आयुर्वेद पर मेरे रोचक अनुभव

 

● आयुर्वेद पर मेरे रोचक अनुभव
1973
तब हम सतियाँ चौक, माडल टाऊन, करनाल में एक किराये के मकान में रहा करते थे।
उस समय मेरे बाबा जी (दादा जी) भी हमारे पास आये हुए थे। एक दिन रविवार को हम दादा पोता सुबह 5 बजे घूमने निकले तो हम श्रीकृष्ण प्रणामी मंदिर के सामने सरकारी खेतों में घुस गये।


वह क्षेत्र शायद कृषि अनुसंधान केन्द्र विभाग के का था।
वहाँ घूमते हुए मेरे बाबा जी की नज़र एक विशेष प्रकार के घास पर पड़ गयी जो कि इधर उधर और छिटपुट जगहों पर randomly उगी हुई थी।
उसे देख कर बाबा जी बोले कि हम कल एक खुरपा और एक बोरी लेकर आयेंगे और इस घास को उखाड़ कर घर ले जायेंगे।
अब मैं सोच में पड़ गया कि हमारे घर में बकरी तक तो है नहीं फिर हम इस घास का क्या करेंगे।

खै़र, अगले दिन हम वहाँ वह सामान लेकर गये और आधा कट्टा भर कर उस घास को लाये।
यह क्रम तीन दिनों तक चलता रहा।
फिर हम ने उस घास को सुखाया।
और, उसे एक कट्टे में भर लिया।
फिर बाबा जी मुझ से बोले कि इस घास को लेकर कर्ण गेट पर फलाने पंसारी के यहाँ बेच कर आ।
और हाँ, इसे तुमने डेढ़ रू किलो से कम नहीं बेचना है। अब चूँकि उस समय बाबा जी की टाँग में चोट लगी हुई थी तो वे पैदल अधिक नहीं चल सकते थे तो मैं उस कट्टे को सिर पर लाद कर चल पड़ा।

उस दुकान पर पहुँचा तो पंसारी उस घास को देख कर कुछ हैरान हो गया और बोला कि तुम इतने छोटे बच्चे (15 वर्ष) हो तो तुम्हें इस घास के विषय बारे मैं किसने बताया। तो मैंने उसे बताया कि मैं पं. जीवा राम पंसारी का पोता हूँ और उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है। इस पर वह पंसारी संतुष्ट हुआ, फिर उस घास को कट्टे में से निकाल कर तोला गया और उसका मोल भाव किया गया। आख़िर वह पंसारी उस 3 किलो घास को 1 रु 60 पैसे किलो के हिसाब से खरीदने को राज़ी हुआ और उसने मुझे 4 रु 80 पैसे पकड़ा दिये और मैं घर की ओर चल पड़ा।

अब आप यह तो सोच ही रहे होंगे कि वह ऐसी कौनसी रामबाण टाइप घास थी जो कि 1973 में अर्थात् आज से 48 वर्ष पहले 1 रु 60 पैसे किलो बिक गयी थी। उन दिनों तो गेहूँ का आटा ही 60-70 पैसे किलो मिल जाता था तो वह घास ऐसी क्या अफलातून थी जो कि इतनी महँगी बिकी थी?

■ उस घास का नाम है शंखपुष्पी।
अब शंखपुष्पी क्या है और इसका सेवन करने से हमें क्या लाभ हो सकता है यह आप गूगल पर खोज सकते हैं।

मेरे बाबा जी (दादा जी) आर्थिक अभावों के चलते दूसरी तीसरी कक्षा से आगे पढ़ नहीं पाये…
तो वे एक देसी वैद्य को गुरु मान कर उन के पास 2-3 रु मासिक वेतन पर काम करने लगे थे।
उन्होंने 20-25 वर्षों तक हाड़ तोड़ परिश्रम करके आयुर्वेद का काम सीखा और बाद में उन्होंने वैद्य और पंसारी की स्वयं की दुकान खोल ली। उनके हाथों में इतना यश था कि उनकी प्रसिद्धि आसपास के गाँवों तक हो गयी थी। 1972 आते-आते वे वृद्ध हो चले थे और वे स्वयं के सभी पारिवारिक दायित्वों से मुक्त हो चुके थे। तो वे वह दुकान छोड़ कर दूसरे नगरों में सरकारी नौकरी कर रहे अपने पुत्रों के पास रहने लगे थे।
1975
तब मेरे बाऊ जी का स्थानांतरण चरखी दादरी, जिला भिवानी का हो गया था तो तब हम वहाँ किराये के एक मकान में रहने लगे थे। उन दिनों बाबा जी हमारे पास आये हुए थे।

