Categories
इतिहास के पन्नों से

भारत पर आक्रमण करने वाले शक कौन थे ?

 

शक और शाक्य दोनों में फर्क है। बौद्ध पाठ्यों में शाक्य मुख्यत: गौतम गोत्र के क्षत्रिय बताए गए हैं। शाक्यों का हिमालय की तराई में एक प्राचीन राज्य था, जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी, जो अब नेपाल में है। शाक्य प्रथम शताब्दी ई.पू में प्राचीन भारत का एक जनपद था। हम यहां शाक्य की बात नहीं ‘शक’ की बात कर रहे हैं।

ऐसा कहा जाता है कि पुराणों अनुसार शक जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए। महाभारत में भी शकों का उल्लेख है। शक साम्राज्य से संबंधित मथुरा के राजकीय संग्रहालय में मूर्ती, स्तंभ, सिंह शीर्ष स्तंभ, मुद्रा आदि कई वस्तुएं रखी हुई है। गार्गी संहिता, बाणभट्ट कृत हर्षचरित में भी शकों का उल्लेख मिलता है।

शक कौन थे, इस पर विवाद हो सकता है। वे मध्य एशिया से खदेड़े गए थे तब उन्होंने सिंध पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया था। सिंध से वे देश के अन्य हिस्सों में फैल गए। सिंध से पंजाब, सौराष्ट्र, मथुरा, नासिक और उज्जैन तक इन्होंने अपना शासन विस्तार कर लिया था।

जो भी हो, शकों का भारत के इतिहास पर गहरा असर रहा है। शक संभवतः उत्तरी चीन तथा यूरोप के मध्य स्थित झींगझियांग प्रदेश के निवासी थे। कुषाणों एवं शकों का कबीला एक ही माना जाता है। हालांकि यह शोध का विषय है। इतिहाकारों में इसको लेकर मतभेद हैं। इतिहासकार मानते हैं कि शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था।

‘युइशि’ लोग तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में तकला-मकान की मरुभूमि के सीमांत पर निवास करते थे। युइशि लोगों पर जब चीन के हूणों ने आक्रमण किया तो उनको अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। उन्होंने शकों पर आक्रमण कर उनका स्थान हड़प लिया तब शकों को अपना स्थान छोड़कर जाना पड़ा। हूणों ने युइशियों को धकेला और युइशियों ने शकों को। शकों ने बाद में बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर हिन्दूकुश के मार्ग से भारत में प्रवेश किया। बैक्ट्रिया के यवन राज्य का अंत शक जाति के आक्रमण द्वारा ही हुआ था। शकों ने फिर पार्थिया के साम्राज्य पर आक्रमण किया। पारसी राजा मिथिदातस द्वितीय (123-88 ईपू) ने शकों के आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा की। मिथिदातस की शक्ति से विवश शकों ने वहां से ध्यान हटाकर भारत की ओर लगा दिया।

भारत में शकों का शासन : शुंग वंश के कमजोर होने के बाद भारत में शकों ने पैर पसारना शुरू कर दिया था। संपूर्ण भारत पर शकों का कभी शासन नहीं रहा। भारत के जिस प्रदेश को शकों ने पहले-पहल अपने अधीन किया, वे यवनों के छोटे-छोटे राज्य थे। सिन्ध नदी के तट पर स्थित मीननगर को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। भारत का यह पहला शक राज्य था। इसके बाद गुजरात क्षेत्र के सौराट्र को जीतकर उन्होंने अवंतिका पर भी आक्रमण किया था। उस समय महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग को शकों ने सातवाहन राजाओं स छीना था और उनको दक्षिण भारत में ही समेट दिया था। दक्षिण भारत में उस वक्त पांडयनों का भी राज था।

शक राजाओं ने गांधार, सिन्ध, महाराष्ट्र, मथुरा और अवंतिका आदि क्षे‍त्रों के कुछ स्थानों पर लंबे काल तक राज किया था। उज्जयिनी का पहला स्वतंत्र शक शासक चष्टण था। इसने अपने अभिलेखों में शक संवत का प्रयोग किया है। इसके अनुसार इस वंश का राज्य 130 ई. से 388 ई. तक चला, जब संभवतः चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने इस कुल को समाप्त किया। उज्जैन के क्षत्रपों में सबसे प्रसिद्ध रुद्रदामा (130 ई. से 150 ई.) था।

माना जाता है कि आजादी के बाद जब इतिहास लिखा गया तो हिन्दू विजयों और प्रतीकों को जानबूझकर हाशिये पर धकेला गया और उन लोगों का महिमामंडन ज्यादा किया गया जिन्होंने भारत पर आक्रमण करके यहां की संस्कृति और सभ्यता को लगभग तहस नहस कर दिया। भारतीय वीरता के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है जिसे कभी उद्घाटित नहीं किया ग्या क्योंकि वह हिन्दू अस्मिता और गौरव से जुड़ा हुआ था। ऐसे ही एक अध्याय का नाम है ‘द ग्रेट विक्रामादित्य’। जब विक्रमादित्य ने शकों को समूल से हराकर उन्हें देश से बाहर धकेल दिया था जब उन्हें इस विजय के बाद शाकारी उपाधी से सम्मानीत किया गया था।

