क्या है शिव ,शिवलिंग और भस्मासुर का वैज्ञानिक और वैदिक सत्य ?

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मूढ जो होते हैं वह गूढ़ को न समझ कर रूढ़ की बात करते हैं। ऐसे लोगों से क्षमा चाहते हुए विचारवान विद्वान , सत्यान्वेषी, सत्यपारखी ,सत्याग्रही, लोगों के समक्ष एक प्रकरण उद्धत करना चाहूंगा।
शिव किसको कहते हैं?
शिवलिंग क्या है?
कैलाशपति क्या है?
शिव के पर्यायवाची क्या क्या हैं?
शिवनाद और डमरु क्या है?
भस्मासुर की वास्तविक कथा क्या है?
ऐसे ही अनेक प्रश्न जो शिव से जुड़े हैं, उनका समाधान करते हैं।

शिव किसको कहते हैं?

शिव परमात्मा को कहते हैं। ईश्वर के नाम कहीं गौणिक, कहीं कार्मिक और कहीं स्वाभाविक अर्थों के वाचक हैं ।इसलिए ईश्वर का एकमात्र सही नाम केवल ओ३म है। शेष नाम उसके कार्मिक, स्वाभाविक एवम् गौणिक हैं।
उदाहरण के तौर पर विराट, पुरुष ,देव ,आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, विश्वंभर, विष्णु ,शिव, यह नाम लौकिक पदार्थों के और मनुष्यों के भी होते हैं और यही नाम ईश्वर के भी होते हैं।

इनमें अंतर कैसे करें?

जहां-जहां उत्पत्ति ,स्थिति, प्रलय,अल्पज्ञता ,जड़ता, दृश्य आदि विशेषण भी हों वहां वहां परमेश्वर का अर्थ नहीं होता।अर्थात जहां उत्पन्न, एक आकार में स्थित होकर के और प्रलय अथवा नष्ट होता हो वह ईश्वर नहीं है। जैसे शंकर अर्थात जो सुख का करने हारा है उस ईश्वर का नाम शंकर है।
दूसरी तरफ आप किसी व्यक्ति का नाम भी शंकर देखते हो। इसी प्रकार जो कल्याण करने वाला है उसको शिव कहते हैं और कल्याण केवल परमात्मा करता है, इसलिए परमात्मा कल्याणकारी है। इसलिए परमात्मा शिव है।
(महर्षि दयानंद कृत अमर ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम समउल्लास का अध्यन करें)

शिव आत्मा को कहते हैं।जैसे त्रेता युग में एक राजा शिवजी हुए हैं, वह एक आत्मा थीं।जैसे आपने व्यक्तियों के नाम शिवकुमार, शिवराज, शिवपाल अपने जीवन में देखे और सुने होंगे।
शिव सूर्य को कहते हैं। शिव राजा को कहते हैं।
त्रेता युग में अब से करीब 1269000 वर्ष पहले रामचंद्र जी हुए थे। उन्हीं के समकालीन थे रावण, राजा शिव, ऋषि श्रृंग, भारद्वाज मुनि, सोनक मुनि एवं अन्य ऋषि गण। राजा शिव के विषय में जानकारी।
हमने जाना कि वैदिक साहित्य में शिव के नाना पर्यायवाची शब्दार्थ हैं। जैसे शिव नाम परमात्मा का, शिव नाम राजा का, शिव नाम आत्मा का और शिव नाम सूर्य का।
श्रंग ऋषि की आत्मा ब्रहम ऋषि कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी में आती थी। इसलिए दिनांक 18 अक्टूबर 1964 को अपने उपदेश में श्री कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी अर्थात
श्रृंग ऋषि महाराज कहते हैं कि उन्होंने शिव के दर्शन किए थे। जब शिवजी एक राजा थे। जो रावण के गुरु कहलाते थे। हिमाचल राजा दक्ष की कन्या पार्वती के साथ उनका संस्कार हुआ था। लेकिन बहुत ही सुंदर, बहुत ही विवेकी पुरुष थे।
जिस राजा के राज में प्रजा का आचरण बहुत उच्च कोटि का होता हो, जिस राजा के राज्य की प्रजा बहुत ऊंचे विचारों की सदाचरण करने वाली होती है, उस राजा को शिव कहते हैं। उसी राजा को कैलाशपति की पदवी दी जाती थी अर्थात ऊंचे शिखर वाली प्रजा कैलाश कही गई और उसका स्वामी कैलाशपति कहलाता था। महाराजा शिव कैलाश पर्वत पर तपस्या किया करते थे। कैलाश कहते हैं बहुत उच्च शिखर वाला पर्वत।
एक संसार का रचयिता स्वामी है, जो शिव है, जो लिंग में संसार को धारण कर रहा है। आज हम उस लिंगमय ज्योति वाले शिव की याचना करते चले जाएं जिसने महत्व देकर इस संसार को विलक्षण बनाया। शिव नाम उस द्रव्य पति का भी है जो अपने द्रव्य को यथाशक्ति संसार के शुभ कार्यों में लगाता है ।राष्ट्र के कार्यों में लगाता है। रक्षा के कार्यों में लगाता है। धर्म के कार्यों में लगाता है ।उस द्रव्य को भी लिंगमय ज्योति कहा जाता है।
अब प्रश्न पैदा हुआ कि शिवलिंग क्या है ? इसमें से कैसे ज्योति प्रस्फुटित होती है? शिव ने संसार को लिंग में कैसे धारण कर रखा है?इसके लिए शिव लिंग के वास्तविक वैदिक अर्थ एवं महत्व को समझना होगा।

