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अल्पसंख्यकों का मुस्लिम देश में भविष्य, लेखमाला- भाग – 4

 

प्रेषक- #डॉविवेकआर्य

1880 में बसु परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया सूरज कुमार। ढाका विश्वविद्यालय से बी ए पास करने के पश्चात वह युवक अहमदाबाद पहुंच गया। वहां कपडा मिल के मैनेजर थे केशवलाल मेहता। उन्होंने उसके गुण देखकर उसे अपनी कपड़ा मिल में रख लिया। मिल में कपड़ा सम्बंधित प्रक्षिशण लेकर वह युवक ढाका लौट गया। वहां उसने ढाकेश्वरी कॉटन के नाम से 1927 में काटन मिल की स्थापना की। धीरे धीरे भारत के इस पूर्वी भाग के प्रसिद्द उद्योगपतियों में गिना जाने लगा। मजदूरों की भलाई के लिए स्कूल-कॉलेज, मैदान,रात्रि पाठशाला, टेक्निकल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट आदि सब बनवाये। उनकी मिल की वार्षिक बिक्री थी दो करोड़ सत्तर लाख रुपये। सूरज कुमार ने 83 लाख रुपये टैक्स दिया था। उनकी मिल में 9 हज़ार कर्मचारी कार्य करते थे।

कर्मचारियों का मासिक वेतन पचपन लाख रुपये था। 1963 में सूरज कुमार का स्वर्गवास हुआ। उनके पुत्र का नाम था सुनीलकुमार बसु। वे भी परिश्रम और प्रतिभा में अपने पिता के अनुकूल थे। उन्होंने भी पिता के समान आदर्श कोटन मिल की स्थापना की थी। उन्हें पाकिस्तान सरकार ने तगमा-ए-पाकिस्तान से समान्नित भी किया था। उनकी देहात में सैकड़ों एकड़ भूमि और ढाका में 35 मकान थे। हर वर्ष दुर्गापूजा के अवसर पर वे भारी आयोजन करते थे।

समय ने पलटा खाया। पाकिस्तान सरकार ने उनपर राजद्रोह का आरोप लगा दिया। सात साल की सख्त सजा और 50 लाख का जुर्माना लगाया गया। जेल में वह सुखकर कांटा हो गए। 1971 में उनकी धीरे धीरे बुझती प्राण शक्ति पुन: प्रदीप्त हो उठी। उन्हें लगा जैसे कोई देवीय चमत्कार हुआ है। पूर्वी पाकिस्तान बंगलादेश बन गया। सुनील बाबू जेल से छूट गए। पर जाये कहा। उनके 35 मकान, सैकड़ों एकड़ भूमि, मिल, हज़ारों कर्मचारी, परिवार, आलीशान कोठी। सब पर गैरकानूनी रूप से कब्ज़ा हो चूका था। पाकिस्तानी पुलिस के अत्याचारों से तंग आकर उनके परिवार वाले कोलकाता चले गए थे। उनकी हालत दर-दर भटकते भिखारी जैसी हो गई। पर वे लोहे के बने थे। उन्होंने हाथ पैर मारने शुरू कर दिए। शेख मुजीब से मिले। कभी उन्होंने उन पर अनेक उपकार किये थे। सुनील बाबू के साथ गए व्यक्ति ने शेख साहिब को सारी बात बता दी। शेख साहिब ने प्राइवेट सेक्रेटरी को बुलाकार कहा कि सुनील बाबू का मकान तीन दिनों में मिल जाना चाहिए। पर उस वार्तालाप को तीन साल बीत गए। दादा के निवास स्थान पर कब्ज़ा करने वाला व्यक्ति इतना प्रभावशाली था कि अफसरों का मुँह बंद कर देता था। वे कभी रामकृष्ण मिशन के आश्रम में रहे। कोर्ट के चक्कर लगाते रहे। जाने दादा को कब न्याय मिलेगा। तब तक वह जीवित रहेंगे या नहीं। दादा अपने घर के सामने बनाये गए नौकरों के निवास में रहते हैं। अपने पुराने वफादार सेवकों के साथ। उनकी पथरीली ऑंखें उनके परिवार के देश को और देश के उनके परिवार को योगदान की साक्षी हैं।

एक धनी प्रतिष्ठित गैर मुस्लिम परिवार का ऐसा हश्र एक मुस्लिम देश में हुआ। आप सोचिये की निर्धन गैर मुस्लिम परिवारों के साथ कैसा व्यवहार होता होगा।

अब आप बताये कि क्या ऐसे दो करोड़ गैर मुसलमानों को अपने शोषित जीवन से मुक्ति दिलाकर भारत में यथोचित सम्मान क्यों नहीं मिलना चाहिए ?इसलिए मैं CAA और NRC का समर्थन करता हूँ। क्या आप मेरे साथ है?

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