नम्रता व धैर्य के शिखर थे श्री गुरू हरिगोबिंद जी

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सुखा भारती

श्री गुरू अर्जुन देव जी की शहीदी के पश्चात् यह बात स्पष्ट हो गई थी, कि शांतमई यत्नों का युग पलट चुका है। अब गुरूदेव के सामने दो रास्ते थे या तो वे हथियारबंद ढंग से संघर्ष की राह अपनाएँ या फिर सारे प्रयास बंद कर अच्छे दिनों के आने का इन्तज़ार करें।

इतिहास के वह पन्ने सुनहरे बन गए, जिन पर किसी तपस्वी, त्यागी, परोपकारी एवं सत्य धर्म के लिए अपनी शहादतें देने वाली महान हस्तियों के नाम अंकित हो गए। उनके जीवन का हर एक पहलू समस्त मानवता के लिए प्रकाश स्तंभ बन गया। जो अनादि काल तक उन पर श्रद्धा रखने वालों का वर्तमान व भविष्य रौश्न करता रहेगा।

ऐसी ही एक महान विभूति श्री गुरु हरिगोबिंद जी के रूप में इस धरा पर अवतरित हुईं जिन्हें मीरी-पीरी के मालिक, वड़ योद्धा परोपकारी एवं दलभंजन योद्धा कहकर संबोधित किया जाता है। वे ऐसे महामानव युगपुरुष थे जिनके मुखमंडल का ओज देखकर सूर्य भी शर्मा जाए, हृदय की विशालता व उदारता देख सागर भी सिमट जाए व उनकी दृढ़ता देख हिमालय भी कंपायमान हो उठे, उनकी ललकार ऐसी कि एक बब्बर शेर को भी थर्रा दे। उन्होंने अपनी अध्यात्मिक उच्चता व राजनैतिक सूझबूझ ने अनेकों ही लोगों के जीवन को प्रकाशित किया। जिसके चलते जनमानस के अत्याचार व जब्र-जुल्म के विरुद्ध डट जाने के हौंसले बुलंद हुए। आज उन्हीं महान गुरूदेव का गुरगद्दी दिवस हम श्रद्धा व सत्कार से मना रहे हैं।

श्री गुरू हरिगोबिंद जी का इस धरा पर प्रकटीकरण बाबा बुढ्ढा जी के वरदान के फलस्वरूप हुआ। जिस समय माता गंगा जी पुत्र प्राप्ति हेतु बाबा बुढ्ढा जी के पास वरदान लेने गईं तो उन्होंने खाना ग्रहण करते समय, प्याज़ पर जोर से मुक्का मारते हुए तोड़ दिया और माता जी को यह वचन किया कि जिस प्रकार मैंने इस प्याज़ को तोड़ा है इसी प्रकार तेरा पुत्र भी दुशमनों के सिर फोडे़गा। वे एक महान शूरवीर योद्धा होने के साथ-साथ ही एक प्रतापी गुरू भी होगा। वह दो तलवारें धारण करेगा एवं सब लड़ाइयों में विजेता होगा। इस प्रकार बाबा बुढ्ढा जी के वचनों से संवत 1651 (9 जून, 1595) को श्री गुरू हरिगोबिंद साहिब जी का वडाली गाँव (अमृतसर) में जन्म हुआ।

श्री गुरू अर्जुन देव जी की शहीदी के पश्चात् यह बात स्पष्ट हो गई थी, कि शांतमई यत्नों का युग पलट चुका है। अब गुरूदेव के सामने दो रास्ते थे या तो वे हथियारबंद ढंग से संघर्ष की राह अपनाएँ या फिर सारे प्रयास बंद कर अच्छे दिनों के आने का इन्तज़ार करें। दूसरा रास्ता आत्मघाती था, क्योंकि श्री गुरू अर्जुन देव जी की शहीदी ने इस बात को प्रमाणित कर दिया था कि जुल्म-सितम पर त्याग, बलिदान से विजय प्राप्त नहीं की जा सकती क्योंकि अंधों को सूर्य का ओज दिखाई नहीं देता और बहरों को माघ-मलहार का प्रेमागीत सुनाई नहीं देता। परंतु शान्ति व सहनशीलता से उनके अहंकार को और ज्यादा पोषण मिला है। उन्होंने इसे सिखों की कमजोरी मान लिया है। इसलिए अब अपने धर्म को बचाए रखने के लिए हथियार उठाने ही पडे़ंगे-

