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आओ कुछ जाने आतंकवाद

फासीवाद, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र की हत्या के क्या हैं वामपंथियों की नजरों में अर्थ

भारतीय वामपंथी के मुंह से यह शब्द आपने भी सुने होंगे।
तानाशाही,
फासीवाद
अभिव्यक्ति की आजादी
लोकतन्त्र की हत्या
सर्वाहारा, समानता और मानवता
भगवान श्री राम से लेकर सावरकर तक हर महापुरुष पर अंगुली उठाने वाले कम्युनिस्टों के आदर्श माओ कैसे थे? हाँ वही चीनी माओ जिसने1962 मे भारत पर आक्रमण किया था। हाँ वही माओ जो CPI और CPM के अन्तिम नबी हैं। वही माओ जिनकी लिखी हर बात कम्युनिष्टों के लिए कुरान की आयात और बाइबिल की उपदेश माला है। (गीता कम्यूनल है इसलिए गीता नहीं। गीता रामायण और उपनिषद से सेक्युलरिज़्म की भावनाए आहात होती हैं। वैसे भी सनातन एक पिछड़ी हुई सोच है।)

आज के चीन में माओ की दो हज़ार से अधिक ऊंची-ऊंची प्रतिमाएं खड़ी हैं. पर, एक भी ऐसा स्मारक नहीं है, जो उनकी सनक और बहक के कारण मरने वालों की भी याद दिलाता हो. जर्मनी में हिटलर की या रूस में स्टालिन की कोई प्रतिमा नहीं मिलती. लोग उनके नाम पर थूकते हैं, न कि उन्हें पूजते हैं.जितने लोग माओ की सनक से मारे गए उतने तो दूसरे विश्वयुद्ध मे भी नहीं मारे गए।

ली चीस्युई 22 वर्षों तक माओ त्सेदोंग के निजी डॉक्टर थे. समय के साथ वे भी माओ से दूर होते गये. 1976 में माओ की मृत्यु के बाद ‘सांस्कृतिक क्रांति’ का अंत होते ही वे अमेरिका चले गये. वहां प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द प्राइवेट लाइफ़ ऑफ़ चेयरमैन माओ’ (पार्टी अध्यक्ष माओ का निजी जीवन) में डॉक्टर ली ने ‘लंबी छलांग’ और ‘सांस्कृतिक क्रांति’ जैसे राजनैतिक अभियानों के साथ-साथ माओ की आदतों, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य वर्णन किया है. यह पुस्तक चीन में आज भी प्रतिबंधित है।

इस पुस्तक में डॉक्टर ली ने लिखा है कि ‘माओ अपने दांत एक बार भी साफ़ नहीं करते थे. चीन के अनेक किसानों की तरह माओ भी सुबह चाय पीते हुए मुंह में चाय घुमाते-फिराते थे और चाय की पत्तियां भी निगल जाते थे. समय के साथ उनके दांत काले पड़ कर गिरते गये. दांतों के बीच की खाली जगह को वे अपने होंठों से इस छिपा लेते थे कि यह जगह केवल बोलते या हंसते समय दिखती थी.’
डॉक्टर ली लिखते हैं कि एक सेवक उनके लिेए नियमित रूप से औरतों का इंतज़ाम किया करता था. ‘कम आयु की अनगिनत महिलाओं का यौन शोषण,. जब कभी वे अपनी वैभवशाली ट्रेन से यात्रा कर रहे होते थे, तब सारा रेल यातायात रोक दिया जाता था. जब कभी वे हवाई जहाज़ से यात्रा कर रहे होते, तब देश के बाक़ी सभी विमानों को ज़मीन पर ही रहना पड़ता था.’

एक किसान परिवार में जन्मे माओ 1920 वाले दशक से ही मार्क्स और लेनिन के भक्त बन गये थे.
वर्षों से चीन को शेष दुनिया से अलग-थलग रखे हुए और दमनपूर्ण आत्याचारों के बल पर सत्ता के अधिष्ठाता बने रहे माओ को, 1972 में, एक बड़ी विदेश नैतिक मान्यता मिली. जिस अमेरिका को उन्होंने सबसे बड़ा ‘वर्गशत्रु’ घोषित कर रखा था, उसके राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन उनसे मिलने बीजिंग पहुंचे. 82 वर्ष की आयु में, नौ सितंबर 1976 को आखिरकार उनकी मृत्यु हो गयी. लाखों चीनी, जिन्होंने अपने देश के पूरे इतिहास में दमन और अत्याचार से परे निजी स्वतंत्रता और सम्मान को कभी जाना-सुना ही नहीं था, माओ के काले कारनामों को भुला कर सच्चे मन से शोक मनाते दिखे. उनके लिए माओ ही ‘राष्ट्रपिता’ थे.