इस विजय की याद में ही महान विक्रमादित्य ने एक संवत शुरू किया था जिसे आज हम विक्रम संवत कहते हैं। दरअसल कहानी कुछ यूं है कि ईसा के 100 वर्ष पहले भारत पर शकों के आक्रमण की शुरुआत हुई। ग्रीक प्रदेश बैक्ट्रिया को जीतने के बाद शकों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। संपूर्ण भारत में शक तेजी से तूफान की तरह फैल गए थे और उन्होंने लगभग संपूर्णा भारत पर कब्जा ही कर लिया था। सिंध से लेकर वे दक्षिण के आंध्र तक चले गए थे।

महाजनपदों में विभाजित भारत के अधिकतर हिस्से शकों के अधिन हो गए थे। सिंध, पंजाब, कश्मीर, अफगान, राजस्थान और गुजरात में तो इनकी सत्ता मजबूत हो गई थी। साथ ही उत्तर और मध्य भारत के कुछ हिस्से भी इनके अधीन हो चले थे। ऐसे में इतिहास के पटल पर एक शक्तिशाली राजा का प्रादुर्भाव हुआ, मालवपति गंधर्वसेन पुत्र विक्रमादित्य का।

भारत के उस कठिन समय के शक्तिशाली गण मालवगण के अधिपति विक्रमादित्य ने यौद्धेय गण और बाकी गणों को संघटित कर एक बड़ी सेना खड़ी की। अत्यंत निपुण सेनानी विक्रमादित्य के नेतृत्व में इस संघटित भारतीय सेना की शकों से भीषण लड़ाई हुई और एक के बाद एक युद्ध जीतते हुए विक्रम की सेना आगे बढ़ती गई और उन्होंने शकों को हर जगह से उखाड़ फेंका। शक सत्ता से बेदखल हो गए लेकिन उनके कुछ समूह भारतीय धर्म और संस्कृति में ही घुल मिल कर रहने लगे।

इस युद्ध में शकों का राजा नह्वान भी मारा गया। विक्रम की सेना ने संपूर्ण अखंड भारत पर अपना परचम लहराकर अपनी शक्ति सिद्ध कर दी और वे सम्राट शाकारी विक्रमादित्य नामक उपाधी से नवाजे गए। ईसा पूर्व 57 साल पहले भारतीयों की इस अविस्मरणीय जीत को याद रखने के लिए ही विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत करवाई। विक्रमादित्य के बाद लगभग 135 साल बाद राजा शालिवाहन (गौतमीपुत्र सातकर्णि ) ने भी शकोंं को रौंद डाला और अपनी एक नई कालगणना शुरू की जिसे ‘शालिवाहन शक’ कहा जाता है।

शक सत्ता से बेदखल हो चले थे लेकिन कमजोर नहीं पड़े थे। उसी दौर में कुषाणों ने भारत पर हमला बोल दिया। कुषाणों के आते ही भारत के शकों ने अपने आप उनकी शरण ली। कुषाणों में कनिष्क नामक राजा बहुत प्रसिद्द हुआ। उसने बौद्ध धर्म अपनाकर अफगानिस्तान से लेकर मथुरा तक अपना राज्य कायम कर लिया था। उसके राज्य की सिमाएं विशाल थी। हिंदुकुश के पार तक उसका साम्राज्य था।

कनिष्क की मृत्यु के बाद कुषाण साम्राज्य कमजोर होने लगा तो भारत के शकों ने अधिपत्य को अस्वीकार किया और वे स्वतंत्र होकर रहने लगे। गुजरात, सौराष्ट्र और मालवा के कुछ भाग पर पुन: शकों का अधिकार था तो गांधार, सिंध इत्यादि पर कुषाणों ही अधिकार रहा। इस तरह शकों का सम्राज्य 123 ईपू से 200 ईस्वी तक चलता रहा और उसके बाद चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने फिर से वही कार्य किया जो कि महान सम्राट शाकारी विक्रमादित्य ने किया था। चंद्रगुप्त के बाद सबसे महान सम्राट हुए जिनका नाम था समुद्र गुप्त।

पाटलिपुत्र के छोटे से राज्य के शासक समुद्र गुप्त ने उत्तर भारत के सभी छोटे बड़े राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया और वे अब पश्‍चिम की ओर बढ़ने लगे थे। इससे पहले की वह कुषाणों पर हमले करते, कुषाणों ने खुद होकर उसका विवाह अपनी कन्या से करवाते हुए उनकी शरणागति ली और इस प्रकार कुषाण हमेशा के लिए हिंदुत्व में विलीन हो गए। समुद्रगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय ने राज्य संभाला।
( सोशल मीडिया से साभार)

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
onwin giriş
onwin giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş