महाराज धृतराष्ट्र को बता रहे हैं!

यदुवंश के महारथी सत्यकि ने संजय की सारी युद्ध सामग्री नष्ट कर दी वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा उसे जीवित ही बंदी बना लिया गया | संजय के बंदी बनाने जाने के पश्चात कौरवों के दो महारथी जो सबसे अंत में मारे गए उनमें सूशर्मा अपने पुत्र सहित तथा शकुनि का ही वध हुआ| शकुनि का पुत्र उलूक भी सबसे अंत में मारा गया|

संजय फिर अपनी आपबीती बताते हैं महाराज! उस समय मुझे कैद में पड़ा हुआ देखकर पांडवों के महारथी धृष्टद्युम्न ने हंसते हुए सत्यकि से कहा “इसे कैद करके क्या करना है ,इस के जीवित रहने से अपना कोई लाभ नहीं है”

धृष्टद्युम्न की बात सुनकर महारथी सत्यकी तीखी तलवार उठा कर उसी क्षण मुझे मार डालने के लिए उद्धत हो गए|

इसी बीच महाराज युद्ध भूमि में महर्षि व्यास आ गए सहसा आकर बोले “संजय को जीवित छोड़ दो यह किसी भी प्रकार वध के योग्य नहीं है”

महर्षि व्यास को हाथ जोड़कर सत्यकी ने मुझे बंधन से मुक्त करके कहा संजय !तुम्हारा कल्याण हो जाओ ,अपना अभीष्ट साधन करो |

उनके इस प्रकार आज्ञा देने पर मैंने कवच उतार दिया और हथियार रहित हो शाम को नगर की ओर प्रस्थान किया उस समय मेरा सारा शरीर रक्त से भीगा हुआ था|

महाराज एक कोश चलने पर मैंने भागे हुए दुर्योधन को गदा हाथ में लिए अकेले खड़े देखा| उसका शरीर बहुत छत विक्षत हो गया था |मुझे देखते ही उसकी आंखों में आंसू भर आए वह अच्छी प्रकार मेरी ओर देख ना सका मैं उस समय दिन भाव से खड़ा था वह मेरी उस दशा पर दृष्टिपात करता रहा| मैं भी रणभूमि में अकेले शौक मग्न हुए दुर्योधन को देखकर गहरे दुख सागर में डूब गया और दो घड़ी तक कोई बात मुख से ना निकाल सका, कुछ देर पश्चात मैंने युद्ध में अपने पकड़े जाने और महर्षि व्यास जी की कृपा से जीवित छूट जाने का सारा समाचार उन्हें कह सुनाया| यह सुनकर आप के पुत्र ने लंबी सांस छोड़कर बारंबार मेरी ओर देखा | हाथ से मेरा स्पर्श करके इस प्रकार कहां संजय! इस युद्ध में सिवाय तुम्हारे दूसरा कोई मेरा बंधु बांधव संभवत जीवित नहीं है क्योंकि मैं यहां दूसरे किसी स्वजन को नहीं देख रहा हूं| उधर पांडव अपने सहायकों से संपन्न है| तुम प्रज्ञा चक्षु महाराज धृतराष्ट्र से कहना कि आपका पुत्र दुर्योधन अपने मित्रों पुत्रों और भाइयों से हीन होकर सरोवर में प्रवेश कर गया है| जब पांडवों ने मेरा राज्य ले लिया तब इस दिन हीन दशा में मेरे जैसा और मनुष्य जीवित रह सकता है|

यह सारा प्रसंग महाभारत के शल्य पर्व के नौवें और दसवें अध्याय में विस्तार से वर्णित है| जो यह सिद्ध करते हैं संजय ना केवल और रिपोर्टर थे बल्कि युद्ध भूमि में भी लड़ते थे शाम को जाकर महाराज धृतराष्ट्र को सारा प्रसंग बताते थे |अब यह अनुसंधान का विषय है मेरठ के हस्तिनापुर ,हरियाणा के कुरुक्षेत्र के बीच की दूरी संजय कैसे तय करते थे| इसके लिए जरूर कोई ठोस राज व्यवस्था होगी |

संजय यह काम इतनी बखूबी करते थे कि युद्धभूमि के प्रत्येक दिन घटनाक्रम जानकारी उनके पास होती थी था किस पक्ष के कितने योद्धा मारे गए किस योद्धा ने कौन से अस्त्र का प्रयोग किया? किस योद्धा ने युद्ध के नियमों को तोड़ा ?प्रतिबंधित अस्त्रों का कब-कब किसने प्रयोग किया ?आदि आदि योद्धाओं के परस्पर वार्तालाप युद्धमंत्रणा का भी वह अक्षरस: लेखा-जोखा रखते थे |

आप इसे महाभारत के शल्य पर्व के बारहवें अध्याय से समझ सकते हैं.. महाभारत का युद्ध जब समाप्ति की ओर था कौरव पक्ष के अधिकांश योद्धा मारे गए तो महाराज धृष्ट राज ने पांडव पक्ष के युद्ध संसाधनों के विषय में जानना चाहा.. संजय बताते हैं महाराज पांडवों की विशाल सेना में केवल 2000 रथ 700 हाथी 5000 घोड़े और 10000 पैदल सैनिक बचे हैं केवल|

भीष्म वध से लेकर दुर्योधन वध की सारी घटना संजय ने युद्ध भूमि पर ही घटित होते देखी थी..|

महाभारत में ऐसे अनेक प्रसंग है संजय को लेकर जो यह सिद्ध करते हैं संजय युद्ध भूमि में वार रिपोर्टिंग करता था. इसमें कोई संदेह नहीं संजय विश्व का प्रथम war Journlist था|

दिव्य दृष्टि वाला प्रसंग महाभारत में कहीं नहीं है यदि ऐसा होता तो महर्षि व्यास इसका उल्लेख जरूर करते| बी आर चोपड़ा कृत महाभारत सीरियल ने इस मिथक को प्रचारित प्रसारित किया है.. हमारी कमजोरी रही है हमने अपने ऐतिहासिक घटनाक्रमों सांस्कृतिक गौरव ग्रंथों को सही स्वरूप में कभी लिया ही नहीं है| यह हमारी अज्ञानता ही तो है कि हमारे घर में आज भी महाभारत जैसा ज्ञान का कोश नहीं पाया जाता लोगों में यह भ्रांत धारणा है कि महाभारत घर में रखने से लड़ाई झगड़ा होता है ऐसा नहीं है महाभारत में युद्ध शास्त्र से लेकर कूटनीति राजनीति शास्त्र लोक प्रशासन धर्मशास्त्र आदि का विस्तृत ज्ञान है|

हमें गर्व होना चाहिए अपनी वैदिक सभ्यता पर जो हर क्षेत्र में अग्रणी रही चाहे ज्ञान विज्ञान कला कौशल पत्रकारिता कुछ भी हो|

आर्य सागर खारी ✒✒✒

One reply on “वार रिपोर्टर थे संजय महाभारत में”

महाभारत के युध्द का सीधा प्रसारण धृतराष्ट्र के महल मे हो रहा था। संजय वार रिपोर्टर नही बल्कि कमैंटेटर थे जो धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध का आँखो देखा हाल सुना रहे थे।

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