माओ की लाल किताब
माओ ने 1949 से देश भर में ऐसे सैनिकों और पार्टी-कार्यकर्ताओं को भेजना शुरू किया, जिन्हें दिमाग़ी धुलाई द्वारा जनता को साम्यावाद की माओवादी व्याख्या पढ़ा कर ‘पुनर्शिक्षित’ करना था. माओ का मानना था कि साम्यवाद के बारे में उनकी समझ ही सबसे सही है. इसलिए हर व्यक्ति के दिमाग में उसे गहराई तक बैठाया जाना चाहिये. ज़रूरी हो, तो बलपूर्वक भी.
इस ‘पुनर्शिक्षा’ अभियान के लिए जिन ‘जनशिक्षकों’ को देश भर में भेजा गया, उनमें माओ का सबसे बड़ा बेटा 27 वर्षीय ऑनजिंग भी था. ‘पुनर्शिक्षा’ के लिए हर जगह जनसभाएं की जाती थीं,’ ऑनजिंग ने अपनी गोपनीय डायरी में एक बार नोट किया. पुनर्शिक्षा सभाएं अनेक लोगों की पीट-पीट कर हुई मौतों के साथ समाप्त होती थीं
पुनर्शिक्षा के नाम पर होने वाले अत्याचारों में सहभागी रही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की एक युवती ने भी ऐसे ही वीभत्स दृश्य देखे थे, ‘हमने एक गांव के चार निवासियों को हाथ की कलाइयां बांध कर लटका दिया. हर ग्रामवासी को, चाहे वह मर्द था, औरत थी या कोई बच्चा था, इसे देखना पड़ा. एक ज़मींदार महिला को भी इसी तरह सताया गया, हालांकि उसके पास बहुत थोड़ी-सी ज़मीन थी. उससे पूछा गया, अनाज कहां छिपा रखा है? मुझे पता था कि उसके पास कुछ नहीं था. लेकिन, पूछताछ और पिटाई चलती रही. अंत में उसका ब्लाउज़ फाड़ दिया गया. उसने कुछ ही समय पहले एक बच्चे को जन्म दिया था. उसके स्तनों से दूध टपक रहा था. उसका नवजात शिशु ज़मीन पर पड़ा बिलख रहा था… सबको यह दृश्य देखने के लिए मजबूर किया गया. ना-नुकुर करने पर पिटाई कर दी गई.’

1958 में माओ पर एक नयी सनक सवार हुई. उन्हें लगा कि देश में यदि तीन मुख्य अंतर तेज़ी से मिट जायें – गांव और शहर, दिमाग़ और हाथ तथा कृषिकार्य और औद्योगीकरण के बीच – तो चीन, पश्चिम के औद्योगिक देशों को पीछे छोड़ कर, अपने समाज का बहुत जल्द ही साम्यवादी कायापलट कर सकता है. यह विलक्षण ज्ञान मिलते ही उन्होंने दूसरी पंचवर्षीय योजना रोक कर आगे की ओर ‘लंबी छलांग’ लगाने का एक नया अभियान छेड़ दिया. शुरुआात गांवों से हुई. किसानों से उनके खेत-खलिहान छीन कर उन्हें सामूहिक खेती के लिए विवश कर दिया गया.
ज़ोर-ज़बर्दस्ती भरा खेती का यह तरीका बिल्कुल नया था. किसान परेशान थे. कृषि-पैदावार रसातल में चली गयी. भुखमरी से हाहाकार मच गया. सिचुआन प्रदेश के एक ग्रामीण शुाआगे ने एक बातचीत में याद किया है, ‘(कम्युनिस्ट) पार्टी के कार्यकर्ता हमारे बर्तन-भांडे उठा ले गये. खाना केवल सामूहिक रसोईघरों में ही पकाया- खाया जाता था. हर चीज़ सामूहिक थी. हमारे पास कुछ नहीं बचा था. हम धान की बालियां मुरझाते देख रहे थे, कुछ नहीं कर सके. पार्टी-कार्यकर्ता निर्दयता से घरों में कोने-कोने की तलाशी ले रहे थे. अल्मारियां और बिस्तर तोड़-फोड़ देते थे. उनमें लगी लकड़ी को जला कर अलाव तापते थे. हमारे कच्चे घरों को भी अक्सर गिरा देते थे.’ किसान शहरों की ओर भागने लगे. भयंकर अकाल पड़ गया.

लेख स्रोत
https://satyagrah.scroll.in/article/128070/mao-zedong-china-sanskritik-kranti-1966-mauten?fbclid=IwAR3GC96kX3oRnVHIoeaoblYQsfkYkGVK-D15n6OyW1higA5V4dm4yx4uvgI

 

प्रस्तुति  : देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन  : उगता भारत

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