सूरा सो पहचानिए जो लरै दीन कै हेत।।

पुरजा पुरजा कटि मरै, कबहू न छाड़ै खेतु।। (कबीर साहिब)

इसलिए छठे गुरू श्री गुरू हरिगोबिंद साहिब जी ने धर्म व मानव के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए हथियारबंद संघर्ष चुना। आप पीर (अध्यात्मिक गुरू) तो थे ही इसके साथ ही आप मीर (राजनैतिक अगुवा) भी बन गए। आप जी ने भक्ति व शक्ति, राजनीति व धर्म के सच्चे सुमेल को साकार किया। या यों कहें कि भाला-माला, तलवार-तस्बीह, मीरी-पीरी एक साथ रखना उनके बड़-योद्धा परोपकारी गुण को प्रकट करता है। योद्धे होने के साथ-साथ परोपकारी होना उनकी विलक्षणता है। आप जी के समय से ही सिख सही अर्थों में संत-सिपाही बन चुका था।

छठे पातशाह जी की शक्ति को दबाने के लिए जहाँगीर ने उन्हें कैद भी किया, लेकिन उनके वेग में किसी प्रकार की अड़चन नहीं डाल सका। अपितु उसके इसी दुस्साहस ने सिख लहर को और मजबूत कर दिया। श्री हरिगोबिंद साहिब जी ने पाँच गुरूओं की भाँति ही जन मानस को प्रभु भक्ति से जोड़ा। श्री गुरू नानक देव जी के पश्चात् आप ही ऐसे गुरू थे जिन्होंने उन्हीं की भाँति लम्बी-लम्बी यात्राएं की व सिख मत का प्रचार-प्रसार किया। आप दीन दुखियों के मसीहा बन उनके बीच पहुँचे व एक अंतर्यामी गुरू के रूप में अनेकों भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण किया। इसके अलावा गुरू जी ने ज़ालिम मुगल शासकों का मुकाबला करने के लिए हथियार, बंदूकें, गोला बारुद, घोड़े एकत्र कर सिखों की फौज बना उन्हें सैन्य शिक्षण भी दिया। आपने हथियार चलाने में माहिर 52 योद्धा अपने पास रखे। जो सिखों को युद्ध कला सिखाने के साथ-साथ गुरू महाराज जी के अंग रक्षक की सेवा भी पूर्ण करते थे। इनकी अगुवाई में दूर-दूर से नौजवान आकर शस्त्र विद्या व घुड़सवारी सीख रहे थे।

गुरू जी द्वारा इस प्रकार फौज तैयार करनी व शस्त्र विद्या सिखाना हुकुमत को सीधी ललकार थी। इससे भी बड़ी ललकार उन्होंने ‘अकाल तख्त’ की स्थापना कर दे डाली। अकाल तख्त का भाव वह तख्त जो प्रभु सत्ता द्वारा संचालित है। जिसका आधार दैवी व नैतिक गुण हैं, जो सत्य-समानता, इंसाफ, एवं आपसी तालमेल व मिलवर्तन का संदेश देता है। अकाल तख्त राक्षसी शक्तियों व प्रवृतियों के विनाश का संदेश देता था। दूसरा तख्त पर बैठने के अधिकार को मुगल मात्र अपनी बपौती समझते थे। कोई और तख्त पर बैठे यह उनके अहंकार पर सीधी चोट थी।

गुरू साहिब मीरी-पीरी की दो तलवारें धारण कर व सच्चे पातशाह के रूप में बिराजमान होकर जनमानस को उपदेश देने लगे व हुकुमनामे जारी करने लगे। उन्होंने शहर को भावी आक्रमण से बचाने हेतु लोहगढ़ किले का निर्माण करवाया।