शिवलिंग

इससे पहले कि हम वास्तविक शिवलिंग की बात करें हम लोक में प्रचलित एक रूढ़ कथा का उदाहरण ले लेते हैं । लेकिन उसका गूढ़ अर्थ कुछ और है, उसको भी समझने का प्रयास करेंगे।
कहते हैं कि एक बार महाराजा शिव नग्न होकर ऋषि पत्नी के द्वार पहुंच गए तो ऋषियों ने शाप दिया कि तेरा लिंग पृथ्वी में स्थापित हो जाए। इस प्रकार उनका लिंग पृथ्वी में स्थापित हो गया और अपनी क्रीड़ा करने लगा। तीनों लोकों में त्राहिमाम त्राहिमाम मच गया। देवताओं ने याचना की तो विष्णु ने कहा कि तुम पार्वती की याचना करो वह अपनी “भग: लिंगों धारणा अचेत “करके इसको शांत कर देगी।
इसका दार्शनिक रूप क्या है ?
इसका गूढ़ अर्थ क्या है? इसका वैदिक साहित्य में क्या अर्थ है? शिव नाम परमात्मा का है और पार्वती नाम प्रकृति का है ,तथा प्राण लिंग को भी कहते हैं।
संसार में जब प्राण अर्थात लिंग बिना प्रकृति के आता है अर्थात बिना पार्वती के होता है तो वह त्राहिमाम त्राहिमाम कर देता है, जैसे मनुष्य के शरीर में जब अपान और प्राण दोनों की एक गति हो जाती है तो मानव मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ,अर्थात ‘त्राहिमाम त्राहिमाम’ हो जाती है। इसी प्रकार जब प्राण रूपी लिंग इस संसार में बिना प्रकृति के आता है तो ‘त्राहिमाम _त्राहिमाम’ मच जाती है ।
देवता उस समय याचना किया करते हैं । आवाहन करते हैं कि हे ! माता पार्वती अर्थात प्रकृति तू आ ।
उस समय यह प्रकृति माता पार्वती आती है ।भग नाम ही इस प्रकृति का है ।वह लिंग रूपी प्राण को अपने में धारण कर शांत किया करती है।
जब प्राण और अपान दोनों की गति विषम चलती हो तो आयुर्वेद का कोई महान आचार्य किसी औषधि अथवा सोमलता को देकर उनकी संधि कराता है। जिससे वह प्राणधारी यथार्थ गति पर आ जाता है। अर्थात उसमे वापस प्राण लौट आता है।
इसी प्रकार जब प्राण को प्रकृति (यानी लिंग को पार्वती) धारण करती है तो सृष्टि प्रारंभ हो जाती है और जो इस प्रकार की सृष्टि का सृजन कर प्रारंभ करता है उसका नाम शिव है। सृष्टि का प्रारंभ करने वाला तो केवल एक परमात्मा ही तो है उसी का नाम शिव है।
(इसी सच्चे शिव की खोज के लिए महर्षि दयानंद घर से निकल थे।)

अब मूढ़ और रूढ़ की बात करें

त्रेता युग में माता पार्वती उसका नाम भी था जो दक्ष राजा हिमाचल की कन्या थी और जिसको देखने का सौभाग्य श्रृंगऋषि महाराज को समकालीन होने के नाते मिला था ।कुछ लोगों ने यह घटना उस शिव राजा और पार्वती से जोड़ करके देखा और इसके वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाए। वैदिक और आर्ष साहित्य में क्या अर्थ है, उसका आध्यात्मिक क्या अर्थ है ? यह आपके समक्ष प्रस्तुत किया गया।
शिव नाम आत्मा का भी है। जब मनुष्य अर्थात आत्मा शिव संकल्प धारण करता है और शिव का पुजारी बनता है तो उस समय यह आत्मा अपने प्रभु को अर्थात शिव को पाकर शिव कहलाता है ।
(जैसे लोहा अग्नि के गुणों को धारण करने वाला हो जाता है उसी प्रकार शिव अर्थात् परमात्मा के संपर्क में आने से आत्मा शिव हो जाता है)
जिस प्रकार राजा अपने प्रजा को ऊंचा बनाने से शिव कहलाता है ।ऐसी यह आत्मा उस प्रभु की गोद में अर्थात् शिव की गोद में जाने से शिव कहलाता है।
परंतु ध्यान रहे एक शिव होता है और दूसरा महाशिव होता है ।यह आत्मा महाशिव नहीं होता केवल शिव कहलाता है।
हमारे वेदों में वह अनुपम विद्या ,व दार्शनिक विचार हैं जिनको धारण करता करता मानव गदगद हो जाता है। परंतु हमारी बुद्धि की सूक्ष्मता है, हम बुद्धि को संकुचित बना लेते हैं ।बुद्धि से इस वेद वाणी का विस्तार नहीं लेते ।वेद में शिव के नाना मंत्र आते हैं ।
(यज्ञ करते समय भी शिव संकल्प मन में बना लेने के अनेक मंत्र महर्षि दयानंद ने एक जगह एकत्र करके प्रस्तुत किए हैं।)

शिव का नाद एवं डमरु क्या है?

हमारे आचार्यों ने ऐसा कहा है कि जब महर्षि पाणिनि थे महाराजा शिव ने डमरू बजाया और गान गाया। उस डमरु में से 14 सूत्रों का विकास हुआ ,उसको व्याकरण कहते हैं। व्याकरण में प्रत्येक वेद मंत्र बंध जाता है।
क्या यह यथार्थ है कि शिव ने डमरू बजाया ,पार्वती ने नृत्य किया ,शिव ने गाना गाया ,और महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को ले लिया?
परंतु महर्षि पाणिनि तो अब हुए हैं और इस सृष्टि को लगभग एक अरब 97 करोड़ 29,56,064 वर्ष(यह गणना महर्षि श्रृंग वर्तमान जन्म में कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी द्वारा उस समय की गई है जब व्याख्यान कर रहे थे) प्रारंभ हुए हो रहा है तो क्या पाणिनी ऋषि महाराज से पूर्व यह वेद मंत्र क्रमबद्ध नहीं थे? उस समय कोई व्याकरण नहीं था?
यह एक जटिल प्रश्न है। इस विषय में हमारे ऋषियों ने और आचार्यों ने कहा है कि यह तो यथार्थ है कि शिव ने डमरू बजाया और पार्वती ने नृत्य किया परंतु इसको जानने की आवश्यकता है।
शिव नाम परमात्मा का है।पार्वती नाम इस प्रकृति का है ।सृष्टि के प्रारंभ में जब संसार का प्रादुर्भाव हुआ उस समय परमपिता परमात्मा या शिव ने इस महत रूपी डमरु को बजाया और डमरु बजने से यह माता पार्वती रूपी प्रकृति नृत्य करने लगी ।यह नाना रूपों में रची गई।
महत रूपी डमरु प्रकृति रूपी पार्वती और शिव रुपी परमात्मा को इस रूप में माना जाना चाहिए। उन्होंने डमरू बजाया तो संसार रच गया ,जो आज हमें दृष्टिगोचर हो रहा है।
यह है शिव का नाद एवं डमरु।
इस वाक्य को इस प्रकार जान और मान लेना चाहिए।
मैं यह नहीं कहता कि महर्षि पाणिनी मुनि महाराज ने भी संसार का अधिक कल्याण किया, उन्होंने 14 सूत्रों को प्रकृति के महत्त्व से या डमरु से किसी प्रकार स्वीकार कर लिया परंतु उपरोक्त तथ्य ही सही है।
हमारे यहां सृष्टि के प्रारंभ में इस व्याकरण को हमारे आदि ऋषि ब्रह्मा ने जाना और वह योग से जाना महर्षि पाणिनि ने भी इन 14 सूत्रों को अपने योग से जाना।
डमरु अग्रणी अनाद से जाना। ब्रह्मा ने सृष्टि के आदि में पूर्व की भांति अर्थात् पुनः की भांति( कहने का अर्थ यह है कि प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में एक ब्रह्मा होता है और वह प्रलय के बाद हर सृष्टि के प्रारंभ में योग से पहली सृष्टि के ज्ञान को आगे बढ़ाता है) योगाभ्यास किया अर्थात ब्रह्मा पहले से भी हो योगाभ्यास करते रहे थे। प्राण ,अपान, उदान, समान और व्यान इन पांचों प्राणों को जाना ।
उनको एकाग्र किया, और ब्रह्मरंध्र में ले जाया गया। जहां एक चक्र होता है। उस चक्र का विस्तार रूप हुआ। प्रत्येक मानव के मस्तिष्क में एक अनहद नाम का नाद बजता है। उस अनहद से नाना प्रकार के स्वर चलते हैं। उन स्वरों को जाना। स्वरों को जानकर इन अक्षरों को जाना ,और इन अक्षरों से यह प्रत्येक वेद मंत्र क्रमबद्ध होते चले गए। यह वेद मंत्र ऋचा कहलाती है। उन्हीं शब्दार्थ से संसार की भाषाओं का विकास हुआ। वही शब्दार्थ परंपरा से चले आ रहे हैं ।उन्ही शब्दों को मनुष्य अपनी कल्पना से कुछ परिवर्तन करता रहता है । इस प्रकार नाना प्रकार की भाषाओं का विकास हो जाता है, तो यह व्याकरण सृष्टि के आदि से चला आ रहा है ।महर्षि पाणिनि ने इसको कुछ सरल रूप में लिया है ।उनमें अक्षरों की व्याहृतियों करते हुए उन्होंने भिन्न-भिन्न रूपों से इस का प्रतिपादन किया है।
इसका अभिप्राय यह है कि हमारे मस्तिष्क में एक अनहद नाम का बाजा होता है ,एक नाद होता है, एक सिंहनाद होता है ,रिद्धि नाद होता है ,डमरू जैसा नाद होता है ,वही नृत्य भी होता है ।इस नाद को जानकर हम वास्तव में वैज्ञानिक बनते हैं और उससे नाना प्रकार की व्याहृतियों को जानने वाले और अपने मानवत्व का विकास करने वाले बनते हैं।
(यह पुष्प दिनांक 21 अक्टूबर1964 को कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी द्वारा अपने संबोधन में प्रस्तुत किया गया था)

अब यह भस्मासुर कथा क्या है ?

इसको देखते हैं।यह काल्पनिक है कि एक समय महाराजा भस्मासुर को इच्छा जागृत हुई कि मैं तपस्वी होऊं ।कुछ काल पश्चात उन्हें देव ऋषि नारद के दर्शन हुए तो नारद ने कहा अवश्य तपस्वी बनो। वह शिव की तपस्या करने लगे तो शिव आ पहुंचे। शिव ने कहा कि भस्मासुर क्या चाहते हो?
भस्मासुर ने कहा कि भगवान आपके द्वारा यह जो कंगन है इस कंगन को मुझे अर्पित कर दीजिए। अब भगवान शिव ने वह कंगन दे दिया। उस कंगन में यह विशेषता थी कि यदि वह मस्तिष्क के ऊपरले भाग में हो तो वह मानव भस्म हो जाता है।
महाराजा शिव तो कैलाश पर जा पहुंचे और भस्मासुर को अभिमान आ गया। जिसको भस्म करने की इच्छा होती, उसे कंगन द्वारा भस्म कर देते ।एक समय वह भ्रमण करते हुए कैलाश जा पहुंचे ।जब मानव के विनाश का समय आता है तो इसी प्रकार की बुद्धि बन जाती है ।उसी प्रकार के कारण बन जाते हैं ।भस्मासुर के जब विनाश का समय आया तो वह भ्रमण करते हुए कैलाश पर जा पहुंचा। माता पार्वती के दर्शन करते ही पार्वती पर मोहित हो गए और मोहित होकर के महाराजा शिव से कहा कि या तो मुझे पार्वती को अर्पित करो अन्यथा इस कंगन से मैं आप को भस्म कर दूंगा ।
अब महाराजा शिव ने यह विचारा कि यह तो एक मर्यादा का उल्लंघन होने चला ।क्या करना चाहिए? उसी काल में उन्होंने कहा कि अरे भस्मासुर ! मुझे कुछ समय प्रदान किया जाए , उन्होंने कहा कि बहुत अच्छा।
समय लेकर के शिव कैलाश को त्याग करके ब्रह्मा के द्वार जा पहुंचे। ब्रह्मा ने उनकी बात को सुना लेकिन सहायता करने से इंकार कर दिया। इसी प्रकार विष्णु के यहां पहुंचे तो विष्णु ने भी सुनकर के इनकार कर दिया। इंद्र के पास पहुंचे तो इंद्र ने भी सहायता नहीं की।
अंत में निराश होकर भ्रमण करते हुए पुन: कैलाश पर आ गए और पार्वती से कहा कि देवी अब क्या करना चाहिए ?यह तो मर्यादा का विनाश होने चला है। यदि मर्यादा का विनाश हो गया तो देवी हमारा जीवन व्यर्थ हो जाएगा ।
उस समय पार्वती ने कहा कि प्रभु यदि आप मेरे वाक्य को स्वीकार कर लें तो मैं आपको कुछ कह रही हूं। महाराज शिव ने कहा कि कहो। देवी ने कहा कि उच्चारण करो कि आप मेरा और भस्मासुर का नृत्य करा दीजिए। जब नृत्य होगा तो जहां जहां मेरा हाथ जाएगा वहीं वहीं भस्मासुर का हाथ जाएगा। और जब भस्मासुर का हाथ मस्तिष्क के ऊपर के विभाग में जाएगा तो कंगन से भस्मासुर समय नष्ट हो जाएगा ।
माता पार्वती के इस वाक्य को शिव ने स्वीकार कर लिया। अब महाराज शिव ने भस्मासुर से कहा कि हे भस्मासुर तुम पार्वती के साथ नृत्य करो।
भस्मासुर ने प्रसन्न होकर के यह बात स्वीकार कर ली और दोनों का नृत्य होने लगा और इस प्रकार योजना के तहत भस्मासुर का अंत उसी कंगन से करा दिया गया।
इस का वास्तविक, वैदिक और अभिप्राय क्या है ?

देखिए भस्मासुर वही होता है जो संसार में अभिमानी होता है ।आज भौतिक विज्ञानवेत्ता जो समाज में हैं जिसमें अणु,महाअणु, त्रिसेणु इत्यादि नाना प्रकार के कंगन रूपी यंत्र एकत्र किए जाते हैं ।जैसे अग्नियास्त्र हैं ।कहीं ब्रह्मास्त्र हैं ,तो वहां आत्मा का ज्ञान नहीं होता ।वह केवल अनीति से भिन्न भिन्न प्रकार के कंगनों को, अर्थात् यंत्रों को एकत्रित करता है ।नाना कंगन रूप यंत्रों को बनाता है और परमात्मा शिव को नष्ट करना चाहता है, तो उस काल में जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो माता पार्वती का नृत्य होता है। प्रकृति नाचती है।और नृत्य करके यह जो भौतिक विज्ञानवेत्ता समाज है यह तो परमाणुवाद का समाज है , यह स्वयं उस भयंकर अग्नि में भस्म हो जाता है। और भौतिक विज्ञानवेत्ता में जब अभिमान हो जाता है तो अभिमान को हमारे यहां भस्मासुर कहते हैं।

(दिनांक 26 अक्टूबर 1967 को प्रस्तुत पुष्प)
प्रस्तोता : देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत समाचार पत्र

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