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नेपाल के सिंहासन का ताज एक बार फिर केपी शर्मा ओली के सिर, सांठगांठ कहे या सियासी चमत्कार?

डॉ. रमेश ठाकुर

बीते सोमवार को ओली का विश्वास मत में पिछड़ने के बाद अचानक से मुल्क में सियासी संग्राम शुरू हो गया था। लेकिन इतना तय है मौजूदा सरकार को राष्ट्रपति ने जीवनदान तो बेशक दे दिया है। पर, आसानी से सरकार चलाना मुश्किल होगा।

नेपाल के सिंहासन का ताज एक बार फिर केपी शर्मा ओली के सिर सज गया। सांठगांठ कहे, या सियासी चमत्कार? जो भी हो आखिरकार ओली तीसरी बार पहाड़ी मुल्क नेपाल के प्रधानमंत्री बन ही गए। विश्वास मत हारने के बाद उन्हें और विपक्षी पार्टियों को राष्ट्रपति विधा देवी भंडारी ने तीन दिन का समय दिया था सरकार बनाने के लिए, जिसमें दोनों पक्ष नंबरों के गेम को पूरा नहीं कर पाए। इसके बाद गेंद राष्ट्रपति के पाले में पहुंच गई। अब फैसला उनको ही करना था। चुनाव कराएं या अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें। कुछ घंटों के मंथन के बाद राष्ट्रपति विद्या भण्डारी ने संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए सबसे बड़े दल के नेता होने के कारण ओली को फिर से नेपाल की कमान सौंपने का निर्णय किया। ओली को राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए आमंत्रित कर दिया। इसके साथ राजनीतिक संग्राम खत्म हुआ।

गौरतलब है कि विश्वास मत हारने के बाद कयास ऐसे भी लगाए जा रहे थे कि शायद ओली ने रणनीति के तहत जानबूझकर सदन में अपना विश्वास मत हासिल नहीं किया? यह जानते हुए कि बहुमत उनके पक्ष में नहीं है लेकिन इस प्रक्रिया के बाद शायद राष्ट्रपति सबसे बड़े दल के नेता के रूप में उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाने का फैसला लें। सच में हुआ भी वैसा ही। राष्ट्रपति ने बड़े दल को प्रधानमंत्री बनने का ऑफर दिया। राजनीति में तभी तो कहा जाता है कि यहां कुछ भी संभव है। केपी शर्मा ओली भी उम्मीद छोड़ चुके थे। उनको भी लगने लगा था देश में अब मध्यावधि चुनाव ही अंतिम रास्ता है। लेकिन फिर भी उनको कहीं न कहीं उम्मीद थी, फैसला उनके पक्ष में आएगा। उन्होंने आस नहीं छोड़ी, क्योंकि उनकी एक लीगल टीम लगातार राजभवन में सक्रिय रही। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी तक एक संदेश पहुंचाने में सफल रही कि बड़ी पार्टी होने के नाते ओली को ही चुना जाए।

बीते सोमवार को ओली का विश्वास मत में पिछड़ने के बाद अचानक से मुल्क में सियासी संग्राम शुरू हो गया था। लेकिन इतना तय है मौजूदा सरकार को राष्ट्रपति ने जीवनदान तो बेशक दे दिया है। पर, आसानी से सरकार चलाना मुश्किल होगा। अगर चली भी तो बड़ी मुश्किलें आएंगी रास्तों में। क्योंकि ओली के पीएम बनने के बाद उन पर लगे आरोप लंबे समय तक चर्चाओं का विषय बने रहेंगे। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर दो ऐसे बड़े आरोप लगे जिसका सामना उनको लंबे समय तक करना पड़ेगा। पहला, जब उन्होंने कांग्रेस सरकार के बाद अपनी हुकूमत मुल्क में पहली मर्तबा स्थापित की थी, तब कांग्रेस सरकार के तबके बनाए गए सभी सातों राज्यों के राज्यपालों को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही बिना बताए बर्खास्त कर दिया गया। तब उन्हें तानाशाह तक कहा गया था।

दूसरा, आरोप बिल्कुल ताजा है। कुछ समय पहले हिंदुस्तान से भेजी गई कोरोना वैक्सीन में घपला करने का भी उन पर आरोप लगा है। जिसे विपक्षी दल समूचे नेपाल में बड़ा मुद्दा बनाए हुए हैं। खुदा न खास्ता अगर चुनाव हो जाते हैं, तो वह मुद्दा जरूर गूंजेगा। जिसका प्रत्यक्ष रूप से उन्हें नुकसान भी हो सकता था। दरअसल, ये दो ऐसे आरोप हैं, जो उनको आगे चलकर भी सताएंगे। हालांकि कारण एकाध और भी हैं, लेकिन उनका असर उतना नहीं पड़ेगा। देखा जाए तो नेपाल वैसे सियासी संग्राम के लिए हमेशा से कुख्यात रहा है। क्योंकि वहां की सियासत में आए दिन कुछ न कुछ ड्रामा होता ही रहता है। कम समय में ही अब तक 41 प्रधानमंत्री बन चुके हैं। किसी भी प्रधानमंत्री को अपना कार्यकाल पूरा करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। सियासी छीछालेदर वहां मची ही रहती है।

केपी शर्मा अब दोबारा प्रधानमंत्री जरूर बन गए हैं लेकिन चुनौतियां कम नहीं होगी, बल्कि और बढ़ जाएंगी। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के फैसले के खिलाफ विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट भी जाने की तैयारी कर रहे हैं। वह राष्ट्रपति के फैसले को चुनौती दे रहे हैं और फैसला एकतरफा बता रहे हैं। विपक्षी नेता प्रचंड राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच मिलीभगत का भी आरोप लगा रहे हैं। इन आरोपों की तपिश बताती है कि मामला बेशक शांत हो गया, लेकिन इसके बाद भी हाई वोल्टेज ड्रामा होने की संभावनाएं और प्रबल हो गईं हैं। वैसे देखा जाए तो ओली की कुर्सी हिचकोले तो उसी दिन से मारने लगी थी जब उन्होंने दूसरी बार सत्ता की बागडोर संभाली थी। डगर तीसरी बार भी आसान भी नहीं होगी। उनके पक्ष में अभी 93 ही सांसद हैं। इतने से वह संसद संचालित नहीं कर सकते। नीति बनाने के लिए और कोई निर्णय लेने के लिए कम से कम 124 सांसद चाहिए ही होंगे।

सरकार के माथे पर मंडराते काले बादल आगे भी आसानी से छंटने वाले नहीं? विश्वास मत के समय ओली की खुद की पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और यूएमएल के 28 सांसदों द्वारा व्हिप का खुलेआम उल्लंघन किया गया था। कुछ अनुपस्थित भी रहे थे? ओली के समक्ष अब भारत से संबंध मधुर स्थापित करने की बड़ी चुनौती होगी। एक वक्त था जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व दूसरे भारतीय नेताओं का उन्हें खुलेआम समर्थन हुआ करता था। लेकिन जबसे ओली का झुकाव चीन की तरफ बढ़ा, उनकी चरणवंदना करने लगे, स्थिति अचानक बदल गई। भारत का नजरिया भी उनके प्रति बदल गया। प्रधानमंत्री मोदी जब नेपाल गए थे, तो उन्होंने बातों-बातों में ओली को इशारा भी किया था कि चीन के चंगुल से वक्त रहते बाहर आ जाएं, वरना नुकसान उन्हीं को होगा। कमोबेश, वैसा हुआ भी। केपी शर्मा ओली की पार्टी के ज्यादातर सांसद ऐसे हैं तो भारत से अच्छे संबंधों की वकालत करते हैं। चीन की नेपाल में लगातार घुसपैठ किसी से छिपी नहीं है। इन सभी मौलिक कारणों पर ओली को मंथन करना होगा।

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