बेशक अमृतसर शहर पहले ही प्रसिद्ध हो चुका था क्योंकि सिखों का काअबा ‘श्री हरिमंदिर साहिब’ यहीं स्थित था, जिसका निर्माण श्री गुरू रामदास जी ने करवाया था, यहीं पर ही श्री गुरू अर्जुनदेव जी ने ‘श्री गुरू ग्रन्थ साहिब’ जी का प्रथम प्रकाश करवाया था। हरिमंदिर साहिब परिसर सैनिक कारवाई का मुख्य केन्द्र बन चुका था। यहाँ पर युवकों को भाला चलाना, तीरअंदाज़ी, बंदूकबाजी, तलवारबाजी, घुड़सवारी, मल्ल युद्ध इत्यादि का शिक्षण दिया जाने लगा। गुरू साहिब अकाल तख्त पर बैठकर सारी गतिविधियों का जायज़ा लेते। गुरू जी द्वारा सेना तैयार करने, शस्त्र विद्या देने, किला बनवाने, हथियार, हाथी, घोडे़ एकत्र करने से मुगल सरकार चौकन्नी हो गई। गुरू जी ने नगाड़ा बजाने की परंपरा भी शुरू की जिसे मुगल सेना में प्रभुता की निशानी समझा जाता था।

मुगलों ने गुरू जी की इन गतिविधियों को किसी संभावी बगावत की तैयारी समझ लिया। इसलिए उन्होंने श्री गुरूदेव को बंदी बनाने का मन बला लिया। इसलिए जहाँगीर ने अत्याचारी मुर्तज़ा खान को फिर से लाहौर का सूबेदार नियुक्त कर दिया। याद रहे ये वही मुर्तज़ा खान या शेख फरीद बुखारी था जिसने श्री गुरू अर्जुन देव जी पर अमानवीय अत्याचार कर, इस धरा के हृदय को लहूलुहान किया था। उसे मुगल हुकूमत द्वारा श्री गुरू हरिगोबिंद साहिब जी पर नज़र रखने को कहा गया। क्रूर मुर्तज़ा खान सिखों का कट्टर विरोधी तो था ही व उसे सिख लहर को दबाने का एक और अवसर मिल गया। उसने जहाँगीर को बताया कि ‘सिखों के गुरू ने दिल्ली तख्त के मुकाबले में अकाल तख्त बना लिया है। वह किसी शहंशाह की भाँति कलगी लगा व दो तलवारें धारण कर सिंघासन पर बैठता है। उसके सिर पर छतर झूलता है व सिख चंवर झुलाते हैं। वह खुद को सच्चा पातशाह कहलवाता है। वह हुकुमनामें जारी करता है व लोगों के झगड़े खत्म करवाता है। कई राजे भी उसके श्रद्धालु बन चुके हैं व उन्हें नज़राने पेश करते हैं।’ उपरोक्त तथ्यों को मद्देनज़र रखते हुए गुरू जी को मुगलों द्वारा गवालियर के किले में कैद कर दिया गया। लगभग डेढ़ साल वहाँ रखने के पश्चात् उन्हें रिहा किया गया। गुरू जी ने मानवता की रक्षा हेतु चार युद्ध व कई लड़ाइयाँ भी लड़ीं।

अंत में हम यही कहेंगे कि गुरूदेव जैसा कोई योद्धा नहीं, जिन्होंने सब आतंकियों को खत्म किया। उनके जैसा कोई दानी परोपकारी नहीं, जिन्होंने कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाया। उनके जैसा कोई शान्त चित्त नहीं जिन्होंने मैदान-ए-जंग में भी अपना संतुलन नहीं खोया। उन्होंने मुर्दा रूहों में प्राण फूंक दिए। श्री गुरू हरिगोबिंद साहिब जी एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने देश कौम को निड़र कर अपने पैरों पर खड़े होना सिखाया। वे नम्रता व धैर्य का शिखर थे। वह सिखी के महल को इतना ऊँचा उठाकर गए हैं कि कोई बड़े से बड़ा जलजला भी इसे गिरा नहीं पाएगा। भाई नंद लाल जी उनकी महिमा में बखान करते हैं-

गुरू हरिगोबिंद आं सरापा करम

कि मकबूल शूद जू सकी ओ दज़म।।

वे जनमानस पर प्रभु की अलौकिक बख़्शीश थे जिनके प्रताप से मंदभागी व मुर्झाये हुए लोग भी प्रभु की दरगाह में नवाज़े गए। इस प्रकार गुरू जी जनमानस में भक्ति-शक्ति के नवप्राण फूंककर 19 मार्च 1644 को ज्योति ज्योत समा गए।

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