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आज का चिंतन

अन्याय सहन करने की भी एक सीमा होती है, जिसे हमें समझना चाहिए : स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

प्रश्न — Swami Vivekanand Parivrajak नमस्ते स्वामी जी। स्वामी जी क्या अन्याय सहना चाहिए, चाहे वह अन्याय करने वाले स्वयं के माता-पिता ही क्यों ना हों? क्योंकि मेरे हिसाब से अन्याय करना भी नहीं चाहिए और सहना भी नहीं चाहिए। क्या अन्याय सहने वाला दोषी नहीं?

उत्तर — Shobharohilla जी। महर्षि मनु जी ने
धर्म के लक्षणों में क्षमा भी लिखा है। क्षमा का अर्थ होता है सहन करना। इसलिए प्रारंभ में थोड़ा बहुत अन्याय सहना चाहिए, परंतु साथ साथ अन्यायकारी व्यक्ति को बताना भी चाहिए कि आपका व्यवहार ठीक नहीं है। आप अपना व्यवहार ठीक करें। क्योंकि अन्याय करना अधर्म है। कोई भी व्यक्ति अन्याय को सहना नहीं चाहता। हम भी नहीं चाहते। तो आप भविष्य में हमारे साथ अन्याय ना करें।
इस प्रकार से सूचना भी देनी चाहिए।
जब अन्यायकारी का अन्याय बढ़ता जावे और वह सुधार न करे, तो फिर यथा योग्य व्यवहार करना चाहिए। चार लोगों को इकट्ठा करके उसके विरुद्ध शिकायत करनी चाहिए, और कहना चाहिए, कि इसका अन्याय बंद करवाओ।
इस प्रकार से आगे आगे कार्यवाही करनी चाहिए।
ना तो चुपचाप सहना चाहिए, और न ही हमेशा अन्याय सहना चाहिए।

सहन करने या क्षमा करने के कुछ नियम होते हैं।

.क्षमा मांगने और क्षमा करने के नियम —-

निम्नलिखित लोग क्षमा माँगने और क्षमा करने के पात्र नहीं होते। वे दंड के पात्र होते हैं।

नियम 1 – छोटी छोटी गलतियों को क्षमा किया जाता है, बड़ी-बड़ी गलतियों को नहीं।

नियम 2 – अनजाने में की गई गलतियों को क्षमा किया जाता है, जानबूझकर की गई गलतियों को नहीं।

नियम 3 – परिवार में 8/10/15/20/30 बार
गलतियों को क्षमा किया जाता है। समाज में 2/ 4 बार। इससे अधिक गलतियां की जाएं, तो क्षमा नहीं किया जाता।

नियम 4 – यदि पहले भी अंतिम चेतावनी दी जा चुकी हो, और उसके बाद फिर गलती की जाए, तो क्षमा नहीं किया जाता। (तब दंड लागू होता है।)

जो क्षमा करने के पात्र होते हैं। उन पर ये नियम लागू होते हैं।

नियम 5 – क्षमा तब मांगी जाती है, जब व्यक्ति को अपनी गलतियाँ समझ में आई हों, और वह अपनी गलतियों को लिखकर स्वीकार करे, कि मैंने ये ये गलतियाँ की हैं। मैं इन गलतियों के लिए बहुत लज्जा का अनुभव करता हूँ, हृदय से क्षमा मांगता हूं, और भविष्य में ऐसी गलतियाँ नहीं दोहराऊंगा, ऐसा सब सज्जनों को आश्वासन देता हूँ। कृपया मुझे बताया जाए कि मैं प्रायश्चित के रूप में किस प्रकार का कष्ट भोगूँ? आप मुझे जो भी कष्ट भोगने को कहेंगे, यह मेरी गलतियों का प्रायश्चित होगा, दंड नहीं । यदि मैं फिर अगली बार कोई गलती करूंगा, तो समाज के बुद्धिमान लोग मुझे जो भी दंड देंगे, मैं उसे स्वीकार करूंगा।
केवल औपचारिकता पूरी करने के रूप में ऐसा कह देना, कि यदि मुझसे कोई गलती हो गई हो, तो मैं क्षमा चाहता हूँ। यह क्षमा मांगने का स्वरूप नहीं है। क्योंकि इस वाक्य का अर्थ है कि, उस व्यक्ति को अभी तक अपनी गलती समझ में नहीं आई। जब गलती समझ में ही नहीं आई, तो वह क्षमा किस बात की माँग रहा है? यह क्षमा याचना नहीं है, बल्कि जिसके प्रति अपराध किया था, उस पर एक और पत्थर मारने जैसा, एक नया अपराध है।

नियम 6 – वह हृदय से पश्चाताप करे, कि वास्तव में मुझसे बड़ी गलती हो गई है, और दृढ़ संकल्प करे, कि अब आगे ऐसी गलती नहीं दोहराऊंगा।

नियम 7 – आगे गलती न दोहराने के लिए उसे गलती के हिसाब से कष्ट भोगना चाहिए, जिसे महर्षि मनु जी के विधान के अनुसार, प्रायश्चित करना कहते हैं। इससे गलती करने का संस्कार नष्ट हो जाता है। यह कष्ट उतनी मात्रा में भोगना चाहिए, जिससे कि वह संस्कार नष्ट हो जाए , ताकि वास्तव में व्यक्ति दोबारा गलती को न दोहराए, तथा और नई गलतियाँ भी न करे।
यदि हल्का सा प्रायश्चित करके फिर वह गलतियाँ करता है, तो इसका अर्थ है उसने प्रायश्चित किया ही नहीं, प्रायश्चित करने का सिर्फ दिखावा मात्र किया है। इस कारण से उसका सुधार नहीं हुआ।

नियम 8 – उसकी गलती से जितने लोगों को कष्ट पहुंचा है, उन सब से उसे क्षमा मांगनी पड़ती है, क्योंकि उसने गलती केवल एक व्यक्ति के प्रति नहीं की, उन सब लोगों के प्रति गलती की है, जिनकी भावनाओं को, उसकी गलती से ठेस पहुंची है।

विशेष सूचना — क्षमा करने और क्षमा माँगने के ये नियम मनुष्यों पर लागू होते हैं, ईश्वर पर नहीं।
वैदिक सिद्धांत के अनुसार, ईश्वर तो एक भी गलती, एक बार भी क्षमा नहीं करता। वह तो अवश्य दंड देता ही है, तभी वह न्यायकारी कहलाता है।
इसलिये ईश्वर के दंड से सबको डरना चाहिए, और गलतियाँ करने से बचना चाहिए।
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक रोजड़ गुजरात

 

प्रस्तुति : अरविंद राजपुरोहित

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