एक दिन उन्होंने देखा कि पड़ौस में एक युवती को उसके दो परिजन रिक्शा से उतार कर घर में ले जा रहे थे।
वह युवती दोनों हाथों से पेट पकड़े हुए कराह रही थी।
तो बाबा जी भी उनके घर पहुँच गये।
वहाँ उन्हें बताया गया कि उस युवती को 2 दिनों से पेट में तीखा दर्द था।
उसे दो डॉक्टरों को दिखाया गया था परंतु उसे कोई आराम नहीं हुआ था।
तब वे उसे मैडिकल कॉलेज, रोहतक ले जाने की सोच रहे थे।
इस पर मेरे बाबा जी बोले कि वे भी कुछ प्रयास करके देखते हैं।
उन्होंने उस युवती के पेट को टटोल कर देखा और वे लाठी टेकते हुए बाजार की ओर चल दिये।
वे आधे घंटे में एक पंसारी से 20-25 पैसों में एक देसी दवा खरीद लाये।

घर पहुँचते ही उन्होंने आधा लीटर दूध मँगवाया और वह दवा उस में डाल दी और कहा कि इस दूध के आधा रह जाने तक तेज आँच पर उबाला जाये फिर युवती को गर्मागर्म पिलाया जाये।
उन्होंने ऐसा ही किया तो उस युवती का पेट दर्द दूध पीने के आधे घंटे मे ही ठीक हो गया था।

युवती को पेट दर्द क्यों था?

किसी कारण से उसकी आंतड़ियों के एक भाग में मल जम कर इतना सड़ चुका था कि वह कोयले जैसा काला पड़ गया था।
उस जमे और सड़े हुए मल के कारण ही युवती के पेट में तेज दर्द हो रहा था।
अब उन दिनों बीमार के परीक्षण के लिये एक्स रे के इलावा सीटी स्कैन इत्यादि तो होता नहीं था और मल एक्स रे में आता नहीं है तो वे डॉक्टर किसी निष्कर्ष पर पहुँच नहीं पाये थे तो वे युवती का पेट दर्द ठीक नहीं कर पाये थे।

अब आप यह तो सोच ही रहे होंगे कि जिस पेट दर्द को डिग्री धारी डॉक्टर ठीक नहीं कर सके उसे एक अनपढ़ वैद्य ने 20-25 पैसे की देसी दवा से कैसे ठीक कर दिया था और वह दवा कौनसी है।

वह दवा है अमलतास अर्थात् अमलतास वृक्ष पर लगी गहरे भूरे रंग की फलियाँ। अमलतास की फलियों को तोड़ कर उनका गूदा निकाला गया और उसे दूध में खूब उबाल कर युवती को गर्मागर्म पिलाया गया तो उसके आधे घंटे बाद ही उसकी आंतड़ियों में जम कर सड़ा हुआ मल निकल गया तो उस युवती का पेट दर्द ठीक हो गया।

इस पर उस युवती के परिजन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने बाबा जी को कुछ रुपये देने चाहे तो उन्होंने लेने से मना कर दिया।
फिर बाद में उन्होंने मेरे बाबा जी को किसी अवसर पर जिमा कर उन्हें नकद दक्षिणा और एक जोड़ा वस्त्र दिये थे।

■ Disclaimer: इस पोस्ट को पढ़ कर स्वयं या दूसरे बंधु पर किसी कुशल वैद्य के परामर्श पर ही पेट दर्द / कब्ज के इलाज की इस विधि को अपनायें।
✍️ अनिल कौशिश

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