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भारतीय संस्कृति

स्वच्छता से अस्वच्छता की ओर

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भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने स्वच्छता को ईश्वर उपासना में साधन माना है महर्षि पतंजलि ने शौच (जल से शरीर बाहरी अवयवों की शुद्धि) अष्टांग योग में यम नियमों में गणना की है|

शरीर की स्वच्छता चित्त की एकाग्रता में वृद्धि करती है|
हैंड वॉशिंग सबसे बड़ा प्रिवेंशन माना गया है रोगाणुओं विषाणु से उत्पन्न डिजीज के खिलाफ… | डब्ल्यूएचओ ने बुकलेट जारी किया है हाउ टू हैंड वॉश , booklet में हाथ धोने के 7 स्टेप्स है हाथ धोने में 20 सेकंड की अवधि निर्धारित की है… यदि आप इस मेथड से हाथ नहीं धोते हैं तो आप पानी साबुन सैनिटाइजर की बर्बादी करते हैं केवल 20 फीसदी रोगाणु ही साफ हो पाते हैं| 80 फ़ीसदी bacteria virus हाथ पर ही चुपके रह जाते हैं |

आजकल पीढ़ी का तो पता नहीं किसी बुजुर्ग के हाथ धोने के तरीके को देखें वह काफी तसल्ली से रगड़ रगड़ कर हर एंगल से हाथ को धोता है यह हूबहू who के हाथ धोने की दिशा निर्देश से मिलती जुलता है… हमें यह कहना चाहिए डब्ल्यूएचओ के एडवाइजरी हमारे बुजुर्गों के हाथ धोने के तरीके से मिलती है जो इसका घोतक है कि आधुनिक हाइजीन की जितनी भी पद्धतियां है वह सभी भारतीय जीवन पद्धति से निकली है…|

आपको आश्चर्य होगा 1840 तक यूरोप में आम जनता की तो बात छोड़ो डॉक्टर भी हाथ नहीं धोते थे| जच्चा बच्चा रोग मृत्यु दर पूरी दुनिया में सर्वाधिक थी माताएं प्रसव के तुरंत बाद बुखार में संक्रमण से मर जाती थी…|
इस समस्या पर सबसे पहले नजर हंगरी के डॉक्टर जच्चा प्रसूति रोग विशेषज्ञ Ignaz Semmelweis का ध्यान आकर्षित हुआ | उसे एक अंग्रेज ने बताया कि भारत में जच्चा-बच्चा मृत्यु दर पूरी दुनिया में बहुत कम है| उसने तमाम आंकड़े इकट्ठे किए विश्लेषण किया तो पाया भारत में प्राचीन काल से स्वस्थ वर्कर (दाई )होती है वह हाथों की स्वच्छता का बहुत ख्याल रखती है प्रसव से पूर्व तथा प्रसव के पश्चात… प्रसव के बाद माता बच्चे का विशेष ख्याल रखा जाता है…. सवा महीने का प्रसूति काल होता है… जिस दौरान बच्चे माता को संक्रमण की काफी संभावना होती है उसे बड़ी सावधानी से गुजार दिया जाता है…. नीम हल्दी अजवाइन आदि चीजें इस्तेमाल में लाई जाती थी |

Obestrictis , मेडिकल साइंस में इस काल को पोस्टपार्टथम पीरियड कहा जाता है… डब्ल्यूएचओ ने इसकी अवधि 2 सप्ताह से लेकर 6 सप्ताह तक निर्धारित की है…. बच्चा जनने के बाद माता के प्रजनन अंग इतनी अवधि में ही नॉर्मल हो पाते हैं जिसमें यूट्रस का आकार सिकुड़ता है ,प्रेगनेंसी हार्मोन बैलेंस होते हैं… 19 वीं शताब्दी तक यूरोप इस विषय में बिल्कुल अनभिज्ञ था |

भारत में प्रसूति विज्ञान गांव घर का घर तक प्रचारित था|Ignaz Semmelweis हंगरी के चिकित्सक महोदय तमाम विषय पर अनुसंधान कर यह पुस्तक लिखते हैं|

“Concept and Prophylaxis of Childbed Fever”

इसी पुस्तक के आधार पर जो भारतीय जीवन पद्धति के आधार पर लिखी गई यूरोप के शासक चिकित्सा अधिकारी सभी डॉक्टरों का मरीज के इलाज से पूर्व चीर फाड़ से पूर्व पश्चात कैलशियम हाइपोक्लोराइट से हाथ धोना अनिवार्य कर देते हैं तेजी से संक्रमण जच्चा बच्चा मृत्यु दर में कमी आती है जो दर 50 फ़ीसदी थी वह घटकर 1 फ़ीसदी पर आ जाती है…|

पुस्तक के लेखक डॉक्टर Ignaz महोदय को सेवियर ऑफ मदर की उपाधि दी गई… उनके कारण यूरोप में लाखों-करोड़ों माताओं का जीवन बच पाया |

लेकिन आज भारत के अधिकांश लोग हाथ धोना ही लोग भूल गए हैं जल्दबाजी में आनन-फानन में इस काम को निपटा लिया जाता है जिनके पूर्वजों ने पूरी दुनिया को साफ रहना सिखाया आज वही देश का स्वास्थ्य मंत्रालय हाथ धोने को लेकर एडवाइजरी जारी कर रहा है…. कोरोना वायरस के खतरे को टालने के लिए…|

2016 में पूरी दुनिया में सर्वे होता है हाथ धोने की आदतों को लेकर पहला स्थान आपको विश्वास नहीं होगा सऊदी अरब का आता है जहां पानी पहले से ही कम उपलब्ध है दूसरा स्थान संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे खराब हालत चाइना , भारत की मानी गई…|

ऐसी स्थिति में आर्य कवि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की यह रचना चित्त में कौंध जाती है |

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है

यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े

वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा

संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में

वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे|

आओ सभी विचारे|

आर्य सागर खारी I ✍✍✍

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