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नास्तिकों का यह नया तर्क है कि कोशिकाओं से ही पेड़ पौधे और जानवर बने हैं। इनका शरीर कुछ नहीं अपितु कोशिकाओं का सम्मिलित जोड़ है। नीचे दिया चित्र नास्तिकों का नया ब्रह्मास्त्र है जिसके माध्यम से वो साबित करना चाह रहे हैं कि कोशिकायें चाहें पादप जगत की हों या जंतुओं की,दोनों की संरचना समान होने के कारण मनुष्य केवल कोशिकायें ही खाता है। इसलिये मांसाहार और शाकाहार में कोई अंतर नहीं है। चाहे मांस खाओ या कंदमूल, खाई तो केवल कोशिकायें ही जा रही हैं। जिस चित्र को नास्तिक ने दिया वो ही स्पष्ट कर देता है कि दोनों प्रकार की कोशिकाओं में भिन्नता है। ये एकसमान नहीं हैं। इस तथ्य को वह चित्र में देख ही नहीं पाया। इस दावे को विज्ञान की सहायता से अमान्य करना इस पोस्ट का उद्देश्य है।

सर्वप्रथम तो पादप कोशिका और जंतु कोशिका एकसमान नहीं होतीं। दोनों में कई अर्थों में अंतर होता है। पादप कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली (Cell membrane) के ऊपर कठोर कोशिका भित्ति (Cell wall) होती है। जबकि जंतुओं की कोशिका में केवल कोशिका झिल्ली ही होती है। अत: कोशिका भित्ति के अभाव के चलते यह कठोर नहीं होती है।

दोनों प्रकार की कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया होता है परंतु केवल पादप कोशिका में ही क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast) होता है, जहां प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) से सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा शुगर में रूपांतरित की जाती है जो पौधों के लिये भोजन है। साथ ही यह उन समस्त जानवरों के लिये भी भोजन है जो वनस्पतियों को खाते हैं। पादप कोशिका में एक अकेली बड़ी रिक्तिका (Vacuole) होती है जिसका उपयोग भंडारण और कोशिका के आकार को बनाये रखने के लिये होता है। जबकि जंतु कोशिका में अनेक छोटे-छोटे वैकुओल होते हैं। इसलिये विज्ञान के हिसाब से दोनों प्रकार की कोशिकायें एक जैसी नहीं होती हैं। इनमें भिन्नता होती है। अब कथित नास्तिक के हास्यास्पद तर्क को ही आगे बढ़ाते हुये नास्तिक को सलाह है कि, चूंकि सूर्य ही इस धरा पर ऊर्जा का प्रथम स्त्रोत है, कोशिकाओं को छोड़ रोज सुबह नाश्ते, दोपहर भोजन के समय वो धूप में खड़ा होकर सूर्य की ऊर्जा खाये और जो भी अतिथि घर में आयें उन्हें भी धूप में खड़ा करवाकर यही खिलाये। ऐसा करने से शाकाहारी बनाम मांसाहारी विवाद का स्वत: अंत हो जायेगा।

यदि फिर भी नास्तिकों के लिये पादप कोशिका और जंतु कोशिका में कोई अंतर नहीं है, और व्यक्ति मांस या शाक सब्जी नहीं केवल कोशिकायें ही खाता है तो, जब उसके मां बाप, बेटा बेटी, पत्नी की मौत हो तो बजाय उनका शवदाह करने या कब्र में गाड़ने के शवों को ही खा ले। आखिर वो उसके सगे संबंधी ना होकर कोशिकाओं के समूह ही तो हैं। कोई पहाड़ थोड़ी ना टूट जायेगा। खा लेंं चाव से अपने सगे संबधियों के शवों को कोशिकायें मात्र समझकर। लेकिन वो नास्तिक कदापि ऐसा नहीं करेगा क्योंकि शरीर मात्र कोशिकाओं का समूह ही नहीं होता है बल्कि इनसे परे उसमें चेतना होती है। तभी जीवन आता है, चलता है और अंत में चला जाता है।

पौधों में तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क भी नहीं होता जैसा जानवरों में होता है। फिर भी जब कोई कीट पौधों की पत्ती खाना प्रारंभ करता है तो पौधा रासायनिक संकेत छोड़ता हुआ अन्य पत्तियां को अपने बचाव के लिये सावधान करता है। फलस्वरूप दूसरी पत्तियां अपने बचाव के लिये उपयुुुक कदम उठाते हुये स्वयं को कडुआ या विषैला बना कीट से बचने का प्रयास करती हैं। पौधों के रासायनिक संकेत जानवरों के संकेतों से भिन्न होते हैं। जानवरों में तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क होने के कारण ये पादप जगत से भिन्न हो जाती हैं। तंत्रिका तंत्र विद्युत से संचालित होने के कारण तीव्र गति से संकेतों को मस्तिष्क में भेजती और वापस लाती हैं। साथ ही ध्वनि और शारीरिक संकेत भी देती हैं। इसके विपरीत जब किसी पत्ती में यदि छेद किया जाये, काटा या नष्ट किया जाये तो यह कैल्सियम आयन की एक लहर चोटिल भाग से छोड़ती है जो, समुद्र की लहरों की भांति, पौधों के दूसरे हिस्सों में पहुंचती है। कैल्सियम आयन की इस लहर को उत्पन्न करने वाले अमीनो एसिड ग्लूटामेट (Glutamate) की पहचान वैज्ञानिकों द्वारा की जा चुकी है। इसके पूर्व पादप वैज्ञानिकों को मात्र इतना ही ज्ञात था कि पौधों के एक भाग में होने वाले परिवर्तनों को पौधे के दूसरे भाग अनुभव कर लेते हैं। उनको इस बात का कोई ज्ञान नहीं था कि यह सूचना पौधों के दूसरे अंगों तक पहुंचती कैसे है। अब जब अमीनो एसिड ग्लूटामेट की पहचान हो चुकी है वो दिन दूर नहीं जब पादप वैज्ञानिक पौधों के आंतरिक संवाद को अपने हिसाब से चला पायेंगे। यह शोध विज्ञान जगत के शीर्षस्थ जरनल साइंस में प्रकाशित हुआ है।

https://science.sciencemag.org/content/361/6407/1112

Toyota et al. Science 14 Sep 2018: Vol. 361, Issue 6407, pp. 1112-1115

क्या नास्तिक यह कहना चाहते हैं कि गाजर काटने और गाय की गर्दन काटने में कोई अंतर नहीं है ? पौधे भी अपने बचाव के लिये सजग रहते हैं। जब दोपहर में अल्ट्रावायलेट किरणें सबसे तीव्र होती हैं पत्तियां अपने क्लोरोप्लास्ट को बचाने के लिये इसे अपने निचले हिस्से में भेज देती हैं। यदि सूखे की स्थिति हो तो पत्तियां अपने स्टोमेटा को बंद कर लेती हैं ताकि वाष्पीकरण ना हो। यह सब रासायनिक संवाद के माध्यम से ही होता है। जानवरों में चूंकि तंत्रिका तंत्र होता है, यह सुख दुख अनुभव कर सकते हैं इसलिये अपना जीवन बचाने के लिये ये भरपूर संघर्ष करते हैं। गर्दन काटे जाने पर दर्द से चीखते हैं। बचने, भागने और पलटवार करने का प्रयास करते हैं। एक दूसरे की सहायता के लिये भी आते हैं। यदि इनका कोई साथी मर गया तो इसका शोक भी मनाते हैं।
– अरुण लवानिया

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